घरेलू हिंसा सहते रहने से मैंने विद्रोह करना बेहतर समझा : शशिकला गौतम

अपर्णा

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शशिकला गौतम नौगढ़ में ग्राम्या संस्थान, लालतापुर द्वारा संचालित स्कूल में पढ़ाती है। इसके साथ ही वह संस्था द्वारा संचालित चिराग केंद्र में किशोरियों को सिलाई-कढ़ाई भी सिखाती है। आगे वह जीएनएम बनना चाहती है। आज वह भविष्य के नए सपने देख रही है लेकिन कुछ वर्ष पहले तक उसका जीवन बहुत से दुखों से भर गया था। नौगढ़ के मझगवा के सीमांत खेतिहर राम अशीष गौतम की पुत्री शशिकला अपने दो भाइयों से बड़ी है। शशि ने अपना बचपन खेतिहर किसानों के साधारण बच्चों की तरह गुजारा लेकिन पढ़ाई में उसका मन लगता था। कॉलेज दूर होने के बावजूद पिता ने भी इस मामले में कोई रोक-टोक नहीं की। शशि ने सोशियोलोजी, होम साइन्स और नागरिकशास्त्र से बीए किया। लेकिन जैसा कि होता है गाँव-गिरांव में इतना पढ़ लेने के बावजूद लड़कियों की नौकरी के प्रति खास जागरूकता नहीं होती। अलबत्ता अच्छे घर में अच्छे लड़के से शादी की संभावना जरूर बन जाती है।

लेकिन शशिकला के लिए शादी दुःस्वप्न बन गई। 2017 में जब वह बाइस साल की थी तब उसकी शादी चकिया तहसील में शिकारगंज के पास लठिया गाँव के विजय कुमार के साथ तय हो गई। उसकी ससुराल में अच्छी-ख़ासी ज़मीन और अच्छा घर था। अपने माँ-बाप की तरह शशि को भी उम्मीद थी कि सम्पन्न घर में उसकी शादी होनेवाली है तो उसका जीवन सुखमय गुजरेगा। 1 जून 2017 को शादी अच्छी तरह से हो गई और शशि अपनी ससुराल गई। दहेज में शशि के पिता ने चालीस हज़ार रुपए और एक बाइक दिया था। अन्य छोटे-मोटे सामानों की कीमत भी कई हज़ार थी।

शशि बताती है कि ‘यही मेरे पिता की सामर्थ्य थी। इससे ज्यादा करते तो उनको घर बेचना पड़ता। मेरे दो छोटे भाई हैं। पिता जी के अलावा और कोई कमाने वाला नहीं है। लेकिन जब मेरी विदाई नहीं हुई तभी यह बात सामने आई कि लड़के को सोने की चेन नहीं दिया। जब मैं ससुराल गई तब भी यही दबाव बनाया गया और मेरी ज़िंदगी नरक बना दी गई।’

जल्दी ही ससुराल के और लोगों का भी मुलम्मा उतर गया और असलियत सामने आ गई। शशि बताती है ‘पास-पड़ोस के लोग जब मेरी सास से पूछते कि बहू कितना लेकर आई तो वह हाथ नचा-नचाकर कहती कि अरे वे भिखमंगे सब क्या देंगे। लड़की निकाल दिये और गंगा नहा लिए। सोने की एक चेन तक नहीं दिये। जब मेरे कानों में यह सब पड़ता तो कितना अपमान महसूस होता मैं नहीं बता सकती।

ससुराल में उसके ससुर सीताराम, सास सती देवी, जेठ कपिल कुमार, जेठानी रेखा और दो छोटी ननदें नीलम और सुमन थीं। आमतौर पर  जैसा कि होता है शशि को लगा कि सब लोग ठीक हैं। उसका पति कोई नौकरी नहीं करता था बल्कि घर की ‘प्रॉपर्टी’ संभालता था। खाने-पीने की कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन उस समय शशि का सपना चकनाचूर हो गया जब पहली ही रात विजय के मुंह से शराब की बदबू उसकी नाक में पड़ी। उसने अपनी किस्मत को कोसा और सिर थाम लिया। अब यही उसके जीवन का सच था। लेकिन जब उसने उसे मना किया तो वह गालियाँ देने लगा। शशि बताती है कि ‘वह कहता था मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ जो बीवी के कब्जे में रहे। मैं जूतों से पीटूंगा।’

जल्दी ही ससुराल के और लोगों का भी मुलम्मा उतर गया और असलियत सामने आ गई। शशि बताती है ‘पास-पड़ोस के लोग जब मेरी सास से पूछते कि बहू कितना लेकर आई तो वह हाथ नचा-नचाकर कहती कि अरे वे भिखमंगे सब क्या देंगे। लड़की निकाल दिये और गंगा नहा लिए। सोने की एक चेन तक नहीं दिये। जब मेरे कानों में यह सब पड़ता तो कितना अपमान महसूस होता मैं नहीं बता सकती। जबकि मेरे पिता ने अपनी सामर्थ्य भर दहेज तो दिया ही, बारातियों की खातिरदारी भी अच्छे से की।’

शशिकला,जब आत्मनिर्भर नहीं थीं

शशि को लगा अभी सास में यह नाराजगी है लेकिन हो सकता है आगे सबकुछ ठीक हो जाय। लेकिन यह उसका भ्रम साबित हुआ। उसे अपने पति से उम्मीद थी कि वह सुधर जाएगा और उसके साथ सहानुभूति और प्यार से पेश आएगा। उसका पति विजय कुमार लगभग अनपढ़, उजड्ड और संवेदनहीन व्यक्ति था लेकिन उसका दंभ आसमान छूता था। वह अपने को बहुत खरसेटिया समझता था। शाम होते ही वह अपने दोस्तों के साथ शराब के ठेके की ओर चला जाता। वहीं या घर की बैठक में वे सभी बैठकर शराब पीते। रौब झाड़ने के लिए विजय शशि को ज़ोर-ज़ोर से आदेश देता।

शशि बताती है कि ‘विजय के मन में अपनी पढ़ाई-लिखाई को लेकर हीन भावना थी जबकि मेरे प्रति उसके मन में कुंठा भरी थी। लेकिन उसको लगता था कि पुरुष होने के नाते वह मेरे ऊपर शासन कर सकता था। एक दिन मैंने जब उसको शराब पीने से मना किया तो उसने चीखते हुये मेरे बाल पकड़ लिए और धक्का देकर ज़मीन पर गिरा दिया। फिर उसने मुझे थप्पड़ और घूंसे मारे। उसने कहा कि अब तू सोने की चेन ला नहीं तो इस घर में नहीं रहने पाएगी। मैं रोने लगी और कहा कि पिताजी के पास इतने रुपए नहीं हैं तो मैं कैसे लाऊं?’

कुछ ही देर में वहाँ पुलिस की गाड़ी आ गई। उसने अपने ऊपर किए जा रहे जुल्म के बारे में उन्हें बताया। मेरे कपड़ों से आ रही मिट्टी के तेल की बदबू से पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि मेरे साथ क्या हुआ है। घर के सभी लोग जो पहले मुझे छुड़ा रहे थे एक सौ बारह नंबर डायल करते ही उल्टे मुझे गालियाँ देने लगे थे। लेकिन पुलिस को देखकर दुबक गए। विजय, उसके बड़े भाई कपिल, जेठानी, ननदों और उसके माता-पिता को उन्होंने गाड़ी में बैठा लिया और थाने ले गए।

इस पर विजय आग-बबूला हो गया। उसने उसे उठाकर पटक दिया और उसे घसीटकर बाहर ले जाने लगा। वह ज़ोर-ज़ोर से गालियाँ देता हुआ उसे कुएं में फेंकने ले जा रहा था। शोर सुनकर पास-पड़ोस के लोग जुट गए और उसे छुड़ाया। उसकी जेठानी और ननदें भी उसे गालियाँ दे रही थीं। वह रोने के सिवा और कुछ न कर सकी।

शशि को यह देखकर बहुत दुख हुआ कि उसकी पिटाई के बारे में जानने के बावजूद सास-ससुर किसी ने भी उसका बचाव नहीं किया। वे कहते थे कि मियाँ-बीवी के झगड़े में हम क्यों पड़े। लेकिन इससे विजय को और शह मिली। अब उसने मौका खोजकर उसे अपमानित करना और शारीरिक चोट करना तेज कर दिया। शशि के लिए वहाँ रहना मुश्किल हो गया।

वह जल्दी से जल्दी अपने पिता को खबर देना चाहती थी लेकिन विजय ने उसका मोबाइल छीन लिया। वह उसे लगातार धमकाता। वह कहीं नौकरी नहीं करता था लेकिन सड़क के किनारे काफी ज़मीन होने के कारण वह उसको लगातार अच्छे दामों पर बेच रहा था और इस तरह खूब मौज-मस्ती करता और भौकाल बांधता। शशि बताती है कि ‘उन सबको पैसे की इतनी गर्मी थी कि किसी रिश्ते को लेकर कोई संवेदना ही नहीं बची थी। उनको लगता कि पैसे के आगे सब झुकते हैं और पैसे के कारण वे हर तरह का अपराध करके बच सकते हैं।’

इतना सबकुछ होने के बावजूद वह गहरे द्वंद्व में थी कि यहाँ से निकलकर वापस मायके चली जाय लेकिन अपने पिता की आर्थिक स्थिति के बारे में सोचकर मन और दुखी हो जाता। सीमित आर्थिक स्थिति में चार लोगों का परिवार चलाना उनके लिए अत्यंत कठिन था। घर की सारी जमा-पूंजी लगाकर उसकी शादी की और अब जब उनको यह सब पता चलेगा तो वे टूट जाएंगे। फिर से उनके ऊपर बोझ बनना क्या ठीक रहेगा। लेकिन ससुराल में रह पाना तो असंभव होता जा रहा था।

कुछ दिनों बाद जब शशि के पिता वहाँ गए तो उसने उनके साथ मायके जाने की इच्छा प्रकट की। वह बताती है कि ‘ससुराल वालों का व्यवहार रंगे सियार जैसे था। वे ऊपर से सद्भाव दिखा रहे थे जिससे मैं पिताजी को कोई बात बताकर रोने न लगूँ लेकिन उनकी बेरुखी और दोहरा व्यवहार पिताजी की समझ में आ गया। उन्होंने मेरी विदाई कराई। और मैं मझगवां आ गई।’

शशि कहती है कि ‘पिता के घर आकर वह अपने को जब्त किए रही लेकिन मेरे चेहरे की उदासी और मन की निराशा भला कितने दिन छिपती। आखिर सबको पता लग गया कि ससुराल मेरे लिए यातनागृह है। माता-पिता गहरे दुख में पड़ गए। उन्होंने कितने सपने देखे थे लेकिन सबकुछ धूल में मिल गया। पिताजी ने कहा कि गलती तो हमसे हुई लेकिन अब हम लड़की को नरक में नहीं भेजेंगे।’

अब उसे लगता है कि शादी-ब्याह से अधिक जरूरी अपने पाँव पर मजबूती से खड़ा होना है। केवल तभी महिलाएं अपने आत्मसम्मान को बचा सकेंगी। बिन्दु सिंह कहती हैं कि ‘उसका यह आत्मविश्वास चकित करता है। दो साल पहले तक उसके दुखों का कोई अंत नहीं था लेकिन अब उसने हँसना सीख लिया है!’

लेकिन अगले कुछ महीने बाद उसके ससुर विदाई कराने के लिए आ गए। माँ-बाप ने उन्हें आड़े हाथों लिया और वापस कर दिया। फिर कुछ दिन बाद वे अपनी पत्नी के साथ आए। अपने लड़के के किए पर शर्मिंदा होते हुये रिश्ता न तोड़ने की बात करने लगे। उन लोगों ने शशि के माँ-बाप को आश्वासन दिया कि अब बहू को कोई तकलीफ नहीं होगी। अपने बेटे को भी नियंत्रण में रखेंगे। आखिर बहुत सोच-विचार के बाद शशि को उसके पिता ससुराल भेजने पर राजी हो गए।

शशि कहती है ‘लेकिन कुत्ते की दुम टेढ़ी की टेढ़ी ही रही। बमुश्किल दो दिन बीता कि फिर से वही सब शुरू हुआ। विजय रोज पीकर आता और मुझे गंदी-गंदी गालियाँ देता। मना करने पर मारता था। रोटी खाना मुश्किल हो गया। वह न जाने किस बात का बदला ले रहा था। मुझे लगता कि न जाने किस अनजाने देश में रह रही हूँ जहां किसी को मुझसे कोई सहानुभूति नहीं है। मैं कितना समझौता करती। मैं तो बर्दाश्त कर ही रही थी लेकिन अगले को लगता था कि उसको हर जुल्म करने का अधिकार है।’

ऐसा अनेक बार हुआ कि उसे मनाकर और उसके माता-पिता को सबकुछ ठीक रहने का आश्वासन देकर उसे ससुराल लाया गया लेकिन मारपीट में कमी नहीं आई। उसका पति कहता कि तू आखिर जाएगी कहां? आना यहीं है। कोई कुछ नहीं बोलेगा न कोई कुछ कर सकता है। वह इसी बात पर मारना-पीटना शुरू कर देता कि तुम फिर से क्यों आ गई। वह उसे केवल शारीरिक रूप से ही प्रताड़ित नहीं करता था बल्कि उसके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को भी चोट पहुंचाता।

संस्था द्वारा संचालित चिराग केंद्र में किशोरियों को सिलाई-कढ़ाई सिखाती हुईं शशिकला

शशि के बर्दाश्त की सीमा खत्म होती जा रही थी। वह चाहती थी कि उसका परिवार न टूटने पाये लेकिन उसके हाथ में कुछ नहीं था। इस मोर्चे पर वह बुरी तरह टूट चुकी थी। वह बताती है कि उसी दौरान लालतापुर स्थित ग्राम्या संस्थान की नीतू सिंह बहनजी मेरे गाँव आईं। उन्होंने मुझसे कहा कि कभी भी घरेलू हिंसा नहीं सहना चाहिए। इस बात से मुझे काफी हिम्मत मिली।

हिम्मत बांध लेने से मन में प्रतिरोध की भावना पैदा हुई। अब वह अपने उत्पीड़न के खिलाफ तन कर खड़ी थी लेकिन विजय के लिए वह पहले वाली शशि ही थी। उसने एक दिन फिर उसको गालियाँ दी, मारा-पीटा और उसके ऊपर मिट्टी का तेल का गैलन उलट दिया।

शशि बताती है कि ‘मैं अपने ससुर के गिड़गिड़ाने पर इस बार ससुराल आई थी लेकिन मैंने थान लिया था कि अब जुल्म नहीं बर्दाश्त करूंगी। आखिर मेरा अपराध क्या है? मैं क्यों उनसे दबती रहूँ और गाली-मार सहती रहूँ? मेरा इरादा अब आत्मसम्मान से जीने का था। आखिर एक ब्याहता पत्नी के रूप में इस घर पर मेरा भी हक था और अपने ही घर में मैं गुलाम क्यों रहूँ। इसलिए जब अगली बार विजय ने मुझसे गाली-गलौज और मारपीट की तब मैंने भी जवाब दिया। यह उसके लिए सदमा था। उसने मेरे ऊपर हमला कर दिया और घर में रखे गैलन का मिट्टी का तेल मेरे ऊपर उड़ेल दिया। मैं भींग गई और थरथर कांपने लगी। लेकिन मैंने भी कहा कि आज मर जाऊँगी लेकिन अब नहीं सहूँगी। मैंने एक सौ बारह नंबर डायल कर दिया।’

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कुछ ही देर में वहाँ पुलिस की गाड़ी आ गई। उसने अपने ऊपर किए जा रहे जुल्म के बारे में उन्हें बताया। मेरे कपड़ों से आ रही मिट्टी के तेल की बदबू से पुलिस को यह समझते देर नहीं लगी कि मेरे साथ क्या हुआ है। घर के सभी लोग जो पहले मुझे छुड़ा रहे थे एक सौ बारह नंबर डायल करते ही उल्टे मुझे गालियाँ देने लगे थे। लेकिन पुलिस को देखकर दुबक गए। विजय, उसके बड़े भाई कपिल, जेठानी, ननदों और उसके माता-पिता को उन्होंने गाड़ी में बैठा लिया और थाने ले गए। आस-पड़ोस के अनेक लोग उल्टे शशि को ही समझाने लगे कि इससे क्या इज्जत रह जाएगी। यह अच्छी बात थोड़े है। लेकिन उसने किसी भी समझौते से इंकार कर दिया। उसने कहा कि अगर मेरे साथ हादसा हो गया होता तो क्या करते। इसपर सब अपना सा मुंह लेकर वापस चले गए।

शशि इस बार हमेशा के लिए ससुराल को त्याग आई। अगले कुछ साल उसके लिए भयानक यातना और पीड़ा के साल रहे। वह बहुत भावुक हो जाती और रोने लगती। फिर भी उसने हिम्मत से काम लिया और तलाक ले लिया। यह सामाजिक रूप से भी कष्टदायक बात थी लेकिन उसको लगा कि जीवन के और भी रास्ते हैं।

नीतू के जरिये वह ग्राम्या से जुड़ गई थी। संस्थान की अध्यक्ष बिन्दु सिंह ने उसे चिराग केंद्र में काम करने को कहा। वहाँ वह किशोरियों को सिलाई सिखाने लगी। क्रमशः उसने संस्थान के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाना शुरू किया। अब वह अपनी पढ़ाई आगे करना चाहती है। साथ ही जीएनएम बनने का भी उसका सपना है। मैंने पूछा कि तुम और मेहनत से किसी बड़ी नौकरी की कोशिश क्यों नहीं करती? वह मुस्कराई। अब उसे अपने आप पर भरोसा है।

अपने पैरों पर खड़े होने के बाद शशिकला के चेहरे पर झलकता आत्मविश्वास

उसके पिता, माँ और भाई सभी उसे बहुत प्यार करते हैं। मैंने पूछा कि क्या तुम्हारे पिता तुमको नौकरी करने देंगे? शशि ने बताया कि मुझे आगे पढ़ने और यहाँ काम करने की छूट तो उन्होंने दी ही है लेकिन यह मैं नहीं जानती कि आगे को लेकर उनके मन में क्या है। उन्होंने अभी कुछ भी नहीं बताया है।

बहरहाल, अब उसे लगता है कि शादी-ब्याह से अधिक जरूरी अपने पाँव पर मजबूती से खड़ा होना है। केवल तभी महिलाएं अपने आत्मसम्मान को बचा सकेंगी। बिन्दु सिंह कहती हैं कि ‘उसका यह आत्मविश्वास चकित करता है। दो साल पहले तक उसके दुखों का कोई अंत नहीं था लेकिन अब उसने हँसना सीख लिया है!’

अपर्णा रंगकर्मी और गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

3 Comments
  1. Gulabchand Yadav says

    मार्मिक और प्रेरक । यह जानकर संतोष हो रहा है कि, “…अब शशिकला ने मुस्कुराना सीख लिया है।”

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