Friday, May 24, 2024
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पानी की ‘ब्यूटी’ का इस्तेमाल करने वाला सिनेमा पानी के प्रति ड्यूटी’ कब निभाएगा

फिल्म आया सावन झूम के में आनंद बक्शी का लिखा हुआ एक गीत है, ये शमा तो जली रोशनी के लिए, इस शमा से कहीं आग लग जाए तो समा क्या करे? इसी गाने का आगे जो अंतरा है वह हवा और पानी की  स्वाभाविकता के बारे में इशारा करता है, गाने के बोल कुछ […]

फिल्म आया सावन झूम के में आनंद बक्शी का लिखा हुआ एक गीत है, ये शमा तो जली रोशनी के लिए, इस शमा से कहीं आग लग जाए तो समा क्या करे? इसी गाने का आगे जो अंतरा है वह हवा और पानी की  स्वाभाविकता के बारे में इशारा करता है, गाने के बोल कुछ इस तरह हैं:

ये हवा तो चली सांस ले हर कोई/ घर किसी का उजड़ जाए आंधी में तो यह हवा क्या करे ?

चल के पूरब से ठंडी हवा आ गई/उठ के पर्वत से काली घटा छा गई/ ये घटा तो उठी प्यास सब की बुझे

आशियां पे किसी के गिरी बिजलियां तो यह घटा क्या करे?

वास्तव में हवा सांस लेने के लिए और पानी प्यास बुझाने के लिए प्रकृति प्रदत्त अनमोल उपहार है लेकिन हमने इनकी जो दुर्दशा की है उसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं। इस लेख में हम सिनेमा में पानी के रूपक के रूप में प्रयोग पर विचार करेंगे।

पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व लिए जल एक अपरिहार्य तत्व है। भारतवर्ष में हजारों नदियां हैं, झील, ताल, तालाब और झरने अपनी खूबसूरती के साथ यत्र-तत्र विद्यमान हैं लेकिन भारतीय सिनेमा में पानी और उससे जुड़े मुद्दों को बहुत कम स्पेस मिला है। हालांकि पानी और सिनेमा का हमेशा से करीबी रिश्ता रहा है लेकिन वह पानी के रोमांटिक पक्ष पर ही ज्यादा केंद्रित रहा है। भारतीय सिनेमा में जब हम हिन्दी भाषा से अलग अन्य भाषाओं के सिनेमा को देखते हैं तो पता चलता है कि सामाजिक और पर्यावरणीय विषयों पर कुछ गंभीर निर्देशकों ने सार्थक फिल्में बनाई हैं जिनमे ऋत्विक घटक (बंगाल), जानु बरुआ (असम), रामू करियात (केरल) प्रमुख हैं। ये निर्देशक बंगाल, असम और केरल जैसे प्रदेशों से आते हैं, जहां प्रचुर वर्षा के कारण जल संसाधन पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। झील, नदियां और समुद्र की उपलब्धता इन प्रदेशों की खूबसूरती में विशेष योगदान देते है। व्यक्ति अपने परिवेश का ही उत्पाद होता है और फिल्मकार एक व्यक्ति के तौर पर अपने पर्यावरण को अपनी रचनाओं मे प्रस्तुत करने का कार्य करता है। भारत को एक कृषि प्रधान देश कहा जाता है परंतु यहाँ की कृषि मानसून पर निर्भर है यह भी एक तथ्य है। जलवायु में आ रहे निर्णायक परिवर्तनों के कारण पिछले एक दशकों से कृषकों को कृषि कार्य में लगातार नुकसान उठाना पड़ रहा है। असम एक कृषि प्रधान प्रदेश है और जानु बरुआ और उनके प्रदेश के किसान प्रकृति-प्रदत्त मानसून, बारिश और बाढ़ को स्वीकार कर अपना जीवन जीते हैं। केरल के फिल्मकार जी. अरविंदन की फिल्में चेमीन (Chemeen) और ‘द्वीप’ जल से जुड़े समुदायों, उनकी रोजमर्रा की ज़िंदगी और सोच के दायरों को परदे पर प्रस्तुत करती हैं।

ऋत्विक घटक की फिल्में – अजांत्रिक (1957), तिताश एकटा नदीर नाम (1972) आदित्य माला बर्मन के उपन्यासों पर आधारित थीं। इन दोनों फिल्मों में पानी मुख्य तत्व था। गुरुदत्त की फिल्म जाल (1951) में  गोवा के समुद्र तटीय क्षेत्र का प्रभावी फिल्मांकन हुआ है। बिमल रॉय ने अपनी फिल्मों के गानों में पानी के सौन्दर्य का काव्यात्मक चित्रण किया। शंभू मित्र और अमित मित्र निर्देशित और राजकपूर अभिनीत फिल्म जागते रहो (1957) में एक रात में सिमटी फिल्म की कहानी एक ग्रामीण किसान के अनजान शहर कलकत्ता में एक रात में पानी की खोज से शुरू होती है और जब सुबह होती है तो नरगिस प्यासे राजकपूर को गागर से जी भर के पानी पिला रही होती हैं और गीत बजता सुनाई देता है –जागो मोहन प्यारे। यह पानी के रूपक पर केंद्रित अत्यंत महत्वपूर्ण फिल्म है जो गाँव-शहर के लोगों की सोच, असली-नकली चोर की बाइनरी पर दर्शकों को सोचने को विवश करती है। फिल्म श्री 420 का गाना प्यार हुआ इकरार हुआ  बारिश में एक छाते तले आधे बचते-आधे भींगते नरगिस और राजकपूर रोमांटिक युगल के अमर प्रतीक बन गये। राजकपूर की फिल्म बरसात, सत्यम शिवम सुंदरम से लेकर हिना तक में यह दर्शन स्थापित करने का प्रयास किया गया है कि पहाड़ों, सुदूर गांवों और आदिवासी समुदायों के लोग सीधे-सच्चे और मानवीय होते हैं। इन समुदायों में लड़कियों और महिलाओं को ज्यादा बराबरी और आजादी परंपरागत रूप से मिली हुई है। शहरों से इन स्थानों पर जाने वाले उच्च एवं मध्यम वर्ग के नौजवान यहाँ की भोली-भाली लड़कियों को अपने जाल में फँसाते हैं। बरसात से राम तेरी गंगा मैली तक मैदानों और शहरों में रहने वाले लोग इन्हें ठगते रहते हैं। ये लड़कियां पहाड़ से निकलने वाली नदियों की धाराओं की तरह स्वच्छ, धवल और पवित्र होती हैं। राजकपूर इस रूपक को लगातार चित्रित करते हैं।

पानी के रूपक का कई तरीकों से सिनेमा मे उपयोग हुआ है। कहीं वह जीवन का प्रतीक है तो कहीं संदेशवाहक की भूमिका में है। कहीं प्रेम और सौन्दर्य को प्रकट करते हुए जीवन को आकर्षण से भर देता है। पानी की अधिकता मुश्किलें पैदा करती है तो उसकी कमी से जनजीवन अस्त-व्यस्त होने लगता है। गंगा को पवित्र और रोगनाशिनी माना गया है लेकिन एक समय में बिहार मे अपराधियों को सबक सिखाने के लिए तेजाब को ही गंगाजल का नाम दे दिया गया जो पानी को सबसे खतरनाक रूपक बनकर भारतीय समाज के सामने लाता है। बंगाल, असम और केरल से लेकर देश के कोने-कोने में  पानी के अलग रंग हैं जिन्हें  फ़िल्मकारों ने अपने अपने तरीके से फिल्मी परदे पर प्रस्तुत करने का काम किया है।

पानी के वैभव को दिखाती फिल्में 

बरसात, नदी, झील, झरने, ताल और तालाब को लेकर पानी के रूपक पर अनेक तरह से फिल्मांकन किये गए हैं। कुछ प्रमुख फिल्में निम्न प्रकार हैं: बरसात (1949), बरसात की रात (1960), आवारा (1951), तीसरी कसम (1966), जिस देश में गंगा बहती है (1961), संगम (1964), गाइड (1965), दो बूंद पानी (1971), जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली (1971), राम तेरी गंगा मैली(1985), गंगा की सौगंध (1978), सत्यम शिवम सुंदरम (1978), मिलन (1967), गंगा जमुना सरस्वती (1988), हिना (1991), मर्द (1985), डकैत (1987), कहो ना प्यार है (2000), चेन्नई एक्सप्रेस (2013), समुंदर (1986), सूखा (1983), चिरूथा (2007), जल (2013), गंगाजल (2003), गौतम गोविंदा (1979), लगान (2001), तारा: द जर्नी ऑफ लव & पैशन (2013), रेनकोट (2000), पार (1984), नदिया के पार (1982), स्प्रिंग थन्डर (2018), मदर इंडिया (1957), भोपाल एक्सप्रेस (1999), वाटर (2005), कौन कितने पानी में (2015), वेलडन अब्बा (2010), जल (1967), तुम मिले (2009), मोहनजोदाडो (2016),  कड़वी हवा (2017), केदारनाथ (2018), सोहिनी महिवाल (1984), चम्बल की कसम (1980), लाइफ ऑफ पाई (2012), बजरंगी भाईजान (2015), 1869 (2020)। चेलुवी (1992), सावन की घटा (1966), अमर प्रेम (1972 ), पाथेर पांचाली (1955), जलसा घर (1958), अजांत्रिक (1957), तिताश एकटा नदीर नाम (1972), सुबर्णरेखा (1965), मेघे ढाका तारा (1960), सागर संगमे (1958) आदि ऐसी फिल्में हैं जिनमें पानी का रूपक बहुत शिद्दत से व्यक्त हुये हैं।

जानू बरुआ की फिल्मों में पानी के रूपक

जानू बरुआ फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट पुणे से ग्रेजुएट हैं और मूलतः आसाम के रहने वाले हैं। आसाम लंबे समय तक उग्रवाद, हिंसा, आंदोलनों और अस्थिरता का शिकार रहा है। हर साल आने वाली बाढ़ और ब्रह्मपुत्र नदी के सैलाब से लाखों लोगों के जीवन में तबाही और बर्बादी आती है। जानू बरुआ इन्हीं परिस्थितियों के बीच अपना सिनेमा रचते हैं, जिनमें बादल, बरसात, विस्थापन और पानी के विभिन्न रूपक सामने आते हैं। वे अपनी फिल्म सागोरोलोई बोहु दूर (It’s Long Way to the Sea-1995) में वे एक वृद्ध और उसके अनाथ पोते की कहानी कहते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसे दो जन के परिवार में गरीबी और पैसे की कमी से जीवन कठिन है। वृद्ध का छोटा बेटा एक सफल आदमी है और गुवाहाटी में रहता है। पोते की शिक्षा और अच्छे भविष्य की उम्मीद में दादा अपने पोते को गुवाहाटी लेकर जाता है और उसे वहाँ छोड़कर अकेले वापस आ जाता है। कुछ दिन बाद दादा को एक पत्र मिलता है कि उसका पोता शहर में दुखी है। वह शहर जाता है और यह जानकर दुखी होता है कि उसके पोते के साथ छोटी बहू द्वारा नौकर जैसा व्यवहार किया जा रहा है। वह अपने पोते के भविष्य को संवारने के संकल्प के साथ अपने गाँव लौट आता है। इस फिल्म में ब्रह्मपुत्र नदी पोते के जीवन की तरह भूरी और कीचड़युक्त दिखती है। संकल्प और उम्मीद के क्षणों में नदी और उसका पानी सुनहरा, दिन चमकदार होकर परदे पर उभरते हैं। बरुआ की फिल्मों में जीवन अपनी सम्पूर्ण संश्लिष्टताओं के साथ सामने आता है जिसमें पानी की विभिन्न छबियाँ अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।

जी. अरविंदन की फिल्म इसथापन (Esthapan-Stephen1979) एक आवारा मछुआरे स्टीफन की कहानी है जिसे चर्च के लोग मानते हैं कि वह बुरी शक्तियों (devil) के साथ यात्रा करता है। परंतु वह वास्तव मे एक निर्दोष, मानवीय व्यक्ति है जो लोगों को जादुई घटनाओं के बारे में सलाह देने की क्षमता रखता है। अरविंदन ने उसे ईसा मसीह की तरह एक प्राफेट के रूप में प्रस्तुत किया है। फिल्म के आरंभ में उसे समुद्र किनारे इस तरह टहलते हुए दिखाया गया है जिससे भ्रम होता है कि वह लहरों पर चलकर समुद्र पार कर रहा है। उसके बारे मे लोगों के बीच तरह-तरह की विरोधाभाषी बातें प्रचलित हैं। पानी का प्रयोग इस फिल्म में एक ईश्वरीय शक्ति की तरह प्रस्तुत की गई है। केरल प्रदेश में समुद्र किनारे मछुआरों की बस्ती में रहने वाले एक फक्कड़ व्यक्ति की कहानी के माध्यम से निर्देशक ने समुद्र और उसके आसपास के जीवन को परदे पर प्रस्तुत किया है।

विश्व सिनेमा में पानी

फिल्मों पर गंभीर लेखन करने वाले पत्रकार नमन रामचंद्रन ने फिल्मों के पानी के रूपक के इस्तेमाल पर महत्वपूर्ण लेख लिखा है। भारत के साथ ही दुनिया के कई देशों के फ़िल्मकारों ने नदी और पानी के रूपक को खूबसूरती से इस्तेमाल किया है। इस संदर्भ में हम फ्रांसिस फोर्ड कोपोला के अपोकैलिप्स नाऊ (1979) और वरनेर हरजोग के फिट्जकरालडो (1982) को देख सकते हैं जो नदी के रुपक को चित्रित करती प्रमुख फिल्में हैं। जीन रेनायर की रिवर (1951) रुमर गोड्डाण के उपन्यास पर आधारित है। ब्रिटिश कालीन बंगाल में गंगा तट  पर रहने वाले अंग्रेजों को चित्रित करती यह भव्य टेक्निकलर फिल्म है। हरजोग की दो अन्य फिल्में अगिररे और रैथ ऑफ गॉड (Aguirre, the wrath of God 1972) है। इस फिल्म में क्लाउस किंसकी के नेतृत्व मे जवानों का एक समूह सोने के शहर (city of gold) अल डोराडो की तलाश में अमेज़न की यात्रा करता है। निर्देशक कार्टिस हैन्सन की फिल्म एल.. कॉन्फिडेंशियल पानी के रूपक पर एक बेहतरीन फिल्म है जहां मेरिल स्ट्रिप एक रैफ्टमास्टर की भूमिका में हैं जो एक व्हाइट वाटर अभियान के दौरान हत्यारों की एक जोड़ी का सामना करती है। जान बोरमान  की फिल्म (Deliverance 1972) एक क्लासिक फिल्म है जिसमें एक बड़े शहर के चार पुरुष एक नदी में उतरते हैं और योकल के साथ एक खराब स्थान पर पहुँच जाते हैं। लाइफ ऑफ पाई और अवतार: द वे ऑफ वाटर हॉलिवुड की पानी के रुपक को लेकर बनी जरूरी फिल्में हैं।

लोकनाथ राजाराम की फिल्म H2O (2002) में खबरों में नदी की बात आती है। इस फिल्म में उपेन्द्र (कन्नड) और प्रभु देवा (तमिल) में कावेरी नामक लड़की के प्यार को जीतने की होड़ होती है। कर्नाटक और तमिलनाडु में कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद का पुराना इतिहास है। इस फिल्म में दो लड़के, जो दो अलग गांवों के रहने वाले हैं, वे एक लड़की कावेरी के प्यार के लिए झगड़ा करते हैं। कावेरी नदी हो या लड़की विवाद का कारण है, इसलिए इस फिल्म का विरोध कई समूहों द्वारा किया गया। तमिल भाषा में इस फिल्म को H2O कावेरी नाम से रिलीज किया गया। दो राज्यों के बीच पानी के बंटवारे के विवाद को फिल्म में कावेरी नाम की लड़की के लिए विवाद के रूपक के माध्यम से सिनेमाई परदे पर बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत करने का काम फिल्मकार ने किया है। हिन्दी में इस फिल्म को दिल की धड़कन नाम से रिलीज किया गया। निर्देशक का यह मत था कि किसी भी झगड़े का समाधान आपसी संवाद और प्यार से किया जा सकता है, न कि लड़ाई-झगड़े और युद्ध से। इस फिल्म से यही संदेश देने का काम किया गया है।

भारतीय सिनेमा इतिहास बिल्कुल सपाट नहीं लेकिन उपेक्षित 

दृश्य-श्रव्य माध्यम होने के नाते सिनेमा किसी भी मुद्दे को प्रभावी तरीके से आम लोगों तक पहुँचाने का सबसे सशक्त माध्यम है। भारतीय सिनेमा में सामाजिक मुद्दों को लेकर अच्छी फिल्में बनती रही हैं। पानी की महत्ता को सिनेमा के परदे पर सबसे पहले निर्देशक और पटकथा लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने वर्ष 1971 में दो बूँद पानी नाम से फिल्म बनाकर प्रस्तुत करने का काम किया था। यह फिल्म राजस्थान की पृष्ठभूमि और पानी की कमी पर आधारित थी। कैफ़ी आजमी के लिखे दो गीत पानी से जुड़े दो अलग आयामों को सामने लाते हैं। एक गीत में सिमी ग्रेवाल अपनी संगी महिलाओं के साथ गागर लेकर पानी भरने कुएं की तरफ जा रही हैं और एक सामूहिक गीत खुशी के भाव से गा रही हैं- पीतल की मेरी गागरी, दिल्ली से मोल मैंने मंगाई रे, पाँवों मे घुँघरू बांध के अब पनिया भरन हम जाई रे दूसरा गीत सूखे और पानी की कमी से जूझते राजस्थान के एक गाँव का हालात बयान करता हुआ मार्मिक गीत है अपने वतन में आज दो बूंद पानी नहीं, तो यहाँ ज़िंदगानी नहीं । गीत के दृश्य में गाँव के लोग अपना घर छोड़कर जा रहे हैं इस उम्मीद के साथ कि जब पानी आएगा तो फिर वापस आएंगे। अपनी मातृभूमि को छोड़ के जाना आसान नहीं होता लेकिन जीवन रुकता कहाँ है। वह तो एक बहती नदी के समान निरंतर प्रवाहमान होता है। पंजाब में सतलज और ब्यास नदी के संगम पर स्थित हरिके बैराज से इंदिरा नहर निकालकर राजस्थान के उत्तर-पश्चिम भाग के चुरू, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, जैसलमेर, बाड़मेर और नागौर जिलों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित कराई गई। इसे राजस्थान की मरु गंगा भी कहते हैं। फिल्म दो बूंद पानी का निर्माण गंग नहर के निर्माण के समय ही हुआ। यह पानी के लिए जद्दोजहद और पलायन, अपनी धरती से प्यार और दायित्व निभाने जैसे मुद्दों को लेकर बनी एक संदेशपरक फिल्म है। इस फिल्म को राष्ट्रीय अखंडता के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था

अफसोस की बात है कि 1971 के बाद से वर्ष 2012 तक राम तेरी गंगा मैली को छोड़कर कोई फिल्म पानी के रूपक पर नहीं आई। वर्ष 2013 और फिर वर्ष 2014 में पानी की समस्या पर क्रमशः दो फिल्में कौन कितने पानी में और जल रिलीज हुई। कौन कितने पानी में फिल्म का निर्देशन नील माधव पांडा ने किया था जबकि जल के निर्देशक थे गिरीश मल्लिक। गिरीश मल्लिक की यह पहली फिल्म थी। जल को कच्छ के रण में फिल्माया गया था। फिल्म की कहानी बक्का नाम के एक युवक के इर्द-गिर्द घूमती है। बक्का के पास दैविय शक्ति है जिसके दम पर वह रेगिस्तान में पानी खोज सकता है। वह कच्छ के रण में रहता है और अपनी शक्ति के जरिये अपने गाँव की पानी की किल्लत को खत्म करता है।

पानी की किल्लत पर कुछ डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है जिनमें एक है – थर्स्टी सिटी (प्यासा शहर)। वर्ष 2013 में निखिल सबलानिया ने दिल्ली में पानी की किल्लत और पानी के लिये श्रमिक वर्ग के संघर्ष को इस फिल्म के माध्यम से दिखाने का प्रयास किया था। पानी के किल्लत से जूझते देश के कई हिस्सों को देखकर, वहाँ के लोगों पानी के लिए किये जा रहे संघर्षों को महसूस करने के बाद कुछ निर्देशकों ने इस विषय पर फिल्में बनानी शुरू कीं जिनमे नील माधव पांडा प्रमुख हैं। कड़वी हवा जैसी संवेदनशील फिल्म बनाने वाले पांडा एक इंटरव्यू मे कहते हैं कि, ‘मैं ओडिशा के कालाहांडी-बालांगीर क्षेत्र का रहने वाला हूँ। वहाँ मैंने पानी की किल्लत को देखा और पानी के लिये यहाँ के लोग किस हद तक जाते हैं इससे भी रू-ब-रू हुआ। वहीं से मुझे खयाल आया कि पानी की किल्लत पर फिल्म बनानी चाहिए।’

कौन कितने पानी में फिल्म में दो गाँवों ऊपरी और बैरी की कहानी है। ऊपरी गाँव में एक राजा (सौरभ शुक्ला) और ऊँची जाति के लोग रहते हैं। यह गाँव ऊँचे क्षेत्र में है। गाँव के लोग आलसी हैं और वे पानी को सहेजकर नहीं रखते। बैरी गाँव में पिछड़ी जाति के लोग रहते हैं लेकिन वे जागरूक हैं और पानी को सहेजकर रखते हैं। एक वक्त ऐसा आता है कि ऊँची जाति वालों के गाँव में पानी की घोर किल्लत आ जाती है जबकि पिछड़ी जाति वालों के गाँव में पानी की बहुलता और सुख-समृद्धि रहती है। बैरी गाँव से संसाधन पाने के लिये ऊपरी गाँव का राजा किस तरह छल-प्रपंच करता है, यही है कहानी। फिल्म का संदेश यह है कि अगर हम पानी को सहेजकर नहीं रखेंगे तो पानी की किल्लत से हमें जूझना पड़ेगा।

निर्देशक का मानना है कि पानी की किल्लत की सबसे अधिक कीमत गरीबों को ही चुकानी पड़ती है क्योंकि अमीर तो पानी खरीदकर भी पी लेते हैं लेकिन गरीबों को दो जून की रोटी बमुश्किल मिल पाती है। वे पानी कैसे खरीदकर पी सकते हैं।

प्रख्यात फिल्म निर्देशक शेखर कपूर भी पानी की समस्या पर फिल्म बनाना चाहते हैं जिसका शीर्षक भी है पानी। फिल्म की टैगलाइन है-जब कुआँ सूख जायेगा तब हम पानी की कीमत समझेंगे। फिल्म की कहानी वर्ष 2040 के कालखंड में बुनी गयी है जब मुंबई के एक क्षेत्र में पानी नहीं है और दूसरे क्षेत्र में पानी है। पानी के लिये जंग छिड़ती है और इसी जंग में प्रेम पनपता और पलता है। फिल्म के प्रोमोशन के लिए जारी पोस्टर में एक व्यक्ति को घड़ा मुंह में लगाये हुए दिखाया गया है लेकिन घड़े में एक बूँद भी पानी नहीं है।

दिनेश श्रीनेत सिनेमा और पर्यावरण पर अपने महत्वपूर्ण लेख में सिलसिलेवार इस विषय पर बनी फिल्मों और उनकी विषयवस्तु की चर्चा करते हैं- ‘निर्देशक एमएस सथ्यु ही सबसे पहले सिनेमा में पारिस्थितिकी की पड़ताल करते पाए जाते हैं। उनकी फिल्म सूखा (1983) एक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में सूखाग्रस्त इलाकों की कहानी सामने लाती है। कन्नड़ लेखक यूआर अनंतमूर्ति की कहानी पर आधारित इस फिल्म में ट्यूबवेल लगाकर सूखाग्रस्त इलाकों में पानी पहुंचाने के हर प्रयास को राजनेता और नौकरशाह नाकाम करने में जुटे हैं। फिल्म के आरंभ में ही बंजर भूमि में मृत जानवर दिखाई पड़ते हैं। पहले यह फिल्म कन्नड़ भाषा में बारा के नाम से बनी थी और इसे उस वर्ष कन्नड़ की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। यह फिल्म अपनी पटकथा और सशक्त निर्देशन के माध्यम से सूखा प्रभावित जिले में सामाजिक-राजनीतिक स्थिति का गहन विश्लेषण करती है।’

फिल्म वसुंधरा का एक दृश्य

निर्देशक अशोक आहूजा अपनी फिल्म वसुंधरा (1988) के जरिए पर्यावरण के मुद्दे को गंभीरता से उठाते हैं। नसीरुद्दीन शाह, नीना गुप्ता, बेंजामिन गिलानी और टॉम ऑल्टर इस फिल्म में मुख्य भूमिकाओं में थे। फिल्म समीक्षक मनमोहन चड्ढा लिखते हैं, ‘वसुन्धरा को पर्यावरण के विषय को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करने वाली फिल्म भी कहा जा सकता है। वसुन्धरा अत्यंत जटिल और मूलभूत प्रश्नों से जूझती है। पृथ्वी की ऊपरी उपजाऊ परत के नष्ट हो जाने से कितना नुकसान है इसको समझाने की वह कोशिश करती है। जंगलों के विनाश और विस्फोट करके पहाड़ों से पत्थर निकालने से पारिस्थितिकी और मानव जीवन पर घातक प्रभाव पड़ते हैं। हिमालय पर स्थित एक शहर के चूना पत्थर से समृद्ध इलाकों के हालात का अध्ययन करने के लिए भारतीय मूल की और स्विट्जरलैंड में पली-बढ़ी एक युवा महिला पारिस्थितिकीविद शोध कार्य के लिए आती है। यह पूरी फिल्म वास्तविक लोकेशन पर फिल्माई गई थी। वसुन्धरा एक महत्वपूर्ण फिल्म है जो पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए हमें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में सचेत करती है।

साहित्य, सिनेमा और पानी

प्रख्यात लेखिका अमृता प्रीतम ने अपनी आत्मकथा रसीदी टिकट में उज़्बेकिस्तान दौरे का जिक्र करते हुए लिखा है कि ‘वहां एकत्र हुए कवियों में से एक द्वारा सवाल पूछे जाने पर कि सुना है कि आपके देश में एक आशिकों का दरिया है, उसका नाम क्या है? तो जवाब में अमृता प्रीतम जी कहती हैं चिनाब (प्रीतम 2012:43)। चिनाब को इश्क की नदी कहा जाता है। फिल्म सोहिनी महिवाल एक पंजाबी कहानी/मिथक पर बनी है जिसमें चिनाब नदी का महत्वपूर्ण रोल है। चिनाब इश्क का दरिया है तो चम्बल किनारे बागी पैदा होते हैं। नदियां और उनका पानी कई भूमिकाओं में हमारे समक्ष मौजूद हैं।

पानी हमेशा सौंदर्य का ही विषय हो ऐसा जरूरी नहीं है। हम मोहन राकेश के प्रसिद्ध उपन्यास अंधेरे बंद कमरे को पढ़ते हुए एक दृश्य पाते हैं जिसमें उपन्यास का एक पुरुष चरित्र अपने बचपन के पोखर को याद करते हुए कहता है कि, मुझे अपने गांव का वह पोखर याद आ जाता है जिसके कीचड़ मिले पानी में सूअर मुंह मारते रहते थे और मैं उन्हें पत्थर मार-मार कर भगाया करता था मगर मेरे मारे हुए पत्थरों का उन पर उल्टा ही असर होता था। वे पोखर में उतर कर अपने को और भी कीचड़ में लथपथ कर लेते थे। तब मैं चाहा करता था कि वह पोखर किसी तरह सूख जाए जिससे सूअरों का उसमें उतरकर अपने कीचड़ में लथपथ करना बंद हो जाए… पोखर में उतरते हुए सूअर अपनी थुथनिया उठाकर मेरी तरफ मुंह चिढ़ाने लगते थे और मैं अपनी बेबसी से खींझकर उन्हें और पत्थर मारने लगता था। घर लौटने तक मेरे सब कपड़े कीचड़ से लथपथ होते और दहलीज से अंदर दाखिल होते ही मुझे ताई की डांट सुननी पड़ती थी (राकेश1984:20)।

गौतम घोष के निर्देशन में बनी शबाना आजमी और नसरुद्दीन शाह अभिनीत फिल्म पार (1984) को देखते हुए हमें एक गरीब और प्रवासी युगल नौरंगिया और रमा की दयनीय दशा और कुछ रुपयों के बदले में दोनों के द्वारा सूअरों के झुंड को अवैध तरीके से नदी की धारा पार करा कर सूअर पालन के एजेंट तक पहुंचाने का काम दिया जाता है। इस फिल्म में फिल्म रमा (शबाना आजमी) सूअरों को नदी पार कराते वक्त गर्भवती है। यह भारतीय सिनेमा का अद्भुत लेकिन वीभत्स दृश्य है जहां एक गर्भवती महिला को कुछ रुपयों के जरूरत के कारण विपरीत परिस्थितियों में सूअरों के झुंड को नदी पार कराना पड़ता है। नसीर और शबाना ने एक गरीब-दलित प्रवासी युगल की लाचारी और बेबसी के चरित्र को बेहतरीन तरीके से परदे पर प्रस्तुत करने का काम किया है। नदी और पानी अपने आप में सुंदर हैं लेकिन जब नदियां हजारों घरों को तबाह कर देती हैं और तमाम निर्दोष लोगों की जान बाढ़ और तूफान में चली जाती है तो यह सब कुछ सुंदर नहीं रह जाता है बल्कि दुखद हो जाता है।

फिल्म खामोश पानी का एक दृश्य

सिनेमा में कुआँ

कुएं भी पानी का एक महत्वपूर्ण स्रोत रहे हैं और फिल्मों में इनका प्रयोग किया गया है। किरण खेर अभिनीत पाकिस्तानी निर्देशक साबिहा समर कि फिल्म खामोश पानी (2004) में फिल्म की मुख्य महिला पात्र आयशा कुएं मे कूदकर जान दे देती है। तमस फिल्म में बहुत सारी सिख महिलाएं दुश्मनों के हाथ में पड़ने से बचने के लिए कुएं में कूदकर अपनी जान दे देती हैं। भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दृष्टिकोण में बनी इन फिल्मों ने दिखाया है कि पानी केवल जीना जीवन ही नहीं देता बल्कि कई बार भिन्न परिस्थितियों में व्यक्ति की जीवन लीला भी समाप्त कर देता है। बजरंगी भाईजान फिल्म में तो बॉर्डर पर बहती नदी के दोनों किनारों पर खड़े भारतीय और पाकिस्तानी मूल के लोग एक साथ मिलकर फिल्म के नायक के प्रयास को सराहते हुए दिखते हैं। पानी तो प्यास बुझाने और जीवन देने के लिए है लेकिन कभी वह झगड़े कि वजह बन जाता है (दिल की धड़कन 2002) तो कभी लोग जलस्रोतों नदी, नहर, नाले, तालाब और कुएं में कूदकर अपनी जान दे देते हैं तो कभी दुर्घटनावश या देवी आपदाओं में ऐसे लोगों की जान चली जाती है। भारतीय मिथक में तो जल प्लावन के बाद समूची सृष्टि के विनाश और पुनः मनु और शतरूपा के माध्यम से सृष्टि के सृजन का वर्णन मिलता है। पानी अपने रूप में बहुत सारी भूमिकाओं में हमारे सामने ले आता है।

सिनेमा में पर्यावरणीय असंतुलन और पानी  

जनसंख्या का विस्थापन एक बड़ी समस्या बनकर सामने आया जिसको ध्यान मे रखकर दुनियाभर के कई पर्यावरणविदों ने विकास के नाम पर मानव विस्थापन और पारिस्थितिकी के विनाश को मुद्दा बनाया। भारत में बड़ी बांध परियोजनाओं के निर्माण का असर स्थानीय समुदायों पर पड़ता है। फिल्मों में चित्रित पर्यावरण की चिंताओं ने मीडिया और बुद्धिजीवियों का ध्यान आकर्षित किया और बाद में कई आंदोलन भी  चलाए गए। बांधों से विस्थापन और पारिस्थितकी को होने वाले नुकसान को ध्यान मे रखकर मेधा पाटकर ने नर्मदा बचाओ आंदोलन चलाया। सुंदर लाल बहुगुणा ने भी चिपको आंदोलन एवं टिहरी बांध के खिलाफ आंदोलनों को नेतृत्व प्रदान किया। विकास परियोजनाओं के कारण पर्यावरण पर असर पड़ने लगा और इसने एक जनआंदोलन का रूप ले लिया। इस मुद्दे को एक और कन्नड़ फिल्म भूमि गीता (1997) में उठाया गया था। इस फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे बांध बनने पर लोग अपनी ही जमीन से उजड़ जाते हैं। केसरी हरवू के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने पर्यावरण संरक्षण श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीता।

[bs-quote quote=”अनियोजित औद्योगीकरण के कारण भारत में जल, मृदा,  वायु और ध्वनि प्रदूषण बड़े पैमाने पर हुआ। इस प्रदूषण ने मानव स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इन विषयों पर भारतीय सिनेमा में  कुछ गिनी-चुनी फिल्में बनी हैं। इस कड़ी में फिल्म भोपाल एक्सप्रेस (1999) भोपाल गैस त्रासदी और उसके कारण हुए जान-माल के नुकसान और कई पीढ़ियों तक होने वाली विकलांगता को दिखाने का सराहनीय प्रयास करती है। फिल्म की कहानी एक नवविवाहित जोड़े और उनके दोस्तों के नजरिए से आगे बढ़ती है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

रेनकोट (2004) ऋतुपर्णो घोष द्वारा निर्देशित फिल्म है जो दो प्रेमियों की कहानी कहती है जिन्हें दुर्भाग्य से अलग होना पड़ता है। कोलकाता शहर की बारिश भरी एक दोपहर में वे दोनों एक छोटे से घर में मिलते हैं और एक दूसरे के जीवन की वास्तविकताओं से परिचित होते हैं। यह फिल्म मनोज बसु की लघु कथा पर आधारित थी। रेनकोट अजय देवगन और ऐश्वर्या राय के संजीदा अभिनय से सजी एक संवेदनशील फ़िल्म है। इस फ़िल्म में कोलकाता शहर की बारिश और उस बारिश से बचने के लिए प्रयोग में लाया गया रेनकोट दो पूर्व प्रेमियों के मध्य निःशब्द संवाद का माध्यम बनकर क्लाइमेक्स पर हमें भी निःशब्द कर जाती है। हम दिल दे चुके सनम में सफलता के परचम लहरा चुकी इस जोड़ी ने एक कमरे में बंद होकर बातचीत और आंखों के संवाद से बिना किसी तामझाम के जिस तरह जीवन के अभावों, असफलताओं, और बिरह के बीच प्रेम के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देने की भावना को  पर्दे पर प्रस्तुत किया है वह अविस्मरणीय है। डॉ कौशल इसे चित्रपट लिखी गई एक प्रेम कविता कहता है। मनोज (अजय देवगन) इस उम्मीद से अपनी पूर्व प्रेमिका नीरजा (ऐश्वर्या राय)के पास जाता है कि वह व्यापार शुरू करने में उसकी आर्थिक मदद करेगी क्योंकि उसकी शादी एक बड़े घर मे नौकरी करने वाले लड़के से हुई थी। नौकरी और पैसा न होने के कारण ही प्रेमिका से वह विवाह न कर सका था लेकिन सामाजिक बंधनों से दूर उन दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव मे कोई कमी नहीं आई। रेनकोट में रखे कागज के टुकड़े को पढ़ने के बाद बेहद गरीबी में जी रही प्रेमिका अपने बालसखा और प्रेमी के मदद के लिए अपने हाथ के कंगन उस रेनकोट में छुपाकर रख देती है। जबकि अजय अपनी प्रेमिका के मकान मालिक को मकान किराए के बकाया बारह हजार रुपये चुका कर आ जाता है जो उसने दूसरों से उधार लिए होते हैं। यहां पानी, बरसात और उधार का रेनकोट प्रेम की उदात्तता को दर्शकों के सामने लाता है। रेनकोट की शूटिंग मात्र 16 दिनों मे हुई थी।  यह फ़िल्म एक रुका हुआ फैसला की तरह एक कमरे में फिल्माई गयी है और बहुत ही भावनापूर्ण प्यारी सी फिल्म है।

नदिया के पार (1982) कोहबर की शर्त नामक उपन्यास पर आधारित थी। एक छोटी नदी के दोनों तरफ बसे गांवों में शादी-ब्याह, नाव के रास्ते आवागमन और प्रेम के परवान चढ़ने की कहानी है। यहां नदी प्रेमियों के मिलाने में बाधक नही बल्कि सहयोगी की भूमिका में है और सौंदर्य के नए प्रतिमान रचती है। मर्द (1985) फ़िल्म के कई दृश्यों में पानी के दलदल में लोगों को धकेलकर मारने की अंग्रेजों की क्रूर हरकत को दिखाया गया है। अमिताभ अपनी पालनहार मां के मरने के बाद उसकी अस्थियों को नदी में प्रवाहित करते हुए दुआ करते हैं कि कलश में रखी चिट्ठी को वह उनकी असली माँ तक पहुंचा दे। और वह कलश जेल में बंद उनकी माँ के पास पहुंचता है। नदियों ने वास्तव में प्रवाह का सुलभ मार्ग उपलब्ध कराकर समुदायों, समाजों और देशों को जोड़ने का ऐतिहासिक काम किया है।

गिरीश मलिक अपनी फिल्म जल (2014) में कच्छ के रण मे पानी की समस्या को सामुदायिकता के स्तर पर प्रस्तुत करते हैं। फिल्म मे कच्छ के दो गांवों की कहानी है जहां दूर-दूर तक पानी नहीं है। पानी को लेकर आपसी झगड़े हो रहे हैं। पानी खोजने वाले नवयुवक बक्का को लोग पानी का देवता कहते हैं। गांव में एक खारे पाने का तालाब होता है जहां हर साल फ्लेमिंगो पक्षी आते हैं लेकिन खारा पानी पीने से मर जाते हैं। रूस से एक पक्षी वैज्ञानिक लड़की गांव में अपनी टीम के साथ आती है और इन पक्षियों को मरने से बचाने के लिए कच्छ में कुएं और तालाब बनाने का फैसला करती है। जल फिल्म पानी के संकट को परिहास से भरी स्थितियों के जरिए प्रस्तुत करती है। पानी के संकट की गंभीरता व पारिस्थितिकी असंतुलन तथा लोगों के जीवन और उनकी सामाजिक अंतर्संबंधों की बारीकी से पड़ताल करती है।

फिल्म तारा में कलाकार

एक और उल्लेखनीय फिल्म फिल्म पाणी (2019) जो मराठी भाषा में बनी है। महाराष्ट्र के एक सूखा प्रभावित गांव नागदरवाड़ी की पृष्ठभूमि पर आधारित एक प्रेम कहानी है। यह उन चुनौतियों को सामने लाती है जो एक गांव में पानी और खेती के आधुनिकीकरण की जद्दोजहद से जुड़ी हैं। फिल्म का नायक हनुमंत प्रयास करता है कि उसके इलाके को पर्याप्त पानी मिल सके। आदित्य कोठारे की इस फिल्म ने पर्यावरण संरक्षण श्रेणी में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता। तारा: द जर्नी ऑफ लव एंड पैशन (2013) सौराष्ट्र मे सूखे की पृष्ठभूमि पर बनी एक महत्वपूर्ण फिल्म है।

अनियोजित औद्योगीकरण के कारण भारत में जल, मृदा,  वायु और ध्वनि प्रदूषण बड़े पैमाने पर हुआ। इस प्रदूषण ने मानव स्वास्थ्य को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इन विषयों पर भारतीय सिनेमा में  कुछ गिनी-चुनी फिल्में बनी हैं। इस कड़ी में फिल्म भोपाल एक्सप्रेस (1999) भोपाल गैस त्रासदी और उसके कारण हुए जान-माल के नुकसान और कई पीढ़ियों तक होने वाली विकलांगता को दिखाने का सराहनीय प्रयास करती है। फिल्म की कहानी एक नवविवाहित जोड़े और उनके दोस्तों के नजरिए से आगे बढ़ती है। निर्देशक महेश मथाई ने इस फिल्म में बताने की कोशिश की है कि किस तरह मानवीय मूल्यों की उपेक्षा करने वाला औद्योगीकरण आम लोगों के जीवन में कभी न भरने वाला एक घाव छोड़ जाता है। यहीं हमें विकास की एकांगी परिभाषा और सोच को पुनः परिमार्जित ढंग से गढ़ने-समझने की आवश्यकता महसूस होती है। इस विषय पर दूसरी उल्लेखनीय फिल्म है अपर्णा सिंह की इरादा (2017), जो भटिंडा के ताप विद्युत संयंत्रों और कारखानों की पृष्ठभूमि पर है। इस फिल्म को एक थ्रिलर की शैली में बनाया गया है। एक पूर्व सेना अधिकारी की बेटी को जानलेवा बीमारी का पता चलता है। धीरे-धीरे यह रहस्योद्घाटन होता है कि यह धरती में मौजूद पानी में रिस रहे रासायनिक तत्वों के कारण है। केमिकल की रिवर्स बोरिंग के कारण पंजाब के उस इलाके का पानी संक्रमित हो चुका है। जमीन जहरीली हो गई है और उस इलाके में कैंसर तेजी से फैला है। भटिंडा से एक ट्रेन मुंबई जाती है जो भारी संख्या मे कैंसर से ग्रसित यात्रियों को ढोने के कारण कैंसर एक्सप्रेस के नाम से जानी जाती है।

‘औद्योगिक माफिया और राजनीतिक पार्टियों का यह गठजोड़ आम नागरिकों को एक धीमी मौत की तरफ ले जा रहा है। इस बीच, एक पत्रकार को मामले की जानकारी मिलती है और उसका अपहरण कर लिया जाता है। पूर्व-सेना अधिकारी, पत्रकार की प्रेमिका और एक एनआईए अधिकारी मामले को सुलझाने और पीड़ित लोगों को न्याय दिलाने का प्रयास करते हैं। यह फिल्म यूरेनियम तथा फर्टिलाइजर के जहरीले प्रभावों तथा इस वजह से पैदा होने वाले पारिस्थितिकीय असंतुलन को सामने लाती है। फिल्म के कथानक में मालवा क्षेत्र में रहने वाले लोगों के जीवन पर सीधे होने वाले असर को दिखाया गया है’ (श्रीनेत 2021)।

फिल्म कड़वी हवा का एक मार्मिक दृश्य

कड़वी हवा (2017) विशालकाय भारतवर्ष और उसकी विविधता के भीतर पानी को लेकर दो तरह की वास्तविक स्थितियों से पीड़ित व्यक्तियों और समुदायों का प्रत्युत्तर है। फिल्म में एक चरित्र (रणवीर शौरी) उड़ीसा के समुद्र तटीय इलाके का रहने वाला बैंककर्मी है जिसकी पोस्टिंग सूखाग्रस्त बुंदेलखंड के एक जनपद में है। उसके गृह प्रदेश में सुनामी ने ऐसी तबाही मचाई और जानमाल का नुकसान किया कि लोग वर्षों तक उस दहशत को भूल नहीं पाए। दूसरी तरफ, बुंदेलखंड का सूखाग्रस्त इलाका है जहां के किसान कर्ज के कारण आत्महत्या करने को मजबूर हैं। लगातार बर्बाद होती फसलों और बढ़ते कर्ज के दबाव से बचने का किसान को एकमात्र रास्ता आत्महत्या दिखाई पड़ता है। गाँव के किसानों के परिवारीजन दहशत में जीते हैं कि जाने किस घर से अगली मनहूस खबर आए। महिलायें अपने पतियों के व्यवहार पर नजर रखती हैं और उनके गुमसुम होने पर डरती हैं। देर से घर लौटने पर उन्हें चिंता होती है कि कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई। आत्महत्या एक फिनामिना (phenomenon) बनकर उस ग्रामीण परिवेश को अपने आगोश मे ले चुका है। एक अंधे वृद्ध (संजय मिश्रा) को रात-दिन यही डर सताता है कि कहीं उसका कर्ज में डूबा बेटा भी कोई गलत कदम न उठा ले। ऐसे में एक वसूली अफसर उस इलाके में आता है। उसकी चिंताएं अलग हैं। उड़ीसा का समुद्री तूफान उसकी जमीन लील चुका है। उसका बस एक ही लक्ष्य है कि इस इलाके से कैसे ज्यादा से ज्यादा वसूली हो और उससे मिलने वाले कमीशन की मदद से वह अपने परिवार को यहां ला सके। दोनों किरदारों की चिंताएं उन्हें एक-दूसरे से जोड़ देती हैं।

पानी की चिंता करने की जरूरत  

मुजफफर अली ने अपने लेख में पानी और सिनेमा के रिश्ते का कुछ इस तरह जिक्र किया है : ‘पानी, हिन्दी सिनेमा का बहुत गहराई से हिस्सा रहा है। यह बात बिल्कुल ठीक है कि पानी का बहुत से हिन्दुस्तानी फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों को आकर्षक बनाने के लिये बेहद खूबसूरती से समय-समय पर अपनी फिल्मों में इस्तेमाल किया है। इस तरह पानी और सिनेमा का एक गहरा अन्तर्संम्बन्ध सहज ही बनता चला गया है। पानी से सिनेमा का ठीक वैसा ही रिश्ता है जैसे जीवन से। पानी पूरी तरह से सिनेमैटिक चीज है। पानी की अपनी एक स्ट्रांग इमेजरी है। हिन्दी सिनेमा में हमेशा फिल्मकार अपनी फिल्म के दृश्यों को एक सौन्दर्यबोध देने के लिये कभी समुद्र का इस्तेमाल करते रहे, कभी झील का, तो कभी बारिश का, या फिर कभी किसी खूबसूरत दरिया और झरने का।’

वे आगे कहते हैं कि ‘सिनेमा ने अब तक पानी की ‘ब्यूटी’ को इस्तेमाल किया है। इसलिये सिनेमा की ‘ड्यूटी’ बनती है कि वह पानी के कंटेंट को, पानी की री-साइक्लिंग को और पानी की गन्दगी को कैसे ट्रीटमेंट कर इसे साफ किया जाये, इस सब्जेक्ट को केन्द्र में रखकर दर्शकों के सामने फिल्में प्रस्तुत करे, ताकि पानी को लेकर कई समस्याएं पैदा हुई हैं उनके बारे मे दर्शक जागरूक और सजग हो सकें।’

फिल्म सागर संगमे का एक दृश्य

महान शोमैन राजकपूर ने अपनी फिल्मों में रोमांटिक सीन से लेकर नदियों के प्रदूषण तक के मुद्दे को उठाने का काम किया। सद्यःस्नात नायिकाओं के सौन्दर्य को जिस खूबसूरती से उन्होंने सफेद साड़ी में लपेटकर प्रस्तुत किया वह अद्वितीय है। उन्हें बॉलीवुड सिनेमा का कालिदास भी कहा जा सकता है। उनके बाद के निर्देशकों ने भी विशेषतः रोमांटिक दृश्यों और गीतों को फिल्माने के लिए नदी, झील, समंदर बादल और बरसात को फिल्माने का काम किया।  राजकपूर की फिल्म श्री 420 का सदाबहार रोमांटिक गीत प्यार हुआ इकरार हुआ तो प्यार से फिर क्यों डरता है दिल  में तेज बारिश में एक ही छाते में खड़े होकर नर्गिस और राजकपूर एक दूसरे की आँखों में झांक रहे थे। यह दृश्य भारतीय सिनेमा में रोमांस का एक प्रतीक दृश्य बन गया। राजकपूर और नरगिस के प्रेम की गवाह बारिश और बारिश से बेपरवाह दो जवान प्यार भरे दिल। बारिश और पानी ने उस आम दृश्य को खास बना दिया था। बात अब रोमांस से बहुत आगे पानी की कमी और प्रदूषित पानी तक जा पहुंची है। आज जब पानी पर संकट का दौर है तो फिल्मकार पानी से जुड़े समकालीन प्रासंगिक मुद्दों पर फिल्में बनाने की जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं क्योंकि यह मसालेदार और कमाऊ विषय नहीं है।

संदर्भ

राय, उमेश कुमार (2016) रुपहले पर्दे पर पानी (Water in Cinema), Hindi on Sat, 06/11/2016 – 13:44, इंडिया वाटर पोर्टल
रामचंद्रन, नमन (2016) वाटर, वाटर, एव्रीह्वेयर: द मेटाफर ऑफ अरिवर हैज बीन ब्यूटीफुली यूज़्ड इन मेनी फिल्म्स,  17 सितंबर 2016 दहिन्दू।
श्रीनेत, दिनेश (2021) पर्यावरण की पाठशाला बन सकता है सिनेमा, 30 नवंबर 2021, डाउन टू अर्थ
अली, मुजफ्फर (2016) सिनेमा से पानी का रिश्ता, इंडिया वाटर पोर्टल 17-07-2016

राकेश कबीर प्रसिद्ध कवि-कथाकार और सिनेमा के समाजशास्त्रीय अध्येता हैं।

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6 COMMENTS

  1. बहुत ही बेहतरीन और सामाजिक यथार्थ को दर्शाता शोधपरक लेख। बहुत बधाई।

  2. पानी की अहमियत को बारीक तरीके से समझाने वाला शानदार लेख, वाकई में आप के शानदार लेख प्रकृति, नदियों व मानवता, नैतिकता के साथ वैज्ञानिक दृष्टिकोण की समझ पैदा करती है। 🙏🙏

  3. पानी पर लिखा गया यह लेख ज्ञानवर्धक, आलोचनात्मक ,विचारणीय ,शोध परक एवं पठनीय है ।केवल एक लेख के माध्यम से एक साथ पानी से संबंधित इतनी सारी फिल्मों को चाहे वह हिंदी जगत (बॉलीवुड), केरला ,असमिया हॉलीवुड का फिल्म का संग्रह कर एक मंच पर प्रस्तुत करना काबिले तारीफ है।इस लेख में पानी की उपयोगिता(जो फिल्मकारों को पैसा कमाने का जरिया बनता है)पानी से होने वाले नुकसान (बाढ़ की स्थिति),एवम पानी को कैसे अपने भविष्य के लिए सुरक्षित किया जाए(फिल्मकारों को पानी की रिसाइसिल, पानी की गंदगी को कैसे ट्रीटमेंट कर साफ किया जाए,पानी के कंटेंट पर भी ध्यान देना आवश्यक है ) को सम्मलित किए है।👌👌👌👌🌻🌻🌻🌻🙏🙏🙏🙏🙏

  4. पानी और सिनेमा ही नहीं बल्कि कहना चाहिए पानी और समूचा जीवन, इस थीम को केंद्र में रखकर लिखा गया श्री राकेश कबीर जी का यह शोधपरक आलेख अत्यंत महत्वपूर्ण और पठनीय आलेख जो बहुत मेहनत और गहन अध्ययन से लिखा गया है। राकेश जी को इस सामयिक और बढ़िया आलेख के लिए बहुत बहुत बधाई।

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