क्या कोई मेरे गाँव का नाम बता सकता है

विरजानंद गरीब

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गाँव के लोग के बहाने अपने गाँव की याद

मेरा नाम विरजानंद गरीब है और मैं दक्षिण अफ्रीका में रहता हूँ| मेरे पिता 1912 में भारत के गोंडा जिला, उत्तर प्रदेश से यहाँ आये थे इसलिए आप मुझे उत्तर प्रदेश से आया हुआ कह सकते हैं| मैं एक यादव हूँ, एक पक्का भारतीय हूँ और मेरे दिल में भारत ही बसता है| मेरी संस्कृति भारत की है और मेरी भाषा भी भारत की है, इसलिए मैं हर तरह से एक भारतीय हूँ| सिर्फ मेरी नागरिकता दक्षिण अफ्रीका की है लेकिन मैं अपने आप को भारत का ही समझता हूँ और मुझे इसपर गर्व है| और वह इसलिए हैं की मैं जो भी हूँ उसपर मुझे गर्व है| हमें बनाने वाले यह उम्मीद करते हैं की हम उस भूमिका को निभाएं जिसके लिए हमें बनाया गया है इसलिए मैं वही करने की कोशिश करता हूँ जो मैं हूँ|

मेरा बचपन दक्षिण अफ्रीका के एक गांव में बीता है| मेरे घर में सिर्फ दो कमरे थे जिसमें मेरे माता पिता और हम पांच बच्चे रहते थे| घर पर पानी की व्यवस्था नहीं थी, बिजली नहीं थी और एक लकड़ी का चूल्हा था| मेरा काम रोज लकड़ी काटना था और मैं घर के आस पास की जमीन खोद कर कुछ सब्जियां ऊगा लेता था जैसे मक्का, धनिया, लहसुन, टमाटर, प्याज आदि| पिताजी काम पर चले जाते थे और उनके पास इन कार्यों के लिए कोई वक़्त नहीं होता था इसलिए ये सब कार्य मुझे ही करना पड़ता था| मेरे पिता एक कट्टर आर्यसमाजी थे| हमारे गांव के बहुत से लड़के शाम को हमारे घर आरती में आते थे| मैं उनको आरती करवाता था और हम सब आर्य समाज की रीत के हिसाब से पूजा पाठ किया करते थे| कभी कभी हम लोग हवन भी करते थे| मैं अपने पिता के साथ कभी कभी रामायण भी पढ़ता था और मेरे पिता को इसपर बहुत गर्व होता था| हम सब समय निकाल कर खेलते भी थे और क्रिकेट मेरा पसंदीदा खेल था| बरसात के दिनों में हम सब टिप और रन भी खेलते थे|

जब भाई संतोष कुमार भारत से यहाँ फरवरी में आये और मुझे मिले तो मुझे लगा जैसे भारत से मेरा कोई भाई आया है| हम एक ही भोजपुरी भाषा बोलते हैं जो की मेरे बचपन में यहाँ बोली जाती थी (आजकल लोग सिर्फ अंग्रेजी बिल्ट हैं जिसपर मुझे काफी दुःख होता है)| हमें अब अपनी पुरानी भाषा को वापस लाना है और अपने पुरानी संस्कृति को जिन्दा करना है| आज की आधुनिक संस्कृति उनकी ही स्वादहीन है जितनी आज का पाश्चात्य भोजन| यह संस्कृति कुछ भी नहीं बताती है और इसने हमारी सभ्यता को पीछे की दिशा में मोड़ दिया है| हम लोग यहाँ के लोगों को मैकाले से प्रेरित इस सभ्यता से बचाने की कड़ी मेहनत कर रहे हैं|

मैं गांव के लोग के पहले दो संस्करण से बहुत प्रभावित हुआ हूँ| इसका नाम से ऐसा लगता है जैसे हमसे इसका कोई जुड़ाव हो| भारत के ग्रामीण लोग दरअसल भगवान के बनाये सच्चे लोग हैं| वह लोग प्रकृति के साथ रहते हैं और उसी में जीते हैं| उनको जिंदगी के मूलभूत चीजों के लिए संघर्ष करना पड़ता है और ऐसे लोगों में ही भगवान बसता है| ऐसे लोगों के बारे में बताने की जरुरत है और इन्हीं लोगों की कहानियां वास्तविक हैं| मुझे इसीलिए यह पत्रिका बेहद पसंद आयी क्योंकि यह भारत के ग्रामीण लोगों की कहानियां है| और यही सच्चा भारत आज भी हमारे दिलों में बसता है| इस पत्रिका के द्वारा भारत के ग्रामीण क्षेत्रो की असली तस्वीर सामने आएगी और उसकी संस्कृति का प्रसार होगा| और फिर यह पत्रिका साहित्य के क्षेत्र में अपना वास्तविक स्थान प्राप्त कर सकेगी|

मुझे पूरा भरोसा है की अपनी जिंदगी के समाप्ति के पहले मैं भारत में गोंडा के अपने गांव के लोगों से मिल सकूँगा| मुझे लगता है की इस पत्रिका को भारत के गांव के लोगों की जिंदगी के बारे में कुछ और लिखना चाहिए| मेरी तरफ से पत्रिका को हार्दिक शुभकामनायें और भारत के ग्रामीण लोगों को दिल से बधाई|

विरजानंद गरीब

7, हिल्लार्ड एवेन्यू

मोरेहिल, बेनोनी, दक्षिण अफ्रीका

0027844911039, 0027102350220

2 Comments
  1. डॉ के एल सोनकर 'सौमित्र' says

    बेहतरीन बात, विरजानन्द जी को बधाई। —– ‘सौमित्र’

  2. विरजानन्द गरीब जी को भी बहुत शुभकामनाएं

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