जीना इसी का नाम है…..

गुलाबचंद यादव

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 ‘भाई साहब, नमस्कार। मैं जयशंकर बोल रहा हूँ और इस समय आपके शहर में हूँ। क्या कल शनिवार दोपहर को आपसे भेंट हो सकेगी? कार्यालय कार्य से 2 दिन के लिए पनवेल आया था। कल ही शाम को 6 बजे मुझे थाने से बस से बेलगावी लौटना है।’ जयशंकर जी ने एक सांस में ही यह सब कहा तो सहसा यकीन नहीं हुआ कि आपसे मुलाक़ात का अवसर मिलने वाला है। मैंने उन्हें सहर्ष आमंत्रित किया। मोबाइल रखते ही यादों की खट-पट शुरू हो गई और बेलगावी (पूर्व का वेणुग्राम, बेलगाँव या बेलगाम) प्रवास की सुखद स्मृतियाँ मानस पटल पर चहलकदमी करने लगीं।

बेंगलुरु में अगस्त 2016 का वह कोई दिन था। ‘भाई साहब नमस्कार। मैं बेलगावी से डॉ जयशंकर यादव बोल रहा हूँ।’ शाम 5 बजे के आसपास यह मधुर आवाज मेरे मोबाइल पर सुनाई पड़ी थी। बेलगावी और डॉ जयशंकर…! मैंने अपनी स्मरण शक्ति पर खूब ज़ोर-आजमाइश की किन्तु परिचय का कोई पूर्व सूत्र मेरे यादों में नहीं उतर पाया। बहरहाल, मेरा अनुभव रहा है कि कुछ फोन काल (यद्यपि इनकी संख्या बहुत ही कम होती है) ऐसे होते हैं जो आपके दिन को सुखद एहसास और मधुर अनुभूति से सार्थक बना देते हैं। अभिवादन के आदान-प्रदान के बाद उन्होंने गर्मजोशी से अपना परिचय दिया और मेरे बारे में जानकारी ली। आपने बताया कि भारत सरकार की एक राजभाषा पत्रिका में छपे मेरे लेख को उन्होंने पढ़ा, जो उन्हें अच्छा लगा। इसलिए उन्होंने उस लेख के अंत में दिए गए मेरे मोबाइल नंबर पर काल कर अपनी प्रतिक्रिया देने का विचार किया। हम जैसे बहुत कम लिखने और छपनेवाले व्यक्ति की किसी रचना या लेख पर जब कोई दूर शहर का पाठक उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दे तो वाकई ‘सरप्राइज़’ जैसा लगता है। उस संक्षिप्त वार्तालाप में अपने लेख की प्रशंसा से ज्यादा मुझे जयशंकर जी की आत्मीयता और विनम्रता ने प्रभावित किया था और मुझे उसी समय महसूस हुआ था कि एक अच्छे इंसान से परिचय हुआ है।

जिला बलिया, उत्तर प्रदेश के मूल निवासी डॉ. जयशंकर भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग की हिंदी शिक्षण योजन में वरिष्ठ प्राध्यापक हैं और कर्नाटक के गुलाबी मौसमवाले शहर बेलगावी (पूर्व का बेलगाँव) में तैनात हैं। बेलगावी शहर से आपका नाता ऐसा जुड़ गया है कि आपने यहीं पर एक भूखंड लेकर अपना मकान बना लिया है। मैं बेंगलुरु में जून 2014 से जून 2017 तक करीब तीन साल तक रहा। बेंगलुरु में मेरी इस तैनाती के दौरान इस महानगर के ज्ञानचंद मर्मज्ञ (जाने-माने कवि एवं समाजसेवी),  ईश्वर चंद्र मिश्र (सहायक निदेशक, केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो) और श्रीनिवास राव (राजभाषा अधिकारी, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लि.) मेरे गहरे मित्र बने तो बेंगलुरु से बाहर डॉ बुद्धिराम पाल (राजभाषा अधिकारी, एमआरपीएल लि., मेंगलूर) और डॉ जयशंकर यादव (बेलगावी) घनिष्ठ मित्रों की सूची में जुड़े।

डॉ जयशंकर की बेटी का विवाह समारोह

जयशंकर जी से फरवरी 2017 में मुंबई में भेंट का अवसर मिला था जब वे हमारे एक साझा मित्र की बेटी के विवाह समारोह में शामिल होने के लिए आए थे। वह मुलाक़ात इसलिए भी मेरी यादों में बनी हुई है क्योंकि ‘द्वारपूजा’ की रस्म के समय हम दोनों पास-पास बैठे थे। लौटते समय आपने मुझे बेलगावी आने के लिए आमंत्रित किया था। बेंगलुरु आने के बाद मैं बेलगावी जाने के लिए अवसर तलाश रहा था। बीच में मैं हुबली भी गया था किन्तु दौरे की व्यस्तता के कारण बेलगावी जाना संभव नहीं हो पाया। खैर! जहां चाह, वहाँ राह। मार्च 2017 में मैंने सप्ताहांत की छुट्टियों के दौरान बेलगावी जाने की योजना बनाई और ट्रेन के टिकट बुक कर जयशंकर जी को फोन कर दिया। मेरे यात्रा कार्यक्रम की सूचना पर आपने खुशी व्यक्त की, जबकि सच यह भी था कि आप उस समय अपने निर्माणाधीन मकान को अंतिम रूप देने तथा उसकी साज-सज्जा और अन्य व्यवस्थाओं में लगे हुए थे। फिर भी आपने मुझे अपने यात्रा कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए नहीं कहा। मुझे याद है बेलगावी स्टेशन पर रिसीव करने आप खुद आए थे और एक गेस्ट हाउस में मेरे ठहरने और घूमने के लिए एक कार की व्यवस्था की थी।

बेलगावी के दर्शनीय स्थानों में मिलिट्री महादेव मंदिर, 12वीं सदी में निर्मित कमल बस्ती जैन मंदिर, हरि मंदिर, रामकृष्ण मिशन आश्रम, बेलगाँव किला, सफा मस्जिद, सेंट मैरीज़ चर्च आदि प्रमुख हैं। बेलगावी भारतीय सैन्य नक्शे में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मराठा लाइट इन्फैन्ट्री रेजिमेंटल सेंटर यहीं पर है।

 

हममें से अधिकांश लोग बेलगाँव या बेलगावी को महाराष्ट्र और कर्नाटक की सीमा पर बसे उस शहर के तौर पर ही ज्यादा जानते हैं जिसे महाराष्ट्र अपने में मिलाना चाहता है क्योंकि यहाँ मराठी भाषी आबादी अधिक है, जबकि कर्नाटक इसे अपना अविभाज्य हिस्सा मानता है। कर्नाटक सरकार इस शहर को उप-राजधानी के समकक्ष मानती है और यहाँ भी मुख्य शहर से थोड़ी दूरी पर उसी मॉडल का ‘सुवर्ण विधान सौधा’ बनाया गया है जैसे मुख्य राजधानी बेंगलूरु में मौजूद है। विधानसभा के कुछ सत्र भी यहाँ सम्पन्न होते हैं। पिछले 10-15 वर्षों में बेलगावी और उससे सटे हुबली एवं धारवाड़ शहर भी शिक्षा के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में उभरे हैं। यहाँ मेडिकल, इंजीनियरिंग, फार्मेसी, मैनेजमेंट आदि की शिक्षा प्रदान करने वाले अनेक कॉलेज/संस्थान हैं जहाँ देश के कोने-कोने से आए हजारों छात्र-छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। बेलगावी की केएलई सोसाइटी (केएलईएस) प्रदेश ही नहीं वरन देश की सबसे पुरानी स्वदेशी शैक्षणिक संस्थाओं में से एक है जो कर्नाटक, महाराष्ट्र और गोवा में लगभग 250 कॉलेज/संस्थान संचालित कर रही है। 14 नवंबर 2015 को इस संस्था ने अपना 100वां स्थापना दिवस मनाया था। केईएलएस का विशाल मेडिकल कॉलेज और उससे संलग्न बृहद परिसर में फैले अस्पताल को देखकर यकीन नहीं होता कि एक ट्रस्ट ने बेलगावी जैसे मध्यम श्रेणी के शहर में इसे बनाया है। मैं सोचता हूँ, ‘काश! हमारे उप्र और बिहार के शहरों में भी शिक्षा और चिकित्सा की ऐसी सुविधाएं उपलब्ध हो पातीं।‘

डॉ जयशंकर यादव का परिवार

बेलगावी के दर्शनीय स्थानों में मिलिट्री महादेव मंदिर, 12वीं सदी में निर्मित कमल बस्ती जैन मंदिर, हरि मंदिर,  रामकृष्ण मिशन आश्रम, बेलगाँव किला, सफा मस्जिद, सेंट मैरीज़ चर्च आदि प्रमुख हैं। बेलगावी भारतीय सैन्य नक्शे में भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। मराठा लाइट इन्फैन्ट्री रेजिमेंटल सेंटर यहीं पर है। पास ही एयर फोर्स स्टेशन और कमांडों केंद्र भी अवस्थित हैं। देश के 5 प्रतिष्ठित सैनिक स्कूलों में से एक ‘बेलगाँव मिलिट्री स्कूल’ भी यहीं पर है। यहाँ हिंदलगा में पुरानी सेंट्रल जेल भी है जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए अनेक राष्ट्रीय नेताओं/क्रांतिकारियों को रखा गया था। हाल के दिनों में वीरप्पन गैंग के मौत की सजा पाये चार सदस्यों को यहीं रखा गया था और यहीं उन्हें फाँसी पर लटकाया गया था। यदि आप खोवा (मावा) की बनी मिठाई के शौकीन हैं तो यहाँ की प्रसिद्ध कुंदा मिठाई के स्वाद को शायद ही कभी भूल पाएं।

मेरा बेलगावी का वह दो दिवसीय प्रवास बहुत अच्छा रहा था। जयशंकर जी ने आग्रहपूर्वक अपना नया मकान दिखाया था और यह सुखद जानकारी भी दी थी कि हिंदी के जाने-माने साहित्यकार और राजस्व सेवा के शीर्ष पद से सेवानिवृत्त  कमलाकान्त त्रिपाठी भी बेलगावी में सेटल हुए हैं और उनका मकान आपके नए आवास के पास ही है। पाहीघर और बेदखल जैसे बहुचर्चित उपन्यासों के रचयिता और ‘श्रीलाल शुक्ल स्मृति साहित्य सम्मान’ सहित कई अन्य पुरस्कारों/सम्मानों से नवाजे गए कथाकार कमलाकांत जी से आपने मेरी मुलाक़ात भी कराई। त्रिपाठी जी अत्यंत सरल, सहज और प्रसन्नचित्त व्यक्तित्व के धनी हैं। आपके व्यवहार और बातचीत में अभिमान या वरिष्ठता का भाव रंच मात्र भी नहीं है। मैंने अपने ललित निबंध संग्रह क्षमा करें, मैं हिंदी अखबार नहीं पढ़ता की एक प्रति आपको भेंट की और आपने मुझे शाल ओढ़ाकर आशीर्वाद दिया। हम तीनों की वह बैठकी लगभग दो-ढाई घंटे चली थी। त्रिपाठी जी के साथ गाँव-देहात की कई यादें, स्मृतियाँ, बदलावों और नए-पुराने समय की अच्छाइयों- बुराइयों पर बातें/ विचार साझा कर बहुत अच्छा लगा। यह महसूस हुआ कि उत्तर प्रदेश के अवध और पूरबी इलाकों की सामाजिक, राजनैतिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं और इतिहास की बारीकियों पर आपका अध्ययन बहुत ही गहरा और अनुसंधानपरक है। आप आजादी के आंदोलन की पृष्ठभूमि पर एक बृहद उपन्यास पर काम कर रहे हैं जिसके शीघ्र ही प्रकाशित होने की आशा है।

जब हमारा जीवनसाथी जिंदगी के सफर में बीच रास्ते में ही अचानक साथ छोडकर हमेशा-हमेशा के लिए जुदा हो जाता है वह वह विछोह, वह विपदा या दुर्घटना हमारे लिए कितनी कष्टकारी, दुखद और आपूरणीय क्षति जैसी होती है इसे भुक्तभोगी ही जानता है। ऐसे में अकेला पड़ा साथी टूट जाता है। आगे के जीवन के लिए बुने गए सपने ध्वस्त से प्रतीत होते हैं और सामने गहरा अंधकार सा छा जाता है।

 

यद्यपि मैं बेलगावी में 2 दिन ही रहा किन्तु इस छोटे से प्रवास में भी जयशंकर जी की आत्मीयता, गँवईं बेलौसपन और स्नेहिल आतिथ्य ने यह साबित कर दिया कि इस बदलते और मशीनी युग में भी अभी भी हमारे बीच ऐसे लोग मौजूद हैं जो रिश्तों और संबंधों, दोस्ती/यारी की पूंजी को, अपनी संस्कृति की धरोहर को और अपनी सामाजिकता की अमानत को बड़े जतन से सँजोए-संभाले हुए हैं। यादों की गठरी खोले बैठा हूँ तो और भी कई बातें स्मृति के पर्दे पर उभरती जा रही हैं। जब जयशंकर जी मुझे अपने किराएवाले मकान में ले गए थे तो वहाँ उनके घर का सामान पैक हो रहा था क्योंकि उन्हें अब अपने खुद के नए मकान में शिफ्ट होना था। उनके बेटे ने चाय-पान की व्यवस्था की। मैं सोच रहा था कि भाभी जी (यानी श्रीमती जयशंकर) कहाँ हैं और वे सामने क्यों नहीं आईं? फिर मन ने उत्तर दिया कि हो सकता है कि संकोच और लाज/लिहाज के नाते वे मेरे सामने आने से बच रही होंगी। उन्हें शायद यह लगा होगा कि मैं उम्र में उनके पतिदेव से बड़ा हूँ और इस नाते मैं उनके लिए पद या नाते में ‘जेठ’ जो ठहरा। ऐसे में भला वे कैसे सामने आतीं? यहाँ बता दूँ कि जयशंकर जी उम्र में मुझसे लगभग पाँच साल बड़े हैं। अतः मैंने इस संबंध में कोई पूछताछ नहीं की।

डॉ जयशंकर जी स्कूटर पर बैठाकर मुझे अपने नए मकान पर ले गए और स्नेहपूर्वक पूरा घर दिखाया। अपने पूजाघर में फूल-माला चढ़ाकर मुझे इस आग्रह के साथ प्रसाद खिलाया कि मेरे आने से आज उनके इस घर का गृह प्रवेश हो रहा है वरना यह काफी समय से टलता जा रहा था। यह मकान नई बस रही बस्ती में था और चारों ओर काफी खुली जगहें, पार्क और हरियाली थी। यह शहर भी बड़ा हुआ है और अच्छे स्कूल-कॉलेजों, अस्पतालों, शॉपिंग माल, रेस्टोरेन्ट, मल्टीप्लेक्स जैसी आधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस हुआ है। किन्तु घने महानगरों की घुटन और आपा-धापी से यह अभी लगभग मुक्त ही है। इसीलिए यहाँ जीवन की मंद-मंथर गति, सहजता और रुक-ठहरकर जीने की स्वाभाविकता बनी हुई है। यह शहर डराता नहीं है बल्कि यदि कुछ वर्ष हम यहाँ रह लें तो शायद हमें यहाँ से जाने ही नहीं देगा। उसी तरह से जैसे कमलाकांत त्रिपाठी और डॉ जयशंकर को इसने अपने स्नेहजाल से मोहित कर रोक लिया है।

यही सब सोचता-विचारता हुआ मैं उनके मकान के सामने खड़ा होकर आस-पड़ोस के मकानों, पेड़-पौधों और हरियाली को निहार रहा था कि जयशंकर जी ने वह रहस्य खोला। आपने बताया कि आपकी जीवनसंगिनी श्रीमती इन्दिरा जी इस दुनिया में नहीं हैं। उनकी पुण्यतिथि भी पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी की पुण्य तिथि अर्थात 31 अक्तूबर को पड़ती है। करीब 18 वर्ष पहले वे इसी बेलगावी में अचानक गंभीर रूप से अस्वस्थ हुईं और तमाम प्रयासों/चिकित्सा के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। असमय निधन के समय भाभी जी की उम्र 38 वर्ष और डॉ. जयशंकर जी की 41 वर्ष थी। चारों बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए घरवालों/रिशतेदारों के दबाव/सलाह के बावजूद आपने पुनर्विवाह नहीं किया। आपने अपने बच्चों को पिता के स्नेह के साथ-साथ माँ की ममता और वात्सल्य भी दिया। आपकी सबसे छोटी बिटिया तब मात्र तीन साल की थी। आज आपके बच्चे बड़े हो गए हैं। बड़ी बेटी कीर्ति ने एमबीए (वित्त) की पढ़ाई की और उसका विवाह हो गया है और वह दो वर्ष की प्यारी बच्ची अन्वी की जननी है। आपके दामाद सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। बड़ा बेटा डॉ. शिवेंद्र हृदय चिकित्सा के क्षेत्र में पोस्ट ग्रैजुएशन कर चुका है और उसी अस्पताल और आपरेशन थियेटर में सेवारत हुआ जहाँ उसकी माँ का निधन हुआ था। उस दिन वह उसी ओटी के सामने खड़ा होकर रो रहा था जब उसकी माँ अपनी जिंदगी की अंतिम घड़ियाँ गिन रही थी। संप्रति वह लंदन यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल, लंदन में चीफ कार्डियक फिजियोलोजिस्ट के पद पर नौकरी कर रहा है। मझली बेटी डॉ. श्रुति यादव भी मास्टर ऑफ फिजियोथैरेपी कोर्स के अंतिम वर्ष में है और साथ ही बाल रोग विशेषज्ञता का कोर्स भी कर रही है। सबसे छोटी बेटी प्रीति आर्किटेक्चर इंजीनियरिंग एवं इंटीरियर डिजाइन कोर्स के अंतिम सेमिस्टर में है। मेरी कामना है कि आपके सभी बच्चे अपने-अपने प्रोफेशन में भलीभाँति सेटल हो जाएँ और जल्दी ही आपके घर बहू का आगमन हो तथा घर नन्हें-मुन्ने/मुन्नी की किलकारियों से गुंजित-स्पंदित हो।

जब हमारा जीवनसाथी जिंदगी के सफर में बीच रास्ते में ही अचानक साथ छोडकर हमेशा-हमेशा के लिए जुदा हो जाता है वह वह विछोह, वह विपदा या दुर्घटना हमारे लिए कितनी कष्टकारी, दुखद और आपूरणीय क्षति जैसी होती है इसे भुक्तभोगी ही जानता है। ऐसे में अकेला पड़ा साथी टूट जाता है। आगे के जीवन के लिए बुने गए सपने ध्वस्त से प्रतीत होते हैं और सामने गहरा अंधकार सा छा जाता है।

 

जब हमारा जीवनसाथी जिंदगी के सफर में बीच रास्ते में ही अचानक साथ छोडकर हमेशा-हमेशा के लिए जुदा हो जाता है वह वह विछोह, वह विपदा या दुर्घटना हमारे लिए कितनी कष्टकारी, दुखद और आपूरणीय क्षति जैसी होती  है इसे भुक्तभोगी ही जानता है। ऐसे में अकेला पड़ा साथी टूट जाता है। आगे के जीवन के लिए बुने गए सपने ध्वस्त से प्रतीत होते हैं और सामने गहरा अंधकार सा छा जाता है। जिंदगी में जो रिक्तता या शून्यता आ जाती है उसे वही महसूस कर सकता है जिसने ऐसी विपदा खुद झेली हो। दुख और विपत्ति इंसान को तोड़ती हैं, कमजोर बनाती हैं और कई बार इस तरह से झकझोर देती हैं कि उससे उबरने में महीनों नहीं बल्कि सालों का समय लग जाता है। कहा जाता है कि समय बड़े-बड़े घावों को भर देता है किन्तु उन विपदाओं, रिक्तताओं और बिछोह के निशान को कहाँ मिटा पाता है? कई बार दुख और विपदाएँ हमारी संवेदनाओं को भली-भांति माँज देती हैं, मन में तरलता भर देती हैं और हम पहले से अधिक कृतज्ञ, दयालु, समझदार और संवेदनशील हो जाते हैं और दूसरों के सुख-दुख को पहले से बेहतर जानने-समझने लगते हैं। जीवन की निस्सारता और क्षण-भंगुरता हमारी आँखें खोल देती हैं। अपनी मूल जड़ों से जुड़ा होने के नाते  जयशंकर जी का स्वभाव समावेशी और बहिर्मुखी ही रहा है, किन्तु लगता है कि जीवन के इन अनुभवों ने आपको और अधिक उदात्त और कोमल बना दिया है।

डॉ. जयशंकर का स्वभाव एकोsअहम् बहुस्याम् वाला है। बेलगावी में रहते हुए आपने अपने गाँव/क्षेत्र के कई युवक-युवतियों को फार्मेसी, इंजीनियरिंग, होमियोपैथी तथा अन्य कोर्सों में प्रवेश दिलाने में मार्गदर्शन और सहायता की। उनमें से कइयों के लिए स्थानीय अभिभावक की ज़िम्मेदारी भी आपने सहर्ष निभाई। कुछेक ने तो आपके घर पर ही रहकर अपनी पढ़ाई पूरी की। कुछ युवतियों ने आपके मार्गदर्शन में आपके घर पर रहकर बेलगावी से बी एड और एम एड की पढ़ाई पूरी की और आज सरकारी/ निजी विद्यालयों में सफलतापूर्वक अध्यापन कर रही हैं। सोचा और समझा जा सकता है कि आज के आत्मकेंद्रित और बीहड़ स्वार्थपरकता वाले इस समय-काल में दूसरों के हित के बारे में कितने लोग सोचते होंगे और मदद के लिए आगे आने का साहस करते होंगे। अपने लिए तो सभी जीते हैं और जी भी रहे हैं किन्तु जो औरों के लिए भी अपना अमूल्य समय, संसाधन और अनुभव बाँट रहे हैं वे ही लोग सच्चे अर्थों में अपने जीवन को सार्थक और सफल बना रहे हैं।

हममें से जो लोग अपने और अपने परिवार के लिए जरूरी सुख-सुविधाएं जुटा चुके हैं और अपेक्षित जिम्मेदारियों को पूरा कर चुके हैं उन्हें अपने आस-पास भी जरूर देखना चाहिए और अपने नाते-रिशतेदारों के होनहार किंतु साधनविहीन  बच्चों में से एक-दो को पढ़ने-लिखने में सहायता करनी चाहिए। समाज के कल्याण के लिए अपनी क्षमता और शक्ति के अनुसार कुछ ऐसा किया जाए जिससे हम ‘देने का आनंद’ (joy of giving) पा सकें। देश-समाज हमें बहुत कुछ देता है। अतः थोड़ी देर ठहरकर हमें भी यह सोचना चाहिए कि प्रतिदान में हम अपने देश-समाज को भी कुछ दे रहे हैं या नहीं? अपने जीवनकाल में यदि हम दो जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई में सहयोग कर उन्हें कुछ बना सकें और दो-चार पौधों को रोपकर उन्हें पूर्ण विकसित वृक्ष बना सकें तो यह प्रतिदान हमें असीम संतोष देगा। प्रसिद्ध कवयित्री सुश्री निर्मला पुतुल की चर्चित कविता ‘उतनी दूर मत ब्याहना बाबा’ की कुछ पंक्तियाँ इस प्रसंग में याद आ रही हैं जिसमें एक युवती अपने पिता से अपने लिए चुने जानेवाले वर में अपेक्षित योग्यताओं का जिक्र करती है, ऐसा वर नहीं चाहिए मुझे/ और उसके हाथ में मत देना मेरा हाथ/ जिसके हाथों ने कभी कोई पेड़ नहीं लगाया/ जिन हाथों ने नहीं दिया कभी किसी का साथ/ किसी का बोझ नहीं उठाया।  जिग जिगलर ने किसी जगह लिखा है कि आप जीवन में जो कुछ चाहते हैं, वह प्राप्त कर सकते हैं। बस आप दूसरों लोगों की मदद करना शुरू कर दें।  मेरा मानना है कि जयशंकर जैसे लोग इन अपेक्षाओं पर खरे उतरते हैं। हमें कामना करनी चाहिए कि हमारे देश-समाज में जयशंकर जैसे लोगों की संख्या दिनों-दिन और बढ़े और इस काफिले में हम सब भी सहभागी बनें।

गुलाबचंद यादव बैंक में सेवारत हैं और फिलहाल मुंबई में रहते हैं ।

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