विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी के बिना मुमकिन नहीं है ‘बहुजन मीडिया’ का खड़ा होना ! 

एचएल दुसाध

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नई सदी में बहुजन बुद्धिजीवियों में बहुजन राज के बाद जिस बात की सर्वाधिक ललक दिखी वह है, बहुजन मीडिया! बात जब मीडिया की चलती है, तमाम बहुजन बुद्धिजीवी ही बहुजन मीडिया की कारुणिक स्थिति देखकर क्षोभ से फट पड़ते हैं। इसके लिए उनमें सर्वाधिक गुस्सा बहुजन नेतृत्व को लेकर दीखता है। प्रायः शत-प्रतिशत बुद्धिजीवी ही बहुजन मीडिया खड़ा न हो पाने के लिए बहुजन नेताओं को दोषी देते हैं। खासकर दलित-पिछड़ों के ‘सुप्रीमो’ टाइप नेता, जब किसी संकट में पड़ते हैं, तमाम बहुजन बुद्धिजीवी एक स्वर में कहते हैं कि यदि इन्होंने अपना खुद का मीडिया खड़ा किया होता, इनकी यह दशा नहीं होती। और जब लोग बहुजन मीडिया खड़ा न हो पाने के लिए लालू-मुलायम, मायावती, रामविलास पासवान जैसों पर दोषारोपड़ करते हैं, लोग ख़ुशी से फट पड़ते हैं। मीडिया को लेकर वर्षों से बहुजन नेताओं को दोषी ठहराने की जो प्रवृति बहुजन बुद्धिजीवियों में देखी जा रही है, उसमें आज भी रत्ती भर बदलाव नहीं आया है, इसका साक्ष्य कुछ दिन पूर्व कांस्टीट्यूशन क्लब में फिर देखने को मिला। जून 18-19 को बहुजन बुद्धिजीवियों का एक बड़ा सम्मलेन कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित हुआ, जिसमें देशभर आये चर्चित बुद्धिजीवियों ने विविध समस्यायों पर अपनी राय रखी। ऐसे बुद्धिजीवियों में एक का वीडियो इस लेखक की नज़रों से गुजरा जिसमें बहुजन मीडिया की दुर्दशा पर बात रखी गयी थी। मैं सामान्यतया वीडियोज की अनदेखी करता हूँ। मुझे बड़े से बड़े लोगों का वीडियो भी पांच मिनट झेलना मुश्किल लगता है, मैं वीडियो के मुकाबले आर्टिकल पढ़ना ज्यादा पसंद करता हूँ। किन्तु कांस्टीट्यूशन क्लब में बहुजन मीडिया पर उस व्यक्ति का संबोधन इतना प्रभावशाली था कि मैं ग्यारह मिनट का वीडियो बिना रुके देख डाला।

बहुत से चालाक सवर्ण संपादक अपनी पहुँच के बल पर, अपनी पत्रिकाओं की सौ-पचास प्रतियाँ निकालकर पचास-पचास हजार का सरकारी विज्ञापन हासिल कर लेते हैं। लब्बोलुआब  यह है कि प्रधानतः सरकारी विज्ञापनों के सहारे ही पत्र- पत्रिकाओं के स्वामी न सिर्फ अपने वर्गहित के अनुकूल विचारों का निर्माण करते हैं, बल्कि रईसों की जिन्दगी जीते हुए पेज-3 में जगह बनाने एवं राष्ट्र और राज्य की राजधानियों के ह्रदय स्थल में अट्टालिकायें खड़ी करते हुए विधान परिषद और राज्यसभा की सीटें तक ‘बुक’ करा लेते हैं।

वक्ता ने बहुजन मीडिया खड़ा न हो पाने के लिए सारा दोषारोपण सुप्रीमो टाइप बहुजन नेताओं पर किया था। वह जब-जब उनका नाम लेकर हमला बोलते, श्रोता तालियों से उनका स्वागत करते। मेरे हिसाब से ग्यारह मिनट के उस वीडियो में  श्रोताओं ने पांच-सात बार तालियों की गड़गड़ाहट से उनका समर्थन किया था। आखिरी में उन्होंने श्रोताओं में जोश भरते हुए कहा था, ’हम यदि ठान लें तो दलित-पिछड़ों से एक-एक दो रुपये लेकर अपना मीडिया खड़ी कर सकते हैं।’ बहरहाल मैं वक्ता के ओजपूर्ण संबोधन से रोमांचित जरुर हुआ, पर कंटेंट से भारी मायूसी हुई। मायूसी इसलिए हुई क्योंकि बाद में पता चला वक्ता बहुजन मीडिया के स्पेशलिष्ट हैं। पहले मुख्यधारा के किसी चैनल में जॉब करते थे अब खुद का चैनल बनाकर बहुजनों की आवाज बुलंद कर रहे हैं। उन्होंने अपने संबोधन में वही बातें दोहराई थीं, जो शत-प्रतिशत बुद्धिजीवी विगत पचीस-तीस वर्षों से कहते रहे हैं। उनके भी संबोधन में आम बुद्धिजीवियों की भांति बहुजन मीडिया खड़ा न होने के पृष्ठ में विज्ञापन निधि से बहिष्कार पर एक शब्द भी नहीं बोला गया। मीडिया को लेकर बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा विज्ञापन निधि की अनदेखी से मैं तबसे परेशान रहा, जबसे लेखन शुरू किया। मुझे लगता रहा हमारे लोग मीडिया का इकॉनोमिक्स बिलकुल ही नहीं समझते, इसलिए बहुजन मीडिया की दुर्दशा में विज्ञापन निधि की भूमिका सिरे से इग्नोर कर देते हैं। इसे देखते हुए जब 15 मार्च, 2007 हमारे नेतृत्व में बहुजन लेखकों का संगठन बहुजन डाइवर्सिटी मिशन (बीडीएम) वजूद में आया, तब उस अवसर पर जारी बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के घोषणापत्र के 10 सूत्रीय एजेंडे में 6वें नंबर पर विज्ञापन निधि में सामाजिक और लैंगिक विविधता के प्रतिबिम्बन का मुद्दा उठाते हुए 64 पृष्ठीय घोषणापत्र के पेज 46-48 पर निम्न बातें विस्तार से लिखा था :-

‘विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी लागू करवाकर आर्थिक विषमता की खाई को पाटने तथा बहुजन मीडिया खड़ा करने में महत्वपूर्ण रोल अदा किया जा सकता है। केन्द्र और राज्य सरकारें अपने कार्यक्रमों, नीतियों और उपलब्धियों को प्रचारित करने के लिए प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये विज्ञापन पर खर्च करती हैं। यह सारा पैसा जाता कहा है? यह सारा खासतौर से वर्ण-व्यवस्था की पोषक उन पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन में जाता है, जिन्हें बहुजन बुद्धिजीवी ट्वायलेट पेपर कहकर खारिज करते रहते हैं। मुख्यतः सरकारी विज्ञापन के सहारे ही हिन्दू आरक्षणवादियों के तीस-तीस, चालीस-चालीस रुपये की लागत के अखबार डेढ़-दो से तीन रुपये में बिकते हैं, फिर भी भारी मुनाफे में रहते हैं। यही हाल सवर्णों की पत्र-पत्रिकाओं का भी है। बहुत से चालाक सवर्ण संपादक अपनी पहुँच के बल पर, अपनी पत्रिकाओं की सौ-पचास प्रतियाँ निकालकर पचास-पचास हजार का सरकारी विज्ञापन हासिल कर लेते हैं।

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लब्बोलुआब  यह है कि प्रधानतः सरकारी विज्ञापनों के सहारे ही पत्र- पत्रिकाओं के स्वामी न सिर्फ अपने वर्गहित के अनुकूल विचारों का निर्माण करते हैं, बल्कि रईसों की जिन्दगी जीते हुए पेज-3 में जगह बनाने एवं राष्ट्र और राज्य की राजधानियों के ह्रदय स्थल में अट्टालिकायें खड़ी करते हुए विधान परिषद और राज्यसभा की सीटें तक ‘बुक’ करा लेते हैं। वहीं, सरकारी विज्ञापनों में हिस्सेदारी न मिल पाने कारण मूलनिवासी समाज के मीडिया के स्वामी सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रकाशित की जाने वाली पत्र-पत्रिकाओं की अकाल मृत्यु का साक्षात करने के लिए अभिशप्त रहते हैं। वहीं सरकारी विज्ञापनों में हिस्सेदारी न मिल पाने के कारण मूलनिवासी समाज के प्रिंट मीडिया के स्वामी सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रकाशित की जाने वाली अपनी पत्र-पत्रिकाओं की मृयु का साक्षात करने के लिए अभिशप्त रहते हैं। लेकिन सवर्ण मीडिया स्वामियों के लिए विज्ञापन निधि के मामले में सरकारी क्षेत्र अगर दरिया है तो निजी क्षेत्र समंदर।

निजी क्षेत्र अपने अनाप-शनाप उत्पादों की ओर उपभोक्ताओं को लुभाने के लिए कहीं-कहीं उत्पादित वस्तुओं की मैनुफैक्चरिंग लागत से कहीं ज्यादा खर्च उसके विज्ञापन पर खर्च करता है। नतीजा, हजारों-हजार करोड़ रुपया विज्ञापन के मद में सवर्ण मीडिया स्वामियों के पास जा रहा है। फलस्वरूप कुकुरमुत्ते को तरह रोज-रोज, नये-नये अखबार, नये-नये टीवी चैनल उगते जा रहे है। अपने उदय के थोड़े ही दिनों में ये चैनल हजारों करोड़ के व्यवसायिक प्रतिष्ठान में तब्दील हो जाते हैं। होंगे भी क्यों नहीं, कुछ-कुछ सेकेंडों के विज्ञापन के लिए इन्हें कई-कई लाख जो मिल जाते हैं लेकिन सड़े-गले और समाज परिवर्तन विरोधी विचारों को बेचकर सुख-ऐश्वर्य की जिन्दगी जीने वाले सवर्णों की वित्त वासना सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा मिलने वाली विज्ञापन राशि से शान्त नहीं हुई। उन्होंने अटल सरकार को, जो 1955 के मंत्रीमण्डल का हवाला देकर प्रिन्ट मीडिया में विदेशी निवेश से पोछे भागती रही, भूमण्डलीकरण के दौर में बन्द पड़े सभी खिड़कियों-दरवाजों को सभी के लिए मुक्त करने का आग्रह कर प्रिंट मीडिया में विदेशी निवेश को अनुमति देने के लिए राजी कर लिया। अटल सरकार के जमाने में शुरू हुआ 26 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आज प्रिन्ट मीडिया में 49 प्रतिशत तक पहुंच गया, वहीं यह इलेक्ट्रानिक मीडिया में 74 प्रतिशत हो गया है। विदेशी मीडिया स्वामी भी भारत में विपुल विज्ञापन राशि का लहराता समंदर देखकर निवेश में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। ऐसे में अगर सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा खर्च की जानेवाली विज्ञापन राशि तथा मीडिया में निवेश होने वाली विदेशी पूंजी में डाइवर्सिटी लागू कर दिया जाय तो आर्थिक विषमता की गैर-बराबरी तो मिटेगी ही, सबसे बड़ी बात यह होगी कि भारत में वैचारिक क्रांति की जमीन तैयार हो जायेगी।

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कारण, तब विज्ञापन निधि के सहारे मूलनिवासी समाज के ढेरों अख़बार और चैनल अस्तित्व में आ जायेंगे, जो मूलनिवासी युवक-युवतियों को मीडिया में रोजगार देने के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तनकारी विचारों को हवा देंगे। इस सम्भावना को देखते हुए बीडीएम विज्ञापन राशि में डाइवर्सिटी लागू करवाने पर विशेष जोर देगा।’ मार्च 2007 में बीडीएम अपने घोषणापत्र में विज्ञापन निधि में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करवाने की घोषणा करने के बाद विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी विषय पर देश के विभिन्न अंचलों में चर्चा करवाकर बहुजन बुद्धिजीवियों में सन्देश देता रहा कि मीडिया की प्राणशक्ति विज्ञापन निधि है और यदि हम विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी लागू करवाने की लड़ाई जीत लेते हैं तो 85 प्रतिशत अखबार और चैनल बहुजनों के होंगे! किन्तु वैकल्पिक मीडिया स्थापित करने में जुटे बहुजन मीडिया स्वामियों पर कोई असर नहीं पड़ा। वे बस लालू-मुलायम, मायावती-पासवान को मीडिया न खड़े करने के लिए कोसकर संतुष्ट होते रहे। ये कभी यह समझने की कोशिश ही नहीं किये कि यदि नेता किसी तरह अपना अख़बार व चैनल शुरू कर भी दें, बहुजनों से एक-एक दो रुपया जुगाड़ करके कोई मीडिया खड़ा भी कर लें तो क्या वह नियमित विज्ञापन के बिना टिकाऊ हो पायेगा?

नई सदी में मीडिया में डाइवर्सिटी लागू करवाने की हिमायत में भूरि-भूरि लेखन करने वाले प्राख्यात बहुजन पत्रकार दिलीप मंडल ने मीडिया का अर्थशास्त्र समझाने में ऐतिहासिक भूमिका अदा की। उन्होंने असंख्य लेखों और पुस्तकों के जरिये यह सत्य स्थापित किया कि मीडिया उद्योग की जान विज्ञापन नाम के तोते में बसती है। इस मामले में 2011 में प्रकाशित उनकी किताब मीडिया का अंडरवर्ल्ड मील का पत्त्थर रही जिसमें उन्होंने साबित किया कि ‘भारत में मीडिया और मनोरंजन के विकास के पीछे मुख्य ताकत विज्ञापनों से मिले पैसे की ही है। 2006-2008 भारतीय विज्ञापन में विकास का दौर रहा। इस दौरान विज्ञापनों कारोबार में औसतन 17.4 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हुई। 2009 में भारतीय विज्ञापन कारोबार 22,000 करोड़ रुपये का हो गया। वैश्विक मंदी और भारत पर उसक असर की वजह से 2008 के मुकाबले 2009 में विज्ञापन कारोबार में मामूली (0.4%) की गिरावट आई। लेकिन 2009-2014 के दौरान विज्ञापन कारोबार का औसत सालाना विकास दर 14 प्रतिशत से ज्यादा होने का अनुमान है।

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आर्थिक माहौल के बदलने से विज्ञापनों से होने वाली आदमनी पर असर जरूर पड़ा है लेकिन विज्ञापन कारोबार के बढ़ने की दर जीडीपी विकास दर के किसी भी अनुमान से ज्यादा है। मीडिया के अलग-अलग माध्यमों की बात करें तो प्रिंट माध्यम के विज्ञापन क बाजार 2009 में 10,300 करोड़ रुपये का था जिसके 2014 में बढ़कर 17,640 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। यानी अगले कुछ वर्षों में प्रिंट के विज्ञापन का कारोबार सालाना 11.4 प्रतिशत की औसत रफ्तार से बढ़ेगा। वहीं, टीवी विज्ञापनों का बाजार 2009 में 8,800 करोड़ रुपये था, जिसके 2014 में बढ़क 18,150 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। प्रतिशत के हिसाब से सालाना बढ़ोतरी का आंकड़ा 15.6 प्रतिशत का रहेगा। बढ़ोतरी का सिलसिला वैश्विक आर्थिक मंदी के कारण विज्ञापन बाजार में आई शिथिलता के बावजूद है। केपीएमजी और प्राइस वाटरहाउस कूपर्स जैसी विश्लेषक कंपनियों का अनुमान है कि भारत में विज्ञापन बाजार पर मंदी का साया जल्द ही छंट जाएगा। चीन और भारत दो देशों के बारे में अनुमान है कि विश्व में विज्ञापनों का बाजार इन देशों में सबसे तेजी से बढ़ेगा।’

बहरहाल, आज से 15 वर्ष पूर्व बीडीएम द्वारा विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी लागू करवाने की लड़ाई लड़ने का सुझाव देने तथा दिलीप मंडल द्वारेक दशक पूर्व विज्ञापन कारोबार के तेजी से विस्तार का निर्भूल नक्शा खींचने के बावजूद पाई-पाई के लिए तरसते बहुजन मीडिया स्वामी कभी सरकारों और निजी क्षेत्र की कंपनियों के समक्ष विज्ञापन निधि में डाइवर्सिटी लागू करने की मांग नहीं रखे, कभी तमाम बहुजन पत्र-पत्रिकाओं के स्वामी मिल-जुलकर विज्ञापन निधि में हिस्सेदारी की मांग को लेकर कभी कोई बैठक नहीं किये। यहाँ सवाल यह पैदा होता है कि यह जानने के बावजूद कि दिलीप मंडल के शब्दों में ’मीडिया उद्योग की जान विज्ञापन नामक तोते में बसती है’, बहुजन मीडिया के लिए लिए रोते-बिलखते बहुजन बुद्धिजीवी विज्ञापन निधि में हिस्सेदारी की लड़ाई क्यों नहीं लड़ते? इस सवाल पर काफी मगजपच्ची करने के बाद एक ही उत्तर मिलेगा, वह है इगो! वास्तव में बहुजन बुद्धिजीवियों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें किसी जीवित व्यक्ति की आइडिया स्वीकारने में अहम को ठेस लगती है। यही कारण है कि ये बहुजन समाज से जुड़ी समस्या के बेहतरीन से बेहतरीन सुझाव का सदुपयोग करने के लिए आगे नहीं आते। वे नए सिरे से लोगों को बंटोर कर समस्या पर विचार करते हैं और जो आधा-अधुरा समाधान मिलता है, उसे लागू करवाने के लिए जोर लगाते हैं। यही कारण है कि नई सदी में दलित-पिछड़ों के हित में सुझाएँ गए ढेरों बेहतरीन एजेंडे व्यर्थ पड़े हैं।

नई सदी में 2002 के जनवरी में दलितों के भोपाल सम्मलेन से जो 21 सूत्रीय ‘दलित एजेडा’ जारी हुआ, उसे राष्ट्र के समक्ष अपनाने की अपील तब तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायण ने की थी। नई सदी में अबतक दलितों के हित में भोपाल घोषणापत्र जैसा एजेंडा न तो आया है और न आगे आने की उम्मीद है, लेकिन उसे दरकिनार कर आज दलित बुद्धिजीवी जगह-जगह सम्मेलन कर दलित मुक्ति का एजेंडा तलाश रहे हैं। भोपाल घोषणा की भांति ही 2007 में बहुजन डाइवर्सिटी मिशन की ओर शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक, के भारत के प्रमुख समाजों के स्त्री-पुरुषों के मध्य न्यायपूर्ण बंटवारे के लिए दस सूत्रीय एजेंडा जारी हुआ। यह एजेंडा भारत की प्रमुख राजनीतिक दलों के घोषणापत्र में शामिल हो चुका है। इस एजेंडे का अनुसरण करते हुए कई राज्य सरकारें नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, धार्मिक न्यासों, मंदिरों के पुजारियों की नियुक्ति, निगमों, बोर्डों, आउटसोर्सिंग जॉब इत्यादि में वंचित जातियों के पुरुषों और महिलाओं को आरक्षण दे चुकी हैं। डंके की चोट पर कहा जा सकता है कि भारत में आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे के साथ शक्ति के स्रोतों के न्यायपूर्ण बंटवारे का परफेक्ट एजेंडा देने में भारत का कोई भी संगठन बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के आसपास नहीं हैं। लेकिन दलित संगठन बीडीएम के दस सूत्रीय एजेंडे को अपनाने के बजाय जगह-जगह सम्मलेन का बहुजन मुक्ति का एजेंडा तलाश कर रहे हैं, क्योंकि बीडीएम के एजेंडे को अपनाने से इनका ‘इगो हर्ट’ होगा। इगो हर्ट की इसी बीमारी के चलते विज्ञापन निधि में हिस्सेदारी का निर्भूल सूत्र सामने आने के बावजूद, बहुजन बुद्धिजीवी इसे लेकर आगे नहीं बढ़ सकते, क्योंकि इससे उनका इगो हर्ट होगा!

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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