कहाँ गए वे मोटे अनाज

गुलाबचंद यादव

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पिछले कई वर्षों से देश के कुछ हिस्सों की तरह हमारे पूर्वी उत्तर प्रदेश के अधिकांश जिलों में मानसून कमजोर ही रहा था और पर्याप्त बारिश नहीं हो पा रही थी। किसान जैसे-तैसे सिंचाई कर खरीफ फसलों की खेती कर पा रहे थे। मैं जब भी गाँव फोन कर किसी पड़ोसी या मित्र से हालचाल पूछता तो बारिश का कम होना अनिवार्य विषय बन जाता था। इस साल यानी 2019 में भी आधे सितंबर तक यही रोना रहा। हमारे क्षेत्र में अमूमन 20-22 जून को मानसून दस्तक दे देता था और जुलाई (सावन) महीने में बहुत अच्छी बारिश हो जाती थी। अच्छी बारिश से धान की फसल के अलावा गन्ना, उड़द, बाजरा और मक्के की खेती और सब्जियों की उपज अच्छी हो जाती थी। किंतु इस बार जून महीने में न के बराबर बरसात हुई और जुलाई तथा अगस्त में भी धूल उड़ती रही। लोग गर्मी और उमस से त्राहिमाम-त्राहिमाम करते रहे। बारिश अपर्याप्त होने से धान के पौधे पीले पड़कर मुरझाने लगे और उड़द, मक्के, बाजरे की फसल भी सुखने लगी। किसान असहाय और निरुपाय होकर दिन में कई बार आसमान की ओर निहारते किंतु बादलों के झुंड उनकी खिल्ली उड़ाते हुए तेजी से आगे बढ़ जाते थे।

सितंबर 2019 के उत्तरार्द्ध में मानसून ने ऐसी करवट ली जिसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। लगता था यूपी-बिहार वालों की शिकायतें सुन-सुन कर इंद्रदेव कुपित हो गए और फिर उन्होंने अपना ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि लोग हाथ जोड़ प्रार्थना करने लगे कि, “हे प्रभु, अब बस कीजिए….. प्रलय मत लाइए। आपने पूरे सीजन की बारिश की भरपाई केवल आठ-दस दिनों में ही कर दी है। हजारों लोगों के कच्चे-अधपक्के घर-मकान, झुग्गी-झोपड़ियाँ, मड़ई-दालान गिर पड़े हैं। सैकड़ों लोग असमय काल-कवलित हो गए हैं। नदी-नाले उफान पर हैं और फसलें डूब रही हैं। शहरों में नावें चलने के समाचार आने लगे हैं। कृपा कर अब शांत हो जाइए।“ अंततः वर्षा के देवता मान गए किंतु पिछले 40-45 वर्षों का रिकार्ड तोड़ने के बाद।

मोटे अनाज में पल्प की मात्रा अधिक होती है जिससे यह आंतों में चिपकता नहीं है और व्यक्ति कब्ज की परेशानी से मुक्त रहता है। अब इन मोटे अनाजों में से कुछ के खास गुणों पर भी थोड़ी चर्चा कर लेना समीचीन होगा। जौ आसानी से पचनेवाले फाइबर का अच्छा स्रोत है।

मेरे गाँव के श्यामसूरत भाई मेरे अभिन्न मित्र हैं जो लगभग हर सप्ताह मुझे फोन करते हैं। मैं उनसे विस्तारपूर्वक बातें कर गाँव-देश के समाचार, खेती-बारी की स्थिति, मौसम का हाल, उनके परिवारीजनों के समाचार, गाँव में हुए या रुके पड़े विकास कार्यों, ग्राम प्रधान और कोटेदार की कार्यपद्धति और कारनामों आदि की जानकारी प्राप्त कर लेता हूँ। हमारा गाँव वरुणा नदी के पास स्थित है। अतः हमारे यहाँ की जमीन बलुई प्रकृति की हैं जो बारिश के अधिकांश पानी को जल्दी सोख लेती है और अतिरिक्त पानी वरुणा नदी या निकटवर्ती ताल-पोखरों में चला जाता है। यदि बारिश का स्तर मध्यम रहे तो धान के साथ-साथ बाजरे, मक्के, उड़द आदि की अच्छी पैदावार हो जाती है। किंतु यदि अतिवृष्टि हो तो धान, गन्ने के अलावा बाकी की फसलें नष्ट हो जाती हैं। मैंने साल दर साल अपने प्रवासों के दौरान गौर किया है कि नीलगायों और छुट्टा पशुओं के आतंक के चलते किसानों ने गन्ने और सब्जियों की खेती करना लगभग बंद ही कर दिया है। नीलगायें भी अन्य फसलों तथा सब्जियों को खाकर और  रौंदकर बहुत नुकसान पहुँचा देती हैं।

श्यामसूरत ने बताया कि इस साल मक्के और बाजरे की खेती चौपट हो गई है और उतैला-भदईला (उड़द-मूंग) के पौधे खेतों में सड़ने लगे हैं। यह सुनकर मुझे बड़ी निराशा हुई विशेष रूप से बजड़ी (बाजरे) की फसल के चौपट हो जाने का समाचार जानकर। मैं लगभग हर साल नवंबर-दिसंबर के महीने में 3-4 सप्ताह के लिए छुट्टी लेकर अपने गाँव अवश्य जाता हूँ। नई पीढ़ी खास तौर पर महानगरों में पैदा और जवान हुई पीढ़ी के लोग अक्सर बाजरे का नाम ही सुनकर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। किंतु पुरानी पीढ़ी के लोग जिनका बचपन या किशोरावस्था गाँव में गुजरी है वे बाजरे की रोटी का स्वाद शायद ही भूले हों। मैं भी ऐसे लोगों में से एक हूँ। सर्दियों में गाँव रहने के दौरान रात के भोजन में बाजरे की एक-दो कड़क सेंकी गई रोटी खाये बिना मुझे तृप्ति महसूस नहीं होती। फूलगोभी की तरकारी के साथ अथवा देर तक औटाये गए मलाईदार दूध में उपले की आग में अच्छी तरह से सेंकी गई बाजरे की रोटी मींजकर खाने की मेरी आदत आज भी बरकरार है। मैं यह सोचकर उदास हो गया हूँ कि शायद इस बार नवंबर-दिसंबर में मैं जब गाँव जाऊँगा तो बाजरे की रोटी की लज्जत का लाभ नहीं ले पाऊँगा।

बात जब बाजरे (यानी मोटे अनाज की एक किस्म) की चली है तो पुरानी यादों का जेहन में आ जाना स्वाभाविक ही है। जब तक भारत में विशेष रूप से पूर्वी उ.प्र. में हरित क्रांति का दौर नहीं आया था तब तक खेती के लिए जैविक खादों का ही एकमात्र सहारा था। रासायनिक खादों की तुलना में जैविक खादों के प्रयोग से खेती की उपज भले ही कम हुआ करती थी किंतु अनाजों एवं सब्जियों का स्वाद बेजोड़ हुआ करता था। तब गेहूँ और चावल बहुत कम पैदा हो पाता था।  उस समय  घर में गेहूँ की रोटी और चावल तब बनता था जब घर पर मेहमान आए होते थे। इसलिए हर वर्ग के किसानों के परिवार के लोग बाजरे की रोटी, बाजरे का ही भात, मक्के की रोटी, मक्के का भात, जौ की रोटी, अरहर की दाल, आलू के चोखे या आलू की रसदार तरकारी के साथ खाते थे। सुखाकर रखे गए महुए को भी दूध में उबालकर चाव से खाया जाता था। उस दौर की सब्जियों के स्वाद का तो कहना ही क्या? यह 1975 के पहले के समय की बात है। यदि किसी घर में फूलगोभी की तरकारी बन रही होती तो आसपड़ोस के लोग ही नहीं राह चलते मुसाफिर भी उसकी खुशबू से जान जाते थे कि पास कहीं गोभी की तरकारी बन रही है। नेनुआ की तरकारी का वह स्वाद अब गुजरे जमाने की बात हो चुकी है। दूध या मट्ठे में जौ या बाजरे की रोटियाँ सानकर/डुबोकर खाने का स्वाद याद कर अभी भी मन रोमाँचित हो उठता है। ये सब तो बस अब यादों में शेष रह गए हैं। इसके साथ ही सावाँ, मड़ुआ, कोदो, रागी, कुटकी जैसे मोटे अनाज भी उस समय उगाये और खाये जाते थे। यदि आज की पीढ़ी के लोगों को इनके बारे में बताया जाए तो शायद उन्हें विश्वास ही न हो। सच्चाई तो यह है कि मोटे माने जाने वाले इन अनाजों में जो शुद्धता और पौष्टिकता होती है वह आज भी सेहत के लिए अत्यंत अनुकूल है। किंतु ये मोटे अनाज अब बहुत ‘पतले’ यानी प्रचलन से बाहर होते जा रहे हैं।

नई पीढ़ी खास तौर पर महानगरों में पैदा और जवान हुई पीढ़ी के लोग अक्सर बाजरे का नाम ही सुनकर नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। किंतु पुरानी पीढ़ी के लोग जिनका बचपन या किशोरावस्था गाँव में गुजरी है वे बाजरे की रोटी का स्वाद शायद ही भूले हों। मैं भी ऐसे लोगों में से एक हूँ। सर्दियों में गाँव रहने के दौरान रात के भोजन में बाजरे की एक-दो कड़क सेंकी गई रोटी खाये बिना मुझे तृप्ति महसूस नहीं होती। फूलगोभी की तरकारी के साथ अथवा देर तक औटाये गए मलाईदार दूध में उपले की आग में अच्छी तरह से सेंकी गई बाजरे की रोटी मींजकर खाने की मेरी आदत आज भी बरकरार है।

हरित क्रांति से पहले यही मोटे अनाज जीवन का आधार हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ-साथ धीरे-धीरे ये चलन से बाहर होते गए। हमारे पुरखे-पुरनिया इन्हीं मोटे अनाजों का सेवन कर सर्दी, गर्मी और बरसात की मार से मुक्त रहते थे। किंतु यही अनाज आज उपेक्षित हैं। कुछ अनाज के दानों की बाहरी झिल्ली रेशेदार छिलकों से कसी होती है जो मड़ाई के बावजूद अनाज के दानों में विद्यमान रहती है। इन्हें ही मोटा अनाज कहा जाता है जैसे- चना, मक्का, बाजरा, ज्वार, कोदो, मड़ुआ, सावाँ, रागी, जौ, कुटकी, कँगनी आदि।महंगाई के इस दौर में हर कोई महंगे फल, सूखे मेवे, दूध-घी या विटामिन आदि खरीद नहीं सकता है। ऐसी स्थिति में ये मोटे अनाज आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों के लिए अच्छे विकल्प हैं। वैज्ञानिक शोधों में भी इन मोटे अनाजों की पौष्टिकता को कई बार प्रमाणित किया गया है। अब कई बड़ी कंपनियां भी मोटे अनाजों के पैकेट बाजार में उतार रही हैं। अपवादस्वरूप परिपूर्ण माना जानेवाला और रेडीमेड सत्तू अभी भी उत्तर प्रदेश, बिहार पश्चिम बंगाल, असम और दिल्ली में प्रचलन में है और अन्य प्रांत के लोगों का भी रुझान इसकी ओर बढ़ रहा है। अब सेहत के लिए फिक्रमंद कुलीन समाज के बहुत से लोग भी इन मोटे अनाजों को खरीदने लगे हैं।

आजादी के बाद विशेष रूप से आठवें दशक से बदली कृषि नीति के चलते भारत में गेहूँ और धान जैसी फसलों पर हमारी निर्भरता लगातार बढ़ती चली गई। परिणाम यह हुआ की कुल कृषि योग्य भूमि में मोटे अनाजों की उपज लगातार कम होती गई। मोटे अनाज में पल्प की मात्रा अधिक होती है जिससे यह आंतों में चिपकता नहीं है और व्यक्ति कब्ज की परेशानी से मुक्त रहता है। अब इन मोटे अनाजों में से कुछ के खास गुणों पर भी थोड़ी चर्चा कर लेना समीचीन होगा। जौ आसानी से पचनेवाले फाइबर का अच्छा स्रोत है। यह रक्त के कोलेस्ट्रॉल को कम करके ब्लड ग्लूकोज में वृद्धि करता है। यह मैग्निशियम का भी अच्छा स्रोत और एंटीओक्सीडेंट है। बाजरा गरम प्रकृति का अनाज माना जाता है। इसलिए आम तौर पर इसका सेवन जाड़े के दिनों में ज्यादा उपयुक्त और लाभकारी रहता है। यह प्रोटीन का भंडार और थायमीन अथवा विटामिन बी का अच्छा स्रोत है। इसमें आयरन, फॉस्फोरस और कैल्शियम भी खूब होता है।

सामान्य गेहूँ में जहाँ कुछ महीने मे इन ही घुन लग जाता है वहीं मड़ुआ के दाने कई वर्षों तक ज्यों के त्यों पौष्टिक बने रहते हैं। सावाँ में गेहूँ की तुलना में 840 प्रतिशत ज्यादा फैट, 350 प्रतिशत फाइबर और 1200 प्रतिशत अधिक आयरन पाया जाता है। कोदो में चावल की तुलना में 600 प्रतिशत अधिक खनिज तत्व पाया जाता है। इसी प्रकार से रागी में गेहूँ की तुलना में कई गुना अधिक कैल्शियम होता है।

कुल मिलाकर यह कहना कतई गलत नहीं होगा की मोटे अनाजों के गुणों की ओर लोगों का ध्यान ही नहीं जा रहा है। चना, मक्का, ज्वार और बाजरा तो फिर भी बाजार में यत्र-तत्र दिखाई दे जाते हैं किंतु अन्य मोटे अनाज तो विलुप्त होने के कगार पर पहुँच चुके हैं। समय की माँग को देखते हुए क्या हम इन मोटे अनाजों को फिर से अपनाकर अपनी सेहत को बेहतर बनाए रखने के लिए जागरूक हो सकेंगे? इसका उत्तर तो आनेवाला समय ही बता पाएगा।

गुलाबचंद यादव बैंक में सेवारत हैं और फिलहाल मुंबई में रहते हैं ।

3 Comments
  1. Yogesh Nath Yadav says

    बेशक मोटे अनाज गायब ही नहीं हो रहे हैं बल्कि जरूरत पड़ने। पर Amazon और flipcart पर हम गांव वालों को भी ढूंढ़ना पड़
    रहा है।

  2. Amrendra kumar Tripathi says

    आपके लेखन में साफ़ झलकता है कि आपको विषय की समझ कितनी स्पष्ट और गहरी है…. मुंबई में रहने के बावजूद भी आप विषय के अनुरूप शब्दों का चयन बड़ी सावधानी और रोचक ढंग से करते हैं.???

  3. Yesh Pal Singh says

    मोटे अनाज अब वापसी कर रहे हैं गुलाब भाई। हम आटे में जों, चना, रागी मिलवा रहे हैं। बहुत अच्छा और उपयोगी लेख लिखा है आपने । हार्दिक बधाई।

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