Friday, February 23, 2024
होमअर्थव्यवस्थाकिसानों के साहस और जज़्बे की हद नहीं

ताज़ा ख़बरें

संबंधित खबरें

किसानों के साहस और जज़्बे की हद नहीं

 किसान को पिज्जा खाते, जींस पहने हुए या एसी में देखकर दलाल और कोर्पोरटी किस्म के लोगों से सहन नहीं होता और उन्हें वे किसान मानने से इंकार करते हैं लेकिन अमिताभ बच्चन किसान हो सकता है भले उन्हें किसानी का क भी न आए। ऐसे दलाल लोग के साथ सरकार भी चाहती है कि देश की कृषि व्यवस्था कॉर्पोरेट के हाथ मे चले जाये और कृषि के यह तीन कानून इसी व्यवस्था को मजबूत करने की साजिश है।

हमारे भारतीय किसान पिछले दस महीने से दिल्ली सीमा पर आंदोलनरत होकर धरने पर बैठे हैं। किसान के हित में तीन कानून लाने वाली भारत सरकार आज तक उन्हें फायदे की बात नहीं समझा पाई। पिछले आठ महीने  से एक फोन कॉल की दूरी का हवाला देने वाली भारत सरकार से कोई बातचीत नहीं हो सकी है और आंदोलन अभी भी चल रहा है। एक वर्ष के दौरान दिल्ली के सीमा पर किसान जाड़े-गर्मी-बरसात सभी मौसम की मार झेल चुके हैं। यही नहीं शासन-प्रशासन और  सरकार द्वारा तमाम प्रकार से दी जा रही यातनाएँ भी झेल चुके हैं। कभी उनके रास्ते में गड़ढे खोद दिए गए तो कभी कँटीले तार और नुकीली कीले बिछा दी गयी। कभी उनके उपर आँसू गैस और पानी की बौछारें की गई तो कभी लाठी और डंडे बरसाए गए। उनका आंदोलन खत्म करने के लिए सरकार ने हर तरह से हथकंडे अपना लिए लेकिन किसान तो किसान है। सरकार भी समझ गयी होगी कि बारह महीने प्रकृति की मार झेलने वाले किसानों को प्रशासन की मार से कोई डर नहीं है। मैं उनके साहस और जज्बे को सलाम करता हूँ। कोरोनाकाल में जब अर्थव्यवस्था  जब  ठप हो गई थी तब कृषि क्षेत्र ही था जहाँ से सरकार को लाभ दिख रहा था, इसलिए कॉर्पोरेट की नजर कृषि की तरफ चली गई। वर्तमान में जब सारे सरकारी क्षेत्र कॉर्पोरेट के हवाले किए जा रहे हैंं। ऐसे में कॉर्पोरेट को अधिक लाभ देने के उद्देश्य से कृषि क्षेत्र  के निजीकरण की तैयारी तेज कर दी गई। पहले तो अडानी की बड़े-बड़े गोदामेश बनने शुरू हुए। फिर संसद में विपक्ष और किसान की सहमति के बिना कृषि कानून पास कर दिया गया। सरकार के इस रवैये को किसान भली-भांति समझ गए  और आंदोलन में उतरकर अपनी खेती को गुलाम होने से बचाने के लिए जद्दोजहद में लग गए। वे अभी भी अपनी बात पर अड़े हुए हैं कि चाहे कुछ भी हो जाए हम ये कानून लागू नहीं होने देंगे।

आजादी के 75 साल हो गए हैं। तब से लेकर आज तक कर्मचारियों के वेतन में दो सौ से चार सौ गुना वृद्धि हो चुकी हैं किंतु किसानों के आय मे बहुत अल्प बदलाव आया है। वह अपने पूरे परिवार के साथ खेत में सुबह से लेकर शाम तक काम करता है। जाड़ा-गर्मी-बरसात की मार झेलते हुए रात-रात भर खेत की सिंचाई करता है, नीलगायों एवं सांडों से फसल की रक्षा करता है, खाद व बीज के लिए घंटो-घंटो तक लाइन में खड़ा होता है, पंपिंग सेट मालिकों से पानी के लिए चिरौरी करके खेत भरता है, कर्ज लेकर ट्रैक्टर की जुताई देता है, जुताई, गोड़ाई, कटाई, मड़ाई, बुवाई, सिंचाई सब मिलाकर आकलन किया जाए तो किसान के पास बचता क्या है? मेरा आकलन है कि मध्यम और छोटे किसान को अपना लागत मूल्य तक नहीं मिल पाता तो पारिश्रमिक की कौन बात कहे ?

आज अगर किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी की माँग कर रहे हैं तो इसमें क्या गलत है? अपना लागत मूल्य और थोड़ा-सा पारिश्रमिक ही तो मांग रहे हैं। स्वामीनाथन आयोग के रिपोर्ट के अनुसार किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत मूल्य से डेढ़ गुना अधिक होना चाहिए। सरकार अपने मेनिफेस्टो में इसे लागू करने का वादा करके सत्ता में आई थी। सात साल सत्ता में रहने के बाद भी इस पर कोई विचार नहीं किया गया। मैं न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गारंटी के कानून की मांग का समर्थन करता हूँ।

हम देखते हैं कि गांवों में हर घर से एक न एक सदस्य दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, सूरत जैसे बड़े शहरों में कमाने क्यों जाता यदि उसे गाँव में कृषि से ही फायदा होता  तो वह कमाने के लिए बाहर कदापि नहीं जाते। यदि वे बाहर कमाने के लिए नहीं जा पाते हैं तो गांव में छोटा-मोटा दुकान-डलिया डालकर आजीविका चलाने का उपाय करते हैं। मैं देखता हूँ कि एक मध्यम वर्ग का किसान सिर्फ खेती करके अपने बच्चों की अच्छी पढ़ाई और इलाज कराने में हमेशा असमर्थ रहता है। देश में छोटे किसानों की तादाद 80% से अधिक है। मुझे अफसोस है कि धरने पर बैठे हुए किसानों को खालिस्तानी, मवाली, दलाल, आतंकवादी, माओवादी कह उनका अपमान किया जाता है। वह किसान ही हैं जिनके श्रम और पसीने  से  देश का पेट पलता है। हमारा देश किसानों का ऋणी है।  विकास की राजनीति करने वाले लोग सड़कों से कंकड़ और डामर खाकर जिंदगी नहीं गुजार सकते हैं। देश की अधिकांश अर्थव्यवस्था कृषि पर ही निर्भर है। उद्योग में कपड़े बनाने के लिए जूट, कपास खेती से ही पैदा होता है। मसाले, काफी, कहवा, अचार, मुरब्बा, शराब ये सारी चीजें कृषि की ही उपज है। सरकार को किसानों की बात गम्भीरता से लेनी चाहिए। सिर्फ आंदोलनजीवी कहकर जिम्मेदारी से पल्ला नह़ी झाड़ा जा सकता।

 किसान को पिज्जा खाते, जींस पहने हुए या एसी में देखकर दलाल और कोर्पोरटी किस्म के लोगों से सहन नहीं होता और उन्हें वे किसान मानने ने इंकार करते हैं लेकिन अमिताभ बच्चन किसान हो सकता है भले उन्हें किसानी का भी न आए। ऐसे दलाल लोग के साथ सरकार भी चाहती है कि  देश की कृषि व्यवस्था कॉर्पोरेट के हाथ मे चले जाये और कृषि के यह तीन कानून इसी व्यवस्था को मजबूत करने की साजिश है। इसके लिए अदानी और अंबानी देश के कई हिस्सों मे बड़ी मात्रा मे अनाज भंडारण के लिए साइलो का निर्माण कराया है जिसमें अनाज भंडारण की विशाल क्षमता होगी और अनाज भरने,रखने और सहेजने की प्रक्रिया स्वचालित होगी। जिसमें मैन पावर की जरूरत कम होगी इससे लोगों मे बेरोजगारी भी बढ़ने की आशंका होगी।

कटाई के बाद किसान खेत मे बचे ठूंठ को जलाते हैं, जिस पर सरकार ने रोक लगा दी क्योंकि धुएँ से पर्यावरण के साथ इंसान के स्वास्थ्य को भी नुकसान होता है। मान लिया नुकसान होता है, जब सरकार पर्यावरण और स्वास्थ्य को लेकर इतनी चिंतित है तब उसे ऐसे कल-कारखानों पर भी रोक लगाना चाहिए जिससे निकालने वाली गैस,धुएँ और अपशिष्ट पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। जलाने पर रोक लगाने वाले लोग शहरों में एसी चलने पर चुप क्यों रहते हैं? उससे तो पराली की अपेक्षा बीस गुना प्रदूषण फैलता है। किसान अनुपयोगी पराली का क्या करेगा? सरकार ही इसके किसी दूसरे विकल्प के लिए कोई कार्य क्यों  नहीं कर सकती?

देश के किसान अभी निशाने मे हैं, उन्हें हर तरह से तोड़ने की कोशिश में लगी हुई किसान विरोधी सरकार और किसान पूरी ताकत से पिछले दस माह से सामने डटकर लड़ रहे हैं जबकि इस आठ महीनों मे लगभग 700 किसानों की मौत आंदोलन में हो चुकी है। तीन काले कृषि कानूनों को लागू करने के विरोध में किसान आंदोलन शुरू हुआ।

इसमें पहले कृषि  कानून में सरकारी मंडियों के अतिरिक्त किसान अपनी फसल कॉर्पोरेट को भी ऊंचे दामों पर बेच सकेंगे। मुझे लगता है कि ये सरकारी मंडियों को खत्म करने की आंतरिक साजिश है। सरकार एपीएमसी से अब अपना पल्ला झाड़ना चाहती है। इस कानून के लागू हो जाने के बाद एपीएमसी का विकास शून्य हो जाएगा और निजी मंडियों का विकास तेजी से किया जाएगा। जो किसानों की उपज को सस्ते दामों में खरीद करेगा तत्पश्चात भंडारण करेगा और बाजार में जब उसकी कमी दिखेगी तब  उसे दस-बीस गुना दाम बेचेगा। सरकार उसमें कोई दखल नहीं दे सकेगी। इस कानून में सरकारी मंडियों के सुधार का जिक्र तक नहीं है। अभी देश में मात्र 7000 सरकारी मंडियां हैं लेकिन यह पर्याप्त नहीं है। इसकी संख्या इससे छः गुना बढ़ाने की आवश्यकता है किंतु कॉर्पोरेट की मंडियां विकसित हो जाने के बाद सरकारी मंडियों का हाल बी एस एन एल जैसा हो जाएगा कारपोरेट जिओ की तरह अपना पैर मजबूती से जमा लेगा।  वर्ष 2006  म़े बिहार में एपीएमसी अधिनियम खत्म करके सुधारवादी कदम उठाया गया था। वहाँ 97 प्रतिशत छोटे किसान है। वे अपनी उपज औने पौने दाम में विचौलिए को बेच देते हैं। उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिल पाता। इसी प्रकार निजी मंडियां सरकारी मंडियों को तोड़कर अपनी सत्ता स्थापित कर लेगी.

 दूसरे कानून में कांट्रैक्ट फार्मिंग की बात कही गई है। उसमें आप की जमीन पर कोई पूँजीपति या ठेकेदार किराए पर लेकर अपने अनुसार आपसे खेती करवाएगा और उसे बाजार में बेचेगा। इसका पूरा लाभ सिर्फ और सिर्फ पूँजीपतियों को होगा। किसान अपने ही खेत में बंधुआ मजदूर बन जाएगा। इसमें किसानों को आशंका है कि यदि फसल लागत मूल्य के साथ डूब गई या उसमें भारी क्षति हुई तब क्या होगा? किसान अपना नुकसान भले सह लें किंतु कॉर्पोरेट कभी घाटा नहीं सहकर काम नहीं करता। यदि उपज में नुकसान हुआ तो वे सीधे किसानों के जमीन हड़पने का दावा कर सकते हैं। बिल्कुल अंग्रेजों की कंपनी जैसा व्यवहार हो सकता है। ज्यादातर किसान कम पढ़े-लिखे होते हैं। उन्हें तो ठीक से कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का मतलब ही नहीं समझ में आता। उसमें व्यवस्था यह है कि किसान न्यायालय नहीं जा सकता। उनके हर पक्ष का न्याय एसडीएम करेगा। हम जानते हैं कि अधिकतर एसडीएम सरकार के दबाव में काम करते हैं। उनका एक न्याय हमने करनाल में देखा था। जिसमें एसडीएम के द्वारा किसानों का सर फोड़ देने वाला वीडियो वायरल हुआ था। उनके कहने पर किसानों के सर पर लाठियाँ बरसायी भी गयी थी। ऐसे में एसडीएम के न्याय पर कैसे भरोसा किया जा सकता है। एसडीएम के पास अनेक काम होते हैं, किसान अपनी समस्या लेकर जब उनके पास जायेगा तो उनकी सुनवाई कैसे हो सकती है? छोटे और कमजोर किसानों को तो साधारण से दफ्तर में जाने से भी डर लगता है तो एसडीएम से बात करने में वे अपने को कितना समर्थ पायेंगे?

तीसरे कानून में आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक का जिक्र है। इसमें किसान अपनी उपज चाहे जितना जुटाकर रख सकेगा और वह जब चाहे उसे ऊँचे दाम में बेच सकता है। हमें मालूम है कि किसानों के पास भंडारण की क्षमता सीमित होती है। भण्डारण की उचित व्यवस्था मंडियो में ही होती है। फसल तैयार होते ही किसान उसे बाजार में बेचना चाहता है और अगली फसल की तैयारी करने लगता है। ऐसे में उन्हें जो दाम मिलता है उन्हें उसी से संतुष्ट होना पड़ता है। हमारे यहां 80% से अधिक छोटे किसान हैं। इस प्रकार का कानून केवल पूँजीपतियों के फायदे के लिए ही हो सकते हैं कानून में जिक्र है कि किसान अपनी फसल कहीं भी बेच सकता है। यह नियम तो पहले भी था किंतु अब इसको ऐसे समझाया जा रहा है जैसे कोई नई और बहुत उपयोगी बात कह दी गई हो। मुझे लगता है किसान अपनी फसल अपने आसपास के किसी मंडियों में ही बचेगा। ज्यादातर किसानों के पास निजी ट्रैक्टर नहीं है, वह किराए के ट्रैक्टर को लेकर एक राज्य से दूसरे राज्य में जाएगा तो उसे बचत कितना होगा? अगर उनके पास निजी ट्रैक्टर है तब भी तो 400- 500 किमी दूरी तक ले जाने में उपज के बराबर डीजल ही खर्च हो जाएगा।

कानून विशेषज्ञ और किसान की आपसी बातचीत के माध्यम से इसे मैं समझाने की कोशिश करता हूँ

 

  विशेषज्ञ आपने कितना बीघा धान लगाया था?

चार बीघा।

पैदावार कितनी हुई ?

12 कुंतल

 कितना बेचना चाहते हैं?

छः कुंतल

कातो बेच दो।

किसको?

 मैं आपको एक बिचौलिए का नम्बर देता हूँ।

दीजिए।

  (किसान नम्बर डायल करता है। )

 मैं पहले आपके धान को देखूँगा,  फिर कीमत लगाउँगा।

 आकर देख लीजिए।

 (बिचौलिया कार से हाजिर हो जाता है। )

 आपके धान में तो पाई है,  काफी हल्का है।

इससे अच्छा और कैसा होता है धान?

मैं एक से एक ब्रांडेड धान 12 रूपये किलो से खरीदा हूँ।  आपके धान का 9 रूपये लगा देता हूँ।

 मुझे बहुत नुकसान होगा !

 नुकसान क्यों?

पाँच हजार रुपया मैंने जुताई का दिया है, 4 हजार सिंचाई का,  खाद-बीज मिलाकर भी 3 से 4 हजार खर्च हुए हैं।

 चलो अच्छा 10 रुपया किलो लगा देता हूँ,  अब हो गया न हिसाब बराबर?

साहब बहुत कम है,  बीबी बच्चे भूखे मर जायेंगे,  मुझे कुछ भी नहीं मिल रहा है।

 इससे ज्यादा खरीद पर मुझे भी नहीं कुछ मिलेगा।  चलता हूँ,  जयराम जी की। 

( किसान फिर कानून विशेषज्ञ के पास जाता है।)

साहब पटरी नहीं खाई,  कोई दूसरा उपाय बताइये।

एक नया कानून बना है,  आप फसल को कहीं बेच सकते हैं। जहाँ अच्छा कीमत मिले वहाँ बेच दीजिए।

ये कैसे मालूम होगा कहाँ अच्छी कीमत मिलेगी?

अरे बुड़बक्क!  नेट पर चेक करो। 

साहेब,  इतना शऊर होता तो हम भी आप की तरह काले कोट न पहन लेते।

अच्छा मैं चेक करके बताता हूँ।  (जेब से मोबाइल निकालकर 2-4 बार स्क्रीन पर ऊंगली फिराते हुए)  तमिलनाडु में सबसे अच्छी कीमत 17 रुपये किलो है।

वहाँ जायेंगे कैसे?

 कोई ट्रैक्टर रिजर्व कर लो,  जाओ बेच आओ।

(किसान ट्रेक्टर वाले के पास जाता है।)

भैया आप तमिलनाडु चलेंगे?  मुझे 6 कुंतल धान बेचना है।

हाँ क्यों नहीं। 10 हजार रुपये से कम डीजल नहीं खर्च होगा, इसके अतिरिक्त मुझे पारिश्रमिक अलग से चाहिए मुझे।

बताइये तैयार हैं आप?

नहीं भैया! अब मैं अपना धान कहीं नहीं बेचूँगा। दिल्ली सीमा पर हमारे किसान बंधु  धरने पर बैठे हैं। अब मैं भी वहीं जा रहा हूँ। तब तक नहीं लौटूँगा, जब तक सरकार तीन काले कृषि कानून वापस नहीं ले लेती और एमएसपी पर गारंटी का कानून नहीं बनाती।

किसान एकता – जिंदाबाद!

 

 

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा कवि-कथाकार हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

लोकप्रिय खबरें