नदी से परिचय बढ़ाने की तीसरी यात्रा

दीपक शर्मा

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वरुणा नदी के किनारे से तीसरी पैदल यात्रा सुरवा घाट से पिसौर पुल तक

गांव के लोग, सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट के तत्वावधान में नदी एवं पर्यावरण जन संचेतना यात्रा का तीसरा आयोजन 26 जून, रविवार को हुआ। आयोजन की रूपरेखा गाँव के लोग कार्यालय में पहले से ही तैयार कर ली गई थी। जिसके कुछ महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं- वरुणा नदी की स्वच्छता के लिए पहल करना, नदी के दोनों किनारों पर जलीय जन्तुओं एवं पौधों के जीवन व अस्तित्व की रक्षा करने के लिए जागरूकता अभियान चलाना, नदी के किनारे बसे गांव में लोगों के भीतर पर्यावरण एवं प्रकृति के प्रति संवेदना का विकास करना तथा नदी किनारे लोगों के स्मृतियों एवं सभ्यता का संचयन करना है।

यात्रा की शुरुआत रविवार की सुबह 5:45 बजे शिवपुर रेलवे फाटक से हुई। मैं सुबह पौने छह बजे शिवपुर रेलवे फाटक पर पहुंचकर रामजी यादव सर और अपर्णा मैम का इंतजार करने लगा। वह वरुणा  एक्सप्रेस ट्रेन का समय था, फाटक बंद थी। फाटक खुलते ही मेरे पीछे से आवाज आई, दीपक! दीपक!  यह आवाज अपर्णा मैम की थी। मैं सड़क की दूसरी और पर अपनी स्कूटी खड़ी करके चहलकदमी कर रहा था। सर और मैम को देखते ही मैं उनके पास गया। तब तक वहां वल्लभाचार्य पांडेय और नंदलाल मास्टर भी आ गए। हम लोग चाय पीने लगे। चलने की बारी आई तो पता चला कि अमन विश्वकर्मा और उनके साथ किसान नेता रामजनम भी आ रहे हैं। सर ने कहा- थोड़ी देर और ठहर कर उनका इंतजार कर लिया जाए, हो सकता है आने में कहीं रास्ता भटक जाएं तो दिक्कत होगी। चाय  खत्म होते-होते वे लोग भी आ गए। उनके लिए भी चाय मंगाई गई। फिर हम लोग अपने अपने वाहन से दक्षिण दिशा में नदी की तरफ चल दिए। कुछ दूर चलने के बाद हम लोग सद्गुरु स्वीट हाउस के पास अपना-अपना वहां खड़ा कर दिए। बातचीत करते हुए पहले तो छुच्छै हाथ चलें फिर वल्लभाचार्य ने कहा कि अगर बैनरवा खोल के हथवा में ले लेते तो बढ़िया लगता, ताकि लोग देखें कि हम लोग किसलिए निकलें हैं। तब हम लोग बैनर खोलकर हाथ में लेकर चलने लगें। दो लोगों के हाथ में बैनर था, पीछे पीछे 5-6 की संख्या में हम लोग चल रहे थे। सड़क किनारे घर व दुकानों से लोग बाहर निकल कर हम लोगों को ध्यान से देख रहे थे और बैनर पर लिखे हुए हैडलाइन को पढ़कर हमारे अभियान के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो रहे थे। हम लोग सबको बताते व समझाते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे।

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पन्द्रह मिनट के पदयात्रा के बाद हम लोग सुरवा घाट पर पहुंच गए। जहां पर नदी के पहली यात्रा का समापन हुआ था, नदी के उस पार तड़िया गाँव था। उसके दोनों तरफ ताड़ के हरे-भरे सुंदर वृक्ष और नदी के दोनों छोर को मिलाने वाला बाँस का पुल था। सुबह का समय था, गांव के लोग नदी किनारे टहल रहे थे। कुछ लोग काम से बाहर निकल रहे थे। हम लोगों को फोटो खिंचवाते देख आस-पास से कई लोग इकट्ठा होकर इस अभियान में शामिल हुए। नदी के बिगड़ते-बनते हालात पर ग्रामीणों से विस्तार से चर्चा हुई। इस बातचीत में माओ नाम के एक व्यक्ति ने अपने स्मृतियों को विस्तार से साझा किया। उन्होंने कहा कि नदी हम लोगों के लिए प्राणदायिनी थी। इसके बिना हमारे जीवन का कोई अस्तित्व न था। आज से 25 बरस पहले हम लोग न सिर्फ इसमें नहाते थे बल्कि कहीं से थके-हारे हुए आते थे तो इसमें का पानी भी पी लेते थे। हमारे दादा-परदादा का जीवन-बसर नदी के सहारे हुआ। किंतु आज यह पानी जानवर भी नहीं पीते, नदी के ऐसी हालत देखकर हम लोग बहुत दुखी हैं।

इसके बाद हम लोग नदी के किनारे से चले तो ग्रामीणों ने बताया कि आगे मार्ग अवरुद्ध है तो हम लोग नदी किनारे गांव के खड़ंजे से चलने लगे। इससे गांव के लोगों तक अपनी बात पहुंचाने और उन्हें समझाने में और अधिक कामयाब हो रहे थे। गाँव के कुछ लोग कुछ दूर तक हमारे साथ चलें लेकिन हमारी यात्रा लंबी थी तो वे वापस लौट गए। तब हम लोग पुनः नदी के किनारे होकर चलने लगें। नदी का किनारा मानव-मल और गंदगी से पटा हुआ था। तब हम लोग उसके उपर बने बाँध पर चलने लगे। चलते-चलते  हम लोग कोटवा के सामने वाले घाट पर पहुंचे तो देखा कि उस पार से गंदा नाला बहता हुआ नदी में गिर रहा था जो बचे-खुचे स्वच्छ जल को भी काला कर रहा था। नदी के किनारे जलकुंभी को बहुत बुरे ढंग से क्षति पहुंचा रहा था। इसे देखकर लगा कि नदियों की विकास और स्वच्छता अभियान की कहानी कुछ अलग ही है। शहर में जगह-जगह लगे हुए ‘स्वच्छ काशी-सुंदर काशी’ वाले बैनर पर तरस आ रहा था। नदी के किनारे चलते हुए कुछ लोगों से बातचीत किया तो वे लोग भी इससे बहुत दुखी थे।

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रामजी सर ने उन लोगों से पूछा कि आप अपने आसपास के लोगों को कचरा करने से क्यों नहीं मना करते हैं? तो जवाब मिला कि जब सरकारे कुछ ना कर रही हैं तो हम लोग क्या कर सकते हैं! हम लोग भी तो चाहते हैं कि नदी स्वच्छ और साफ रहे, किंतु इस पर हमारा बस और अख्तियार नहीं चलता। बताइये हम लोग क्या करें। आगे बढ़ने पर खेत से लौटते हुए कुछ ग्रामीणों ने पूछा कि भैया आप लोग आप लोग बैनर पोस्टर लेकर कहां जा रहे हैं? रामजनम ने अपनी यात्रा के उद्देश्य को समझाते हुए कहा कि हम लोग पर्यावरण को लेकर बहुत चिंतित हैं इसमें कुछ हद तक सुधार हो इस प्रयास में यह अभियान चला रहे हैं। आप भी नदी के बारे में अपने भी कुछ विचार दीजिए? उन लोगों ने कहा कि यह तो बहुत अच्छी बात है, हम लोगों से जो बन पड़ेगा, आप लोग का साथ देंगे विस्तार से बात करने के लिए हमने उनका नाम पूछा तो वे लोग अपना नाम मुन्नालाल, मिश्री लाल, सिपाही शिव शंकर, रतनलाल आदि बताएं। इसी बातचीत में एक लोग ने मजिकिया अंदाज में कहा कि नदी के इसी पानी से कितने लोग दारू का पैग बना लेते थे किंतु अब कोई इस पानी को छूना भी नहीं चाहता। इसी बीच हम लोगों की टीम दो भाग में बँट गई कुछ लोग आगे बढ़ गए थे और मैं अमन के साथ पीछे रह गया। फिर तेजी से चलते हुए एक साथ हो गए। पिसौर पुल से पहले श्यामजी यादव एक बुजुर्ग आदमी रामलाल पटेल को लेकर रास्ते में हम सबका इंतजार करते हुए मिले। रामलाल नदी की दुर्दशा को बयां करते हुए रामजी सर से लिपटकर कर रो पड़ें। यह कहते हुए कि भैया लोगन हमरे माई के बचाई ला, नहीं तो ई एकदम्मै से मर जाई। उनके माई कहने का तात्पर्य वरुणा नदी से था। जिसे वे मां के रूप में देख रहे थे।

श्यामजी यादव उन्हें समझाते हुए बैनर का एक हिस्सा खुद पकड़े और दूसरा उन्हें पकड़ा कर आगे-आगे चल दिए। अब हम लोग यात्रा के समापन पर थे। इसी बीच नंदलाल मास्टर ने कहा की हम लोग नदी की एक लंबी यात्रा कर चुके लेकिन कहीं कोई अखाड़ा नहीं दिखा। पहले नदियों के किनारे अखाड़े हुआ करते थे। लगता है कि अब अखाड़ों का युग खत्म हो चुका है। अब हम लोग पिसौर पुल तक पहुंच चुके थे। खेत की तरफ से पुल के पास सड़क पर आ गए। वहाँ एक मंदिर के आश्रम में ग्रामीण लोगों ने हम लोगों के बैठने की व्यवस्था पहले से कर चुके थे। ऊंची-नीची चढ़ाई-उतराई करते करते यह यात्रा पूरी हुई, सब लोग थक चुके थे लेकिन अभी कार्यक्रम का दूसरा सत्र बाकी था। अपर्णा मैम ने दूसरा सत्र आरंभ करने का संकेत किया। यह सत्र वैचारिक गोष्ठी, विचार एवं चिंतन था। गोष्ठी का विषय था -नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा। गोष्ठी के संचालन का दायित्व रामजी यादव ने संभाला। उन्होंने कहा कि यात्रा का यह तीसरा क्रमिक कार्यक्रम है। हमारे जीवन में नदी की विशेष और अहम भूमिका है। पृथ्वी पर होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भूजल पर ही निर्भर है। लेकिन वह चाहे सरकारी मशीनरी हो, उद्योग हो, कृषि क्षेत्र हो या आम लोग, सभी ने इसका दोहन किया है जिसका नतीजा भूजल के लगातार गिरते स्तर के चलते जल संकट की भीषण समस्या के रूप में हमारे सामने है। इससे भारत ही नहीं कई देशों में भयावह स्थिति पैदा हो गई है। यह इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में स्थिति कितनी विकराल हो सकती है। इसे उसी स्थिति में रोका जा सकता है जबकि पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज हो, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पानी का दोहन नियंत्रित हो, संरक्षण हो, भंडारण हो ताकि वह जमीन के अंदर प्रवेश कर सके। इसके लिए वरुणा नदी का साफ होना अति आवश्यक है जो हमारी ही जिम्मेदारी है।

गोष्ठी की शुरुआत करते हुए सबसे पहले नंदलाल मास्टर ने अपने वक्तव्य में कहा कि बनारस में अस्सी नदी खत्म हो चुकी है, कहीं वरुणा नदी का भी ऐसा हाल न हो जाए हम लोगों को इसकी चिंता करनी है।  आज भी बहुत लोगों का जीवन वरुणा नदी पर निर्भर है, अगर हम लोग उस पर विचार नहीं किए तो 25-30 साल में यह नदी भी असि की तरह हो जाएगी। अब सरकारें वोट की राजनीति करना सीख गई हैं उन्हें पर्यावरण से कोई मतलब नहीं है। हम लोगों को खुद सामने आकर इसका पहल करना होगा। हम लोगों को छोटे-छोटे प्रयास से यह काम मिल-जुलकर करना होगा। नदी किनारे एक भी ऐसा पेड़ नहीं दिखा जो पांच 10 साल पुराना हो। यहां जितने भी पेड़ हैं 30-35 साल से पहले के हैं। हमें नदी एवं पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना होगा। इसके बाद उन्होंने नदी पर एक सुंदर गीत सुनाया –

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किसान नेता रामजनम ने कहा कि हमारा देश गांवों, किसानों, जल, जंगल, जमीन से घिरा हुआ देश है। हमारा सामाजिक वातावरण वैसा ही है जैसा प्राकृतिक वातावरण है। यहां भोजन, पानी, हवा कुछ भी ठीक नहीं है। ‘क्षीत, जल, पावक, गगन, समीरा’ ये पाँचों तत्व दुषित हो चुके हैं। यदि नदियां नष्ट हो जाएंगी तो हमारी सभ्यताएं भी नष्ट हो जाएंगी। नदियों के वजह से ही हमारी जो कुछ सभ्यताएं बची हुई हैं। हमारा उद्देश्य है कि हम नदियों के किनारे लोगों के बीच जाकर नदियों की व्यथा के बारे में कहेंगे और और इसे ठीक करने का पहल करेंगे। हम अपनी सभ्यता नदी, पेड़, पालों और दुनिया को खत्म नहीं होने देंगे। इसके बारे में हम सरकार से नहीं कहेंगे, मुझे इन चमकीले खद्दर वेशधारी नेताओं से कुछ उम्मीद नहीं है, हम एक-एक लोग को जोड़ेंगे और खुद प्रयास करेंगे।

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संतोष कुमार ने कहा कि ये छोटे-छोटे सवाल राष्ट्रीय अस्मिता का सवाल नहीं हैं यह केवल हम लोगों के अपने सवाल हैं। सभ्यता के विकास के क्रम में हम लोगों  ने बड़े-बड़े दावानल खड़े किए हैं जिसमें हमारी नदियां, पहाड़, पर्यावरण सब कुछ भस्म हो जाएगा। इसके साथ छोटा-सा रिश्ता निभाना है आगे आकर पहल करना है।

वल्लभाचार्य पाण्डेय ने कहा कि नदियों की स्थिति हम लोगों के बचपन में ठीक थी। नाद नदी इंडस्ट्री व शहरीकरण की वजह से नहीं, अपितु लोगों ने अपने खेत बढ़ाकर खत्म कर दिए। असि नदी शहरीकरण की वजह से खत्म हो गई। गोमती खत्म होने के कगार पर है। पहले वरुणा नदी में 16 फीट की गहराई तक पानी हुआ करता था, अब दो-ढाई फीट तक भी पानी नहीं है। सारी नदियां जगह-जगह से कचरा लाकर गंगा में गिरा रही हैं। इसको बचाने के लिए हजारों करोड़ों रुपया पानी में बह रहा है। जिसकी कोई मॉनिटरिंग नहीं है। इसलिए सरकारों से उम्मीद करना व्यर्थ है, हम लोगों को स्वयं पहल करना होगा। नदियों के किनारे ताड़, सैजन, बरगद लगाना कोई कठिन काम नहीं है, हम लोग यह काम कर सकते हैं। इसी प्रकार हम विलुप्त होते अन्य नदियों के किनारे भी जाएंगे और इसको अस्तित्व में लाने का प्रयास करेंगे।

दशरथ पटेल ने कहा कि हमारे बचपन में नदी ऐसी था कि इसमें पैसा गिर जाने पर ऊपर से झलकता था, नदियों से सुतूही और घोंघें निकाल सकते थे लेकिन आज इसकी ऐसी दशा हो गई है कि इसका पानी जानवर भी नहीं पी सकते हैं। रामलाल ने कहा कि आज के 25 साल पहले हम लोग चरवाहे करते हुए नदी का पानी पी लेते थे किंतु अब शौच के बाद भी उस पानी को नहीं छू सकते। इसलिए हम गांव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट टीम को इस पहल के लिए बधाई देते हैं। कार्यक्रम का संचालन गांव के लोग पत्रिका के संपादक रामजी यादव तथा धन्यवाद ज्ञापन श्यामजी यादव ने किया। इनके अलावा नदी यात्रा एवं वैचारिक गोष्ठी में अपर्णा, गोकुल दलित, अमन विश्वकर्मा, दीपक शर्मा, विजय शंकर, दूधनाथ पाल, लालजी यादव, सुरेश कुमार, शिव शंकर, मुन्ना लाल, मिश्रीलाल, सिपाही, माओ आदि लोग उपस्थित थे।

दीपक शर्मा युवा कथाकार हैं और  बनारस में रहते हैं।

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