चम्बा के रास्ते में आधी रात को गाड़ी पंचर ….

विनय कुमार

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हिमाचल की हरी-भरी वादियां और वहां की ताज़गी मुझको हमेशा अपनी तरफ आकर्षित करती थी। मैं पिछली बार लगभग 15 साल पहले गया था और इन पंद्रह सालों में मेरा मन मुझे पचीसों बार वापस हिमाचल के शिमला, कुल्लू और मनाली इत्यादि जगहों में ले गया था ।किसी न किसी वजह से मेरा जानाटल जाता था और मैं मन मसोसे अगली बार जल्दी जाऊंगा का प्रण करके रह जाता। हाँ, इस बीच मैं उत्तराखंड के कुछ जिलों में जरूर घूम आया था लेकिन मेरा पहला प्यार हिमाचल  हमेशा याद आता रहता।

इस बार जैसे ही मुझे कुछ दिनों की छुट्टी मिली, तो  तुरंत अपने प्यारे प्रदेश में जाने का मन बना लिया।और इस बार  मंजिल चम्बा थी जिसकी खूबसूरती के चर्चे मैं  गाहे-बगाहे सुनता रहता था। दरअसल चम्बा में मेरी भतीजी पहाड़ी पेंटिंग सीखने के लिए पिछले दो महीने से गयी हुई थी और रहने का इंतज़ामएक फ्लैट में हो गया था। हज़ारीबाग से सीधे जाने के लिए कोई साधन नहीं था तो मैंने बनारस से ट्रेनपकड़ने का सोचा। अब सफर के साथी भैया से पूछना था कि वह चलेंगे कि नहीं। “भैया, मैं कल बनारस आ रहा हूँ और दोपहर में हम लोग चम्बा के लिए निकलेंगे। आपका भी आने-जाने काटिकट मैंने करा दिया है, सामान बांधकर कल 11 बजे तक मेरे फ्लैट पर आ जाइए।” मैंने एक तरह से उनको को ना करने का कोई मौका ही नहीं दिया।

रेल का सफर दोनों को स्लीपर में ही करने में मजा आता था जिसके कई कारण थे। सबसे बड़ी चीज थी कि हमें लोगों से मिलना और बातचीत करना पसंद था । इस पसंद के पीछे भी बहुत दिलचस्प कहानी है, आज से चार साल पहले तक मैं अमूमन एसी में ही सफर करता था। पढ़ने का शौक बचपन से था तो बहुत सी पत्रिकाएं, उपन्यास इत्यादि नियमित तौर पर पढ़ता था। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में लिखने का शौक पैदा हुआ और धीरे धीरे मुझे महसूस हुआ कि जिंदगी की सबसे सच्ची और अनूठी कहानियां तो आम जीवन में ही मिलती हैं । एकाध बार जब मज़बूरी में स्लीपर में जाना पड़ा तो मुझे उस सफर में कुछ दिलचस्प कहानियां मिलीं। फिर तो मुझे यह पता चल गया कि सफर में अगर कहानियां ढूंढनी है तो आम लोगों के क्लास स्लीपर में ही सफर करना पड़ेगा। दूसरा प्रमुख कारण था पैसे की बचत जिसके चलते कहीं भी जाने के लिए सोचना नहीं पड़ता था।

“अरे विनय, थोड़े दिन पहले तो बता दिया करो यार, ऑफिस में किसी को बैठाना पड़ता है। तुम्हारी तरह की सरकारी नौकरी नहीं है ना कि जब चाहे निकल लिए।” उन्होंने थोड़ी नाराज़गी दिखाई।  मुझको पता था कि यह नाराज़गी उतनी ही नकली है जितना उनका हर सफर के बाद यह कहना कि अगली बार तेरे साथ नहीं जाऊंगा, तू बहुत पैदल घुमाता है।

लेखक विनय सिंह चंबा की वादियों में आनंद उठाते हुए

“पता नहीं किसने आप लोगों के दिमाग में यह बैठा दिया है कि सरकारी नौकरी में कोई काम नहीं होता और जब चाहे छुट्टी मिल जाती है। पिछले तीन महीने में चार बार प्लान बनाया लेकिन हर बार किसी न किसी वजह से छुट्टी नहीं मिली । इस बार भी सिर्फ चार दिन की छुट्टी मिली है, वह भी बहुत एहसान जताकर।”

उन्होंने गहरी सांस ली और फोन रख दिया।

बेगमपुरा एक्सप्रेस में स्लीपर में वेटिंग का टिकट मिला लेकिन रेलवे के एक परिचित ने टिकट कन्फर्म हो जाने का आश्वासन दिया तो मैं निश्चिंत होकर बनारस निकल गया । रेल का सफर दोनों को स्लीपर में ही करने में मजा आता था जिसके कई कारण थे। सबसे बड़ी चीज थी कि हमें  लोगों से मिलना और बातचीत करना पसंद था । इस पसंद के पीछे भी बहुत दिलचस्प कहानी है, आज से चार साल पहले तक मैं अमूमन एसी में ही सफर करता था। पढ़ने का शौक बचपन से था तो बहुत सी पत्रिकाएं, उपन्यास इत्यादि नियमित तौर पर पढ़ता था। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में लिखने का शौक पैदा हुआ और धीरे धीरे मुझे महसूस हुआ कि जिंदगी की सबसे सच्ची और अनूठी कहानियां तो आम जीवन में ही मिलती हैं । एकाध बार जब मज़बूरी में स्लीपर में जाना पड़ा तो मुझे उस सफर में कुछ दिलचस्प कहानियां मिलीं। फिर तो मुझे यह पता चल गया कि सफर में अगर कहानियां ढूंढनी है तो आम लोगों के क्लास स्लीपर में ही सफर करना पड़ेगा। दूसरा प्रमुख कारण था पैसे की बचत जिसके चलते  कहीं भी जाने के लिए सोचना नहीं पड़ता था।

बनारस से भैया भी चम्बा चलने के लिए तैयारी में लग गए । पिछले लगभग 30 वर्षों से वे मेरे हर छोटे-बड़े सफर का साथी हैं  और अब तो मैं अकेले सफर की कल्पना भी नहीं कर पाता था। मेरी बस सुबह बनारस पहुँचने वाली थी और फिर दोपहर में दोनों पठानकोट के लिए निकलनेवाले थे। सफर में सामान जितना कम हो उतना बढ़िया, हम दोनों की यही सोच थी और इसीलिए हरसफर का हम भरपूर आनंद उठाते थे। बनारस पहुंचकर मैंने  अपने फ्लैट पर जाकर स्नान किया और खाना खाकर अगले सफर की तैयारी में लग गया। 11 बजते बजते भैया भी आ गए।  12.30 की ट्रेन थी। “जरा पी एन आर से देख लीजिये तो टिकट कन्फर्म हुआ कि नहीं, वैसे हो ही गया होगा।” मैंने कहा तो भैया नेट पर देखने लगे । लेकिन नेट पर उनके उम्मीद के विपरीत टिकट अभी भी वेटिंग में ही था और टिकट अगर कन्फर्म नहीं हुआ तो अपने आप कैंसिल हो जायेगा, यह दोनों को पता था। “इस बार तो धोखा हो गया, अब तो चार्ट भी बन गया होगा। ट्रेन तो गयी , अब क्या किया जाए?” भैया  ने कहा तो मैं भी चिंता में पड़ गया।

जालंधर बस स्टैंड पर कुछ लोगों ने बताया कि पठानकोट से एक बस आपको मिल जाएगी जो चम्बा रात में जाती है। हम दोनों को यह सुनकर बहुत राहत मिली और फिर कुछ देर में बस आगे बढ़ी। तीन घंटे के सफर के बाद जब उनकी बस पठानकोट पहुंची तो भैया लपककर स्टैंड के अंदर बने पूछताछ कार्यालय पहुंचे। वहां पहुँचने पर अंदर तो कोई नहीं मिला लेकिन बाहर मौजूद लोगों ने बताया कि अब चम्बा के लिए अगली बस सुबह करीब 4 बजे मिलेगी।“अरे यार, गजब हाल है, साला दिन भर यात्रा किये और मामला वही टांय-टांय फिस्स। इससे अच्छा तो दिल्ली में ही रुके होते और डायरेक्ट बस मिलती चम्बा की।” भैया अब झल्ला गए। मैंने उनको ढांढस बंधाया, उधर चम्बा से भतीजी का फोन भी आया कि हम लोग कहाँ पहुंचे। “हम लोग तो पठानकोट आकर अटक गए, अब यहाँ से सुबह ही बस मिलेगी और हम लोग 11 बजे तक पहुंचेंगे।” मेरी आवाज में निराशा थी।

“आधा घंटा और देख लेते हैं, फिर सोचेंगे।” मैंने गहरी सांस ली। दोनों को ही पता था कि अब टिकट तो गया, इसलिए नेट पर बस की तलाश शुरू हुई। एक बस में दिल्ली तक का टिकट मिला तो दोनों की जान में जान आयी। ट्रेन तो सीधे पठानकोट उतारती और फिर वहां से चम्बा लगभग 5 घंटे का सफर था।

“चलो यार, पहले दिल्ली चलते हैं, फिर वहां से दूसरी बस लेंगे। शायद चम्बा के लिए कोई सीधी बस भी मिल जाए।” भैया ने कहा तो मैंने भी सर हिला दिया। 5 बजे की बस थी जिसे दिल्ली सुबह 6 बजे तक पहुंचना था । एक ही गनीमत थी कि बस स्लीपर थी तोसोने को मिल जायेगा, यही सोचकर हम दोनों अपना बैग लेकर लहरतारा निकल गए। बस ने चलते-चलते 6 बजा दिए और कुछ खा पीकर दोनों सोने के लिए लेट गए।

“इस बार का सफर तो और यादगार रहेगा, देखते हैं दिल्ली से चम्बा के लिए क्या साधन मिलता है?” मैंने आंख मूंदते हुआ कहा।  थोड़ी देर में दोनों बस के हिचकोलों में सोने लगे और नींद खुली सुबह जब बस एक ढाबे पर रुकी।  कंडक्टर आवाज़ लगा रहा था- “जिसे भी चाय पीना हो या फ्रेश होना हो वह हो ले। इसके बाद बस दिल्ली में ही रुकेगी।”

भैया तो लेटे रहे , मैं उतरकर बाथरूम की तरफ निकल गया। काफी लोग आधी नींद में जगे नित्यक्रिया में लगे थे और कुछ तो ब्रश भी कर रहे थे।  मैं भी फ्रेश होकर निकला और ढाबे पर जाकर एक प्याली चाय पीने लगा। उम्मीद से बेहतर चाय मिली तो मैंने भैया  को फोन लगाया “चाय पीना है क्या, बढ़िया बनी है।”

“रहने दो भाई, चाय पिया तो प्रेशर बन जायेगा और मुश्किल होगी । तुम मजे में चाय पी लो और आ जाओ।” उन्होंने ऊंघते हुए जवाब दिया तो मैं समझ गया कि उनकी नींद अभी नहीं खुलेगी।

बस स्टैंड के बाहर ही एक टैक्सी ऑपरेटर का ऑफिस था जहाँ से उनको टवेरा मिलनी थी। अब पांच लड़के और हम दोनों, कुल सात लोग और एक ड्राइवर, दिक्कत तो होती लेकिन समय इतना कीमती था कि उसके आगे यह बातें बेमानी थीं। बहरहाल अगले आधे घंटे में ड्राइवर आया और फिर गाड़ी चम्बा की तरफ चल दी। अब तक ठण्ड काफी हो चुकी थी और भूख भी सबको लग गयी थी तो तंय हुआ कि आगे एक ढाबे पर रूककर खाना खाया जायेगाऔर फिर चम्बा निकलेंगे। ढाबे पहुँचने के बाद सब लोग गरमागरम भोजन पर टूट पड़े। मैंने और भैया ने भी जमकर तंदूरी रोटी और दाल फ्राई का आनंद लिया । लेकिन जब सारे लोग बाहर निकले तो पता चला कि गाड़ी तो पंचर है.....

दिल्ली पहुँचने में लगभग दस बज गए, बस स्टैंड पर उतरकर मैं फ्रेश होने गया और  भैया पूछताछ काउंटर  की तरफ बढ़े जहाँ चम्बा के लिए बस का पता लगाना था।“चम्बा के लिए शाम 7 बजे एक बस है जो कल सुबह 11 बजे तक पहुंचाएगी। चाहो तो बस से लुधियाना या पठानकोट निकल जाओ और वहां से चम्बा के लिए साधन मिल जाएगा।”मैंने हिसाब लगाया, अगले 8 घंटा यहाँ बैठने से बेहतर है कि लुधियाना या पठानकोट ही निकल चला जाए और फिर वहां से चम्बा रात 12 बजे तक तो पहुँच ही जायेंगे। फिर सुबह उठकर आराम से घूमना-फिरना किया जायेगा।  कुछ देर में भैया आए तो मैंने अपनी योजना बताई। भैया को क्या दिक्कत होती, वह तो उसके साथ कहीं भी निकल जाते थे । दरअसल रास्ते और सफर की सारी योजना बनाने का काम मैं ही करता था, भैया  सामान इकठ्ठा करने और खाने पीने के इंतज़ाम में रहते। बस स्टैंड पर नाश्ता करने के बाद हम दोनों ने लुधियाना का टिकट लिया और बस में जाकर बैठ गए। लुधियाना जाने का एक कारण उसका एक दोस्त था जो उस समय लुधियाना में ही पोस्टेड था। बस में बैठने के बाद मैंने उसको फोन लगाया “हलो, सुखविंदर, कैसा है भाई और कहाँ है इस समय?” सुखविंदर ने मुझे पहचान लिया और बड़े उत्साह के साथ जवाब दिया “भाई मैं तो लुधियाने ही हूँ, तू कहाँ निकला है इस समय?” दरअसल उसके सभी दोस्तों को पता था कि मैं जबरदस्त घुमक्कड़ है और किसीभी समय कहीं भी जा सकता हूँ । अक्सर कोई न कोई कहता “अबे तू भी वही नौकरी करता है जो हम लोगकरते हैं, लेकिन हम लोग तो बाजार जाने के लिए भी दस बार सोचते हैं. और एक तू है कि जब देखो तबकभी इस शहर तो कभी उस प्रदेश।”और मैं हंस कर उनको बताता “भाई अपने-अपने तरीके हैं जिंदगीगुजारने के, तुम लोग आराम करते हो और मैं घूमता हूँ।  लेकिन सभी अपने मन का ही काम करते हैं। इसलिए कभी सोचना नहीं चाहिए कि दूसरा ज्यादा मजे कर रहा है।”

“भाई मैं तो अभी दिल्ली से निकला हूँ और लुधियाना की बस में बैठा हूँ।  अब तू बता कि शाम को दो घंटे के लिए मुलाक़ात हो सकती है क्या?” कुछ पल फोन पर ख़ामोशी रही फिर सुखविंदर ने पूछा “अच्छा, तो कितने दिन रुकना है लुधियाने, किसी काम से आ रहा है या बस घूमने-फिरने?”

“मैं तो घूमने ही निकला हूँ लेकिन चम्बा जाना है. ट्रेन छूट गयी इसलिए बस से जा रहा हूँ, तुमसे मिलने की इच्छा थी, अगर चाहे तो दो घंटे गप-शप करेंगे और फिर चम्बा निकल जाऊंगा।” मैंने काफी उत्साहित होकर बताया।

उधर से फिर थोड़ी देर की ख़ामोशी रही और फिर सुखविंदर ने बताया “यार पहले बताना था, मैं तो अभी लुधियाने से बाहर हूँ और कल ही वापस आ पाऊँगा। खैर तुमको अभी लुधियाने आने में 7 घंटे लगेंगे और लुधियाने से चम्बा के लिए कोई बस नहीं है। तो बेहतर होगा कि तुम पठानकोट तक निकल जाओ। अच्छा यह बस कहाँ तक जाएगी?” सुखविंदर की आवाज़ में नहीं मिल पाने की निराशा साफ़ सुनाई पड़ रही थी.

मैंने कंडक्टर से पूछा कि बस कहाँ तक जाएगी तो पता चला कि बस जालंधर तक जाएगी।“यार यह बस तो जालंधर तक जाएगी।” मैंने सुखविंदर को बताया। “कोई बात नहीं, तुमको वहां से पठानकोट के लिए बस मिल जाएगी। अच्छा मैं एक काम करता हूँ,लुधियाने में मेरे दोस्त को बोल देता हूँ, तुमको नाश्ता वगैरह करा देगा। फिर तुम वहां से पठानकोट की बस ले लेना।” सुखविंदर को सचमुच नहीं होने का अफ़सोस हो रहा था. “अरे तुम चिंता मत करो दोस्त, मैं जालंधर निकल जाऊंगा और फिर वहां से पठानकोट।  सिर्फ तीन दिन की छुट्टी है इसलिए समय का पूरा उपयोग करना है। अगली बार बताकर आऊंगा, पक्का।” उसने सुखविंदर को दिलासा दिया और फोन रख दिया।

इस बीच भैया बस से बाहर देखते हुए सो गए थे।  मैंने उन्हें डिस्टर्ब नहीं किया और खुद बाहर देखने लगा। बहुत महीनों बाद हमने रोडवेज बस की यात्रा की थी लेकिन यह बस बहुत अच्छी थी। और दिल्ली से थोड़ा आगे आने के बाद से ही रास्ता बहुत बढ़िया था तो रास्ते में कहीं भी तकलीफ नहीं हुई। एक और ढाबे पर बस रुकी, हम दोनों उतरे और तगड़ा नाश्ता करके वापस बस में बैठ गए।

उसे अक्सर सड़क के किनारे के ढाबे बहुत आकर्षित करते थे, खासकर ऐसे ढाबे जहाँ खाट बिछी हो और दाल फ्राई में मक्खन डालकर तंदूरी रोटी के साथ गरमा गरम खाने को मिलती हो। खैर यह ढाबा उस तरह का नहीं था, थोड़ा आधुनिक किस्म का था जहाँ चाउमीन और नूडल मिल रहे थे। भैया के साथ सबसे अच्छी बात यह थी कि जो भी मिलता, वह खा लेते थे। और वह आराम से रास्ते भर सोते रहते और मैं रास्ते को अधिक से अधिक देर तक देखना पसंद करता।

बस अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी कि अचानक मेरे फोन पर किसी अनजाने नंबर से कॉल आया। बात करने पर पता चला कि वह सुखविंदर का दोस्त था और उसे सुखविंदर ने ही नंबर दिया था कि वह मुझसे पूछ ले कि हमको लुधियाने में कुछ खाने-पीने के लिए तो नहीं चाहिए। मैंने विनम्रता से मना कर दिया और उसको धन्यवाद भी दिया। बस लगभग 7 बजे जालंधर पहुंची, उतर कर पूछने पर पता चला कि आधे घंटे में एक बस पठानकोट जाएगी। दोनों वहां एक बार फ्रेश हुए और एक कप चाय पीकर पठानकोट वाली बस में बैठ गए।

जालंधर बस स्टैंड पर कुछ लोगों ने बताया कि पठानकोट से एक बस आपको मिल जाएगी जो चम्बा रात में जाती है। हम दोनों को यह सुनकर बहुत राहत मिली और फिर कुछ देर में बस आगे बढ़ी। तीन घंटे के सफर के बाद जब उनकी बस पठानकोट पहुंची तो भैया लपककर स्टैंड के अंदर बने पूछताछ कार्यालय पहुंचे। वहां पहुँचने पर अंदर तो कोई नहीं मिला लेकिन बाहर मौजूद लोगों ने बताया कि अब चम्बा के लिए अगली बस सुबह करीब 4 बजे मिलेगी।“अरे यार, गजब हाल है, साला दिन भर यात्रा किये और मामला वही टांय-टांय फिस्स। इससे अच्छा तो दिल्ली में ही रुके होते और डायरेक्ट बस मिलती चम्बा की।” भैया अब झल्ला गए। मैंने उनको ढांढस बंधाया, उधर चम्बा से भतीजी का फोन भी आया कि हम लोग कहाँ पहुंचे।  “हम लोग तो पठानकोट आकर अटक गए, अब यहाँ से सुबह ही बस मिलेगी और हम लोग 11 बजे तक पहुंचेंगे।” मेरी आवाज में निराशा थी।

“ओह, कोई बात नहीं चाचा, आप लोग आराम से आइये, वहीं कहीं कमरा लेकर सो लीजिये और फिर आराम से सुबह निकलिए।” भतीजी ने दिलासा दिया। तब तक भैया बस स्टैंड के बाहर निकल गए और चारों तरफ देखकर वापस लौटे । चम्बा जाने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी, हलकी ठण्ड भी पड़ रही थी और पेट में चूहे भी अब दौड़ लगाने लगे थे।

“कुछ खा लेते हैं फिर यहीं कुर्सियों पर लुढ़का जायेगा सुबह तक।”  मैंने कहा तो उन्होंने भी सहमति जताई।  उतनी रात में खाने के लिए बहुत विकल्प नजर नहीं आ रहे थे तो ब्रेड ऑमलेट ही उनको बेहतर लगा। मैं दो प्लेट ब्रेड ऑमलेट और एक बोतल पानी ले आया और हम दोनों बैग रखकर खाने में जुट गए। पानी पीकर शरीर में ताजगी आ गयी और भैया एक बार फिर बाहर टहलने के लिए निकले। तभी उसकी नजर सामने से आ रहे तीन-चार लड़कों पर पड़ी। उन्होंने भी अंदाजा लगा लिया कि हम लोग बस के इंतज़ार में बैठे हैं तो एक लड़के ने आकर पूछा –“आप लोग कहाँ जायेंगे?” इतनी रात को एक अनजाने बस स्टैंड पर कोई ऐसा सवाल पूछे तो अजीब तो लगता ही है लेकिन चम्बा जाने की बेसब्री में तुरंत मैंने मुंह से निकल गया –“चम्बा जाना था लेकिन अब तो सुबह ही बस मिलेगी।” जवाब देने के साथ ही उसके मन में एक उम्मीद भी जग गयी कि शायद इन लड़कों को भी चम्बा ही जाना है।

“हम लोगों को भरमौर जाना है लेकिन आपको चम्बा छोड़ते हुए निकल जायेंगे। अगर साथ चलना चाहें तो एक टवेरा है जो जा सकती है।” सामने से मिले इस ऑफर पर उसकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा। “ठीक है, हम लोग भी चलते हैं।” मैंने कहा और भैया को फोन करके बुलाया। अगले दस मिनट में भाड़े का मामला फाइनल हुआ। वैसे तो वह बस की तुलना में चार गुना था लेकिन उम्मीद थी कि रात के दो बजे तक पहुँच जायेंगे और फिर थोड़ा सोकर सुबह घूमने निकल जायेंगे।

चंबा का रास्ता

भैया आए और हम दोनों अपना सामान उठाकर लड़कों के साथ बाहर निकल गए। बस स्टैंड के बाहर ही एक टैक्सी ऑपरेटर का ऑफिस था जहाँ से उनको टवेरा मिलनी थी। अब पांच लड़के और हम दोनों, कुल सात लोग और एक ड्राइवर, दिक्कत तो होती लेकिन समय इतना कीमती था कि उसके आगे यह बातें बेमानी थीं। बहरहाल अगले आधे घंटे में ड्राइवर आया और फिर गाड़ी चम्बा की तरफ चल दी। अब तक ठण्ड काफी हो चुकी थी और भूख भी सबको लग गयी थी तो तंय हुआ कि आगे एक ढाबे पर रूककर खाना खाया जायेगाऔर फिर चम्बा निकलेंगे। ढाबे पहुँचने के बाद सब लोग गरमागरम भोजन पर टूट पड़े। मैंने और भैया ने भी जमकर तंदूरी रोटी और दाल फ्राई का आनंद लिया । लेकिन जब सारे लोग बाहर निकले तो पता चला कि गाड़ी तो पंचर है…..

विनय सिंह युवा कहानीकार हैं .फिलहाल उज्जैन में रहते हुए बैंक में पदस्थ हैं ।

 

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