Tuesday, April 16, 2024
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एक आदिवासी की कहानी डायरी (26 सितंबर, 2021)

यह एक कहानी ही है। हालांकि हर कहानी घटनाओं का समुच्चय होती है और कुछ घटनाएं या तो घटित हो चुकी होती हैं या फिर घटित होने की संभावना कहानीकार को नजर आती है। अंत में वह सभी घटनाओं को जोड़ता है और कहानी लिखता है। मेरे हिसाब से कहानियों के सृजन की भौतिक प्रक्रिया […]

यह एक कहानी ही है। हालांकि हर कहानी घटनाओं का समुच्चय होती है और कुछ घटनाएं या तो घटित हो चुकी होती हैं या फिर घटित होने की संभावना कहानीकार को नजर आती है। अंत में वह सभी घटनाओं को जोड़ता है और कहानी लिखता है। मेरे हिसाब से कहानियों के सृजन की भौतिक प्रक्रिया यही है। मैं यह तो मान ही नहीं सकता कि कोई भी कहानीकार आंख बंद करके कहानी लिख सकता है। आंखें बंद करने का मतलब यह कि वह आसमानी बातों को अपनी कहानी का विषय बनाए और जमीनी बातों को तरजीह ही न दे।

हालांकि कहानी केवल कहानीकार ही नहीं लिखते। गौर से देखें तो कहानी हर कोई लिखता है और कहता भी है। फिर चाहे वह कोई रेहड़ी वाला हो, रिक्शा चलाने वाला हो, एमपी-एमएलए हो, मिनिस्टर-प्राइम मिनिस्टर हो या फिर अदालताें में बैठा कोई जज या दो या दो से अधिक जजों की कोई खंडपीठ। हालांकि सभी की कहानियां अलग होती हैं। जाहिर तौर पर सभी के परिवेश अलग होते हैं और सभी की भाषा भी अलग। और कहानियों में अंतर तो होता ही है। परंतु मूल तत्व? चलिए आज इसी मूल तत्व पर विचार करते हैं।

[bs-quote quote=”तो इसके लिए पहले एक कहानी सुनिए। कहानी में एक पात्र है। वह राजस्थान का आदिवासी है। यह जान लेना बेहतर होगा तो कहानी के अलग-अलग मोड़ों को समझने में आसानी होगी। तो राजस्थान का वह आदिवासी नायक पढ़ने में तेज था। उसके खूब सारे सपने थे। अपने सपनों के लिए उस नायक बचपन से संघर्ष किया।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

तो इसके लिए पहले एक कहानी सुनिए। कहानी में एक पात्र है। वह राजस्थान का आदिवासी है। यह जान लेना बेहतर होगा तो कहानी के अलग-अलग मोड़ों को समझने में आसानी होगी। तो राजस्थान का वह आदिवासी नायक पढ़ने में तेज था। उसके खूब सारे सपने थे। अपने सपनों के लिए उस नायक बचपन से संघर्ष किया। मां-बाप की मार भी सहे कि जब उसकी उम्र के अन्य काम करते हैं, फिर वह किताबों के पीछे क्यों पड़ा रहता है। लेकिन इस कहानी का नायक तो अलहदा था। उसके सिर पर तो जज बनने का भूत सवार था। वह दिन-रात पढ़ता रहता।

इस आदिवासी नायक के जीवन में सब ठीक ही चल रहा था। सिवाय इसके कि उसका जीवन तंगहाली से गुजर रहा था। एक तो दो कमरे के घर में उसे पढ़ने के लिए जगह भी नहीं मिलती थी। बरामदे को उसने अपना अध्ययन कक्ष बना रखा था। उसकी किताबें बची रहें, इसके लिए उसने प्लास्टिक खरीद रखा था। जब बरसात की आहट होती तो वह डर के मारे अपनी सारी किताबें उस प्लास्टिक के हवाले कर देता और इंतजार करता कि बारिश खत्म हो और वह पढ़ना शुरू करे।

पढ़ने के लिए उसे भूखे भी रहना पड़ा। कई बार तो आधा पेट खाकर ही पढ़ता रहता। वह जानता था कि उसके घर के वे सदस्य, जो बाहर जाकर शारीरिक श्रम करते हैं और घर के लिए अनाज कमाते हैं, उन्हें अनाज की आवश्यकता अधिक है। उसका क्या है, उसको तो केवल पढ़ना ही है। कई बार उसे घर के लोगों की बातें भी सुननी होती थीं कि काहिल की तरह घर में बैठा रहता है और मुफ्त की रोटियां तोड़ता रहता है।

[bs-quote quote=”लेकिन इस कहानी का नायक बड़ा जिद्दी है। उसने तो जैसे ठान ही रखी थी कि या तो जज बनना है या फिर जिंदा ही नहीं रहना है। वैसे किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस तरह का जुनून गैरवाजिब तो नहीं ही कहा जा सकता और रही बात परिस्थितियों की तो कौन है जो उनसे बच सका है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

लेकिन इस कहानी का नायक बड़ा जिद्दी है। उसने तो जैसे ठान ही रखी थी कि या तो जज बनना है या फिर जिंदा ही नहीं रहना है। वैसे किसी भी लक्ष्य को हासिल करने के लिए इस तरह का जुनून गैरवाजिब तो नहीं ही कहा जा सकता और रही बात परिस्थितियों की तो कौन है जो उनसे बच सका है।

खैर, कहानी का नायक सफलताएं हासिल करता है। अच्छे अंकों के साथ बोर्ड की परीक्षा पास करता है। फिर इंटर और फिर कानून में स्नातक। वह पढ़ने का सफर जारी रखता है। उसे घर का खर्च चलाने के लिए वकालत भी करनी पड़ती है। वह पीछे नहीं हटता। लेकिन उसके निशाने पर उसका लक्ष्य है – जज बनना। घर वाले उसकी शादी कर देते हैं और फिर उसकी जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं। लेकिन यदि वह जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेता तो मेरी इस कहानी का नायक कैसे होता?

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तो हुआ यह कि एक बार उसने राजस्थान हाई कोर्ट के आदेश पर जूनियर डिविजन जजों की नियुक्ति के लिए जारी वैकेंसी का आवेदन भरा। वह पहले से ही तैयार था। वह जानता था कि वह परीक्षा में बैठेगा तो सफल होगा ही। उसके इस विश्वास के पीछे उसकी कड़ी मेहनत थी। और हुआ भी यही। उसे सफल घोषित किया गया। साक्षात्कार आदि भी संपन्न हो गए। अंतिम परिणाम भी उसके लिए सकारात्मक रहा।

अब उसे इत्मीनान हो गया था कि आदिवासी परिवार का एक इंसान यानी वह जज बन ही जाएगा। बस थोड़े ही दिनों में ज्वाइन करने के लिए बुलावा आएगा। उसके घर वाले भी बहुत खुश थे। उसकी बीवी भी बहुत खुश थी कि अब उसके सपने भी पूरे होंगे।

परंतु, एक दिन उसे सूचना दी जाती है कि वह जज नहीं बन सकता। उसके आवेदन को ही खारिज कर दिया गया है। मतलब यह कि उसका परीक्षा देना और परीक्षा में सफलता हासिल करना तथा साक्षात्कार में सफलता हासिल करन सब महत्वहीन हो गया है। वह चौंका। उसे दुख भी हुआ। लेकिन उसने उसी राजस्थान हाई कोर्ट में मुकदमा दायर किया, जिसके आदेश पर यह आदेश जारी किया गया था कि वह जज नहीं बन सकता।

[bs-quote quote=”अब उसे इत्मीनान हो गया था कि आदिवासी परिवार का एक इंसान यानी वह जज बन ही जाएगा। बस थोड़े ही दिनों में ज्वाइन करने के लिए बुलावा आएगा। उसके घर वाले भी बहुत खुश थे। उसकी बीवी भी बहुत खुश थी कि अब उसके सपने भी पूरे होंगे।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

दरअसल, कहानी के इस पड़ाव से पहले एक कहानी और है जो उसके आवेदन भरे जाने के बाद शुरू हुई। जब निचली अदालतों में वकालत कर रहा था तब अपनी प्रतिभा के कारण वह तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। आदिवासियों के मामले में वह कम पैसे में ही काम चलाता था। कई गरीब आदिवासियों की कानूनी लड़ाई उसने बिना पैसे के लड़ी। उसे कर्तव्य पथ से अलग करने के लिए उसके उपर पहले दो मुकदमे दर्ज किए जाते हैं, जो कि बाद में जांच के दौरान झूठे पाए जाते हैं। फिर दो मुकदमे और। इन दोनों मुकदमों में कहा गया कि उसने मारपीट की है। जबकि हकीकत यह थी कि मारपीट उसके साथ की गई थी और वह भी निचली अदालत के परिसर में। खैर, इन दोनों मामलों में भी वह कोर्ट के द्वारा बरी इसलिए कर दिया गया था क्योंकि उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने वाले ने अपना मुकदमा वापस ले लिया था।

तो राजस्थान हाई कोर्ट की उस समिति ने केवल इस आधार पर इस आदिवासी नायक को जज बनने से रोक दिया क्योंकि उसके खिलाफ चार मुकदमे दर्ज हुए थे और वह भी तब जब उसने आवेदन फार्म भी नहीं भरा था। हाई कोर्ट में सुनवाई हुई तो कहा गया कि जज का काम बेहद पवित्रता वाला काम होता है। व्यक्तिगत पृष्ठभूमि का धवल होना जरूरी है। इसलिए राजस्थान हाई कोर्ट की समिति ने उसके आवेदन को खारिज किया जो कि उसके अधिकार क्षेत्र में आता है।

अब इस कहानी के चरम की ओर बढ़ते हैं। कल सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के एम जोसेफ और न्यायाधीश पीएस नरसिम्हा की खंडपीठ ने भी इस मामले में अपना फैसला देते हुए राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सर्वोच्च नैतिक आधार रखने वाले न्यायाधीश न्याय देने की व्यवस्था में जनता के विश्वास का निर्माण करने में लंबा सफर तय करते हैं और न्यायिक अधिकारी की साख और पृष्ठभूमि के बारे में आम आदमी की धारणा महत्वपूर्ण है। खंडपीठ ने कहा कि किसी भी स्तर पर न्यायिक अधिकारी के पद पर सबसे सटीक मानदंड होते हैं।

तो इस कहानी का अंत सुखांत नहीं है। इस कहानी का आदिवासी नायक कानूनी लड़ाई हार चुका है। वह क्यों हारा है, इसके पीछे की दास्तां बहुत लंबी है। फिलहाल मेरी जेहन में एक कविता है –

वह जो मंदिरों में बैठा है
सदियों से जिसकी पीढ़ियां
खा-खाकर मोटी होती रही हैं
यकीन मानो वह आदमी नहीं है।

पूरे ब्रह्मांड में लागू होते हैं
गति के सारे नियम
और फिर यह कि
हर सृजन के पीछे
होती है एक भौतिक क्रिया
लेकिन यह तो वह तब समझता
अगर वह आदमी होता।

सचमुच वह आदमी नहीं है
उसका बाप भी आदमी नही था
और उसके दादाओं-परदादाओं के बाप भी
आदमी नहीं थे
वह तो कोई भेड़िए थे
आदमी की शक्ल में आए थे
सिंधु सभ्यता लूटने।

मैं सच कहता हूं
वे आदमी नहीं हैं
और अगर वे आदमी होते
इंसान-इंसान में भेद क्यों करते
और दूसरों की संपत्ति लूटने-खसोटने को
भगवान का झूठा स्वांग क्यों रचते?

हां, वह जो मंदिरों में बैठा है
सदियों से जिसकी पीढ़ियां
खा-खाकर मोटी होती रही हैं
यकीन मानो वह आदमी नहीं है।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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