हिंदुत्ववादियों से मुक्त करने की ज़रुरत है बोधगया को

इं.  राजेन्द्र प्रसाद

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क्या कारण है कि बोधगया जहां से बुद्ध को ज्ञान मिला उस नगरी पर हिंदुत्ववादियों और आरएसएस ने कब्जा कर लिया है। कुछ तो बकायदा चीवर धारण कर उनके नाम पर हिंदुत्ववाद को फैलाने में लगे हैं। बुद्ध भारत में पैदा हुए थे, लेकिन कालांतर में, भारत में ही उनकी जड़ें काट दी गईं। वे भारत के बाहर विकसित हुए। बोधगया एक धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी है। इसी नगरी से गौतम बुद्ध को सम्यक ज्ञान और दृष्टि मिली थी। यह वही स्थान है, जहाँ से बुद्ध के ज्ञान का प्रकाश सारे विश्व में फैला था। यही वह समय था जब भारत को विश्वगुरु कहा गया। बुद्ध के कारण ही भारत को विश्वगुरु कहा गया। यह शहर भारत को विश्व में विशिष्टता प्रदान करती है।

विश्व भर से बड़ी संख्या में लोग खासकर बौद्ध मत के अनुयायी बोधगया आते हैं। बोधगया ने मानव मुक्ति का संदेश दिया। पीड़ितों को संघर्ष करने का संदेश दिया। प्रबुद्ध लोगों को मानवता की बेहतरी के लिए कार्य करने का आह्वान किया। पीड़ित मानवता के उद्धार की आवाज उठाई। उन्होंने जाति और वर्ण को अस्वीकार किया। इसके विरुद्ध लड़ाई लड़ी। इसी बुद्ध को हिंदुत्वादी संगठन विष्णु और कृष्ण का अवतार बनाकर बोधगया में प्रचारित प्रसारित करते हैं। सार्वजनिक स्थलों पर होर्डिंग लगाते हैं। इसपर बौद्ध संगठनों की चुप्पी आश्चर्य में डालती है। बाबासाहेब आंबेडकर ने बौद्ध धम्म स्वीकार करते समय बौद्धों को 22 प्रतिज्ञाएं दिलवाई थी। बुद्ध और उनका धम्म नामक पुस्तक लिखी। बोधगया में जहाँ इतने प्रबुद्ध बौद्ध रहते हैं वहाँ बाबासाहेब की 22 प्रतिज्ञाएं कहीं नजर नहीं आती है, जबकि वहाँ बुद्ध को विकृत करते हुए हिंदुत्ववादियों के पोस्टर दिखाई पड़ते हैं। यह छोटी बात नहीं है। यह गौतम बुद्ध का भारी अपमान करना है। इसपर बौद्धजन मूकदर्शक बने हुए हैं। वहाँ चुप्पी वाली शांति छाई हुई है।

जाति व्यवस्था ने अकेले जितना भारत का नुकसान किया है, वह अन्य सभी नुकसानों को मिलाकर भी बड़ा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन की समस्या दलितों की सबसे बड़ी समस्या है। समस्याओं के निदान के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन स्थिति नौ दिन चले अढ़ाई कोस... वाली बनी रहती है।

लोकतंत्र की प्रणाली भी बौद्ध संघ की है। जिसमें समता, स्वतंत्रता और भ्रातृत्व ही आदर्श समाज है। जिसमें व्यष्टि और समष्टि के हितों का आदर्श संतुलन हो। प्रत्येक व्यक्ति में अंतर्निहित शक्तियों का सम्पूर्ण विकास हो, जिसमें षोषण न हो, उसके विकास के मार्ग में कोई अवरोध न हो। समाज की समृद्धि इससे ही होगी। यही हमारे संविधान का आदर्श वाक्य भी है।

इस जन्मना जातीय भावना से गौतम बुद्ध टकराए। उन्होंने चिन्तन, वाणी, आचरण की पवित्रता और एकरुपता को बड़प्पन का आधार माना। चिन्तन, वाणी और आचरण यानी कार्य की पवित्रता और एकरुपता को आंबेडकर और गांधी ने भी दुहराया। कितने हैं जो इस कसौटी पर खरे उतरेंगे? कितने हैं जो इन आधारों पर सम्मान और प्रतिष्ठा के अधिकारी हैं? हम जातिवाद के इस घिनौने कोढ़ को पालते हुए जनतंत्र की बातें करते हैं। जातिवाद और लोकतंत्र साथ नहीं चल सकते। हिंदुत्ववादी यानी जाति वर्ण के घोर समर्थक न केवल असमानतावाद और घृणा फैला रहे हैं बल्कि लोकतंत्र की जड़ों पर सीधे प्रहार कर रहे हैं। आज का सत्ता प्रतिष्ठान इसमें एक बड़े उत्प्रेरक का काम कर रहा है।

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हमारा मस्तिष्क जैसे अलग-अलग कोठों में बंटा है। एक तरफ रूढ़िगत संस्कार है, दूसरी तरफ मानवतावादी विचार। एक ओर आदर्श, दूसरी ओर लूट-खसोट की पाशविक वृत्ति। कहीं, इनमें एकसूत्रता नहीं है, मेल नहीं है। हमारे लोकतंत्र और संविधान के लिए दृढ़ आधार, न हमारे दिलों में बन पाया है, न दिमाग में। हमारा लोकतंत्र और जातिवाद क्या साथ-साथ टिक सकते हैं? लेकिन एक तरफ हम स्वार्थवश लोकतंत्र की दुहाई देते हैं और दूसरी तरफ जातिवाद में पूर्ण विश्वास करते हैं। परिणाम यह होता है कि जाति पहले आती है, लोकतंत्र पीछे खिसकता चलता है।

भारत की जाति व्यवस्था आज एक भयंकर कोढ़ की तरह है, जो खत्म होने की बजाय तेजी से फैल रही है। हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था के नाम पर लोग दलित और अछूत बनाए गए हैं। जिस समाज का भगवान सुअर का अवतार ले सकता है, वही समाज आदमी से इतनी घृणा करे कि उसे अछूत बना दे। यह कैसा समाज है? यह कैसा धर्म है? यह कैसा हिंदुत्व है? यह कैसी विडंबना है? जाति व्यवस्था ने अकेले जितना भारत का नुकसान किया है, वह अन्य सभी नुकसानों को मिलाकर भी बड़ा है। शिक्षा, स्वास्थ्य और जमीन की समस्या दलितों की सबसे बड़ी समस्या है। समस्याओं के निदान के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन स्थिति नौ दिन चले अढ़ाई कोस… वाली बनी रहती है।

राष्ट्र की एकता, सामाजिक विषमता और शैक्षणिक-आर्थिक असंतुलन मिटाने से होगी। यह हिंदुत्व के भौड़े प्रदर्शन से नहीं हो सकती है। अस्त्र-शस्त्र लेकर चलने, लोगों को आतंकित करने और हिंदू-हिंदू चिल्लाने से नहीं हो सकती है। दलित और पिछड़े समुदाय राष्ट्रीय एकता की सबसे कमजोर कड़ी है। जनतंत्र के जंजीर की मजबूती इसके कड़ियों की मजबूती से होती है। लेकिन कुछ हिंदुत्ववादी कमजोर कड़ियों को मजबूत बनाने की बजाय और कमजोर करने में लगे रहते हैं। ऐसे में जंजीर की यह कमजोर कड़ी बीच से ही टूट सकती है। ब्राह्मणवाद ने अपने निहित स्वार्थ के लिए समाज को जातियों और लघु संप्रदायों में बांटकर उसके विकास और एकीकरण को प्रभावित किया है। हमारी लम्बी दासता का मूल कारण यही आन्तरिक निर्बलता रही है।

कहा जाता है कि हमारे देश में बड़ी गहरी धर्म भावना है। लेकिन जिन्हें मानव की मानवता में आस्था नहीं, उनका धर्म-प्रेम प्रवंचना है। चींटी को शक्कर खिलाने और कबूतर को दाना डालने की थोथी धर्म भावना के अन्दर से मानव के प्रति प्रतिष्ठा का भाव नहीं निकल सकता। जिन्हें समाज में प्रतिष्ठा और आर्थिक संसाधनों से वंचित कर रखा गया है, वे भारत की तीन-चौथाई आबादी हैं। उनकी समस्याओं के समाधान आज भी प्रश्नचिन्ह के रूप में खड़ा है।

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जब तक शिक्षा प्रणाली कई स्तरीय रहेगी, तब तक शिक्षा प्राप्त करना बहुत मंहगा होगा। शिक्षा प्रणाली को जनतांत्रिक वृत्ति पर आधारित बनाना होगा। सबके लिए एकस्तरीय और एक समान शिक्षा देनी होगी। समान अवसर की बात हमारे संविधान में भले ही प्रतिष्ठित हो, पर हमारी शिक्षा प्रणाली, समान अवसर के दावे को खारिज करती है। शिक्षा, बिल्कुल एक प्रकार की हो और व्यवस्था ऐसी हो कि विद्यार्थी साथ-साथ रहकर पढ़ें और एकसाथ भोजन करें। यदि एक समान शिक्षा की व्यवस्था हो जाए, तो एक पीढ़ी के अन्दर हम उस लोकतांत्रिक भारत की झलक देख सकते हैं, जिसकी चर्चा हमारे संविधान में है, हमारे संविधान की प्रस्तावना में है। वैदिक आरक्षणधारी लोग, पिछड़े वर्गों के उन थोड़ी-सी संवैधानिक सुविधाओं की ओर, इस तरह संकेत करते हैं जैसे उन्हें दया की भीख दी जा रही है। जबकि वैदिक आरक्षण के रूप में वे स्वयं बहुत बड़े भीख का जन्म से उपभोग करते हैं। वैदिक आरक्षण के कारण ही संवैधानिक आरक्षण लाया गया। संवैधानिक आरक्षण वैदिक आरक्षण की बहुत छोटी-सी भरपाई है। हजारों साल से चले आ रहे जन्म और जाति का वैदिक आरक्षण कब खत्म होगा?

विचारों के कथनी और करनी में एकरुपता कैसे आवे? जो सुविधाओं से वंचित नहीं हैं, जिन्हें समाज में जन्मगत सम्मान है, जो अपेक्षाकृत संपन्न हैं, उन्हें विचारों के उस बन्दीगृह से कैसे बाहर निकाला जाय? जो अपने को बन्दी की बजाय होशियार और सबसे बड़ा ज्ञानवान समझते हैं। दूसरी ओर जो साधनहीन हैं, तिरस्कृत हैं, शिक्षा और चिन्तन के सामर्थ्य से, जो वंचित हैं, इस चक्र को कैसे तोड़ेंगे? जब तक समाज में मानसिक रूप से, सामाजिक प्रतिष्ठा की, अपेक्षाकृत सम्पन्नता की, जन्मगत मर्यादाओं की, वर्चस्वता बनी रहेगी, तब तक नये समाज का निर्माण दिवास्वप्न ही रहेगा। शिक्षा और भूमि सुधार सम्बन्धी नियम यथास्थिति में पड़े हुए है। गरीबों के लिए कानून भी बने हैं, फिर भी उन पर अमल नहीं हुआ है। ये हाथी के दांत जैसे बन गए या बना दिए गए।

अतः इस जाति व्यवस्था को मिटाना सबके हित में है। अगर जात-पात को नहीं मिटाया जाता है, अगर इसकी क्रूरता बढत़ी है तो इससे भारत की स्वतंत्रता के लिए इतिहास की पुनरावृत्ति होने का खतरा है। राष्ट्रीय हित में वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था का उन्मूलन करने की आवश्यकता है। इसके लिए लोगों को तैयार करना होगा। समाज और सरकार को एक अभियान चलाना होगा। यदि सबको एक समान, एक-साथ शिक्षा दिया जाय और सजातीय शादी पर प्रतिबंध लगा दिया जाय, सजातीय शादी करने वाले को दंडित किया जाय, उसे कोई सरकारी पद नहीं दिया जाय तो इसमें शक नहीं है कि 40-50 साल के अन्दर भारतीय समाज से जातीय भेदभाव खत्म न हो जाए। इस प्रकार बुद्ध का एक समतावादी समाज, लोकतांत्रिक समाज बनाया जा सकता है। राष्ट्र को शक्ति देने के लिए आधुनिक समाज का निर्माण करने के लिए वर्ण व्यवस्था और जातिवाद दोनों को मिटाना होगा। इससे जाति आधारित भेदभाव और अस्पृश्यता का भी अंत हो जाएगा। यही तो बुद्ध ने चाहा था। यही तो बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था। क्या देश के प्रबुद्ध लोग, बोधगया को हिंदुत्ववादियों से मुक्त कराएंगे और बुद्ध के उपदेशों को अमल में लाने का प्रयास करेंगे?

राजेन्द्र प्रसाद लेखक हैं और पटना में रहते हैं।

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