बातें नौकरशाहों की डायरी (21 सितंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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 स्मार्टफोन हमेशा स्मार्ट नहीं होते। कल यह नई जानकारी मिली। यह इसके बावजूद कि आजकल के स्मार्टफोन में एंड्रायड जैसा आपरेटिंग सिस्टम होता है और रैम (रैंडम एक्सेस मेमोरी) भी एकदम डेस्कटॉप कंप्यूटर के जैसे। इसके अलावा तमाम तरह के ऐप। हर जरूरत के हिसाब से ऐप। इतना सब होने के बावजूद स्मार्टफोन स्मार्ट नहीं होता। दरअसल, कल दिन की शुरुआत अच्छी नहीं थी। सुबह उठकर देखा तो मेरे सबसे प्रिय मोबाइल में चार्ज खत्म हो चुका था। पहले मुझे लगा कि किसी बैकग्राउंड ऐप के कारण ऐसा हुआ होगा। मोबाइल को चार्ज में लगाया और सेटिंग्स से पता किया तो जानकारी मिली कि कहीं कोई समस्या नहीं है। हालांकि माेबाइल चार्जिंग मोड में था और वह स्मार्टफोन की तरह व्यवहार कर रहा था। परंतु दो घंटे के बाद मेरी नजर चार्जिंग प्रतिशत पर गई। दो घंटे में केवल बीस प्रतिशत। माथा ठनका। पहले लगा कि मोबइल की बैट्री गई और अब कम से कम हजार रुपए का नुकसान उठाना पड़ेगा। संभव है कि यह रकम अधिक भी हो। महीने के आखिर के दिनों में इतनी रकम भी बड़ी रकम होती है।

लेकिन मोबाइल फोन के बगैर काम कैसे चलता। सो नेहरू प्लेस स्थित अपने दफ्तर में कदम रखने से पहले एक मोबाइल रिपेयरिंग करनेवाले के पास पहुंचा। उसने मेरी समस्या सुनी और कहा कि पांच सौ लगेंगे। मेरे मन ने कहा कि यह तो बहुत कम है। खामख्वाह ही मैं घबरा रहा था। लेकिन मुझे लगा कि पांच सौ से कम करवाया जा सकता है तो मैंने साढ़े तीन सौ रुपए कहा। पहले तो मोबाइल के मरम्मतकर्ता ने मना किया लेकिन चार सौ से कम नहीं करने की बात पर अड़ गया। मेरे लिए सौ रुपए की यह बचत भी महत्वपूर्ण थी। असल में घर में बथानी का छप्पर गिर जाने के बाद मेरी गृहस्वामिनी इन दिनों वहां कुछ नया बनवा रही हैं तो आर्थिक बोझ मुझ पर भी डाल रही हैं।

सरकार में भी सेंसर होते हैं। स्मार्टफोन में जैसे डायोड यह काम करता है तो सरकार के स्तर पर नौकरशाह। मुझे लगता है कि इनके बगैर सरकारी तंत्र मुकम्मिल होने के बावजूद मुकम्मिल नहीं होता। अब यह सरकार चलानेवाले पर निर्भर करता है कि वह नौकरशाहों को कितना भाव देता है। कुछ पीएम और सीएम ऐसे होते हैं जो नौकरशाहों को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी जिनके लिए नौकरशाह महज काम करनेवाले हैं।

खैर, मैंने मोबाइल मरम्मतकर्ता से पूछा कि कितना समय लगेगा? जवाब मिला बस पांच मिनट। यह तो सोने पर सुहागा के जैसा था। मैंने कहा कि कृपया इसे ठीक कर दें। मोबाइल मरम्मतकर्ता ने अपना नाम नदीम बताया। उसने मेरे सामने ही मोबाइल को खोला और एक पीसीबी (प्रिंटेड सर्किट बोर्ड) के जैसी एक लंबी सी पीसीबी को निकाला और उसके बदले नई डाल दी। फिर मोबाइल ऑन करते हुए उसने कहा कि मोबाइल को कुछ नहीं हुआ था बस इसका सेंसर काम नहीं कर रहा था। सेंसर मतलब डायोड। यह उस जगह होता है जहां चार्जिंग इंटरफेस होता है, जिसके जरिए हम मोबाइल को चार्ज करते हैं।

मतलब यह कि मेरे मोबाइल फोन में बैट्री भी थी और वह चार्ज भी ले रहा था। लेकिन मोबाइल के दिमाग में यह बात नहीं जा रही थी कि वह चार्ज हो रहा है। वजह डायोड का काम नहीं करना था।

स्मार्टफोन का उद्धरण इसलिए भी कि कल उमा भारती से जुड़ा हुआ एक मामला देखा। उमा भारती का एक वीडियो वायरल हुआ है जिसमें वह नौकरशाहों का मूल्यांकन कर रही हैं। उनका कहना है कि नौकरशाह कुछ नहीं होते, बस चप्पल उठाते हैं। यही उनकी औकात है। उनका यह भी कहना है कि जो करते हैं वे राजनेता करते हैं। उन्होंने अपने इस कथन को संपुष्ट करने के लिए यह भी कहा कि वह 11 वर्षों तक केंद्र में मंत्री रही हैं और मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री भी। इसलिए उन्हें पता है कि फाइलें कैसे आगे बढ़ती हैं।

तो अच्छा कौन है? वह सीएम या पीएम जो नौकरशाहों को माथे पर चढ़ाकर रखता है या फिर वह जो लोकतंत्र का महत्व समझता है तथा नौकरशाहों को भाव नहीं देता? एक उदाहरण कर्पूरी ठाकुर का है। वे नौकरशाहों का बड़ा सम्मान करते थे। कहते थे कि ये लोग बहुत कलम घिसकर आते हैं तो उनको सम्मान मिलना चाहिए। यही वजह रही कि अपने मुख्य सचिव को न केवल वह अपने साथ बिठाते थे बल्कि उन्हें उनकी कार तक छोड़ने जाते थे।

तो हुआ यह कि यह वीडियो वायरल होते ही वह आलोचनाओं का शिकार हो गईं और चौतरफा घिरते देख उन्होंने एक ट्वीट किया और पूरी ईमानदारी से स्वीकार किया कि उन्होंने असंयत भाषा का उपयोग किया है। ऐसा क्यों हुआ, इसके पीछे की घटना के बारे में भी उन्होंने बताया। उनका कहना है कि पिछड़े वर्गों के कुछ लोग उनसे मिलने आए थे और कुछ मुद्दों पर बात चल रही थी। इस अनौपचारिक बातचीत में ही उन्होंने नौकरशाहों को चप्पल उठानेवाला बता दिया। उमा भारती ने यह भी लिखा कि उन्हें अब सबक मिल गया है कि अनौपचारिक बातचीत में भी असंयत भाषा का उपयोग नहीं करना चाहिए।

दरअसल, सरकार और स्मार्टफोन एक जैसे ही हैं। सरकार में भी सेंसर होते हैं। स्मार्टफोन में जैसे डायोड यह काम करता है तो सरकार के स्तर पर नौकरशाह। मुझे लगता है कि इनके बगैर सरकारी तंत्र मुकम्मिल होने के बावजूद मुकम्मिल नहीं होता। अब यह सरकार चलानेवाले पर निर्भर करता है कि वह नौकरशाहों को कितना भाव देता है। कुछ पीएम और सीएम ऐसे होते हैं जो नौकरशाहों को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी जिनके लिए नौकरशाह महज काम करनेवाले हैं। सबसे बड़ा उदाहरण है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का। इन्होंने तो नौकरशाहों को सबसे निम्नतम स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है। बड़े से बड़ा आइएएस  व आइपीएस अधिकारी भूल से भी खांसने की हिमाकत नहीं करता। हालांकि कुछ अपवाद हुए हैं। एक तो संजीव भट्ट हैं जो आइपीएस अधिकारी हैं। लेकिन इन दिनों जेल की सजा काट रहे हैं। एक उर्जित पटेल थे जो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के गवर्नर थे। वे पीएम की पसंद के थे, लेकिन एक दिन उनका सब्र डोल गया और उन्होंने बगावत कर दिया। चूंकि गुजरात के थे तो उनके उपर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई। बस इतना ही हुआ कि उन्हें शंट (शांत) कर दिया।

नौकरशाहों को पसंद नहीं था तो वह था लालू यादव का राज। लालू यादव ने ब्यूरोक्रेसी को सीमित कर दिया था। पूरी ताकत तब जन के पास थी। कोई भी सीओ, बीडीओ, डीएसपी, एसपी, डीएम किसी जनप्रतिनिधि की बात को अनदेखा नहीं कर सकता था

लेकिन किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि केवल पीएम और होम मिनिस्टर के मामले में ही नौकरशाहों की औकात पानी भरनेवालों की है। अन्य सभी मंत्रालयों के नौकरशाह खुद को मंत्रियों से कम नहीं समझते। यही हालत बिहार सरकार की भी है। बिहार के केवल वे नौकरशाह ही भय खाते हैं जो सीधे नीतीश कुमार से जुड़े हैं। भय खाना कहना अतिरेक है। असल में नीतीश कुमार ने पूरे तंत्र को नौकरशाहों के हवाले कर दिया है। बिहार का कोई भी आईएएस या आईपीएस अधिकारी किसी जनप्रतिनिधि की बात को एक कान से सुनता है और दूसरे से बाहर कर देता है। अभी हाल ही में बिहार सरकार में शामिल एक अति पिछड़ा वर्ग से आनेवाले एक कैबिनेट मंत्री मदन सहनी ने इस्तीफे की घोषणा तक कर दी। उनका कहना था कि उनका विभागीय सचिव उनकी बात नहीं सुनता। उन्होंने सीएम पर भी गंभीर आरोप लगाया था। लेकिन बाद में सीएम के समझाने के बाद मदन सहनी शांत हुए।

मुझे नहीं पता कि मदन सहनी और उनके विभागीय सचिव के बीच अब रिश्ता कैसा है।

तो अच्छा कौन है? वह सीएम या पीएम जो नौकरशाहों को माथे पर चढ़ाकर रखता है या फिर वह जो लोकतंत्र का महत्व समझता है तथा नौकरशाहों को भाव नहीं देता? एक उदाहरण कर्पूरी ठाकुर का है। वे नौकरशाहों का बड़ा सम्मान करते थे। कहते थे कि ये लोग बहुत कलम घिसकर आते हैं तो उनको सम्मान मिलना चाहिए। यही वजह रही कि अपने मुख्य सचिव को न केवल वह अपने साथ बिठाते थे बल्कि उन्हें उनकी कार तक छोड़ने जाते थे। जगन्नाथ मिश्र भी नौकरशाहों को माथा पर चढ़ाकर रखनेवाले सीएम थे। ऐसा एक पूर्व आइएएस अधिकारी ने बताया था। यादव जाति के उस आइएएस अधिकारी के मुताबिक जगन्नाथ मिश्र के समय में सारे महत्वपूर्ण पदों पर ब्राह्मण आइएएस थे। कुछेक भूमिहार और राजपूत भी थे। लेकिन चलती केवल ब्राह्मणों की थी। मिश्र को वे आईएएस पसंद आते थे जो माथे पर तिलक लगाता था और चरण वंदना करता था।

खैर, नौकरशाहों को पसंद नहीं था तो वह था लालू यादव का राज। लालू यादव ने ब्यूरोक्रेसी को सीमित कर दिया था। पूरी ताकत तब जन के पास थी। कोई भी सीओ, बीडीओ, डीएसपी, एसपी, डीएम किसी जनप्रतिनिधि की बात को अनदेखा नहीं कर सकता था। फिर वहां के एक मीडियाकर्मी ने बड़ा काम किया। यह खबर फैला दी कि लालू यादव आईएएस अधिकारियों से खैनी रगड़वाते हैं। एक बार मैंने लालू प्रसाद से पूछा भी। उनका कहना था कि वह पांडे था, जिसने यह फैला दिया। ऐसा नहीं था कि मैंने किसी आईएएस अधिकारी को पीकदानी उठाने या फिर खैनी रगड़ने के लिए कहा। मैंने तो बस इतना ही किया कि नौकरशाह नौकरशाह की तरह रहें, जनप्रतिनिधियों का सम्मान करें और उनका कहना मानें। डेमोक्रेसी में और क्या होना चाहिए। देश में कंपनी राज थोड़े ना है।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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