मेरे मुल्क के हुक्मरान (डायरी 13 जून, 2022) 

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भारत में मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ायी जा रही हैं। न्यायपालिका को यह संदेश दिया जा रहा है कि कार्यपालिका जो चाहे वह कर सकती है। हुक्मरानों को लोक-लाज की भी परवाह नहीं। उसे तो इसकी भी परवाह नहीं है कि देश का माहौल किस तरह का जहरीला होता जा रहा है। ये सारी बातें कल जेहन में उस वक्त आयीं जब मैं अपने लिए कुछ सब्जियां खरीदने बाहर निकला। दरअसल, पूर्वी दिल्ली के जिस इलाके में मैं रहता हूं, वहां जरूरत की सारी चीजें आसानी से मिल जाती हैं। यहां तक कि शराब की दुकान भी गली के मोड़ पर ही है।

ऐसा कौन सा वीडियो है, जिसे आप सब मिलकर देख रहे हैं। जवाब मिला कि कुछ खास नहीं है। फिर कुछ पलों के बाद कहने लगे कि हम मुसलमान अब इस मुल्क में सुरक्षित नहीं हैं। वे कल इलाहाबाद में योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा एक मुसलमान का घर गिराए जाने के संबंध में बोल रहे थे। उनके चेहरे पर उदासी थी। उनमें से एक ने कहा कि आप ही देखिए कि हम जहां रहते हैं, वहां हमें मस्जिद नहीं बनाने दिया जाता है।

इस इलाके में वैसे तो आरएसएस का बोलबाला है। मंदिरों की संख्या भी खूब है और उनकी संरचनाएं भी। एक मंदिर तो ऐसा है जो एक निजी मकान में बना है और मकान के बाहर एक बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा है-  ‘प्राचीन शिव मंदिर’। बोर्ड प्लास्टिक का है और इसके उपर एक ब्राह्मण की फोटो भी लगी है। मुहल्ले के इसी हिस्से में गाड़ियां बनानेवाले और भंगार का काम करनेवाले कुछ लोगों की दुकानें हैं। तो कल हुआ यह कि सब्जी खरीदने निकला तो कुछ लोग मोबाइल पर वीडियो देख रहे थे और आपस में चर्चा भी। मुझे देखा तो एकदम से शांत हो गए।

मुझे उनका एकदम से शांत होना खल गया। एक, जिनसे मेरी लगभग रोज ही बात हो जाती है, से मैंने कहा कि ऐसा कौन सा वीडियो है, जिसे आप सब मिलकर देख रहे हैं। जवाब मिला कि कुछ खास नहीं है। फिर कुछ पलों के बाद कहने लगे कि हम मुसलमान अब इस मुल्क में सुरक्षित नहीं हैं। वे कल इलाहाबाद में योगी आदित्यनाथ की सरकार द्वारा एक मुसलमान का घर गिराए जाने के संबंध में बोल रहे थे। उनके चेहरे पर उदासी थी। उनमें से एक ने कहा कि आप ही देखिए कि हम जहां रहते हैं, वहां हमें मस्जिद नहीं बनाने दिया जाता है। हमें नमाज पढ़ने के लिए दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। जबकि इस छोटी सी बस्ती में इनके दो मंदिर हैं। लेकिन हम कुछ नहीं कहते। हम कमाने-खानेवाले लोग हैं।

नासिर भाई इस मुहल्ले में मेरे पहले मुसलमान मित्र हैं। पहले उनके पास भंगार की दुकान के अलावा चिकेन और मटन की दुकान भी थी। हमारी दोस्ती वहीं शुरू हुई थी। बाद में तो मुहल्ले के ब्राह्मणों ने उनकी चिकेन और मटन की दुकान यह कहकर बंद करवा दी कि मंदिर के बगल में यह ठीक नहीं है।

वे मुझसे ऐसी बातें कह पा रहे थे क्योंकि वे जानते हैं कि मैं पत्रकार हूं और नासिर भाई के कारण यह मुमकिन है कि मेरा स्वभाव भी जानते हैं। नासिर भाई इस मुहल्ले में मेरे पहले मुसलमान मित्र हैं। पहले उनके पास भंगार की दुकान के अलावा चिकेन और मटन की दुकान भी थी। हमारी दोस्ती वहीं शुरू हुई थी। बाद में तो मुहल्ले के ब्राह्मणों ने उनकी चिकेन और मटन की दुकान यह कहकर बंद करवा दी कि मंदिर के बगल में यह ठीक नहीं है। नासिर भाई ने तब उनकी बात मान ली थी। हालांकि वे चाहते तो विरोध कर सकते थे।

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खैर, मैं यह सोच रहा हूं कि नासिर भाई और उनके साथियों के जैसे इस देश में करोड़ों मुसलमान होंगे जो कल की घटना के बारे में सोच रहे होंगे कि कैसे एक आदमी का घर तोड़ दिया गया। हालांकि योगी सरकार ने घर तोड़ने का कारण बताया है कि वह घर अवैध था क्योंकि उसके लिए नक्शा की अनुमति नहीं ली गई थी। साथ में यह भी बताया गया है कि 10 मई को ही स्थानीय प्रशासन ने जावेद को नोटिस भेजा था।

दूसरी ओर योगी आदित्यनाथ ने सीना ठोकते हुए ट्वीट किया– “माहौल खराब करने की कोशिश करने वाले अराजक तत्वों के साथ पूरी कठोरता की जाएगी। ऐसे लोगों के लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। एक भी निर्दोष को छेड़ा नहीं जाएगा और कोई भी दोषी छोड़ा नहीं जाएगा।”
जाहिर तौर पर योगी आदित्यनाथ के लिए कानून का कोई महत्व नहीं है। अदालतों के बदले खुद किसी आरोपी को दोषी करार देने और सजा देने का उदाहरण तो यही साबित करता है। और यह भी जगजाहिर है कि मुझ जैसे असंख्य लोग यही सोच रहे होंगे। इसके पहले मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने किया और दिल्ली में नरेंद्र मोदी सरकार ने। अब योगी आदित्यनाथ की सरकार ने किया है। यह एक खास तरह की साजिश ही है। चूंकि सत्ता उनके पास है तो वह जो चाहे कह सकते हैं और दिलचस्प यह कि भारत की न्यायपालिका मुंह बंद रख सब देख रही है।

यदि मैं यह कहूं कि नरेंद्र मोदी या फिर योगी आदित्यनाथ की इस तरह की तानाशाही असल में नीतीश कुमार की नकल है तो गलत नहीं कहूंगा। जो आज ये लोग कर रहे हैं, उसी तरह का काम पूर्व बिहार में नीतीश कुमार कर चुके हैं। 2016 में बिहार में शराबबंदी के बाद हजारों लोगों के घर इसलिए ढाह दिये गये क्योंकि उनके उपर शराब रखने-बेचने का आरोप था। जिनके घर ढाहे गए वे सब गरीब और अधिकांश दलित थे। अधिकांश के घर ऐसे थे कि बुलडोजर को उन्हें ध्वस्त करने में पांच मिनट भी नहीं लगता था।

अदालतों के बदले खुद किसी आरोपी को दोषी करार देने और सजा देने का उदाहरण तो यही साबित करता है। और यह भी जगजाहिर है कि मुझ जैसे असंख्य लोग यही सोच रहे होंगे। इसके पहले मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने किया और दिल्ली में नरेंद्र मोदी सरकार ने। अब योगी आदित्यनाथ की सरकार ने किया है। यह एक खास तरह की साजिश ही है।

जब नीतीश कुमार अपनी मनमर्जी कर रहे थे तब बिहार की मीडिया में उनके दुस्साहस का महिमामंडन ठीक वैसे ही किया गया जैसे कि आज जनसत्ता जैसे अखबार ने योगी आदित्यनाथ हुकुमत का किया है। बिहार में चूंकि घर दलितों और गरीबों के ढाहे गए थे, तो मिडिल क्लास और अपर क्लास को कोई फर्क नहीं पड़ा था। वे खामोश थे। आज एक मुसलमान का घर ढाहा गया तो सब खामोश हैं। मुझे नहीं लगता है कि कोई आंदोलन करेगा। उत्तर प्रदेश में विपक्ष के नेता अखिलेश यादव भी कल ट्वीटर पर ट्वीट करते ही दीखे। आगे भी वह ऐसा ही करते रहेंगे।
दरअसल, बहुमत के अंहकार ने हमारे हुक्मरानों को बौरा दिया है। आवश्यकता है कि न्यायपालिका को उसका काम करने दिया जाय। यदि ऐसा नहीं होगा तो लोगों में असंतोष बढ़ता जाएगा और असंतोष जब हद को पार करेगा तो हमारे मुल्क के लिए यह ठीक नहीं होगा। बिहार में तो नीतीश कुमार का दिमाग ठीक हो गया है और अब वहां गरीबों के घर के नहीं ढाहे जा रहे। उम्मीद है कि नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ जैसों का दिमाग भी ठीक हो और वे संविधान का सम्मान करें, संवैधानिक संस्थाओं को अक्षुण्ण रखें, न्यायपालिका का मान करें।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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