‘ग्वालबाड़े’ का मतलब क्या होता है प्रेमकुमार मणि जी? (डायरी 4 जून, 2022) 

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जातिसूचक शब्दों और अपशब्दों को सुनकर अन्य क्या महसूस करते हैं, मैं नहीं जानता। मैं तो अपनी बात कहता हूं। जब कोई व्यक्ति जातिसूचक शब्दों और अपशब्दों का उपयोग मेरे समक्ष करता है तो मुझे बुरा लगता है और मैं उसका विरोध करता हूं। कई बार ऐसा होता है जब मेरे घर के परिजन ऐसा करते हैं तब भी मैं अपना विरोध व्यक्त करता हूं। मेरे इन परिजनों में मेरी पत्नी रीतू भी है, जो जातिसूचक शब्दों और अपशब्दों का उपयोग करती है। जब मैं पटना में रहता हूं तो वह कभी ध्यान रखती है और कई बार ध्यान नहीं रखती है। मेरे पापा और मम्मी दोनों अनपढ़ हैं। उनके बारे में क्या टिप्पणी करूं। लेकिन जब मेरी पत्नी ऐसा व्यवहार करती है तब बहुत बुरा लगता है। फिर उसकी शैक्षणिक योग्यता का ख्याल आता है और मैं उसे समझाने की कोशिशें करता हूं।
तो मेरे परिजन तो कम शिक्षा या फिर शिक्षित नहीं होने की वजह से जातिसूचक शब्दों और अपशब्दों का उपयोग करते हैं, जो कि मेरे लिए बर्दाश्त के बाहर की बात होती है। लेकिन जरा सोचिए यदि कोई ऐसा व्यक्ति जातिसूचक शब्द/अपशब्द का उपयोग करे जिसकी समाज में एक प्रतिष्ठा है तो कैसा लगेगा? और वह भी तक जब वह व्यक्ति बहुजन चिंतक कहे जाने पर खुश होता हो।

प्रेमकुमार मणि ने अपने इस्तीफे में एक जगह लिखा है–'परिषद चुनाव में मुन्नी देवी को उतार कर आप समझते हैं कि कमाल कर दिया है। भगवतिया देवी और मुन्नी देवी का कार्ड पुराने समय में चलता था, जब जनता का अधिकांश निरक्षर था।राजशाही के जमाने में कोई अपने गुलाम को, तो कोई किसी भिश्ती को बादशाह बना देता था।

हां, मैं बात कर रहा हूं बिहार के प्रख्यात साहित्यकार और समालोचक (राजनीतिज्ञ नहीं, राजनीतिक विश्लेषक) प्रेमकुमार मणि की। अभी हाल ही में इन्होंने राजद से इस्तीफा दिया है। सोशल मीडिया पर खबरें आयी थीं। सामान्य तौर पर मैं बिहार की खबरों से परहेज करता हूं। वजह यह कि बिहार की अधिकांश खबरें नकारात्मक ही होती हैं। मसलन, कल शाम ही मेरे गृह शहर पटना से एक स्थानीय पत्रकार मित्र ने दो खबरें भेजी। एक तो यह कि पटना-गया रोड पर कल फिर स्कूटी पर सवार दो युवकों को अज्ञात वाहन ने कुचल दिया। इनमें से एक युवक की मौत हो गई और दूसरा गंभीर रूप से घायल हो गया। अभी छह दिन पहले ऐसी ही एक घटना में और इसी सड़क पर मेरे सगे चचेरे भाई शंभू के बड़े बेटे रोहित का इंतकाल हो गया था। दूसरी खबर इस बारे में थी कि बिहटा के डोमनिया मोड़ पर एक बेलगाम एंबुलेंस ने एक बच्चे को कुचल दिया। गौर करिए डोमनिया शब्द पर। आप सहज अनुमान लगा सकते हैं कि वहां किस जाति के लोग रहते होंगे। यह एक जातिसूचक शब्द है। इसका मतलब है कि यहां डोम जाति के लोग रहते हैं। डोम जाति के कुछ लोग बांसफोड़ सरनेम का उपयोग करते हैं।

मूल बात यह है कि प्रेमकुमार मणि को एक दलित महिला मुन्नी देवी रजक से ईर्ष्या के शिकार हैं। उनकी मानसिक स्थिति का आकलन उपरोक्त उद्धृत उनके इस्तीके के एक अंश से किया जा सकता है। लालू प्रसाद ने कैसा निर्णय लिया है, यह लालू प्रसाद जानें। कम से कम यह तो सच है कि राजनीति के मामले में प्रेमकुमार मणि उनके आगे कहीं नहीं टिकते। लेकिन उनके बहाने एक जाति समुदाय को अपशब्द कह रहे हैं।

तो मूल बात यह है कि प्रेमकुमार मणि ने अपने इस्तीफे में एक जगह लिखा है–’परिषद चुनाव में मुन्नी देवी को उतार कर आप समझते हैं कि कमाल कर दिया है। भगवतिया देवी और मुन्नी देवी का कार्ड पुराने समय में चलता था, जब जनता का अधिकांश निरक्षर था।राजशाही के जमाने में कोई अपने गुलाम को, तो कोई किसी भिश्ती को बादशाह बना देता था। यह सामंती रिवाज है। डॉ आंबेडकर ने एक जगह लिखा है द्विज लोग राजनीति में दलित-अछूतों के उन लोगों को आगे करते हैं जो दयनीय दिखते हैं। उनकी अशिक्षा और गरीबी से कथाएं गढ़ी जाती हैं और ये दयनीय लोग अच्छे चापलूस भी हो जाते हैं। फिर उनकी अशिक्षा और अनाप -शनाप वक्तव्यों का इस्तेमाल पूरे दलित समाज का मज़ाक उड़ाने में भी किया जाता है। इसलिए लालू जी आप नहीं जानते कि आपके इस निर्णय का स्वागत दलित समाज की तरफ से नहीं, आपके ग्वालबाड़े के एक कोने से ही क्यों हो रहा है?’
राजद एम्एलसी उम्मीदवार मुन्नी देवी रजक
प्रेमकुमार मणि के इस्तीफे के इस अंश को पढ़कर कोई भी आसानी से समझ सकता है कि वह लालू प्रसाद के किस निर्णय से इतने आहत हैं कि वह ‘ग्वालबाड़े’ जैसे अपशब्द का उपयोग कर रहे हैं। यह सभी जानते हैं कि ग्वाल का मतलब ग्वाला होता है और ग्वाला का मतलब यादव। यह वैसा ही है जैसे ब्राह्मण डोम जाति के लोगों की बस्ती को डोमपाड़ा कहते हैं। पटना में ही बिहार सरकार के राज्य मुख्यालय यानी सचिवालय और बिहार विधानसभा से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर एक बस्ती है। इसे डोमखाना कहा जाता है। मैं हमेशा यह सोचता हूं कि बिहार के शासकों को यह शब्द क्यों नहीं अखरता। क्या आपने कभी सुना है ब्राह्मणपाड़ा, राजपूतपाड़ा और भूमिहारपाड़ा जैसा शब्द?
मूल बात यह है कि प्रेमकुमार मणि को एक दलित महिला मुन्नी देवी रजक से ईर्ष्या के शिकार हैं। उनकी मानसिक स्थिति का आकलन उपरोक्त उद्धृत उनके इस्तीके के एक अंश से किया जा सकता है। लालू प्रसाद ने कैसा निर्णय लिया है, यह लालू प्रसाद जानें। कम से कम यह तो सच है कि राजनीति के मामले में प्रेमकुमार मणि उनके आगे कहीं नहीं टिकते। लेकिन उनके बहाने एक जाति समुदाय को अपशब्द कह रहे हैं।
निस्संदेह वह यदि मेरे परिजनों की तरह निरक्षर होते तो उनको समझाता कि जातिसूचक शब्द और अपशब्दों का उपयोग गलत है। हम सभी इंसान हैं। फिर चाहे हम किसी भी नस्ल, धर्म, लिंग, जाति के क्यों न हों। सभी के साथ हमें मनुष्यवत व्यवहार करना चाहिए। जो ऐसा नहीं करते, उनके व्यवहार को पशुवत व्यवहार कहते हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि ऐसा इसलिए होता है कि आप जो व्यक्तित्व प्रदर्शित करते हैं उसके उलट आपके अवचेतन में आपकी सच्चाई पलती है और ठेठ प्यार या गुस्से या ईर्ष्या के समय फेंचकुर की तरह बाहर आ जाती है।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

हमारी खोई हुई प्रतिभा से रू-ब-रू कराती हुई भूलन द मेज..

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