भारतीय संविधान की विकास गाथा, संविधान की जीवनी है..

-दीपक शर्मा

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 भारतीय संविधान की विकास गाथा क्या है? देश में संविधान की जरूरत क्यों महसूस हुई? संविधान बनाने की प्रक्रिया क्या है? संविधान में निहित अनुच्छेदों के मायने क्या है? इन सारे सवालों का जवाब सचिन कुमार जैन ने अपनी पुस्तक भारतीय संविधान की विकास गाथा में विस्तार से समझाया है। लोकतंत्र की व्यवस्था और असमानता पर लेखक का काफी गहरा चिंतन है। जिस व्यवस्था में न्याय और कानून सबके लिए समान है उसी व्यवस्था में जाति, लिंग, ऊँच-नीच भेदभाव क्यों हैं? अमीर और गरीब के बीच इतनी खाई क्यों हैं? और उसका समाधान क्या है? इस पुस्तक के माध्यम से हम जानने का प्रयास करेंगे।

इन सवालों को समझने के लिए सबसे पहले भारत के इतिहास को समझना जरूरी है। जिसे लेखक ने तीन चरणों में विभाजित किया है। पहला चरण- पाँच लाख साल पहले का इतिहास है, जिसमें औजारों का बनना, श्रम का विभाजन, और स्त्री-पुरुष संबंधों के बारे में समझाया गया है। मनुष्य के जीवन में स्थिरता नहीं थी, वह शिकार, फल, फूल और वनस्पतियों को इकट्ठा करता तथा घुमक्कड़ी जीवन जीता था। उस समय मानव केवल अपनी जरूरतें पूरी कर रहा था। उसे संपत्ति इकट्ठा करने की चिंता नहीं थी। दूसरा चरण- दस हजार साल पहले का है, वह दौर खेती और पशुपालन का है। इसमें मानव समुदाय में स्थिरता आई तथा उनमें निजी संपत्ति और ताकत जुटाने की भावना का विकास हुआ, जिसके कारण आपसी विवाद और झगड़े होने लगे, जिसे निपटाने के लिए नियम बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद तीसरा चरण है- जो पाँच हजार साल पहले का है। जिसमें उत्तराधिकार से परिवार, समुदाय और राज-व्यवस्था के बारे में चर्चा है। जिसमें जाति, लिंग, भाषा, आर्थिक स्थिति तथा कौशल और आजीविका उपक्रम आधारित व्यवस्था का स्वरूप बना। इसी क्रम में सभा और पंचायत सरीखी व्यवस्थाएं भी अस्तित्व में आई।

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 भारत 200 वर्ष तक ब्रिटिश उपनिवेश के अधीन रहा। जिसके कारण देश को आर्थिक रूप से काफी नुकसान हुआ। उपनिवेश के विरुद्ध किसानों, मजदूरों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का लंबा संघर्ष रहा है। अंग्रेजों के विरुद्ध ये सब लड़े, किंतु आजादी के बाद इसका लाभ एक खास वर्ग को अधिक हुआ और यह समुदाय हाशिए पर चला गया। जिन्होंने उपनिवेश पर अंकुश लगाने में काफी योगदान दिया था। जिसके बारे में लेखक ने कहा कि ‘भारत केवल 1857 या 20 वीं सदी के आंदोलन से ही आजाद नहीं हुआ है। भारत के समाज में आजादी की ललक हमेशा टिमटिमाती रही है लेकिन राजसत्ता और राजनीति में आजादी को भारत से दूर किया था। भारत के किसानों, मजदूरों, सन्यासियों और आदिवासियों ने लगातार लड़ाई लड़ते हुए ब्रिटिश शासन को भारत में स्थाई उपनिवेश स्थापित करने का अवसर नहीं दिया। वास्तव में भारत अपने समाज के कारण उपनिवेश की जकड़ में नहीं फंसा था, वह राज्य व्यवस्था की नीतियों के कारण उपनिवेश बना।’

इस बीच विश्व पटल पर दो महायुद्ध हुए। जो दुनिया की आर्थिक, राजनीतिक स्थिति को काफी प्रभावित किया। ब्रिटेन भारत की संपत्ति और सैनिकों की मदद से मजबूत बना रहा। ब्रिटेन भारत से काफी मात्रा में खाद्यान्न का भी उपयोग किया, जो कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बंगाल में अकाल का कारण भी बना। इसी बीच रूस की क्रांति भी हुई। भारत के संविधान निर्माण में यह सब घटक बहुत अहम साबित हुआ। इससे सबक लेकर देश में सुरक्षा की नीतियाँ और व्यवस्थाएं बनाने में मदद मिली। स्वतंत्रता से पूर्व ही भारत के आर्थिक नियोजन और प्रगति की लिए नीतियां बननी शुरू हो चुकी थी। इसमें भारत में नियोजन का विचार (1934), राष्ट्रीय योजना समिति (1938), जन-योजना, मुंबई प्लान (1944) मुद्रा राजनीति न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट आदि योजनाएं शामिल रही।

संविधान घोषणा करता है कि देश की स्वतंत्रता के साथ भारत में छुआछूत का अंत किया जाएगा, अवसरों की समानता होगी, शोषण से मुक्त समाज की स्थापना की जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बल्कि बढ़ती असमानता, जातिगत भेदभाव, शोषण, हिंसा और पर्यावरण संकट के विस्तार को देखकर भी अनदेखा किया गया और उन नीतियों पर सवाल नहीं किया गया जिनमें मानव समाज के बीच संकट गहरा रहे थे। गरीब और अमीर बच्चों में शिक्षा की असमानता, परिवार में लड़के और लड़कियों के अधिकार में भेदभाव व उनके कार्यों के विभाजन में बड़ी असमानता पर जान-बूछकर चुप्पी साध ली जाती है।

भारत का संविधान लागू होने से पहले भारत में शासन करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत समय-समय पर भारतीयों के लिए कानून बनाती रही। जिसमें मुख्यतया चार्टर अधिनियम (1833), भारत में उत्तम प्रशासन के लिए अधिनियम (1858), भारतीय परिषद अधिनियम (1861), भारतीय परिषद अधिनियम (1892), भारत शासन अधिनियम (1915), भारत शासन अधिनियम (1919), इरविन घोषणा (1929) और साइमन कमीशन और भारत शासन अधिनियम (1935) आदि था।

1890 के दशक के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी ब्रिटिश शासन के खिलाफ विभिन्न सभाएं करके अधिनियम व प्रारूप बनाने लगी थी। जिसमें स्वराज विधेयक (1895), भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस मुंबई अधिवेशन (1918), कामनवेल्थ ऑफ इंडियन विधेयक (1925), नेहरू रिपोर्ट (1928), पूर्ण स्वराज की घोषणा (1929) भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का करांची अधिवेशन (1931), पूना समझौता (1932), भारत शासन अधिनियम (1935), भारत स्वतंत्र भारत का संविधान – एक प्रारूप (एम एन राव 1944), सप्रु समिति की रिपोर्ट (1945) राज्य और अल्पसंख्यक (डॉ. भीमराव अंबेडकर 1945), मौलिक अधिकारों पर प्रारंभिक/ मूलभूत रूपरेखा (बी एन राव 1946) आदि था।

इस प्रकार यह संविधान तैयार करने के पीछे एक मजबूत आधार है, जिसमें काफी मात्रा में श्रम और पूँजी का निवेश हुआ है। जिसके बारे में सचिन कुमार जैन ने लिखा हैं कि- ‘यह संविधान कुछ महीनों के बौद्धिक विमर्श के आधार पर लिखी गई एक किताब भर नहीं है, इसे हासिल करने के लिए भारत के लोगों ने बहुत कठिन यात्रा तय की है। इस संविधान पर बहस हो सकती है, इसकी समीक्षा हो सकती है, इसे खारिज नहीं किया जा सकता।’

भारतीय संविधान में विभिन्न अधिकारों व कर्तव्यों का प्रमुखता से उल्लेख है। संविधान सभा  सामाजिक और आर्थिक और असमानता, छुआछूत और भेदभाव पर बेहद सचेत थी। इसके बावजूद आज इनके बीच बड़ी खाई मिट नहीं सकी। आज भारत में 76 फीसदी लोगों पर 10% लोगों का कब्जा है। संविधान घोषणा करता है कि देश की स्वतंत्रता के साथ भारत में छुआछूत का अंत किया जाएगा, अवसरों की समानता होगी, शोषण से मुक्त समाज की स्थापना की जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बल्कि बढ़ती असमानता, जातिगत भेदभाव, शोषण, हिंसा और पर्यावरण संकट के विस्तार को देखकर भी अनदेखा किया गया और उन नीतियों पर सवाल नहीं किया गया जिनमें मानव समाज के बीच संकट गहरा रहे थे। गरीब और अमीर बच्चों में शिक्षा की असमानता, परिवार में लड़के और लड़कियों के अधिकार में भेदभाव व उनके कार्यों के विभाजन में बड़ी असमानता पर जान-बूछकर चुप्पी साध ली जाती है। जैसे कहीं कहीं देखा जाता है कि सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन के दौरान जातिगत भेदभाव के आधार पर बच्चों को अलग-अलग पंक्तियों में बैठाया जाता है, परिवार में भोजन पकाने, झाड़ू लगाने, बच्चों की देखभाल करने की जिम्मेदारी सामान्य महिलाओं को ही दी गई है। इसी प्रकार अनुसूचित जाति का युवा अपनी शादी में घोड़ी चढ़कर बरात में जाता है तो इसे अपराध मान लिया जाता है। उनके बीच जब तक समानता नहीं आएगी, तब तक समस्या का हल नहीं निकाला जा सकता। इस पर विचार करते हुए लेखक ने लिखा है कि- सच यह है कि अभी आदिवासी, दलित, गरीब, महिलाएं, बच्चे शोषण का शिकार होते हैं और न्याय व्यवस्था में उनके साथ न्यायपरक व्यवहार नहीं होता है। अभी भी लोग अन्याय के साथ जीने को मजबूर हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए जरूरी ‘समावेशी न्याय’ आधारित व्यवस्था स्थापित की जाए क्योंकि लोकतंत्र में ‘न्याय’ एक बुनियादी सिद्धांत है। न्याय का मतलब है मानव होने के कारण व्यक्ति को सम्मानजनक तरीके से जीने, समाज में योगदान देने और कुछ रचने का अधिकार। न्याय के साथ ही जुड़ी हुई है। ‘समानता’; एक ऐसी व्यवस्था जिसमें सभी समान हों, सभी को शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका के समान अवसर मिले, समान पारिश्रमिक मिले। भारत में असमानता इतनी ज्यादा गहरी है कि उस गहराई से अनुसूचित जाति, जनजाति तबको और महिलाओं को समतल जमीन पर लाने के लिए प्रतिबद्ध राजनीतिक-आर्थिक सामाजिक प्रयासों की जरूरत है।

आज विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार संविधान की हत्या की जाती है। सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलना भी राष्ट्रद्रोह मान लिया जाता है। ऐसे में संविधान के मूल्य को समझाना बेहद कठिन हो गया है। सचिन जी ने लिखा है कि 'संविधान कितना ही अच्छा हो, यदि उसका क्रियान्वयन करने वाला भ्रष्ट, सांप्रदायिक, फासीवादी या अनैतिक है, तो अच्छे से अच्छा संविधान भी बेकार ही साबित होगा।'

  संविधान लोकतंत्र न्याय अधिकार और समानता की रक्षा के लिए बनाया गया है। सरकार की जवाबदेही और उसके निरंकुशता पर अंकुश लगाना भी संविधान का महत्वपूर्ण कार्य है। इसकी आवश्यकता पर बातचीत करते हुए लेखक ने लिखा है कि ‘संविधान एक बेहतर भारत के लिए इसलिए जरूरी है ताकि कोई खास तबका आर्थिक, राजनीतिक एवं मजहबी ताकत का इस्तेमाल करके देश को लोकतंत्र के रास्ते से भटका न सके, अधिनायकवाद न ला सके। संविधान कानून आधारित व्यवस्था स्थापित करता है ताकि भीड़ या लोगों के छोटे-बड़े झुंड गैर जिम्मेदार – हिंसक व्यवहार न करें।’

आज विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा बार-बार संविधान की हत्या की जाती है। सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलना भी राष्ट्रद्रोह मान लिया जाता है। ऐसे में संविधान के मूल्य को समझाना बेहद कठिन हो गया है। सचिन जी ने लिखा है कि ‘संविधान कितना ही अच्छा हो, यदि उसका क्रियान्वयन करने वाला भ्रष्ट, सांप्रदायिक, फासीवादी या अनैतिक है, तो अच्छे से अच्छा संविधान भी बेकार ही साबित होगा।’

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 संविधान जिनके लिए बनाया गया है, उनमें से ज्यादातर लोगों को इसके बारे में जानकारी ही नहीं है। वे अभी तक पुरानी व्यवस्था की जड़ों में जकड़े हुए लोग हैं। इस पर लेखक ने चिंता जाहिर करते हुए लिखा है कि ‘जितनी व्याख्याएं, टीकाएँ, और अनुवाद ग्रंथों और धार्मिक पुस्तकों के हुए है, यदि उससे आधे भी भारत के संविधान पर किए जाए तो भारत समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों को स्थापित करने में बहुत हद तक सफल हो जाता। …. समाज में लोकतंत्र के बीज बोने के लिए समाज के जमीन पर जमी हुई जाति, वर्ण-व्यवस्था, लैंगिक भेदभाव-संपदा पर एकाधिकार, शोषण, अन्याय-अवैज्ञानिकता की शिलओं को हटाने की जरूरत थी। ये शिलाएँ केवल संविधान के औजार से हटाई जा सकती थी, लेकिन इस अवसर को चलाने वाले हाथों की पकड़ को राजनीति-विधायिका न्यायपालिका, कार्यपालिका और जन माध्यमों ने मजबूत नहीं होने दिया।

अंत में कहना चाहूंगा कि संविधान को जानने समझने के लिए यह पुस्तक अति महत्वपूर्ण है। इसकी तह में जाकर इससे अनमोल खजाने निकाले जा सकते हैं। पूरी पुस्तक ध्यान से पढ़ने और समझने की जरूरत है। लेखक ने इस पुस्तक में सारे तथ्य आंकड़ों के साथ प्रस्तुत करते हुए पाठकों को बहुत महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई है। जरूरी अनुच्छेदों की बारीक व्याख्या भी की गई है। सचिन कुमार जैन इस पुस्तक के विषय में स्वयं लिखते हैं कि ‘यह संविधान की किताब नहीं है, संविधान की जीवनी है।’ इस पर मेरी पूरी सहमति है।

दीपक शर्मा युवा कहानीकार और शिक्षक हैं।

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