सुप्रीम कोर्ट बताए जले घर की परिभाषा (डायरी, 28 जून, 2022)

नवल किशोर कुमार

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आज फिर यह सवाल मेरी जेहन में है कि आखिर क्या कारण है कि अगस्त, 2012 के बाद से लेकर आजतक बाथे, बथानी टोला आदि नरसंहारों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई नहीं की है? क्या इसकी वजह यह है कि इन मामलों में जो पीड़ित पक्ष हैं, वे गरीब और दलित-ओबीसी हैं? और यदि ऐसा नहीं है तो इसकी वजह क्या है? सवाल यह भी है कि क्या सुप्रीम कोर्ट इन मामलों की अहमियत नहीं समझता कि ऊंची जातियों के जिन अपराधियों ने सैंकड़ों की संख्या में दलितों और ओबीसी समुदाय के लोगों का खून बहाया है, उन्हें सजा मिले?

ये सारे सवाल मेरी जेहन में इसलिए भी हैं क्योंकि कल सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले महाराष्ट्र में शिवसेना के बागी विधायकों के गुट द्वारा दायर याचिका के मामले सुनवाई की। यह सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के दो महान विद्वान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने की। इस खंडपीठ ने बागी विधायकों को महाराष्ट्र विधानसभा के उपाध्यक्ष नरहरि जिरवाल द्वारा भेजे गये नोटिस का जवाब देने के लिए 14 दिनों की और मोहलत दी। इस दौरान बागी विधायकों को अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकेगा। यह बात भी न्यायाधीशद्वय ने कही है।

मैं एक साथ अनेक बातें सोच रहा हूं। पहली बात तो यही कि क्या सुप्रीम कोर्ट चाहती है कि बागी विधायक, जो कि संख्या में करीब 16 हैं, को भाजपा व एनडीए के द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए घोषित उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करें? क्या ऐसा इसलिए ताकि भाजपा के उम्मीदवार को जीत मिल सके? और यदि यह सही है तो क्या यह सुप्रीम कोर्ट की साख को कमजोर नहीं करता है?

दूसरी बात जो मेरी जेहन में है, वह यह है कि आखिर यह मामला सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंचा कैसे?

सामान्य तौर पर ऐसे मामले पहले राज्यों के हाई कोर्ट में पहुंचते हैं, फिर हाई कोर्ट के जजगण अपना फैसला सुनाते हैं। आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार दोनों पक्षों को होता है और वे सुप्रीम कोर्ट में कराते भी हैं। सामान्य तौर पर सियासी मामलों में निचली अदालतें हस्तक्षेप नहीं करती हैं। मतलब यह कि सामान्य मुकदमों की सुनवाई पहले निचली अदालतों में होती है। फिर वहां से हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट।

सामान्य तौर पर ऐसे मामले पहले राज्यों के हाईकोर्ट में पहुंचते हैं, फिर हाईकोर्ट के जजगण अपना फैसला सुनाते हैं आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार दोनों पक्षों को होता है और वे सुप्रीम कोर्ट में कराते भी हैं। सामान्य तौर पर सियासी मामलों में निचली अदालतें हस्तक्षेप नहीं करती हैं। मतलब यह कि सामान्य मुकदमों की सुनवाई पहले निचली अदालतों में होती है। फिर वहां से हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट।

तीसरी बात यह कि न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कल यह क्यों कहा कि ‘हमारे पास घरों के जलने पर बयानों को सत्यापित करने का कोई साधन नहीं है?’

आखिर किसका घर जला है इस मामले में? मामला तो केवल इतना ही है कि शिवसेना जो कि महाराष्ट्र में सत्तासीन गठबंधन का घटक दल है, के एक गुट ने विद्रोह किया है। इस गुट का नेतृत्व एकनाथ शिंदे कर रहे हैं और उनके मुताबिक कांग्रेस और एनसीपी के साथ शिवसेना का गठबंधन स्वाभाविक नहीं है। जबकि वे स्वयं इस सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। अब उद्धव ठाकरे ने अपने 9 बागी मंत्रियों को मंत्रिपरिषद से बाहर कर दिया है। तो मामला यह है कि आखिर घर किसका जला है, जिसका संदर्भ न्यायमूर्ति सूर्यकांत दे रहे हैं?

एक हदतक यदि हम चाहें तो महाराष्ट्र विधानसभा को घर मान सकते हैं। आखिरकार यह मामला है भी विधानसभा का ही। विधानसभा के अध्यक्ष विधानसभा के प्रमुख होते हैं। संविधान में उनके पास शक्तियां वर्णित हैं। यदि मैं संवैधानिक प्रावधानों की बात करूं तो विधानसभा संचालन नियमावली के अनुच्छेद 226 के अस्तित्व अनुच्छेद 32 के तहत विधानसभा के अध्यक्ष को इसका पूरा अधिकार है कि वह दल-बदल अधिनियम के मामले में विवेकानुसार फैसले ले सकते हैं। इसी अधिकार का उपयोग करते हुए महाराष्ट्र विधानसभा के उपाध्यक्ष नरहरि जिरवाल ने बागी विधायकों को नोटिस जारी किया था और 27 जून की शाम तक जवाब तलब किया था।

अधिकांश मामलों में मैंने तो यही देखा है कि अदालतें सत्तासीन पक्ष का ही पक्ष लेती हैं। लेकिन यह गलत है। वैसे गलत तो यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट बाथे-बथानी नरसंहारों के मामले में सुनवाई एक दशक से नहीं कर रही है। शायद सुप्रीम कोर्ट को इस बात की जानकारी नहीं है कि इन नरसंहारों में सैंकड़ों लोग मारे गए और उनके घर भी जलाए गए।

अब सवाल यह उठता है कि क्या न्यायपालिका (फिर चाहे सुप्रीम कोर्ट ही क्यों न हो) को यह अधिकार है कि वह विधानसभा के अध्यक्ष के अधिकारों को सीमित कर दे? इस सवाल को थोड़ी देर के लिए अनुत्तरित भी छोड़ दें और यह विचार करें कि यदि केंद्र में भाजपा की नरेंद्र मोदी सरकार की दहशत नहीं होती और बागी विधायक भाजपा के पक्ष में जाते नहीं दिखते तो क्या सुप्रीम कोर्ट सीधे-सीधे इस मामले में हस्तक्षेप करता?

बहरहाल, यह पहला अवसर नहीं है जब न्यायपालिका और विधायिका के बीच टकराव सामने आए हैं। अतीत में ऐसी अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। अधिकांश मामलों में मैंने तो यही देखा है कि अदालतें सत्तासीन पक्ष का ही पक्ष लेती हैं। लेकिन यह गलत है। वैसे गलत तो यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट बाथे-बथानी नरसंहारों के मामले में सुनवाई एक दशक से नहीं कर रही है। शायद सुप्रीम कोर्ट को इस बात की जानकारी नहीं है कि इन नरसंहारों में सैंकड़ों लोग मारे गए और उनके घर भी जलाए गए।

वैसे यह सवाल भी है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट के पास हमारे (दलित-ओबीसी समुदायों के लोगों)  घरों के जलने के जलने पर बयानों को सत्यापित करने का कोई साधन क्यों नहीं है? या फिर यह सवाल नीयत का है?

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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