वो भूली दास्ताँ, फिर याद आ गई

विकास कुमार झा

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मेरी आदत रही है कि कई महत्वपूर्ण कागजातों को किसी किताब के पन्ने के बीच रख देता हूँ। उन किताबों को कभी पलटने के क्रम में वे कागज़ चुपके से झाँक कर अपनी याद दिला जाते हैं। इधर कई दिनों से अंग्रेजी शब्दकोष के पन्ने के बीच रखी एक तस्वीर रह-रहकर दिख रही है। यह तस्वीर ‘इन्दुभूषण पब्लिक लाइब्रेरी’ की है, जो पूर्णिया के बंगलाभाषी बहुल मुहल्ले दुर्गाबाड़ी में स्थित है। यह लाइब्रेरी बंगला के अमर रचनाकार स्व.सतीनाथ भादुड़ी के पिता स्व.इन्दुभूषण भादुड़ी की स्मृति में है, जो किसी जमाने में पूर्णिया के एक नामचीन वकील थे। बहरहाल, इस लाइब्रेरी का छोटा-सा भवन है। बंगला साहित्य की बहुत पुरानी और चुनिंदा किताबें इसमें संगृहीत हैं। पूर्णिया के बंगला भाषी इस लाइब्रेरी की देखभाल करते हैं। वैसे, साधन के अभाव में इस लाइब्रेरी की हालत अच्छी नहीं।
इस लाइब्रेरी से लगभग 32 साल पहले मैं तब परिचित हुआ जब पूर्णिया के दुर्गाबाड़ी मुहल्ले में मेरी शादी हुई। सतीनाथबाबू के साहित्य से मैं परिचित था। विशेषकर ‘ढोढाई चरितमानस’ और ‘जागरी’ सरीखी उनकी महान कृतियों से।दुर्गाबाड़ी मुहल्ले के सटे ही पिछड़ी ततमा जाति की रिहायशी टोली जमाने से बसी हुई है, जिस पर आधारित सतीनाथबाबू का क्लासिक बंगला उपन्यास ‘ढोढाई चरित मानस’ है। इस उपन्यास को लेकर ही कुछ लोगों ने ‘मैला आँचल’ के रचयिता स्व.फणीश्वरनाथ रेणु पर आरोप लगाया था कि सतीनाथबाबू के इसी उपन्यास की रेणुजी ने नकल मारी है। हालांकि, यह आरोप निराधार था। पर यह अवश्य था कि रेणुजी के कथा गुरु सतीनाथबाबू ही थे। विवाद उठने पर रेणुजी ने बहुत शालीनतापूर्वक कहा था कि सतीनाथबाबू की रचनाओं का प्रभाव निस्संदेह उनकी रचनाओं में है। पर यह नकल नहीं है।
दुर्गाबाड़ी में ससुराल होने के कारण मैं मुहल्ले का ‘जमाईबाबू’ था। सतीनाथबाबू की रचना भूमि ततमा टोली में मैं अनेक बार गया था। समय बहुत बदल गया था। सतीनाथबाबू के उपन्यास का कोई पात्र दुनिया में नहीं रह गया था। हां, उनके वंशज थे।

दरभंगा में बचपन से किशोरावस्था और युवावस्था के कुछ दिन व्यतीत होने के दौरान बंगला साहित्य के नक्षत्र महान लेखक स्व.विभूति भूषण मुखोपाध्याय का असीम आशीर्वाद और स्नेह पाने का सौभाग्य मुझे मिला था। उल्लेखनीय है कि महान चित्रकार स्व.नंदलाल बसु का बचपन दरभंगा में बीता था। बचपन में जिस 'पीताम्बरी बंगला स्कूल' में नंदलाल बसु पढ़ते थे, वहाँ से दिन में एक बार मैं गुज़रता ही था।

 

मैंने दुर्गाबाडी के अनेक प्रमुख लोगों से अफसोस जाहिर करते हुए कहा कि सतीनाथबाबू सरीखे महान व्यक्तित्व कभी इस मुहल्ले में रहते थे। पर उनकी स्मृति में इस मुहल्ले में कुछ भी नहीं। उनके पिता की स्मृति में जो एक छोटी-सी लाइब्रेरी है, उसका भी हाल अच्छा नहीं। बहरहाल, जमाई बाबू की बात का थोड़ा असर हुआ। दुर्गाबाडी में एक पथ का निर्माण सतीनाथबाबू की स्मृति में हुआ। ‘इन्दुभूषण पब्लिक लाइब्रेरी’  के भवन का भी नया रंग-रोगन हुआ। यह सब देखकर मुझे भी बहुत संतोष हुआ। ससुराल प्रवास के दौरान ही बंगला साहित्य में ‘दादा मोशाय’ के नाम से ख्यात केदारनाथ बंद्योपाध्याय के वयोवृद्ध नाती आदरणीय क्षितीश चटर्जी से मेरी मुलाकात हुई। उन्होंने मुझे बताया कि उनकी माँ अल्पवय में जब विधवा हो गयीं, तो उनके नाना बेटी के स्नेह और देखरेख में अपना सबकुछ छोड़ बेटी के पास आकर पूर्णिया रहने लगे। उनके पूर्णिया प्रवास के दौरान बंगला साहित्य जगत के दिग्गज जो उनसे पत्राचार करते थे, उन्होंने वह सब मुझे दिखाया। सारे अनमोल पत्र जीर्ण-शीर्ण हालत में थे। कुछ को दीमक ने अपना ग्रास बना लिया था। ख़ैर, बंगला साहित्य के उस अनमोल धरोहर को प्रकाशित करने की अनुमति मैंने क्षितीशबाबू से ली।
दरभंगा में बचपन से किशोरावस्था और युवावस्था के कुछ दिन व्यतीत होने के दौरान बंगला साहित्य के नक्षत्र महान लेखक स्व.विभूति भूषण मुखोपाध्याय का असीम आशीर्वाद और स्नेह पाने का सौभाग्य मुझे मिला था। उल्लेखनीय है कि महान चित्रकार स्व.नंदलाल बसु का बचपन दरभंगा में बीता था। बचपन में जिस ‘पीताम्बरी बंगला स्कूल’ में नंदलाल बसु पढ़ते थे, वहाँ से दिन में एक बार मैं गुज़रता ही था।

कुल मिलाकर, लब्बोलुआब यह कि इन सब परिस्थितियों के बीच बंगलाभाषियो और बंगला साहित्य के प्रति मेरा बहुत रुझान हुआ।
विभूतिबाबू से लेकर भागलपुर में जन्में दादा मुनि अशोक कुमार जी से अपनी मुलाकातों को मैंने बड़े अनुराग से लिखा।बिहार के बंगला भाषियों के जीवन पर केन्द्रित मैंने पटना से प्रकाशित हिन्दी दैनिको में कई बार पूरा-पूरा पेज लिखा।इलाहाबाद के ‘मित्र प्रकाशन’ की प्रमुख समाचार पत्रिका ‘माया’ में बिहार से बतौर ब्यूरो प्रमुख काम करने के दौरान मित्र प्रकाशन की बंगला पत्रिका ‘आलोकपात’ के संपादक स्व.रमा प्रसाद घोषाल ने भी मेरे कई आलेखों का प्रकाशन ‘आलोकपात’ में किया।
एक बार कलकत्ता-यात्रा के दौरान आदरणीय रमा दा ने मुझसे कहा कि क्यों न मेरे आलेखों का एक संग्रह बंगला में प्रकाशित कराया जाय! बंगला भाषियों के जीवन पर केन्द्रित मेरे अनेक आलेख तब तक छप चुके थे। आदरणीय क्षितीशबाबू से प्राप्त दादा मोशाय के पत्रों को भी प्रकाश में लाने का दायित्व मैंने ले रखा था। रमा दा ने कलकत्ता के एक नवोदित प्रकाशन ‘तारकनाथ बुक सिंडीकेट’ के व्यवस्थापक जगन्नाथ प्रामाणिक से किताब प्रकाशित करने की बात की और बंगला में मेरी किताब आयी–‘परिचय पत्र।’
अब ‘तारकनाथ बुक सिंडीकेट’ भी नहीं। जगन्नाथ प्रामाणिक भी नहीं। और आदरणीय रमा प्रसाद घोषाल भी दुनिया में नहीं हैं। पर इन सबकी मधुर स्मृति तो मेरे मन में आखिरी सांस तक रहेगी।
ससुराल प्रवास के दौरान ‘इन्दुभूषण पब्लिक लाइब्रेरी’ की यह तस्वीर मैंने ही ली थी, जब उसके जर्जर भवन का मेरे लगातार के अनुरोध पर जीर्णोद्धार कराया गया था। लाइब्रेरी की यह तस्वीर स्टुडियो में साफ करवा कर मैंने अंग्रेजी डिक्शनरी के पन्ने के बीच रख दी थी। इधर बार-बार पन्ने के बीच से यह तस्वीर झाँक जाती। लिहाजा, वह जो कहते हैं-‘वो भूली दास्ताँ,फिर याद आ गयी।’

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और उपन्यासकार हैं।

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