अमृत महोत्सव का जश्न और गालियों का समाजशास्त्र (डायरी 14 अगस्त, 2022)

नवल किशोर कुमार

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जैसे नैतिक बातों का ईजाद सभ्यता के साथ हुआ,वैसे ही गालियाँ और अपशब्द कहने की शुरुआत भी सभ्यता के आने के साथ हुई होगी। इसका कोई लिखित इतिहास है नहीं इसीलिए इसे अनुमान से कहा जा सकता है।  मन जब खुश हो तो चहकता है,बोलता-बतियाता है,वैसे ही नाराजगी या गुस्सा आने पर अनेक लोगों के मुंह से गालियाँ झरती हैं। समाज में पितृसत्ता हावी है इसीलिए सभी गालियाँ स्त्रीसूचक होती हैं और ये गालियाँ पुरुष ही नहीं बल्कि स्त्रियाँ भी देती हैं।

हमारा देश आजादी का 75वां जश्न मना रहा है। भारत सरकार ने इसे अमृत महोत्सव कहा है और मैं हूं कि अमृत के बारे में सोच रहा हूं। बचपन में अमृत का मतलब केवल एक ही होता था और वह था करीब आधा लीटर भैंस का दूध। चूंकि मेरा जन्म मवेशीपालक परिवार में हुआ है तो मेरे घर में भैंसें पाली जाती थीं और मेरे मम्मी-पापा उसके दूध को अमृत ही कहते थे। बाद में जब हिंदू ग्रंथों को पढ़ा तब जाना किअमृत भैंस के दूध को नहीं कहते। अमृत तो एक खास तरह का द्रव होता था, जिसके पान से आदमी जन्म और मृत्यु के चक्र से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्त हो जाता था। हालांकि ग्रंथों में यह भी कहा गया है कि जो अमृत समुद्र मंथन में हासिल हुआ, उसे छल से देवताओं ने अपने बीच ही वितरित कर लिया।

खैर, मैं भी भारत सरकार के अमृत महोत्सव को इसी रूप में लेता हूं कि 14-15 अगस्त, 1947 को सत्तारूपी अमृत जो हासिल हुआ, उसे इस देश के देवताओं यानी ऊंची जाति के लोगों ने आपस में बांट लिया। फिर चाहे वह शासन-प्रशासन में भागीदारी हो या फिर संसाधनों पर अधिकार। रही बात गरीब और उपेक्षित जातियों की तो उनके हिस्से रोज-रोज का संघर्ष है और गालियां हैं।

व्यक्तिवाचक गालियों के केंद्र में महिलाएं होती हैं। इनमें मां, बेटी और बहन शामिल है। पत्नी को लगाकर गालियां देते मैंने आजतक नहीं सुना है। इसकी भी कोई न कोई वजह जरूर होगी। परिवार के स्तर पर भी सबसे अधिक गालियां सुननेवाला पत्नी का भाई होता है। उसके लिए तो हिंदी में एक खास शब्द ही है– साला, स्साला, स्साले।

तो आज गालियों की ही बात करते हैं। यह केवल भारतीय समाज का मसला ही नहीं है। पूरे विश्व में गालियां दी जाती हैं। चूंकि मैं भारत का हूं और वह भी उत्तर भारत का वासी हूं तो मुझे इस हिस्से में दी जानेवाली गालियों के बारे में पता है। और मेरे गृह प्रदेश बिहार की तो बात ही निराली है। वहां तो बिना गालियों के बात करनेवाले अपवादस्वरूप ही होते हैं। लिखंत-पढ़ंत करनेवाले भी जमकर गालियां देते हैं। राजनीति करनेवाले गालियां देते हैं। मुझे उनके बारे में नहीं पता जो अदालत में जज की कुर्सी पर बैठते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि अपनी मजलिस के बाहर आने पर गालियां वह भी देते ही होंगे।
आजादी के अमृत महोत्सव के मौके पर गालियों की चर्चा इसलिए कि आज एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक ने अपने संपादकीय पन्ने पर आलेख प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है– सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लठ। शीर्षक एक तरह की गाली ही है जो इस देश में रहनेवाली एक बड़ी आबादी को सामूहिक रूप से दी गई है।
दरअसल, गालियां दो तरह की होती हैं। एक गाली व्यक्तिवाचक गाली होती है। इस तरह की गाली एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को देता है। एक महिला दूसरे महिला को देती है। व्यक्तिवाचक गालियां सभी देते हैं अपने-अपने लिंग के हिसाब से। चूंकि यह समाज पुरुषों का है तो उन्हें हर जगह गालियां देने का जन्मसिद्ध अधिकार होता है। व्यक्तिवाचक गालियों के केंद्र में महिलाएं होती हैं। इनमें मां, बेटी और बहन शामिल है। पत्नी को लगाकर गालियां देते मैंने आजतक नहीं सुना है। इसकी भी कोई न कोई वजह जरूर होगी। परिवार के स्तर पर भी सबसे अधिक गालियां सुननेवाला पत्नी का भाई होता है। उसके लिए तो हिंदी में एक खास शब्द ही है– साला, स्साला, स्साले। अब तो ‘स्साली’ भी गाली की सूची में शुमार हो चुकी है। दुखद यह कि इस तरह की गालियाें को सामाजिक मान्यता हिंदी फिल्मों ने खूब दी है। हिंदी साहित्य भी बहुत अधिक पीछे नहीं रहा है। प्रसिद्ध समालोचक रहे प्रो. नामवर सिंह के छोटे भाई काशीनाथ सिंह ने तो काशी के अस्सी घाट पर केंद्रित अपने उपन्यास को गालियों का ग्रंथ ही बना दिया।

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खैर, व्यक्तिवाचक गालियाें से अलग एक दूसरे तरह की गाली है– समूहवाचक गाली। इस गाली का उदाहरण है उपर वर्णित अखबार द्वारा प्रकाशित शीर्षक– सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठम-लठ। इस समूहवाचक गालियों का समाजशास्त्रीय अध्ययन करने पर मैं यह पाता हूं कि अर्जक समाज अथवा समुदाय को सबसे अधिक गालियां दी जाती हैं। जो समुदाय जितना कम अर्जन करता है, उतना ही ऐश करता है और उसे गालियां भी कम ही दी जाती हैं। जैसे मैं यादव जाति का हूं और मेरी जाति के लोगों को अर्जक माना जाता है क्योंकि इस जाति के लोग मवेशीपालन करते हैं। दूध का कारोबार करते हैं। इस देश को मांस की आपूर्ति करते हैं। तो मेरी जाति के लिए भी अनेक तरह की गालियां समाज में प्रचलित हैं। कई बार तो मुझे भी लोग गालियां देते हैं, जिसका आशय यह होता हे कि मेरी जाति के लोगों को 65 साल की आयु में बुद्धि होती है। गोवार कहना तो एकदम साधारण बात है। ऐसे ही जुलाहा जाति है। यह भी अर्जक जाति है। धोबी जाति भी अर्जक जाति है और देश के अलग-अलग राज्यों में इसे कहीं अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखा गया तो कहीं पिछड़ा वर्ग में। जैसे बिहार में यह जाति अनुसूचित जाति में शामिल है तो महाराष्ट्र व मध्य प्रदेश में पिछड़ा वर्ग में। लेकिन इस जाति के लोगों को भी खूब गालियां दी जाती हैं और बौद्धिक जगत भी गालियां देने में पीछे नहीं रहता। कुछ उदाहरण देखिए– खेत खाए गदहा, मार खाए जोलहा, धोबी का कुत्ता न घर का ना घाट काआदि।
तो मूल मसला यह है कि भारतीय समाज गालियों से आजादी कब पाएगा? है न एक बड़ा सवाल!
ऐसा नहीं है कि समाधान नहीं है। इसके लिए कानून भी मौजूद है। एक दूसरे को अश्लील गालियां देना भारतीय दंड संहिता की धारा 294 में दंडनीय अपराध है। धारा 294 राजीनामे के योग्य धारा भी नहीं है। यानी इस धारा में दोनों पक्ष का राजीनामा भी नहीं कर सकते क्योंकि गालियां देने से केवल पीड़ित पक्षकार को तकलीफ नहीं होती है अपितु समस्त समाज को तकलीफ होती है।
लेकिन हमारे देश के हुक्मरान और नीति-निर्माताओं के दिमाग में यह बात बैठती ही नहीं कि गालियों के पीछे मुख्य कारण विषमता। जो मजबूत होता है उसे गालियां नहीं दी जाती हैं। भारत का संविधान समतामूलक समाज की स्थापना का अभिलाषी है। यह समता हर स्तर पर हो। परिवार से लेकर जाति और फिर समाज व क्षेत्र के स्तर पर भी। लेकिन यह भी स्वतंत्रता के जैसे महज एक ख्वाब है इस देश की अनेकानेक कमजोर जातियों के लोगों के लिए, महिलाओं के लिए, जिन्हें हर दिन गालियां सुननी पड़ती हैं।

बिगूचनों का दौर (डायरी, 13 अगस्त, 2022)

कल ही एक कविता सूझी। इसके जरिए मैं महाराष्ट्र के प्रसिद्ध दलित कवि रहे पद्मश्री नामदेव ढसाल के मन में 50 साल पहले लगी आग को महसूस कर रहा हूं।
नामदेव ढसाल की तरह
स्वतंत्रता को मैं गधी की उपमा नहीं दूंगा।
अगर तुम चाहो तो
कुछ भी कहो
मैं ऐतराज नहीं करूंगा 
तब भी नहीं 
जब तुम इसे गहनों से लाद दो
और करो उपवास
मनाओ खुशियां।
लेकिन मैं नामदेव ढसाल की तरह
स्वतंत्रता को मैं गधी की उपमा नहीं दूंगा।
और अगर तुम अब भी जानना चाहो
तो मैं स्वतंत्रता को रंभा या मेनका नहीं मानता
जिसके लिए लड़ी जा सकती है
कोई लंबी लड़ाई
बहाई जा सकती है निर्दोषों के खून की नदी।
लेकिन मैं नामदेव ढसाल की तरह
स्वतंत्रता को मैं गधी की उपमा नहीं दूंगा।
गधी क्या मैं तो 
स्वतंत्रता को घोड़ी भी नहीं मानता
जिसकी पीठ पर सवार
खुद को बादशाह से कम नहीं समझता।
हां, मैं नामदेव ढसाल की तरह
स्वतंत्रता को मैं गधी की उपमा नहीं दूंगा।
नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।
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