‘उत्तर’ देता प्रदेश(डायरी, 15 जनवरी 2022)  

नवल किशोर कुमार

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सियासत में मोमेंटम का असर बहुत होता है। जीत उसी को मिलती है जो मोमेंटम बनाता है और जीत मुकम्मल होने तक बनाए रखता है। ऐसा लगभग हर चुनाव में होता है। उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति अब रंगदार हो गयी है। कल जिस तरह से हजारों की भीड़ के बीच भाजपा मंत्रिमंडल के तीन मंत्री और भाजपा के छह विधायकों ने समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली, वह मोमेंटम को ही दर्शाता है। दरअसल, जो सपा में शामिल हुए उन्हें केवल मंत्री व विधायक कहना आधा सच कहने के जैसा है। पूरा सच यह है कि ये सभी दलित-ओबीसी पहले हैं और मंत्री-विधायक बाद में।
अखिलेश यादव मोमेंटम का मतलब समझते हैं। इसके पहले वे नहीं समझते थे। वर्ष 2020 में बिहार विधानसभा के चुनाव में तेजस्वी यादव ने हालांकि मोमेंटम बनाने की कोशिश की थी, लेकिन वे अकेला चना साबित हुए। इस बार उत्तर प्रदेश में अखिलेश ने इसका तोड़ निकाल लिया है। उन्होंने कद्दावर नेताओं को सम्मान दिया है और उन्हें अपनी बात कहने का मौका दिया है। इनमें आप चाहें तो स्वामी प्रसाद मौर्य, शिवपाल सिंह यादव, धर्म सिंह सैनी और दारा सिंह चौहान आदि का नाम शामिल कर सकते हैं।

दरअसल, तोड़फोड़ अथवा दूसरी पार्टी के नेताओं को चुनाव के ठीक पहले अपने दल में शामिल करना और खबरों में बने रहने की रणनीति भाजपा की रही है। लेकिन यह पहला मौका है जब उत्तर प्रदेश में सपा यह कर रही है और हालत यह है कि पिछले पांच दिनों से सपा से जुड़ी एक खबर दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता के पहले पन्ने पर लीड खबर के रूप में प्रकाशित है।

 

दरअसल, तोड़फोड़ अथवा दूसरी पार्टी के नेताओं को चुनाव के ठीक पहले अपने दल में शामिल करना और खबरों में बने रहने की रणनीति भाजपा की रही है। लेकिन यह पहला मौका है जब उत्तर प्रदेश में सपा यह कर रही है और हालत यह है कि पिछले पांच दिनों से सपा से जुड़ी एक खबर दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता के पहले पन्ने पर लीड खबर के रूप में प्रकाशित है।

कल ही एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रहे कमाल खान का निधन हो गया। वे एक अच्छे वक्ता थे। उर्दू के अच्छे जानकार भी रहे। क्लासिकल तरीके से अपनी बात रखनेवाले कमाल खान का एक विश्लेषण कल रात में देख रहा था। संभवत: यह विश्लेषण उन्होंने दो दिन पहले ही किया। वे अपने विश्लेषण में भाजपा के दलित-ओबीसी नेताओं के विद्रोह के पीछे की कहानी बता रहे थे। उनके मुताबिक, तीन तरह के सर्वे किए गए हैं। ये तीनों सर्वे भाजपा ने कराए। इन सर्वेक्षणों के आधार पर ही भाजपा के विधायकों का मूल्यांकन किया गया है कि किसे टिकट मिलेगा और कौन बेटिकट होगा। कमाल खान का एक मंतव्य यह रहा कि भाजपा छोड़नेवालों में वे विधायक ही हैं, जिन्हें यह विश्वास हो गया था कि वे बेटिकट कर दिए जाएंगे।
दरअसल, कमाल खान की रिपोर्टिंग का आधार स्पष्ट नहीं है। सर्वे वाली बात भाजपा के आईटी सेल की उपज है और इसके जरिए भाजपा उन नेताओं को कमतर बता रही है जिन्होंने उसे छोड़ा है। वैसे भी आजकल चुनाव एक मेगा इवेंट हो गया है। हर पार्टी अपने-अपने स्तर पर सर्वेक्षण कराती है। पीके यानी प्रशांत किशोर के जैसे देश में अनेक पालिटिकल इवेंट मैनेजर हैं, जो यह काम करते हैं।

खैर, मैं तो यह देख रहा हूं कि भाजपा छोड़नेवाला हर शख्स दलितों और पिछड़ों के साथ हकमारी की बात कर रहा है। स्वामी प्रसाद मौर्य ने तो कल स्पष्ट रूप से इसका एलान भी कर दिया कि पचासी तो हमारा है, पंद्रह में भी बंटवारा है। यह एक नया नारा है, जिसके गहरे निहितार्थ हैं।

 

खैर, मैं तो यह देख रहा हूं कि भाजपा छोड़नेवाला हर शख्स दलितों और पिछड़ों के साथ हकमारी की बात कर रहा है। स्वामी प्रसाद मौर्य ने तो कल स्पष्ट रूप से इसका एलान भी कर दिया कि पचासी तो हमारा है, पंद्रह में भी बंटवारा है। यह एक नया नारा है, जिसके गहरे निहितार्थ हैं।
विस्तार से बात करें तो दलितों और पिछड़ों की गोलबंदी लंबे समय के बाद होती दिख रही है। इसके पहले जब मुलायम सिंह यादव और कांशीराम एक हुए थे। तब मजाक के तौर पर कहा जाता था– एक हो गए मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम। इस बार पर भी मोमेंटम कुछ इसी तरह का बनता दिख रहा है। भाजपा राम के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीति करना चाहती है और सपा दलितों और पिछड़ों के हक-हुकूक के सवाल पर। यह बेहद दिलचस्प तस्वीर है यूपी की सियासत की।
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बहरहाल, चुनाव में अभी कई दिन बाकी हैं। लिहाजा कई और रंग देखने को मिलेंगे। अभी तो मायावती की राजनीतिक चाल को देखना बाकी है और भाजपा के रणनीतिकारों का पैंतरा भी। इन सबके बीच दलितों और पिछड़ों के सवालों का उत्तर देते दिख रही है उत्तर प्रदेश की राजनीति।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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