Sunday, May 26, 2024
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सोनभद्र : पीने के पानी के संकट से जूझते सुकृत और आस-पास के गाँव

उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला सोनभद्र, देश के चार राज्यों मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, बिहार और झारखंड की सीमाओं से घिरा हुआ है। खनिज और प्राकृतिक संपदाओं से सम्पन्न इस जिले के बहुत से गाँव के निवासी पानी, सड़क, बिजली जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। हर घर नल और नल में जल का दावा करने वाली डबल इंजन की सरकार की वास्तविकता यहाँ पहुँचने पर मालूम हुई। सोनभद्र जिले के सुकृत और उसके आसपास के गांवों में पानी को लेकर ग्रामीणों की स्थिति क्या है? पढिए हरिश्चंद्र की ग्राउन्ड रिपोर्ट

मौजूदा लोकसभा चुनाव 2024 में मोदी की गारंटी के तहत हर घर नल जल योजना का प्रचार भी ज़ोर-शोर से किया गया है जबकि इसकी सच्चाई बहुत दुखदाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर योजना का प्रचार ऐसे करते हैं जैसे वह उनकी जेब से निकल रही है और वह जो कह रहे हैं वह बिलकुल सत्य हो चुका है यानि हर व्यक्ति उनकी योजनाओं का शत-प्रतिशत लाभ उठा रहा है लेकिन वास्तविकता यह है कि धरातल पर वह जुमला मात्र है।

सोनभद्र में पानी के लिए हाहाकार मचा हुआ है जबकि हर घर नल जल योजना का कहीं अता-पता नहीं है। सुकृत में टैंकर से पानी आता है क्योंकि यहाँ के कुएं और तालाब सूख चुके हैं। जलस्तर बहुत नीचे जा चुका है। इसलिए जब टैंकर आता है तो दूर-दूर गांवों से महिलाएं और बच्चे पानी के लिए दौड़ पड़ते हैं।

सोनभद्र के उत्तरी छोर पर स्थित सुकृत यूँ तो छोटा सा कस्बा है लेकिन इस कस्बे में पानी लेने का नज़ारा दिल्ली-मुंबई की झुग्गियों से कम रस्साकशी वाला नहीं है। टैंकर आने के समय दूर-दूर बसे गांवों से महिलाएँ और बच्चे प्लास्टिक की बाल्टियाँ और डिब्बे उठाए पानी के लिए भागते नज़र आते हैं। जब हमने सुकृत गांव की महिला प्रधान हीरावती देवी से पानी की वर्तमान समस्या और उनके स्तर से किए जा रहे उपाय तथा इस काम में उन्हें मिलने वाली सरकारी मदद के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि ‘हमने चार टैंकरों की व्यवस्था की हैं, जहां तक हमारी क्षमता है पानी पहुंचा रहे हैं। जगह-जगह प्लास्टिक की टंकी रखवाईं हैंऔर पाइप भी बिछवाया है।’

हीरावती देवी के छोटे पुत्र रमाशंकर पटेल आर्मी से रिटायर्ड फौजी हैं, इस समय प्रधान प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ‘प्रधान जी मुझे जो आदेश देती हैं या मुझे जहां लगता है कि कुछ करना चाहिए उन सब कामों को करता हूं।’

सोनभद्र में पत्थर तोड़ते हुए मजदूर, अब यह काम ज्यादातर मशीनों से होते है जिस के कारण हाथ को काम कम मिल पाता है

खदानों के कारण लगातार नीचे होता जा रहा है जल स्तर

आगे वह बताते हैं कि ‘पानी की जो समस्या है वह हमारी ग्रामसभा के लगभग 6 किलोमीटर के एरिया में पत्थर खदानों के कारण हैं। जगह-जगह पत्थर खदानों में रोजाना ब्लास्टिंग होती है और मानकों का पालन नहीं किया जाता। दिन रात खनन होता है, जिससे जलस्तर नीचे चला जा रहा है। न तो सरकार इस पर ध्यान दे रही है न ही जिले के अधिकारी इसके रोकथाम के लिए कदम बढ़ा रहें हैं। ठेकेदार 250-300 फीट तक खदान को खोद चुके हैं। एक तरह से ये ‘खदानें मौत का कुआं’ हैं।’

एक ग्रामीण सुशील कुमार ने मुझे बताया कि ‘यहां पाँच-छः सौ फीट तक बोरिंग करने पर भी पानी नहीं मिल पाता।’ वे कहते हैं कि ‘हमारे यहां जितनी भी नहरें बनीं हैं वह लोकपति त्रिपाठी द्वारा बनवाईं गई है। 40-45 साल पहले बनी नहर की स्थिति आज पूरी तरह खराब हो गई है।’

ग्राम प्रधान अशोक कुमार पटेल, बोरिंग से पानी पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं

एक तालाब का जिक्र करते हुए वह बताते हैं कि ‘यह किसी राजा द्वारा बनवाया गया था। ऐसा उनके बुजुर्ग बताते हैं। राजा ने अपने घोड़ों को पानी पीने के लिए व्यवस्था की थी। इस तालाब में हमेशा पानी रहता था।’

ग्राम प्रधान के बड़े पुत्र अशोक कुमार पटेल स्वयं अपने घर की बोरिंग से टैंकरों में पानी भरकर लोगों के घरों तक पहुंचाने का काम कर रहे थे। उन्होंने बताया कि सुबह जल्दी उठकर यह काम शुरू करते हैं और दोपहर तक पानी पहुंचाते रहते हैं। यदि मेरे गांव में किसी लड़की की शादी पड़ती है तो बिना किसी शुल्क के पानी का टैंकर पहुंचा देता हूं।’

पानी के लिए इंतज़ार करते लोग

हम जब पानी के टैंकर के साथ एक जगह पर रुके तो देखा कि लोग पहले से ही बर्तन लेकर खड़े थे। जैसे ही टैंकर पहुंचा महिलाओं ने पानी भरना शुरू कर दिया। कुछ देर बाद जब हमने वहाँ माजूद एक महिला पुष्पा से बात की तो उसने बताया कि ‘आज पांच दिन बाद टैंकर पानी देने आया है। इसके बीच में हम आधा किलोमीटर दूर से सर पर पानी ढोकर लाते हैं और पीते हैं।’

थोड़ा और आगे बढ़ने पर लगभग 12-15 घर आदिवासियों के हैं। बस्ती तक जाने का कोई रास्ता नहीं है। पानी का टैंकर जैसे ही रुका पहले से ही इंतजार में खड़े लोग अपने-अपने बर्तनों को लेकर दौड़ पड़े। यह ग्रामसभा लोहरा है, लेकिन जब भी सुकृत का टैंकर इधर से गुजरता है लोगों को पानी दे देता है। पानी लेने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रही एक महिला ने हमें बताया कि ‘हफ्ते भर से हमारी ग्रामसभा के पानी का टैंकर नहीं आ रहा है। हम लोग आस-पास की बस्ती के लोगों से विनती कर-करके किसी तरह से पानी पी रहे हैं। नहाने और कपड़े धोने की तो बात ही नहीं है। किसी तरह से जी रहे हैं।’

एक दूसरी महिला खुशबू ने बताया कि ‘हमारे घरों तक बिजली तो आ गई है लेकिन पानी नहीं मिला। अभी तक पेयजल योजना नहीं पहुंची।’ बस्ती से सड़क की दूरी 100 मीटर से ज्यादा नहीं होगी। महिलाएं और बच्चे सर पर 20-25 लीटर के गैलन लेकर ऊबड़-खाबड़ रास्ते से जा रहे थे।

जल-नल योजना की हकीकत जानने के लिए जब हमने लोहरा गांव में बन रही पानी की टंकी का जायजा लिया तो हमने देखा कि टंकी अभी निर्माणाधीन है। कुछ मजदूर पेंट कर रहे थे। वहां पर मौजूद एक स्थानीय युवक जितेंद्र ने हमें बताया कि ‘टंकी पिछले डेढ़ साल से बन रही है और अभी तक काम चल रहा है। न तो पानी की सप्लाई की पाइपलाइन बिछाई गई है और न ही ट्यूबवेल बना है। इस स्थिति में लगता है कि साल भर और लग जाएगा पूरा होने में।’

जितेन्द्र ने आगे बताया कि एक टंकी के भरोसे पूरे गांव में पानी सप्लाई करना बहुत मुश्किल होगा क्योंकि हमारे गांव का एरिया बहुत बड़ा है।

मिर्जापुर और सोनभद्र की सीमापर स्थित गांवों सुकृति, लोहरा, मीठवा में जब हमने लोगों से बात की तो उन्होंने हमें बताया कि आज से 20-25 साल पहले यहां पानी की स्थिति इतनी खराब नहीं थी। तालाबों में पानी हमेशा भरा रहता था,जो बरसाती नाले थे उनमें भी खूब पानी भरा रहता था। लेकिन धीरे-धीरे पानी गायब होता चला गया और आज स्थिति ऐसी है कि हम सब बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।

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टैंकर पहुंचते ही ग्रामीण ज्यादा से ज्यादा बर्तन में पानी भरकर रखने की व्यवस्था में

संकटों से घिरा सोनभद्र

सोनभद्र उत्तर प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा जिला है जो प्रदेश के दक्षिण पूर्व में स्थित है। सोनभद्र  झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से सटा हुआ है। यह पूरा इलाका प्राकृतिक सम्पदाओं से समृद्ध है। लेकिन खराब सरकारी नीतियों और स्थानीय समाजों की उपेक्षा के कारण प्राकृतिक सम्पदा की लूट जोरों पर है। यहां के स्थानीय लोगों के जीवन संघर्षों की बात करें तो खेती-किसानी, रोजगार, स्वास्थ्य, पानी, दवाई, पढ़ाई-लिखाई आदि सभी वस्तुओं के लिए उनको हर रोज जूझना पड़ रहा है और यह समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा  रही है।

इस जिले में हवा और पानी दोनों खतरे में पड़ते जा रहे हैं। सबसे बड़ा संकट पानी का होता जा रहा है। खनन के लिए भारी मशीनरी का प्रयोग और मानकों की धज्जियां उड़ाते खदान आसानी से देखे जा सकते हैं। पत्थर की कटाई में पानी का खूब प्रयोग किया जाता है। इन कारणों से प्राकृतिक रूप से पानी पर संकट गहरा होता जा रहा है।

लोगों का कहना है कि अगर समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो यहाँ जीना मुश्किल होगा। लेकिन लोगों में निराशा भी बहुत है। एक महिला से जब हमने पूछा कि ‘आपके सांसद या विधायक इस समस्या पर क्या कहते हैं तो उसने कहा बस चुनाव के समय हाथ जोड़कर आते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं। फिर हम कभी भी उनका चेहरा नहीं देख पाते। अब तो समझ में नहीं आता किसकी बात पर विश्वास करूँ और वोट दूँ।’

लगातार कम होती जा रही बारिश और दूषित पानी की समस्या

अगर हम सोनभद्र के पिछले चार सालों में हुई बारिश के आंकड़े पर नज़र दौड़ाएँ तो पाएंगे कि वर्ष 2017 में प्री मानसून में 9.64 मिलीमीटर, पोस्ट मानसून में 6.72 मिलीमीटर बारिश हुई। वर्ष 2018 में प्री मानसून 9.89 मिलीमीटर, पोस्ट मानसून 6.49 मिलीमीटर, वर्ष 2019 में प्री मानसून 9.69 मिलीमीटर, पोस्ट मानसून में 4.85 मिलीमीटर और वर्ष 2020 में प्री मानसून में 9.34 मिलीमीटर तथा पोस्ट मानसून में 5.27 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई है।

इसी तरह 2021 में 9.21 मिमी एवं 2022 में 8.65 मिली प्री-मानसूनी बारिश और पोस्ट मानसून 4.12 मिमी बारिश दर्ज़ की गई। साल 2023 में 6.87 मिमी बारिश दर्ज की गई। सोनभद्र का भू जल स्तर हर वर्ष दो से तीन मीटर की गति से घट रहा है। ऐसा नहीं कि यह प्रक्रिया दो चार सालों से शुरू हुई है। यह लगातार होती रही है।

जिले में पिछले 25 सालों से जल प्रदूषण की समस्या बनी हुई है जो आगे आने वाले समय में विकराल रूप धारण करेगी। सोनभद्र के 10 विकास खंडों में सैकड़ों ऐसे गांव हैं जिनमें बहुत से लोग पानी में घुले हुए खतरनाक रसायनों के कारण फ्लोरोसिस विकलांगता से पीड़ित हैं। सोनभद्र के अनेक ऐसे गाँव हैं जहां पानी के कारण हड्डियों में विकार की बीमारियाँ तेजी से फैल रही हैं। लोगों के दाँत असमय पीले और बदरंग होते जा रहे हैं।

आज जब देश को आजाद हुए 76 वर्ष बीत चुके हैं।  देश धरती से लेकर चांद पर हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुका है। विकास का मानक बनाती बड़ी-बड़ी इमारतें, कल-कारखाने, बांध, नहरें जैसी हर चीज हमारे देश के पास है। लेकिन यह सब होने का क्या फायदा? लेकिन वास्तविकता यह है कि आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी हाशिये पर बहिष्कृत है। वह  हर जरूरी चीज के लिए तरस रहा है। उसकी दीनता और लाचारी आज की राजनीति का खाद-पानी बनी हुई है।

मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि सारे संसाधन चंद लोगों के लिए मात्र है। देश की एक बड़ी आबादी रोजमर्रा के छोटे-छोटे सामानों के लिए संघर्ष कर रहीं। पानी प्राणिमात्र के जिंदा रहने के लिए पहली जरूरत है। यह पानी प्रकृति से हमें नि:शुल्क प्राप्त होता है। लेकिन आज पानी का अरबों-खरबों का बाज़ार है। शहरों में एक व्यवस्थित वितरण प्रणाली है लेकिन गांवों-कस्बों में आज तक सार्वजनिक पानी की कोई सुचारु व्यवस्था नहीं बन पाई है। कहीं-कहीं ढाँचा जरूर खड़ा दिखाई देता है लेकिन वितरण प्रणाली रामभरोसे काम कर रही है। लोगों में असंतोष है लेकिन सत्ता इससे बेपरवाह है। जनप्रतिनिधि अपने निजी हितों के अलावा कुछ भी नहीं सोच रहे हैं।

हरिश्चंद्र
हरिश्चंद्र
लेखक गाँव के लोग से जुड़े हुए हैं।

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