Tuesday, April 16, 2024
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बुल्लीबाई ऐप के बहाने महिलाओं पर कसता शिकंजा

13 जनवरी 2022 को इप्टा की महिला साथियों ने बुल्लीबाई ऐप के बहाने महिलाओं पर कसता शिकंजा विषय पर ज़ूम प्लेटफॉर्म पर चर्चा की। चर्चा की शुरुआत करते हुए ज्योत्सना रघुवंशी(आगरा) ने कहा, बुल्लीबाई ऐप प्रकरण बहुत शर्मनाक और निंदनीय है। यह बोलने की सज़ा है या किसी राजनैतिक बदले की भावना से किया गया […]

13 जनवरी 2022 को इप्टा की महिला साथियों ने बुल्लीबाई ऐप के बहाने महिलाओं पर कसता शिकंजा विषय पर ज़ूम प्लेटफॉर्म पर चर्चा की। चर्चा की शुरुआत करते हुए ज्योत्सना रघुवंशी(आगरा) ने कहा, बुल्लीबाई ऐप प्रकरण बहुत शर्मनाक और निंदनीय है। यह बोलने की सज़ा है या किसी राजनैतिक बदले की भावना से किया गया है, मगर यह सिलसिला 2014 के बाद से चला आ रहा है। तीन तलाक, सीएए का विरोध मुखर रूप से करने वाली महिलाओं को भद्दे ढंग से प्रताड़ित किया जा रहा है, सेक्सुअली असॉल्ट किया जा रहा है। यह एक तरह का सामाजिक और व्यक्तिगत हमला तो है ही, साथ ही एक बहुत बड़ा इमोशनल अटैक भी है। इस प्रकरण में जिन युवाओं को गिरफ्तार किया गया है, उसके पीछे दूसरे हाथ हैं। वे सिर्फ टूल हैं। इस तरह आनेवाली पीढ़ियों को ज़हरीला बना दिया जा रहा है। यह भी चिंता की बात है। यह स्पष्ट है कि महिलाओं की मुखरता, उनका आवाज़ उठाना सहन नहीं हो रहा है, इसलिए बदला लेने या इमोशनली डाउन करने के लिए इस तरह की बेहूदा हरकतें की जा रही हैं। जो महिलाएँ प्रताड़ित हो रही हैं, उनके साथ हमें एकजुटता दिखाने की ज़रूरत है।

गाजीपुर की एक्टिविस्ट नईश हसन ने इस प्रकरण पर एफआईआर दर्ज़ की है। उन्होंने अपने अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि ‘पिछले दो हफ्तों से हमारे पास बहुत अनाम कॉल्स आ रही थीं, जिसमें भद्दी बातें कही जा रही थीं। किसी एक कौम की सामाजिक दखल देने वाली, विरोध में बोलने वाली औरतों को निशाना बनाया जाना फिक्र की बात है। हम बुल्लीबाई ऐप के खिलाफ एफआईआर दर्ज़ करने के लिए अर्ज़ी के साथ तमाम डॉक्यूमेंट्स अटैच कर गाज़ीपुर थाने पहुँचे। वहाँ कहा गया कि इसे साइबर क्राइम ब्रांच से कनेक्ट किया जाएगा इसलिए देरी लग सकती है। जाँच ज़रूर होगी। उन्होंने अर्ज़ी रख ली और आश्वासन दिया। बाहर निकलना मना होने और आचार संहिता लगने के कारण हमने प्लेकार्ड और पोस्टर्स बनाए, ‘हम बुल्लीबाई हैं, आओ और हमारी डील करो’ इस तरह के पोस्टर्स बनाकर हम और अन्य लड़कियों ने फेसबुक, इंस्टाग्राम आदि पर पोस्ट किये। हमारे मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बिल्कुल खामोश हैं, उन्हें लगता है कि कुछ हुआ ही नहीं है।’

[bs-quote quote=”उषा आठले(मुंबई) ने कहा कि हमें अपने इकाई के स्तर पर, अपने शहर के स्तर पर, अपने प्रदेश के स्तर पर क्या-क्या करना चाहिए, इस ग्रुप में हम यह भी विचार करेंगे। ये जो युवा लड़के-लड़कियाँ गिरफ्तार किये गये हैं, ये टेक्निकल कठपुतलियाँ हैं। इसके पीछे के दिमाग वो हैं, जो आपके घरों में क्रिमिनल्स पैदा कर रहे हैं। हमें युवाओं के बीच अपनी बात कैसे ले जानी चाहिए, इस पर भी चर्चा ज़रूरी है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

नूर ज़हीर ने लंदन में किये जाने वाले अपने प्रयासों के बारे में बताया, ‘हमने हाई कमीशन के सामने प्रोटेस्ट करने के लिए अर्ज़ी दी। हमें फोन पर सूचना देने के लिए कहा गया। हम सोच रहे हैं कि प्रधानमंत्री चुप हैं, मगर ऐसा है नहीं। इंडियन हाई कमीशन के पास आदेश है कि बाहर कोई डिमॅन्स्ट्रेशन न होने पाए। कोई भी मीडिया इसे कवर न करने पाए। इसलिए हमें परमिशन नहीं मिल पाई। मुसलमानों से और कम्युनिस्टों से उन्हें खतरा है, बताया गया। बाद में हमें 10 महिलाओं को ही प्रोटेस्ट में खड़े रहने की इजाज़त मिली है। हम जाएंगे और एक मेमोरेंडम देंगे, जिसमें यह जानकारी माँगी जाएगी कि आखिर यह नीलामी कौन कर रहा है और हमें खरीदने वाले कौन हैं! हमें यह देखना होगा कि ज़ुर्म कितना संगीन है। बेचने वाले तो ज़ुर्म कर ही रहे हैं मगर खरीदने वाले भी तो कम दोषी नहीं! इस मामले में मुसलमानों से पूछने की बजाय हिंदुओं से पूछना है कि आप क्या कर रहे हैं? इसके खिलाफ हम क्या करेंगे, उसका अंज़ाम क्या होगा, यह सब सोचना ज़रूरी है क्योंकि यह एक वॉर है, बैटल है। मेजॉरिटी की चुप्पी खतरनाक है। इसके बावजूद हम लड़ते रहेंगे, इस ग्रुप के माध्यम से हम संकल्प लेते हैं।

उषा आठले(मुंबई) ने कहा कि हमें अपने इकाई के स्तर पर, अपने शहर के स्तर पर, अपने प्रदेश के स्तर पर क्या-क्या करना चाहिए, इस ग्रुप में हम यह भी विचार करेंगे। ये जो युवा लड़के-लड़कियाँ गिरफ्तार किये गये हैं, ये टेक्निकल कठपुतलियाँ हैं। इसके पीछे के दिमाग वो हैं, जो आपके घरों में क्रिमिनल्स पैदा कर रहे हैं। हमें युवाओं के बीच अपनी बात कैसे ले जानी चाहिए, इस पर भी चर्चा ज़रूरी है।

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अपर्णा (बनारस) ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जिन युवाओं ने ये ऐप बनाया है, उनके मन में इतना ज़हर, इतनी नफरत की भावना भरी गई है कि वे सोच तक नहीं पा रहे हैं कि वे कितना भयानक काम कर रहे हैं। सुल्ली डील और बुल्लीबाई एक कौम की उन्हीं महिलाओं को टार्गेट कर रहा है, जो विरोध में बोल रही हैं। टार्गेट करने वाले वही लोग हैं, जो सामने आकर तर्क नहीं कर सकते। बनारस में संघी मानसिकता बहुत भयानक रूप में दिखाई दे रही है।

वर्षा (दिल्ली) ने बताया कि वह ये सब चीज़ें देख तो रही है मगर पिछले सात सालों से इसमें इज़ाफा हुआ है। फेसबुक, इन्स्टा या ट्विटर पर लड़कियों पर जिस तरह के कमेंट्स होते हैं, कुछ भी लिखा जाए तो पर्सनल अटैक, गाली-गलौज होने लगती है। ये आज-कल बहुत नॉर्मल हो गया है। टार्गेट करने वाली चेन अब बढ़ती जा रही है। इसे किस तरह हैंडल कर पाएंगे, नहीं जानती। बस ये है कि हम जहाँ जो हैं, वहीं अपनी लड़ाई लड़े यह ज़रूरी है। इसका विरोध करें।

काजल बोरास्ते (नाशिक) ने कहा, मेरा भी अनुभव है कि सोशल मीडिया पर अपना कुछ या किसी और का ओपिनियन पोस्ट करते ही जो कमेंट आने लगते हैं, हेट से भरा हुआ नैरेटिव सामने आने लगता है। आप देशद्रोही हैं और बुल्लीबाई के कनेक्शन में ज़्यादा दूरी नहीं है। यह सिर्फ पॉलिटिकल ही नहीं है बल्कि बहुत पहले से मनुस्मृति को मानने वाले लोगों के लिए स्त्री एक रणभूमि रही है कि जब भी धर्म-जाति खतरे में आती है, स्त्री पर आक्रमण कर दिया जाता है क्योंकि वही इनके नैरेटिव की वाहक होती है। ये टेक्नॉलॉजी का कितना घिनौना रूप है कि इससे हेट फैलाया जाता है। आज युवाओं के बीच अनेक वेव्ज़ हैं, जिसमें यह पहचानना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि किसमें क्या बुरा है! बीच की उम्र के युवाओं को टार्गेट करना फंडामेंटलिस्ट लोगों को आसान होता है, उनके कंधे पर बंदूक रखकर अपना एजेंडा लागू करना। जब दमित आदमी बोलने लगता है, तब दमनकर्ताओं को बहुत डर लगता है। हमें बोलने वाली महिलाओं की माइनॉरिटी को मेजॉरिटी में बदलना होगा।

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अर्पिता (जमशेदपुर) ने कहा कि ये किसी एक कम्युनिटी की बात नहीं है। यह पैट्रियार्कल माइंडसेट तो हम आसपास समाज में, मीडिया और सोशल मीडिया में देख ही रहे हैं। इसमें जिसतरह युवाओं को देख रहे हैं तो लड़ने के लिए हमें समझना होगा कि यूथ जेंडर के प्रति क्या सोचते हैं, उनका मनस कैसा है, उनसे संवाद करना ज़रूरी है। अभी जिस तरह समाज का समूचा ताना-बाना अस्त-व्यस्त कर दिया गया है, सोचने पर डर लगता है। हमारी लड़ाई रोज़ की है। ये आइडेंडिटी का जो मानस बना दिया गया है, वो बहुत खतरनाक है। पता नहीं हम कैसी दुनिया बना रहे हैं। इसलिए हमें बिना कैलकुलेट किये बोलना होगा।

सारिका श्रीवास्तव (इंदौर) ने याद दिलाया कि कश्मीर की महिलाएँ यह सब लगातार भुगत रही हैं। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख महिलाओं ने यह झेला। 2002 में जब गुजरात में दंगे हुए, तब भी महिलाओं को निशाना बनाया गया। इसके पूर्व की सरकारों का चरित्र भी महिला विरोधी ही था। 2014 के बाद इसमें सम्प्रदाय का मसला जुड़ गया है। सभी फासीवादी सरकारों के हम टूल्स हैं, हमको यूज़ कर वे अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। भारतीय महिला संगठन ने भी इसका पुरज़ोर विरोध किया है। हरेक जन-संगठन से महिलाएँ जुड़ें, इप्टा की ओर से हम सात-आठ मिनट का नाटक या वीड़ियो बनाएँ और प्रसारित करें। ऑफलाइन-ऑनलाइन दोनों तरीके से हम काम करें।

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वेदा राकेश (लखनऊ) ने कहा, समाज में सभ्यता के विकास के साथ ही महिला को प्रॉपर्टी माना गया। आज जो बात दिख रही है,वह तो पचास-साठ साल पहले ही शुरु हो गई हैं। संघ ने सरस्वती शिशु मंदिर में बचपन से ही ये चीज़ें बच्चों के कोमल मन पर उकेरनी शुरु कर दी हैं। पहले वे इतना इम्पोज़ नहीं कर पाते थे, मगर सत्ता पाते ही अपनी विचारधारा के अनुसार उन्हें चलना ही है। इनकी चाल है कि एक्सपेरिमेंट करके देखो, अगर सफल हो गया तो उसे और अच्छी तरह लागू कर देते हैं। एक उम्मीद ये भी है कि जब-जब डिक्टेटरशिप बढ़ी है, उसकी विरोधी धारा भी आगे बढ़ी है। बेहतर है कि डरकर मरने की बजाय अपने भीतर ताकत समेटकर बोलकर मरे। इसलिए हमें एकजुट होकर इनके मंसूबों पर पानी फेरना ज़रूरी है।

भावना रघुवंशी (आगरा) ने कहा, स्त्री ही सबसे बड़ी क्रिएटर है। अब उसी पर फोकस हो गया है। ग्यारहवीं-बारहवीं के बच्चों के दिमाग जिस तरह होते हैं, उन्हें दूषित किया जा रहा है। इप्टा के लिए इस पर नाटक करने के लिए कन्टेन्ट बनाया जा सकता है, गीत लिखे जा सकते हैं। कुछ बुलेटनुमा नारे बनाए जा सकते हैं, जिससे महिलाओं के भीतर का डर, जो डिस्टर्बेन्स के कारण दिखता है, उसका जवाब हो। बच्चों को क्रिटिसाइज़ करने की बजाय उनके टीचर्स, दोस्तों से मनोवैज्ञानिक तौर पर बातचीत करें। हम वीडियो बनाकर, जिस भी प्लेटफॉर्म पर संभव हो, प्रस्तुत करें।

ज्योति मलिक (घाटशिला) ने सुझाव दिया कि अन्य संगठनों की भी सहायता ली जानी चाहिए। झारखंड में महिला-उत्पीड़न काफी कम है। इस क्षेत्र में इसतरह का चलन नहीं है। यह शांत क्षेत्र है। महिला अगर खुद आगे बढ़कर बात करे तो उसका ज़्यादा प्रभाव होगा। नाटकों में भी इसीतरह के कन्सेप्ट आने चाहिए।

सुचिता मुखर्जी (भिलाई) का कहना था, मनुस्मृति के समय से ही स्त्री को दबाया जाता रहा है। स्लम एरिया के ग्यारहवीं-बारहवीं के बच्चे आपस में मिलकर रहते हैं। छोटी जगह पर यह अच्छी बात होती है। हमें छोटी-छोटी स्किट्स और जनगीतों के माध्यम से प्रोटेस्ट करना चाहिए। नीतू अवस्थी ;आगराद्ध ने कहा कि हमें अपने घर और आसपास से शुरु करना चाहिए। बच्चों की जो परवरिश हो रही है, स्कूलों में भी जो बातें होती हैं, उसमें जेंडर संबंधी गलतियों पर टोकना ज़रूरी है। सोशल मीडिया बहुत अच्छा माध्यम है अपनी बात समझाने का। अंत में इप्टा के महासचिव राकेश ने सुझाव देते हुए कहा कि यह सिर्फ महिलाओं का मामला नहीं है। बल्कि समाज में पुरुषों का प्रमुख सेंसिटाइज़ेशन होना है।

बातचीत में निम्नलिखित बिंदु क्रियान्वयन के लिए सामने आए –

  1. बच्चों के बीच इस विषय पर काम करें।
  2. हम सब कन्टेन्ट क्रिएट कर सबके बीच साझा करें।
  3. हम पीएम को संबोधित करते हुए 5-5 पोस्टकार्ड लिखें – ‘हाँ, मैं बुल्लीबाई हूँ, मुझे नीलाम करो’, ‘मैं नीलाम होना चाहती/चाहता हूँ।’ अपने सभी परिचितों को भी इसमें शामिल करें।
  4. छोटे-छोटे स्किट और जनगीत के माध्यम से प्रोटेस्ट करना चाहिए।
  5. हमें अन्य समविचारी संगठनों के साथ जुड़कर पुरज़ोर विरोध करना चाहिए।
  6. ट्विटर पर ‘मी टू’ की तरह ‘मैं भी बुल्ली’ हैश टैग चलाया जा सकता है।

      (ज़ूम पर हुई चर्चा का संचालन और लिप्यांतरण उषा आठले ने किया)

उषा आठले रंगकर्मी और लेखिका हैं।

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