दो मुल्काें का साझा अतीत, साझा वर्तमान  (डायरी 15 अगस्त, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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स्वतंत्रता किसे अच्छी नहीं लगती है? इस सवाल को दूसरी तरह से भी देखें कि आखिर वे कौन लोग हैं, जो स्वतंत्रता का मतलब नहीं समझते? एक तीसरा सवाल यह भी कि आखिर वे कौन हैं जो बहुसंख्यकों को स्वतंत्रता नहीं देना चाहते? वैसे सवाल और भी हो सकते हैं, क्योंकि हम जिस देश में रहते हैं, वहां सवालों की कोई कमी नहीं है। मसलन, राजस्थान के जालोर में एक आठ साल के दलित बच्चे की मौत के बाद पूरे देश में सवाल है कि आखिर कब तक पानी के सवाल पर दलितों की हत्या की जाती रहेगी? ऐसा ही एक सवाल बिहार के गया जिले के शेरघाटी की है, जहां बीते शुक्रवार को एक दलित महिला की दो बच्चियों को मोरहर नदी में फेंक दिया गया, जिनसे उनकी मौत हो गई और महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। क्रूरता की पराकाष्ठा यह कि महिला को गर्दन तक बालू में गाड़ दिया गया। अगले दिन शनिवार को जब लोग शौच हेतु नदी किनारे गए तब लोगों ने उसे बाहर निकाला।
खैर, आज जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान में 76वें स्वतंत्रता दिवस की धूम है, मैं इन दो देशों के बारे में सोच रहा हूं। 14 अगस्त, 1947 तक ये दोनों मुल्क एक ही थे। हालांकि विभाजन की प्रक्रिया पहले ही शुरू हो चुकी थी। सभी जानते थे कि विभाजन के बाद देश आजाद होगा। कल भारत सरकार ने विभाजन विभिषिका स्मरण दिवस मनाया। इस मौके पर विभाजन के दौरान हुए दंगों की जानकारी दी गई।
आज ही मैंने पाकिस्तान के अंग्रेजी अखबारों को भी देखा। वहां भी कुछ भी अलग नहीं है। जिस तरह का उन्माद भारतीय मीडिया में है, उसी तरह का उन्माद वहां की मीडिया में है। यह दो मुल्कों के लोगों का अपना-अपना राष्ट्रवाद है। यदि हम इसे एशिया के स्तर पर देखें तो निश्चित तौर पर संबंध सकारात्मक नहीं रहने के कारण गंभीर परिणाम अबतक दोनों देशों को झेलना पड़ा है। दोनों देशों की हालत आर्थिक उपनिवेशों जैसी बनकर रह गई है। दोनों देशों के बीच तनातनी का असर इनकी अपनी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ती है।

धर्म हालांकि तब भी महत्वपूर्ण था जब दोनों देश एक थे। गांधी के कांग्रेस के हिंदूवाद का परिणाम जिन्ना का मुस्लिम लीग था। इसके अलावा हिंदू महासभा जैसे संगठन भी सक्रिय हो चुके थे। यह तो 1930 के दशक में ही तय हो गया था कि इस देश को मजहब के आधार पर बांटा जाएगा। हालांकि इस दशक के आरंभ में हुए गोलमेज सम्मेलन के दौरान अंग्रेजों ने इसकी कोशिश जरूर की कि सांप्रदायिक आधार पर शासन-प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित कर धर्म के आधार पर विभाजन को रोका जाय।

सबसे महत्वपूर्ण यह कि दोनों देशों के बीच संबंध नकारात्मक होने के मूल में कुछ खास तबकों का वर्चस्ववाद है। भारत के लिहाज से देखें तो यहां सवर्ण जातियों का वर्चस्ववाद है, जिनका शासन-प्रशासन में अधिकतम हिस्सेदारी से लेकर उत्पादन के संसाधनों पर अधिकतम अधिकार है। पाकिस्तान में भी यह बिल्कुल ऐसा ही है। वहां भी मुस्लिम समाज की रसूखदार जातियों का बोलबाला है। वहां भी अजलाफ और अरजाल जातियां हैं, जिन्हें हम भारतीय सामाजिक व्यवस्था के लिहाज से कहें तो क्रमश: ओबीसी और दलित जातियां कह सकते हैं।
एक और दिलचस्प बात यह कि दोनों देशों में धर्म महत्वपूर्ण है। धर्म हालांकि तब भी महत्वपूर्ण था जब दोनों देश एक थे। गांधी के कांग्रेस के हिंदूवाद का परिणाम जिन्ना का मुस्लिम लीग था। इसके अलावा हिंदू महासभा जैसे संगठन भी सक्रिय हो चुके थे। यह तो 1930 के दशक में ही तय हो गया था कि इस देश को मजहब के आधार पर बांटा जाएगा। हालांकि इस दशक के आरंभ में हुए गोलमेज सम्मेलन के दौरान अंग्रेजों ने इसकी कोशिश जरूर की कि सांप्रदायिक आधार पर शासन-प्रशासन में भागीदारी सुनिश्चित कर धर्म के आधार पर विभाजन को रोका जाय। लेकिन तब अंग्रेजों की यह ईमानदार कोशिश भारत के वर्चस्ववादियों को रास नहीं आई। खैर गोलमेल सम्मेलन के दौरान ब्रिटिश हुकूमत की इस कोशिश का पटापेक्ष गांधी के आमरण अनशन के टूटने के साथ हुआ जब दलितों के लिए पृथक निर्वाचन के सवाल पर डॉ. आंबेडकर को मजबूर किया गया।
तो यह बात तो साफ है कि इस देश के विभाजन के लिए जितने जिम्मेदार हिंदू सवर्ण रहे, उतने ही जिम्मेदार सवर्ण मुस्लिम भी रहे। दोनों को आजादी से कोई लेना-देना नहीं था। दोनों को केवल अपनी-अपनी हुकूमत चाहिए थी। यही हुआ भी। भारत जब आजाद हुआ तब प्रधानमंत्री से लेकर लगभग सभी राज्यों के मुख्यमंत्री व राज्यपाल सवर्ण ही थे। पाकिस्तान में भी निम्न वर्ग के प्रतिनिधियों को सत्ता के शीर्ष से दूर ही रखा गया।

जस्थान के जालोर में एक आठ साल के दलित बच्चे की मौत के बाद पूरे देश में सवाल है कि आखिर कब तक पानी के सवाल पर दलितों की हत्या की जाती रहेगी? ऐसा ही एक सवाल बिहार के गया जिले के शेरघाटी की है, जहां बीते शुक्रवार को एक दलित महिला की दो बच्चियों को मोरहर नदी में फेंक दिया गया, जिनसे उनकी मौत हो गई और महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। क्रूरता की पराकाष्ठा यह कि महिला को गर्दन तक बालू में गाड़ दिया गया

बहरहाल, वर्तमान सच्चाई यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों आज विश्व के दो गरीब मुल्कों में से एक हैं और दोनों लगभग एक तरह की परेशानी झेल रहे हैं। चूंकि भारत पाकिस्तान की तुलना में बड़ा देश है और इसके पास बड़ा बाजार है तो आंकड़ों में इसकी अर्थव्यवस्था बड़ी दिखती है। लेकिन आंकड़े पूरी सच्चाई बयां नहीं करते।

 अमृत महोत्सव का जश्न और गालियों का समाजशास्त्र (डायरी 14 अगस्त, 2022)

मैं तो कल अयोध्या में हुई एक घटना के बारे में सोच रहा हूं। दरअसल, वहां अयोध्या छावनी स्थित एक मठ के महंत ने पाकिस्तान का झंडा जलाने की कोशिश की। जिस महंत ने यह कोशिश की, वह अपने नाम में जगद्गुरु परमहंस लगाता है। शहर के बदोसराय कोतवाली चौक पर जब वह अपने समर्थकों के साथ पाकिस्तान का झंडा जलाने की कोशिश कर रहा था तब बदोसराय कोतवाली थाना के प्रभारी अमित मिश्रा ने उसे यह कहकर रोका कि यह (पाकिस्तानी झंडा) तो पहले से ही बहुत गंदा है, आपके हाथ में यह शोभा नहीं देता।
दरअसल, इस घटना का उल्लेख इसलिए कर रहा हूं क्योंकि दोनों देशों के निवासियों के मन में इसी तरह का जहर भरा गया है। यह जहर बहुत खतरनाक है। इससे किसी का भला नहीं होनेवाला। बेहतर तो यह कि आजादी के 75 साल के बाद दोनों देशों के हुक्मरान आपस में विचार करें और कोई राह निकालें ताकि दोनों मुल्क आगे बढ़ें।
नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।
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