Wednesday, April 17, 2024
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पर्वत की चिट्ठी तू ले जाना सागर की ओर!

जबकि सदियों से हमारे देश में मनुष्य और प्रकृति के द्वारा जल का संचय होता आया है। लेकिन आज यह स्थिति बदल गई है। इसमें सरकारी तंत्र पर समाज के आश्रित हो जाने ने अहम भूमिका निभाई है। इसका परिणाम जल प्रबंधन में सामुदायिक हिस्सेदारी के पतन के रूप में सामने आया। नदी के किनारे बस रहे लोगों को पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना होगा।

शिव आश्रम पर हुई गोष्ठी का संचालन करते हुए गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट के मैनेजिंग ट्रस्टी और वरिष्ठ लेखक तथा कहानीकार रामजी यादव ने नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा की भूमिका ग्रामीणों के सामने रखी। उन्होंने बताया कि यात्रा का यह तीसरा क्रमिक कार्यक्रम है। हमारे जीवन में नदी की विशेष और अहम भूमिका है। पृथ्वी पर होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भूजल पर ही निर्भर है। लेकिन वह चाहे सरकारी मशीनरी हो, उद्योग हो, कृषि क्षेत्र हो या आम लोग, सभी ने इसका दोहन किया है जिसका नतीजा भूजल के लगातार गिरते स्तर के चलते जल संकट की भीषण समस्या के रूप में हमारे सामने है। इससे भारत ही नहीं कई देशों में भयावह स्थिति पैदा हो गई है। यह इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में स्थिति कितनी विकराल हो सकती है। इसे उसी स्थिति में रोका जा सकता है जबकि पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज हो, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में पानी का दोहन नियंत्रित हो, संरक्षण हो, भंडारण हो ताकि वह जमीन के अंदर प्रवेश कर सके। इसके लिए वरुणा नदी का साफ होना अति आवश्यक है जो हमारी ही जिम्मेदारी है।

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सामाजिक कार्यकर्ता नंदलाल मास्टर ने अपनी संतुलित और सुरीली आवाज में पर्वत की चिट्ठी तू ले जाना सागर की ओर…नदी तू बहती रहना...  गीत की प्रस्तुति से ग्रामीणों को नदी के प्रति जागरूक किया। उन्होंने कहा कि ‘नदियों को बचाकर काफी हद तक पानी की समस्या का हल निकाला जा सकता है। जबकि सदियों से हमारे देश में मनुष्य और प्रकृति के द्वारा जल का संचय होता आया है। लेकिन आज यह स्थिति बदल गई है। इसमें सरकारी तंत्र पर समाज के आश्रित हो जाने ने अहम भूमिका निभाई है। इसका परिणाम जल प्रबंधन में सामुदायिक हिस्सेदारी के पतन के रूप में सामने आया। नदी के किनारे बस रहे लोगों को पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना होगा। नदी और पर्यावरण से ही हम हैं।’ उन्होंने कहा कि ‘असलियत में यह सब जल संचय के हमारे परम्परागत तरीकों की अनदेखी, कुंडों, तालाबों और कुओं पर अतिक्रमण, नदी और भूजल स्रोतों का प्रदूषण, अत्यधिक पानी वाली फसलों के उत्पादन की बढ़ती चाहत, पानी की बरबादी, बारिश के जल का उचित संरक्षण न मिल पाना, अत्याधिक दोहन के चलते भूजल स्तर में भयावह गिरावट,  जल प्रबंधन का अभाव, जल संचय और संरक्षण में समाज की भागीदारी का अभाव आदि समस्याओं पर अगर हम और आप मिलकर काम करें तो आने वाली पीढ़ी को पानी की समस्या से जूझना नहीं पड़ेगा।’

गोष्ठी से पूर्व नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा की टीम और ग्रामीण

किसान नेता रामजनम ने कहा कि ‘नदियों के बिना किसी सभ्यता और संस्कृति की कल्पना भी सम्भव नहीं है। मनुष्य के लिए सबसे जरूरी पानी की आपूर्ति उसे नदी तटों या अन्य जलस्रोतों से ही करना पड़ता है। तब भी और आज भी समाज पर यही बात लागू होती है। मनुष्य वहीं बसा जहाँ उसके लिए बुनियादी ज़रुरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक संसाधन पहले से मौजूद थे और उसमें पानी का अपना अहम योगदान है। कालांतर में नदियों की धाराएँ बदलती गईं और इसके किनारे बसी सभ्यताएँ भी उन्हीं बदलती धाराओं के साथ ही बदलती रहीं। देखा जाए तो यह बात सभ्यताओं के विकास क्रम से भी साबित होती हैं। पुराने रास्तों को बदलते हुए नदी की धारा जिधर-जिधर मुड़ती है, उधर-उधर ही वह सभ्यता के नए आयाम भी स्थापित करती जाती है।’

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कहानीकार संतोष कुमार ने कहा कि पूर्व वक्ता नन्दलाल जी और रामजनम जी ने जो बातें कही उन्हें फिर से कहना बात का दुहराव ही होगा लेकिन इतना मैं जरूर कहूँगा कि जिन छोटी-छोटी नदियों के किनारे हमलोग घूम रहे हैं वह किसी राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न नहीं है और न ही किसी क्षेत्रीय अस्मिता का सवाल है। यह केवल हम लोगों का सवाल है। हम उसी का हल खोज रहे हैं। सभ्यता के विकासक्रम में हमने लालच के बड़े-बड़े दावानल खड़े किये हैं जिसमें सब कुछ भस्म हो जानेवाला है। उसमें हमारी नदियाँ, हमारे जंगल हमारे पहाड़, हमारा समाज सब कुछ जल रहा है। हमें इस चीज को पहचानना पड़ेगा। हमें इसी तरह से यात्रा करनी पड़ेगी और अपने लोगों को आवाज देनी पड़ेगी। नदियों के साथ यह छोटा सा रिश्ता निभाना पड़ेगा।’

सामाजिक कार्यकर्ता वल्लभाचार्य ने बताया कि ‘मैं गंगा और गोमती के संगम से आया हूँ। एक समय था जब बनारस में लगभग दस नदियां होती थीं। जिनमें नाद नदी खत्म हो गई है। मैंने लगभग आठ से दस वर्षों तक नदियों के किनारे कई यात्राएँ निकालीं। 16-17 मीटर चौड़ाई वाली असि नदी अब मात्र दो फिट तक ही सिमट गई है। न जानने वाले कुछ लोग उसे नाला ही कहते हैं। नदियों के लिए ही सरकार ने ‘नमामि गंगे योजना’ को रूपरेखा दी थी। यह भी नदियों की सही मॉनिटरिंग नहीं कर पा रही है।’ इसी के साथ ही वल्लभाचार्य ने नदियों के किनारे वृक्ष लगाने का सुझाव दिया था। उन्होंने बताया कि ‘पेड़ लगाते समय कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसे एक कतार में लगे पेड़ एक ही प्रकार के हों जो नदी किनारे एक ही आकार और सघनता से वृद्धि करें, उनमें लम्बे और नाटे, सघन या विरल, वृक्ष एक साथ न लगे हों। सहजन और बरगद का पेड़ हों तो पर्यावरण की काफी फायदा होगा।’

युवा लेखक दीपक शर्मा ने कहा कि ‘यात्रा के दौरान ग्रामीणों ने बताया कि पहले नदी में बहुत साफ-सुथरा पानी होता था। यहां पर हम लोग नहाते थे। लेकिन अब पानी काफी गंदा हो चुका है। सम्बंधित महकमे को इस ओर जल्द ध्यान देने और इसकी सफाई करवाने की ज़रुरत है।’

मौके पर मौजूद ग्रामीणों से भी बातचीत किया गया। दशरथ ने बताया कि ‘हम लोगों के समय में नदी की गहराई और चौड़ाई अधिक थी। पानी इतना साफ था कि हमें हैंडपंप और मशीन लगवाने की ज़रुरत नहीं नहीं होती थी। हम सब इसी नदी के पानी से नहाए और इसी का पानी लेकर खाना बनाए। आज नदी अपनी दुर्दशा खुद बयाँ कर रही है।’

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गोष्ठी में विजय शंकर, दूधनाथ पाल भरथरा और रामलाल पटेल गदहा ने भी अपनी बात रखी। जलपान के पश्चात लोग अपने घरों को लौटे।

अमन विश्वकर्मा
अमन विश्वकर्मा
अमन विश्वकर्मा गाँव के लोग के सहायक संपादक हैं।

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