कुलीनतावादी लेखक सुविधाजनक रास्ते पर ही रहते हैं.. (कथाकार, इतिहासकार सुभाषचन्द्र कुशवाहा से अपर्णा की बातचीत )

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बातचीत का तीसरा हिस्सा-

आपके अनुभव ने कितने चरित्रों की सर्जना की?

मेरी रचनाएँ पाठकों के सामने हैं। अब तक 65 कहानियाँ प्रकाशित हैं। उनके मुख्य पात्रों की संख्या इसी से अनुमानित की जा सकती है।

आप किस तरह की सामाजिक-सांगठनिक गतिविधियों में शामिल रहे हैं?

मैं कभी अकेला नहीं जिया। जीवन को सामाजिक संदर्भों में बचपन से ही शुरू किया। कक्षा पांच में था तो गांव के गरीब बच्चे पुआल का गेंद बनाकर खेलते थे। पैसे नहीं थे हम लोगों के पास कि रबड़ की बॉल खरीदें। सबसे पहले चार-पांच लड़कों ने धान सुरुक कर चार आने का एक बॉल खरीदा। फिर धान बीनकर आठ आने की बॉल खरीदी। उसके बाद हमने खेतों से बालियों को बीनकर बारह आने या एक रुपए की बॉल खरीदी। अब हमारे टोले के बच्चे पुआल की गेंद के बजाए, रबड़ की गेंद से खेलने लगे। जब मैं कक्षा छ: में पहुंचा तब चंदा जमा कर सात रुपए की एक फुटबॉल खरीदी। एक बार 22 किलोमीटर दूर, सेखवनियां पैदल चला गया था फुटबॉल खरीदने। कक्षा नौ में आते-आते, गांव में फुटबॉल प्रतियोगिता शुरू करा दिया था। इण्टर में नाटकों का मंचन गांव में कराया। खुद मुख्य नायक का पार्ट किया। वीर अभिमन्यु नाटक में अभिमन्यु का रोल किया। अंधेर नगरी चौपट राजा को तत्कालिक सत्ता विमर्श से जोड़कर मंचित किया। फुटबॉल प्रतियोगिता जारी रही। बीएससी में आते-आते शहीद भागत सिंह पुस्तकालय खोला जिसमें गरीब बच्चों को पढ़ने के लिए किताबें मुफ्त दी जाने लगीं। चंदा जुटाकर गरीब किंतु मेधावी छात्रों को छात्रवृत्ति देने का कार्य भी किया गया और छात्रों के चयन के लिए तीन केन्द्रों पर लिखित परीक्षा आयोजित कराया। बाद में ये दोनों योजनाएं बंद हो गयीं मगर फुटबॉल प्रतियोगिता चलती रही। गांव वालों को साहूकारों के कर्ज से बचाने के लिए भी एक कोष बनाकर मदद शुरू की गयी मगर यह योजना चल न सकी। गांव पर सांस्कृतिक कार्यक्रम होते रहे। 2008 से लोकरंग सांस्कृतिक समिति का गठन कर हमने लोक कलाओं के सामाजिक पक्षों को सामने लाने का जो अभिायान शुरू किया, उसकी ख्याति देश-विदेशों तक गयी। वह आज भी जारी है। गांव से बाहर, विश्वविद्यालय जीवन में वामपंथी छात्र राजनीति की ओर झुकाव हुआ। गोरखपुर विश्वविद्यालय में प्रगतिशील छात्र आंदोलन का पहला सचिव रहा और शुल्क विरोधी आंदोलन का सूत्रपात कर पूरे एक माह तक आंदोलन चलाया जिसके फलस्वरूप आंशिक रूप से फीस बढोत्तरी कम हो सकी। कुछ समय तक जन संस्कृति मंच से भी जुड़ा रहा।

क्या आपको लगता है कि सामाजिक संगठनों का कोई राजनीतिक एजेंडा होता है?

बिल्कुल होता है। कहने को आरएसएस एक सामाजिक संगठन है मगर वह खुले तौर पर राजनीतिक गतिविधियों में शामिल है। राजनीतिक एजेंडा कोई बुरी चीज नहीं होती बशर्ते उसमें लोकतंत्रात्मक विधान हो और वह जनपक्षधर हो या वह हाशिए के समाज की भलाई के लिए हो। व्यापक समाज के विरुद्ध, कुछ खास लोगों के हित-साधन वाले संगठनों को मैं सामाजिक संगठन नहीं मानता।

क्या आप महसूस करते हैं कि हिन्दी साहित्य अपने समय और समाज का आईना है?

यात्रा पर सुभाष…

साहित्य समय का आईना होता ही है। हिन्दी साहित्य भी अपने समय को ही व्यक्त कर रहा है। कम या ज्यादा, वही हिन्दी साहित्य जिंदा है, जिसने समय से साक्षात्कार किया है। हां यह भी सही है कि ज्यादातर हिन्दी साहित्य सवर्ण साहित्य रहा है और वहां हाशिए के समाज के लिए बहुत कम स्थान रहा है। खाये-पीये,अघाये लोगों की बहुलता के कारण, समाज की बजबजाहट से किनारे चलने की प्रवृत्ति रही है। जातिवादी समाज में जातिदंश पर प्रहार करने वाले सवर्ण समाज के बहुत कम लेखक दिखते हैं। अकादमियों और विश्वविद्यालयों में तो अपनी जाति-बिरादरी को स्थापित करने का खेल ही चलता रहा है। वहां हाशिए का समाज अनुपस्थित रहा है। इन सब चरित्रों का भी प्रतिबिम्ब, हिन्दी साहित्य में देखने को मिलेगा।

हाशिए के समाज के कवि को आप जगह कहां देते हैं? कबीर तक को उपेक्षित करने का प्रयास किया गया तो बाकी की क्या बात? हीरा डोम की एक ही कविता क्यों प्रकाश में आती है? क्या जैसी कविता हमें पढ़ने को मिलती है, उससे यह विश्वास किया जा सकता है कि हीरा डोम ने मात्र एक कविता लिखी होगी? अनपढ़ रखे गए समाज ने वाचिक परंपरा में लोक गीतों के माध्यम से अपनी व्यथाओं को सामने लाने का प्रयास किया, बिना किसी संग्रह के। वाचिक परंपरा की सारी कविताएं या गीतों की रचना लोक भाषा में हुई है। जब कवि लोक समाज से नहीं आयेगा तो उसकी भाषा लोक की कैसे होगी?

वे कौन-से मुद्दे हैं जो आपको लगता है साहित्य से गायब हो गए हैं?

साहित्य से गांव और गंवई आपदाएं गायब दिख रही हैं। पूरी तरह से नहीं, मगर गांव और खेती-किसानी की उपेक्षा हुई है। अल्पसंख्यक, आदिवासी और जनजातीय मुद्दों पर कम चर्चा हुई है। जातिदंश और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के विरुद्ध बहुत कम साहित्य रचा गया है जबकि इनकी मार से समाज का गरीब तबका ज़हालत की जिन्दगी जीने कोे अभिशप्त है।

तो फिर साहित्य में ज्यादातर किन मुद्दों का समावेश हुआ है?

साहित्य में ज्यादातर मध्यमवर्ग की कुंठाएं और सरोकर सामने आए हैं। हाशिए के समाज की आपदाएं, उनके सरोकार से गायब हैं। सामाजिकता गायब है। खेती-किसानी गायब हैं। कथ्य पर शिल्प हावी है।

किसी साहित्यिक कृति में कथ्य की ही सामाजिकता नहीं होती, उसके शिल्प और भाषा की भी सामाजिकता होती है। इसलिए साहित्य के नए शिल्प और भाषा की सार्थकता, उसकी सामाजिकता से आंकी जानी चाहिए। बेशक उपेक्षित या अप्रत्याशित विषय को लेकर रचना का निर्माण किया जा सकता है। बशर्ते कि उपेक्षित या अप्रत्याशित विषय का, समय और सामाजिकता से नाता बन रहा हो या बन गया हो। साथ ही साथ उपेक्षित और अप्रत्याशित विषय नए जीवन मूल्यों को समझने में सहायक सिद्ध हो रहे हों। इससे इतर अप्रत्याशित और उपेक्षित विषय की रचना, उसकी भाषा और शिल्प के उपेक्षित हो जाने की संभावना बनी रहेगी। जो भाषा और शिल्प, हिन्दी साहित्य में प्रयुक्त हुई, वह खास वर्ग की मनोदशाओं को संबल प्रदान कर रही थी। पहली बार दलित साहित्यकारों ने इसे झकझोरा। अपनी भााषा और शिल्प से हिन्दी साहित्य की कुलीनतावादी मनोदशाओं के सामने अवरोध पैदा कर दिया।

आज साहित्य सामाजिक सम्मान पाने का एक आसान रास्ता हो गया है इसलिए पुरस्कारों की छुद्र राजनीति, चापलूसी और जोड़-तोड़ साहित्यिक सफलता के जरूरी शर्त हो गए हैं। आपको क्या लगता है?

दरबारीकरण पहले भी था और आगे भी रहेगा। दरबारी संस्कृति वाले तथाकथित साहित्यकारों की अपनी अलग प्रजाति है। हिन्दी समाज में मूल्य और निष्ठाएं कमजोर रही हैं। विभिन्न जातियों और ऊंच-नीच में विभाजित समाज शुरू से अमानवीय रहा है और वही उसकी वैचारिकी भी। ऐसे में मूल्यहीन वैचारिकी में सीधे खड़े रहने का गुण नहीं होता। रेंगने का संस्कार पैदा होता है। पुरस्कारों के जुगाड़ में चरणवंदना करना कोई अप्रत्याशित चीज नहीं है। मैं किसी भी पुरस्कार की अपेक्षा नहीं करता और केवल हाशिए के समाज के मुद्दे को उठाना ही अपना पुरस्कार समझता हूं।

यही संतुष्टि देता है- जैसे लोक कलाकार रसूल मियां की खोज,चौरी चौरा विद्रोह के गलत इतिहास को दुरुस्त किया। अवध किसान विद्रोह के मूल नायकों को सामने रखा, कबीर पर जो कुछ विदेशी अखबारों में लिखा-छपा था, उसे और भील विद्रोह के सैकड़ों नायकों को पहली बार सामने लाने का काम पूरा किया हूं। इसका संतोष है।

प्राय: साहित्यकार मानते हैं कि विचार और राजनीति लेखन के लिए गैरजरूरी है और इस क्रम में वे मार्क्सवाद और जनवाद को तो बुरा कहते हैं लेकिन कांग्रेस और भाजपा को बख्श देते हैं। इसके पीछे आपको क्या लगता है?

बिल्कुल नहीं। बिना विचार या राजनीतिक समझ के आप क्या लिखेंगे? मार्क्सवाद और जनवाद, गरीबों के हक-हकूक के विचार हैं, जो हाशिए के समाज के साहित्य के लिए जरूरी हैं। निश्चय ही साहित्य और साहित्यकार का एक वर्गाधार होता है, एक जाति होती है। वर्गाधार और जाति की एक निश्चित विचारधारा होती है। विचारधारा बिन कोई साहित्य लिखा ही नहीं जा सकता। आजकल दक्षिणपंथी हीनता के बचाव के लिए, विचारधारा को मजाक का विषय बना लिया जाता है। साहित्य को विचारधारा से मुक्त रहने की सलाह दी जाती है। खास विचारधारा से मुक्ति की बात करने वालों से पूछिये कि आज जो लोग सत्ता-सिंहासन पर आरूढ़ हैं, क्या किसी खास विचारधारा से नहीं जुड़े हैं? विचार शून्य चीज तो जड़ ही हो सकती है। इसलिए प्रतिबद्धता या पक्षधरता तब तक हेय नहीं होती, जब तक कि वह आरोपित न हो। जब तक वह सामाजिक सरोकारों की अनदेखी न करती हो या वह नारा न बनती हो। जब तक कि वह येन-केन प्रकारेण स्वयं का पक्ष पोषण न करती हो। सामाजिक होने के नाते सामाजिकता या आमजन से जुड़े होने के कारण आमजन के प्रति प्रतिबद्धता या पक्षधरता तो होगी ही। अगर व्यवस्था का स्वरूप सर्वग्रासी हो, गांव और गरीबों को तबाह करने वाला हो तो संवेदनशील रचनाकार उस पर जश्न तो मनायेगा नहीं? गांव और गरीबों का पक्ष तो लेगा ही ?

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आप अपने जीवन में कितने ऐसे लेखकों से मिलें जो भारतीय इतिहास, संस्कृति और राजनीति की सही समझ रखते हों?

प्रतिबद्ध लेखकों से दुनिया खाली नहीं है। उनकी संख्या कम हो सकती है, मगर है। त्रिलोचन जी को बहुत करीब से देखा हूं। उनकी सारी गृहस्थी उनके कुर्ते की जेब में होती थी। भारतीय समाज और संस्कृति के हर पहलू पर उनके बेबाक विचार होते थे। वह जो कहते थे, उसे ही जीवन में ओढ़ते और बिछाते थे। आज के समय दृढ़ता से खड़ी, अरुंधति राय की राजनैतिक समझ, सत्ता प्रतिष्ठानों को हिलाती रहती है। अनिल सिन्हा मेरे दूसरे मित्र और साहित्यकार रहे जिन्होंने हिन्दी साहित्यकारों के टांग खींचू प्रवृत्ति से आगाह किया था। उनकी सरलता और प्रतिबद्धता ने वैचारिक रूप से मजबूत करने का काम किया। ओमप्रकाश वाल्मीकि, बल्ली सिंह चीमा, अदम गोण्डवी, प्रो. मैंनेजर पाण्डेय, पंकज बिष्ट, कंवल भारती, राजेन्द्र प्रसाद सिंह, हरिभाटनागर, संजीव, रामजी यादव जैसे साहित्यकारों की समझ को अपने करीब पाया।

आप अपने लेखन से कितने संतुष्ट हैं?

संतुष्ट कैसे हो सकता हूं? जब संतुष्ट हो जाऊंगा तो रचना प्रक्रिया ठहर जायेगी। हाँ, जो कुछ किया हूं, उनमें से कुछ ऐसा जरूर है जो लगता है, यह मैंने ही किया है। यही संतुष्टि देता है- जैसे लोक कलाकार रसूल मियां की खोज,चौरी चौरा विद्रोह के गलत इतिहास को दुरुस्त किया। अवध किसान विद्रोह के मूल नायकों को सामने रखा, कबीर पर जो कुछ विदेशी अखबारों में लिखा-छपा था, उसे और भील विद्रोह के सैकड़ों नायकों को पहली बार सामने लाने का काम पूरा किया हूं। इसका संतोष है।

हर रंग में सुभाष…

अपनी पहली कहानी से लेकर आज तक आपने कई कहानियाँ लिखी हैं। तब से लेकर आजतक लिखी कहानी के कथ्य, शिल्प और  प्रस्तुतिकरण में आपके हिसाब से क्या बदलाव आया है?

इसका उत्तर आलोचकों या पाठकों को देने दीजिए। मेरी कहानियों के कथ्य और शिल्प में नि:संदेह परिवर्तन देखने को मिलेंगे। समयानुसार ऐसा होता ही है मगर सरोकार साफ और अपनी जगह पर होंगे यानी हाशिए के समाज के साथ, वंचित समाज के साथ और कुलीनतावाद के खिलाफ।

आज आप अनेक भूमिकाओं में हैं। कथाकार, इतिहासकार और लोकसंस्कृति मर्मज्ञ और सभी में आपका काम बहुत उल्लेखनीय  है। आपको अपनी यात्रा के इस मुकाम पर क्या महसूस होता है?

लगता है जीवन बहुत कम है, अभी शुरुआत की है। बहुत कुछ किया जाना जरूरी है। खासकर हाशिए के समाज की लोक संस्कृति और इतिहास का लिखा जाना बहुत जरूरी है। कविता, कहानी तो लिखी ही जायेगी लेकिन जो बात सामने रखने की जरूरत है वह उसके संघर्षों का विश्लेषण।

ज्यादातर लेखक कुलीनतावादी समाज से आते हैं। लेखन कार्य पेट भरने का साधन नहीं है। इस समाज की ज्यादातर आबादी अभी भी पेट पालने में सिमटी हुई है। ऐसे में वह लेखन की ओर नहीं आती। सुनने-सुनाने की परंपरा समाप्त हो गई। ऐसे में जो कुलनतावादी लेखक हैं, वे सुविधाजनक रास्ते पर ही रहेंगे। आरएसएस उनके लिए सुरक्षित जोन है। वहां वे अपनी संस्कृति की हिफाज़त करेंगे। ऐसा करने से उन्हें कुछ पद-प्रतिष्ठा हासिल हो सकेगी। विरोधी लेखकों को यह खतरे तो उठाने ही होंगे कि उन्हें कोई पद-प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी

आपने कई विधाओं में लिखा है। सबसे सही और सुविधाजनक किस विधा में पाते हैं?

समय के साथ विधाओं में बदलाव आए। जिस समय में जिस विधा में काम किया, वही सुविधाजनक लगा। हिन्दी ग़ज़ल, कहानी, आलेख, लोक संस्कृति सबमें काम किया। आज लगता है कि बात को कलात्मक ढंग की बजाए, साफ-साफ कहा जाए। जो ओझल कर दिए गए हैं, उन्हें सामने लाया जाए। तब मैंने वंचित समाज के संघर्षमय इतिहास लेखन की ओर स्वयं को लगाया और इसमें भी मुझे कतई असुविधाजनक नहीं लगता।

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यह यात्रा शुरू कैसे हुई?

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यात्राओं पर निकलने पर रास्ते निकलते हैं और फिर यात्राएँ फैलती जाती हैं। इसकी शुरुआत की कोई एक तिथि नहीं है। हाशिए के समाज की संस्कृति, स्वर और सवाल को जिस विधा में उठाने को आगे बढ़ा, वहीं से एक यात्रा की शुरुआत हुई।

आप शुरू में कविता लिखते रहे हैं। हिंदी कविता में बहुत बदलाव हुए। हाशिये के लोग केंद्र में आए और बहुत से चमकते चेहरे अँधेरे में विलीन हो गए। क्या आपको लगता है कि कविता ने अपना कर्त्तव्य पूरा किया?

संत साहित्य मूलत: कविता में ही है और उसने कभी व्यापक पैमाने पर वंचित समाज को उद्वेलित किया था। आज भी वह मार्गदर्शक की भूमिका में है। आज भी बहुत से जरूरी कवि, जरूरी कविताएं लिख रहे हैं। कर्तव्यों की पूर्ति समस्या के सापेक्ष आंकी जानी चाहिए। जब अन्यायपरक समाज के निर्माण में शोषकों की सत्ता कायम हो तब तक कविता या साहित्य की दूसरी विधाएं कर्तव्य निभाती रहेंगी। उनका कर्तव्य कभी पूरा नहीं होगा। हां, यह सवाल तो मौजूं रहेगा ही कि वंचित या संघर्षशील तबके से आए कवि की कविता का कर्तव्य या सुविधाभोगी तबके से आए कवि के कविता का कर्तव्य क्या है?

हाशिये की आवाज की जब हम बात करते हैं तो बिलकुल गूंगा नहीं है वह समाज। उसकी संस्कृति है, लोक है और भाषा है लेकिन हिंदी कविता अधिकांश लोक से हीन है। क्या कारण लगता है आपको?

सवाल वही है कि हाशिए के समाज के कवि को आप जगह कहां देते हैं? कबीर तक को उपेक्षित करने का प्रयास किया गया तो बाकी की क्या बात? हीरा डोम की एक ही कविता क्यों प्रकाश में आती है? क्या जैसी कविता हमें पढ़ने को मिलती है, उससे यह विश्वास किया जा सकता है कि हीरा डोम ने मात्र एक कविता लिखी होगी? अनपढ़ रखे गए समाज ने वाचिक परंपरा में लोक गीतों के माध्यम से अपनी व्यथाओं को सामने लाने का प्रयास किया, बिना किसी संग्रह के। वाचिक परंपरा की सारी कविताएं या गीतों की रचना लोक भाषा में हुई है। जब कवि लोक समाज से नहीं आयेगा तो उसकी भाषा लोक की कैसे होगी? इस सदी में उपेक्षित समाज को, तथाकथित विकास के बावजूद, पहले से भिन्न प्रकार की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। गांवों की उपेक्षा, अल्पसंख्यकों, दलितों, पिछड़ों, किसानों और आदिवासियों पर बढ़ते जुल्म, उनकी लूट और विस्थापन, संघर्ष के स्वरूप को आतंक के स्वरूप में बदलने की कला, ज्वलंत मुद्दे बन चुके है। अंधराष्ट्रवादी रुझानों ने धार्मिक पाखंड़ों, अंधविश्वासों, ठगी और हिंसा को संस्थाबद्ध कर लूट और सत्ता का नया हथियार गढ़ लिया है। स्त्रियां उपभोग की चीज बताई जा रही हैं। इन सब विडंबनाओं से इतर, अगर कविता लिखी जायेगी तो वह लोक के नजदीक नहीं होगी। ‘अहो प्रकाश रमणीयता’ या ‘कमल के पत्तों पर मोती सदृश्य चमकती पानी की बूंदों की नैसर्गिकता?’ या ‘पैबंद लगी धोती, पैरों की बिवाइयां या रोटी और चटनी पर नीलाम होता गरीब का जिस्म? हमारे लिए साहित्य के मूल्यांकन में यही ध्यान देने योग्य संदर्भ होंगे।

कहानियों से लेकर इतिहास लेखन तक, वैचारिक आलेखों से लेकर लोकसंस्कृतियों के सामाजिक पक्ष तक, ऐसा लगता है जैसे मैं अपने अतीत से मुक्त होने की लड़ाई लड़ रहा हूं।

कविता से कहानी में आने पर आप लोक के ज्यादा नजदीक गए हैं। क्या गद्य कविता के मुकाबले अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है?

देखिए, मेरा जीवन संतों का नहीं था कि रूखे जीवन को भी कविता से नम कर देता। कविता में मैं बहुत दूर तक नहीं चल सकता था। इसलिए मैंने हाशिए के समाज की लोक संस्कृतियों को सामने रख, स्वयं को नम करने का प्रयास किया। कविता में कठोरता से कहने के औजार सभी के पास नहीं होते। मेरे पास वे नहीं थे। इसलिए गद्य की ओर निकल आया। कहानी या इतिहास लेखन में आकर मुझे लोक अभिव्यक्तियों या संस्कृतियों को ऐतिहासिक संदर्भों में व्यक्त करने में सुगमता और संतुष्टि मिली। कहानियों से लेकर इतिहास लेखन तक, वैचारिक आलेखों से लेकर लोकसंस्कृतियों के सामाजिक पक्ष तक, ऐसा लगता है जैसे मैं अपने अतीत से मुक्त होने की लड़ाई लड़ रहा हूं। मेरा लेखन, उस लड़ाई को विजयश्री में बदले या न बदले, मेरे मन को सुकून देता है। लगता है मैं ज़िंदा हूं।

ज्यादातर हिंदी लेखन राजनीति विरोधी लेखन है। ऐसा क्यों है?

गैर राजनैतिक लेखन, स्वांत: सुखाय होता है। जनसामान्य के लिए नहीं होता।  राजनीति जब समाज को अपने इशारे पर चला रही हो तब लेखन उससे बहुत दूर नहीं रहेगा। आमजन के दुखों का कारण ही आज की कॉरपोरेटपरस्त राजनीति है। अब सवाल यह है कि किस राजनीति का विरोध? किसका समर्थन? जो राजनीति आम जनता की हो, जनता की मुक्ति के लिए हो, जनता के दुख-दर्दों के निराकरण के लिए हो तो उसका विरोध क्यों? आज की राजनीति के जब अमानवीय आवरण में मंदिर-मस्जिद में स्वयं को समेट लिया हो, जब सड़कों पर बूढ़े किसान दम तोड़ रहे हों और राजनीति बांसुरी बजा रही हो, जब मुट्ठीभर कॉरपोरेट के पंजे में देश की संपदा दबा दी जा रही हो, तब उस राजनीति का विरोध ही सच्चा लेखन होगा। मुझे तो आज दूसरी तस्वीर दिखाई दे रही है। वह यह कि ज्यादातर लेखक आज की राजनीति का विरोध नहीं कर रहे अपितु शुतुर्मुर्गी गरदन छिपाए हुए हैं।

देखा यह गया है कि ऐसे लेखकों का कन्फर्ट जोन आरएसएस होता है और जिस प्रकार वे सत्ता विरोधी आवाज को नकारते हैं वह एक खतरनाक संकेत है। इससे कैसे मुकाबला करना चाहिए?

सही कहा आपने। ज्यादातर लेखक कुलीनतावादी समाज से आते हैं। लेखन कार्य पेट भरने का साधन नहीं है। इस समाज की ज्यादातर आबादी अभी भी पेट पालने में सिमटी हुई है। ऐसे में वह लेखन की ओर नहीं आती। सुनने-सुनाने की परंपरा समाप्त हो गई। ऐसे में जो कुलनतावादी लेखक हैं, वे सुविधाजनक रास्ते पर ही रहेंगे। आरएसएस उनके लिए सुरक्षित जोन है। वहां वे अपनी संस्कृति की हिफाज़त करेंगे। ऐसा करने से उन्हें कुछ पद-प्रतिष्ठा हासिल हो सकेगी। विरोधी लेखकों को यह खतरे तो उठाने ही होंगे कि उन्हें कोई पद-प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी। सत्ता के साथ सुविधाजनक जोन में रह रहे साहित्यकारों का मुकाबला, मार्क्सवाद, अम्बेडकर विचार से सीखते हुए, दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यक के सम्मान की लड़ाई से निकलेगा।

बातचीत क्रमशः

अपर्णा रंगकर्मी और गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं।

3 Comments
  1. Ghanshyam kushwaha says

    यथार्थ और बेबाक बातचीत। बहुत सुंदर।

  2. […] कुलीनतावादी लेखक सुविधाजनक रास्ते पर… […]

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