वो आज़मगढ़ वाली ….?

रमेश कुमार मौर्य

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यात्रा करते वक़्त मेरा हमेशा ध्यान रहा कि वह स्वान्तः सुखाय नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसके आनंद में दूसरों को भी सहभागी बनाना चाहिए। इसलिए मैंने अपनी हरेक यात्रा के विवरण लिखे। अब हिमालय कह रहा था, हमारे ऋण से भी तुम्हें उऋण होना चाहिए। मैंने निश्चय किया, दार्जिलिंग के बारे में लिखना चाहिए। 

                                                                                                             मेरी जीवन यात्रा-3 –  राहुल सांकृत्यायन,    पृष्ठ-412
   

जून 2009 के पहले सप्ताह में हम दार्जिलिंग पहुँचे। यात्रा वाराणसी से ट्रेन से शुरू हुई और हम लोगों ने न्यू जलपाईगुड़ी, सिलीगुड़ी होते हुए दार्जिलिंग की खूबसूरत वादियों में कदम रखे।

यात्रा शुरू करने से पहले ही एक पत्र कमला सांकृत्यायन, 21 राहुल निवास, कचहरी रोड, दार्जिलिंग (प.बंगाल) के पते पर भेज चुका था। उम्मीद थी कि पत्र अवश्य पहुँच गया रहा होगा। 3 जून की सुबह मैं अकेले ही राहुल निवास की तरफ बढ़ने लगा। मेरा पहला उद्देश्य कमला सांकृत्यायन से मिलना ही था बाकी घूमना-फिरना द्वितीयक था। कचहरी रोड मेरे होटल से काफी करीब था।  इसी रोड को खोजने और दार्जिलिंग की खूबसूरती निहारने के लिए सुबह ही निकल गया। सड़कें  साफ़ सुथरी और घर यूरोपियन शैली के बने हुए हैं। सड़क  किनारे वाल राइटिंग ध्यानाकर्षित कर रही है जिस पर ‘गोरखालैंड’ की मांग की गयी है। गाढ़े हरे, सफ़ेद और पीले रंगों के ऊपर एक अलग गोरखालैंड के लिए किसी खास दिन मार्च करने का अनुरोध है। मेरे लिए आकर्षण इसलिए भी था कि इस वाल राइटिंग की शैली हूबहू आइसा की शैली की तरह है। इस नारे को देखकर माया पत्रिका की वह तस्वीर याद आ गई जिसमे सुभाष घीसिंग और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव ग़ांधी की हाथ मिलाते छपी थी। अब सुभाष घीसिंग का कहीं नाम नहीं दिख रहा था, उनकी जगह एक नया नाम चारों तरफ लिखा था और वह नाम था, बिमल गुरुंग। अब इस अलगाववादी आंदोलन का सर्वमान्य नेता बिमल गुरुंग थे।

आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी हुयी जातियाँ जब अपनी अवस्था से असंतुष्ट होकर उसे बेहतर बनाने की कोशिश करती हैं तो उनके प्रतिद्वन्दी नीचे दर्जे की प्रांतीयता, भाषीयता, जातीयता, संकीर्णता आदि नाम देकर बदनाम करते हैं।

अंग्रेजों के हाथ में आने से पहले दार्जिलिंग सिक्किमवालों के हाथ से गोरखों के हाथ में चला गया था। गोरखों को हरा कर ही नेपाल से पूर्व में यह इलाका और नेपाल से पश्चिम अल्मोड़ा जिले से लेकर सतलुज तक की हिमालय-भूमि को अंग्रेज़ों ने ले लिया। उस समय दार्जिलिंग की जनसँख्या बहुत कम थी। किरात जाति से सम्बन्ध रखने वाले लेप्चा यहाँ के मूल निवासी थे। अंग्रेज़ों ने वीर और मेहनती नेपालियों को यहाँ बसाना शुरू किया और अपनी सेना में नेपालियों की खूब भर्ती की। पिछली शताब्दी के अंत में ही दार्जिलिंग नेपाली भाषी हो गया था, आज भाषा के आधार पर दार्जिलिंग को नेपाल का ही एक टुकड़ा कहना चाहिए। आज उसी नेपाली बसाहट ने एक अलग राज्य के मांग को शिद्दत के साथ रखा है। पूरे दार्जिलिंग, कुर्सियांग में एक अलग गोरखालैंड की मांग के नारे दीवालों पर लिखे दिखते हैं। इस अलगाववादी नारे की पृष्ठभूमि आज की नहीं है बल्कि आज़ादी के बहुत पहले से ही चली आ रही है। अंग्रेज़ो ने दार्जिलिंग की सामाजिक और भाषाई एकता को नेपालियों को बसा कर तोड़ा। जिसके फलस्वरूप 1907 में ही मार्ले-मिंटो रिफॉर्म्स पैनल के सामने एक अलग गोरखालैंड की मांग रखी गयी थी। राहुल अपनी ‘जीवन यात्रा’ में इसका जिक्र करते हैं कि क्योंकि दार्जिलिंग निवासी एक अलग प्रान्त की मांग करते हैं। वे इस संदर्भ में भाषा की बजाय आर्थिक असमानता की तरफ इशारा करते हैं। वे लिखते हैं, ‘अंग्रेज़ो ने नेपालियों को यहाँ बसाया। ज्यादातर नेपाली यहाँ कुली-मजदूर के तौर पर आए, लेकिन बाद में शिक्षित होने लगे। देर से निद्रा के बाद आँख मलकर वे देखते हैं तो मालूम होता है कि सभी नौकरियों पर बंगालियों का कब्ज़ा है और चाय बागान अंग्रेज़ो या बंगालियों के भद्र समाज के हाथ में है।’ राहुल आगे लिखते हैं, ‘आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़ी हुयी जातियाँ जब अपनी अवस्था से असंतुष्ट होकर उसे बेहतर बनाने की कोशिश करती हैं तो उनके प्रतिद्वन्दी नीचे दर्जे की प्रांतीयता, भाषीयता, जातीयता, संकीर्णता आदि नाम देकर बदनाम करते हैं।’ आज इन दीवारों पर लिखे अलगाववादी नारे उसी आर्थिक असमानता के खिलाफ नारे हैं, जिसका हल आज़ादी के बाद भी नहीं हो सका। एक लोकल आदमी से जब मैंने सुभाष घीसिंग के बारे में पूछा, उसने बड़े हिकारत से मेरी तरफ देखा और टाल दिया। आज इस आंदोलन के सर्वमान्य नेता बिमल गुरुंग हैं । जिसने इस आंदोलन को नई ऊंचाई दी है।

खैर, मुझे तो 21, कचहरी रोड पहुँचना था। कुछ दूर चलने पर एक खूबसूरत यूरोपियन शैली की बनी पुलिस चौकी दिखाई दी उसके सामने एक खूबसूरत,  रौबदार चेहरे वाला इंस्पेक्टर खड़ा था। मैंने कचहरी रोड पूछा उसने अपनी तर्जनी से सामने की तरफ इशारा किया। आगे चलने पर एक रेस्तरां दिखा, जो साफ़-सुथरा और सुरुचिपूर्ण लग रहा था। रेस्तरां की मालकिन अपने काउंटर को पोंछ रहीं थीं। सामने टेबल पर एक बुजुर्ग कॉफी की चुस्कियों के साथ अख़बार पढ़ रहे थे। दोनों के बीच बातचीत भी चल रही थी। शायद वो रेस्तरां मालकिन को आज के समाचार की कुछ महत्वपूर्ण बातें बता रहे थे।  उनकी बातों पर वह कभी कुछ कहती, कभी मात्र मुस्कुरा भर देती। मैंने उन्ही मालकिन से कमला के बारे में पूछा वो बता नहीं पायी । मैं निराश होकर आगे बढ़ गया। राहुल निवास खोजते काफी समय बीत गया। एक तरह से अब हताश हो चुका था। एक तो भाषा की समस्या थी दूसरे मेरे पूछने का अंदाज़ शायद ठीक नही था। मैं भी अंधेरे में ही तीर चला रहा था। मुझे बस इतना ही पता था कि कमला सांकृत्यायन कचहरी रोड पर कहीं रहतीं है। पहाड़ों पर किसी का पता खोजना आसान नही होता। मैदानी इलाकों में घर एक पंक्ति में होते है, जबकि पहाड़ों की सड़कें घुमावदार और एक के ऊपर एक होती हैं। इसलिए थोड़ी ऊँचाई पर भी पूरा का पूरा इलाका बदल जाता है। सुबह 7 बजे का निकला-निकला अब करीब 9:30 बज चुके थे। कई लोगो से पूछा लेकिन वही ढाक के तीन पात।

कमला सांकृत्यायन

कमला सांकृत्यायन जिनका मूल नाम कमला परियार था। 15 अगस्त 1920 को कालिम्पोंग के एक साधारण परिवार में जन्मी थी। छोटी आयु में ही पिता का देहांत हो गया था। पांच भाई-बहनों के परिवार में बड़ा भाई मुश्किल से खर्च के लिए कमा पाता था। माँ दर्ज़ी का काम करती थी वो भी किराये की मशीन पर। कमला पढ़ाकू थी और मैट्रिक पास थी। राहुल को अपने लेखन के लिए एक टाइपराइटर और उनके द्वारा बोले गए शब्दों को लेखनीबद्ध करने वाला शिक्षित तरुण-तरुणियों की जरूरत थी। राहुल अपने आत्मकथा में जिक्र करते है, ‘श्री परमहंस मिश्र 1930 से ही मेरे परिचित थे। वह यहाँ मिशन स्कूल में अध्यापक थे। लिखने वाले लड़के-लड़कियों का प्रबन्ध उन्होंने ही किया था। मैंने उनसे कहा कि सबसे चतुर लिखने समझने वाले लड़के या लड़की को भेजें। काम किए हुए लड़कियों में कमला परियार भी थी। परमहंस जी ने उसकी ही सिफारिश की और वह 14 जून 1949 को आकर काम करने लगी। उनके अक्षर भी साफ़ थे। मैट्रिक पास होने से अंग्रेजी भी ठीक और हिन्दी का भी अच्छा ज्ञान था। मैट्रिक पास लड़के-लड़कियों का मिलना भी आसान नहीं था। कमला शरीर से बहुत दुर्बल और बेकारी से चिंतित थी, उनकी पढ़ने की बहुत इच्छा थी, लेकिन ग़रीबी की मार आगे कैसे बढ़ने देती? वे हमारे यहाँ से पुस्तकें ले जाकर पढ़ा करती।’

अंग्रेज़ो ने दार्जिलिंग की सामाजिक और भाषाई एकता को नेपालियों को बसा कर तोड़ा। जिसके फलस्वरूप 1907 में ही मार्ले-मिंटो रिफॉर्म्स पैनल के सामने एक अलग गोरखालैंड की मांग रखी गयी थी। राहुल अपनी 'जीवन यात्रा' में इसका जिक्र करते हैं कि क्योंकि दार्जिलिंग निवासी एक अलग प्रान्त की मांग करते हैं। वे इस संदर्भ में भाषा की बजाय आर्थिक असमानता की तरफ इशारा करते हैं। वे लिखते हैं, 'अंग्रेज़ो ने नेपालियों को यहाँ बसाया। ज्यादातर नेपाली यहाँ कुली-मजदूर के तौर पर आए, लेकिन बाद में शिक्षित होने लगे। देर से निद्रा के बाद आँख मलकर वे देखते हैं तो मालूम होता है कि सभी नौकरियों पर बंगालियों का कब्ज़ा है और चाय बागान अंग्रेज़ो या बंगालियों के भद्र समाज के हाथ में है।

महान यायावरी राहुल के लिए कमला का होना क्या था ? इसको साबित करते हैं उनके पत्र, जो उन्होंने कमला को लिखे थे। एक पत्र में वे लिखते हैं, ‘तुम्हारे गुणों को मैं जानता हूँ, बहुत प्रभावित हूँ। तुम्हे अपने जीवन भर और बाद में भी सुखी देखना चाहता हूँ। …मैं तुम्हें असाधारण तरुणी समझता हूँ। असाधारण वस्तु में थोड़े से काँटे भी लिपटे हो, तो आश्चर्य नही।’

अब खोजते-खोजते दस से ऊपर हो गए थे। कचहरी रोड का मैं कई बार चक्कर लगा चुका था। अब निराश था और वापसी का ख्याल भी मन में आ रहा था कि अचानक सामने एक व्यक्ति को स्टूल पर एक जनरल स्टोर की शॉप पर बैठे देखा। उसका नाक-नक्श उत्तर भारतीय था और रंग साँवला। मुझे लगा शायद यह व्यक्ति कुछ बता सकें। मैं उसके पास गया और सीधे ही पूछ बैठा, ‘क्या आप कमला सांकृत्यायन को जानते हैं। वे एक कॉलेज में पढ़ाती हैं ?’  वो व्यक्ति और समझ सकें इसलिए एक क्लू भी दिया कि अभी हाल में एक फिल्म आयी है, जिसका नाम मैं हूँ न में जो कॉलेज दिखाया गया है। उसी कॉलेज में वो पढ़ाती हैं। वो साँवला व्यक्ति मेरे प्रश्न का जवाब देने के बजाय अंदर से किसी को हांक लगाया। अंदर से एक 24-25 साल का एक तरुण आया और बोला, क्या चाहिए ? मैंने वही सवाल दाग दिया। प्रश्न सुनते ही उसकी आँखे चमक गयी और लगभग छूटते ही पूछा, ‘वही आज़मगढ़ वाली’ अब चकित होने की बारी मेरी थी। मैंने कहा, हां ! आप को कैसे पता की वो आज़मगढ़ की हैं ? उसने बताया वो अक्सर मेरे दुकान पर कुछ -कुछ सामान लेने आती हैं। उन्होंने ही कभी बताया था कि उनकी ससुराल आज़मगढ़ में है।

इस धरती पर हरेक शख्स की एक अलग कहानी है। शेक्सपियर ने कभी कहा था, ये दुनिया एक रंगमंच है और हम सब इस रंगमंच के अभिनेता। सब अपने-अपने हिस्से का अभिनय कर इस रंगमंच से विदा ले लेंगे। उस बुजुर्ग पिता ने भी अपने रंगमंच पर शानदार अभिनय किया।

आज़ादी के कुछ वर्ष पहले की ही बात है। एक किशोर भीषण रूप से चेचक से ग्रसित हो गया। आज़मगढ़ के वैद्यों और डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए। तब उसके पिता जो एक साधारण किसान थे, ने बनारस के अस्पताल  बीएचयू में दिखाया। लेकिन वहाँ भी कोई ज्यादा सुधार नहीं दिखा। किसी डॉ. ने सलाह दी कि तुम यदि इस बच्चे की जान बचाना चाहते हो तो किसी ठन्डे-पहाड़ी इलाके में ले जाओ। उस किसान ने अपनी जमीन का एक बड़ा हिस्सा बेचा और कलकत्ता (अब कोलकाता) की ट्रेन पकड़ी। तब उस समय पूर्वी यूपी और बिहार के हजारों-लाखों लोग मजदूरी करने कलकत्ता जाया करते थे।  कलकत्ता से दार्जिलिंग गए और कुछ ही दिनों में वह किशोर स्वस्थ होने लगा। पिता को वहां का माहौल रास आने लगा। इलाके के और भी लोग थे जो वहाँ रहकर मजदूरी कर रहे थे। पिता ने भी सब्जी की टोकरी ले घूम-घूमकर बेचनी शुरू कर दी। करते भी क्या गांव की जमीन का एक बड़ा हिस्सा तो बेच आये थे। अब दूसरा कोई रास्ता भी तो नही था। आज वही चेचक वाला बालक दार्जिलिंग के प्राइम लोकेशन पर तीन मंजिला मकान का मालिक है। तीन बच्चों, बहुओं, पोते-पोतियो से भरा पूरा परिवार का मुखिया है।

अब मैं राहुल निवास के करीब था। मेरी वर्षों की इच्छा पूरी होने जा रही थी। बारिश भी ठीक उसी समय शुरू हो गयी। लगा ये बूंदे मेरा इस्तकबाल कर रही हैं। मैं राहुल निवास के ठीक सामने खड़ा था। 1957 की जनवरी में राहुल ने कमला को एक पत्र लिखा था। जिसमें वे लिखते हैं, ‘नजदीक से ज़्यादा दूर रहने पर आकर्षण अधिक रहता है। तुम्हारा जया-जेता का स्मरण आता है, पर चिपके रहने में भी अच्छा नही है।’

परमहंस जी ने उसकी ही सिफारिश की और वह 14 जून 1949 को आकर काम करने लगी। उनके अक्षर भी साफ़ थे। मैट्रिक पास होने से अंग्रेजी भी ठीक और हिन्दी का भी अच्छा ज्ञान था। मैट्रिक पास लड़के-लड़कियों का मिलना भी आसान नहीं था। कमला शरीर से बहुत दुर्बल और बेकारी से चिंतित थी, उनकी पढ़ने की बहुत इच्छा थी, लेकिन ग़रीबी की मार आगे कैसे बढ़ने देती? वे हमारे यहाँ से पुस्तकें ले जाकर पढ़ा करती।'

राहुल ने कमला को अपनी अर्धांगनी ही नही बनाया बल्कि कमला परियार को कमला सांकृत्यायन में भी ढाला। केवल नाम से ही नही कर्म से भी विचार से भी आकार दिया। वे अपने एक पत्र में लिखते हैं, ‘प्रतिदिन के 24 घंटे में 4 घंटे गिनकर थीसिस के लिए दो,  पुस्तकें पढ़ो, नोट ले लो। इसके बिना कोई दूसरा रास्ता नही है। दूसरे कामों  को इन चार घंटे छोड़कर ही करो। …….मानसिक कार्य हमेशा शारीरिक काम से ज्यादा कष्टप्रद मालूम होता है, पर अपने ऊपर जोर देकर करना पड़ता है। पीएचडी के साथ जया-जेता और तुम्हारा भविष्य बंधा हुआ है। मुझे इसके बिना संतोष नही हो सकता।’

राहुल निवास की सीढ़ियों पर था। यूरोपियन शिल्प में लकड़ी का बना मकान अपनी भव्यता के साथ उपस्थित था। एक लड़की बाहर बैठकर कपड़े धो रही थी। मैंने उससे अंदर जाने के लिए पूछा। वो अंदर गयी और जाने का इशारा करते हुए बोली, जाइये। मेरे सामने राहुल की अर्धांगनी, उनके जीवन के अंतिम वक़्त की दोस्त और उनकी हमसफ़र कमला सांकृत्यायन बैठी हुई हैं, बेहद कमजोर और बीमार। पहली नज़र में तो मैं ठिठक गया । लगा शायद मैं सपना देख रहा। मेरे सामने कमला नहीं राहुल का पूरा व्यक्तित्व  है और मैं दर्शन के लिए बेताब हूँ। अभिवादन-प्रणाम के बाद मैं एक लकड़ी की कुर्सी पर बैठा और परिचय हुआ। जैसे ही मैंने बताया कि मैं आज़मगढ़ से आया हूँ। एक बीमार व्यक्ति अचानक स्वस्थ दिखने लगा। वो उठ बैठी और जिज्ञासा भरे सवालो की झड़ी लग गयी।  वे राहुल के बारे में बता रही थीं, जैसे कोई वर्षो से न मिला हो ये सब बताने के लिए और मैं मुग्ध हो सुन रहा था। कुछ भी ध्यान नहीं था। ढेर सारी बातें होती रही। उन्होंने एक आलमारी की तरफ ऊँगली उठाकर कहा, देखो राहुल जी की लिखी किताबें हैं उनमें।  कमला जी की तबियत खराब है, बावजूद वे बात कर रही हैं। उन्हें फ्लाइट से दिल्ली एम्स जाना है।

राहुलजी अपने परिवार के साथ

मैं अपने को भाग्यशाली मानता हूँ क्योंकि कमला उसी वर्ष 25 अक्टूबर को दुनिया छोड़कर चली गईं। शायद मैं उनसे मिलने वालों व्यक्तियों में आज़मगढ़ का अंतिम व्यक्ति रहा होऊँगा।

अब राहुल निवास से विदा लेने का वक़्त भी आ गया। मैं जैसे ही बाहर निकला मेघ फिर मेह बरसाने लगे। अबकी बार लगा जैसे वो रो रहें है। मैं एक घर के छज्जे के किनारे रुक गया। तब याद आया कि मैंने तो कोई तस्वीर तो ली ही नहीं। जबकि मेरे पास मोबाइल था। मैं कम से कम एक तस्वीर तो ले ही सकता था। खैर छज्जे के किनारे खड़े होकर राहुल निवास की तस्वीर ली। जो आज तक मेरे पास है। वही एक यादगार वस्तु है जिसे मैंने आजतक सजों कर रखा है।

रमेश कुमार मौर्य युवा आलोचक और आजमगढ़ में पेशे से शिक्षक हैं। उनकी संपादित पुस्तक दिल्ली बाहर  शीघ्र प्रकाश्य है। 

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