Wednesday, February 28, 2024
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तीस हज़ार की आबादी वाला गाँव जहां शहादत की गाथाएँ हैं लेकिन लड़कियों का एक भी स्कूल नहीं

उन्होंने कहा कि यदि ओबीसी के लिए सुरक्षित सीट न होती तो मैं चुनाव नहीं लड़ पाता। यह दीगर है कि वह इस गाँव के सबसे सम्पन्न लोगों में से एक हैं लेकिन जातीय समीकरण सामान्यतः उनके पक्ष में नहीं है। एक टर्म के बाद फिर यह सीट सामान्य हो गई। फिलहाल यहाँ से रवि प्रताप सिंह प्रधान हैं। मुस्तफा साहब ने पहले ही बताया था कि प्रदीप जायसवाल ने बहुत सा अतिक्रमण हटवाया और सार्वजनिक काम किए। मैंने प्रदीप जायसवाल से पूछा कि इतने बड़े गाँव में लड़कियों का एक भी स्कूल नहीं है। ऐसा क्यों? उन्होंने इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया। हालांकि उनका इशारा था कि यहाँ कन्या विद्यालय न होने की कई वजहें हैं। प्रभावशाली लोग नहीं चाहते कि कन्या विद्यालय खुले तो सारी जातियों की लड़कियां एक साथ पढ़ें।

सलेमपुर पहुँचने पर जाने-माने लेखक और बहुजन डायवर्सिटी मिशन के अध्यक्ष एचएल दुसाध ने कहा कि जब आप सतराँव जा रहे हैं तो वहीं पड़ोस में पैना गाँव जरूर जाइये। यह गाज़ीपुर के गहमर की तरह एक बड़ा गाँव है जहाँ किसी ज़माने में ठाकुरों का वर्चस्व रहा है लेकिन अब वे बर्बाद हो रहे हैं। किसी जाति के तमतमे और पतन को देखना हो तो इस गाँव में जरूर जाना चाहिए।

दुसाध का गाँव नरौली खेम सलेमपुर इलाके के प्रसिद्ध गाँव खुखुन्दू के पास है। पैना गाँव में उनकी ननिहाल है जहाँ उनके बचपन के बहुत दिन बीते। वह कहते हैं कि असल में पैना में ही मेरा पालन-पोषण हुआ।

उन्होंने बताया कि इस गाँव में ठाकुरों का ऐसा आतंक रहा है कि कोई दुकानदार वहाँ दुकान करने की हिम्मत नहीं कर सका है। मेरे मित्र अध्यापक योगेशनाथ यादव जब मिले तो मैंने पूछा कि पैना गाँव की खासियत क्या है? उन्होंने बताया कि गाँव बहुत बड़ा है लेकिन वहाँ एक भी दुकान नहीं है। कुछ दिनों पहले मुंबई में रहने वाले एक पहलवान ने अपनी ज़मीन पर एक बाज़ार लगवाना शुरू किया है।

राममनोहर लोहिया महाविद्यालय सतराँव के प्रबंधक दीनानाथ यादव

सतराँव निवासी दीनानाथ यादव, जो जवाहर लाल नेहरू रघुनन्दन इंटर कॉलेज के पूर्व प्राचार्य हैं, ने कहा कि बात तो सही ही है। उस गाँव की आबादी तीस हज़ार से ज्यादा है लेकिन एक भी चाय की दुकान नहीं है। कारण स्पष्ट है। ठाकुरों की दबंगई के आगे किसी को वहाँ पनपने ही नहीं दिया गया।

पैना गाँव में एक उर्दू प्राध्यापक और शायर एसएम मुस्तफ़ा रहते हैं। वे दीनानाथ जी के सहपाठी हैं और कुछ साल पहले मझौली राज में पढ़ाते थे। फोन करने पर पता चला अभी वह मझौलीराज राजघराने के रघुराज प्रताप मल्ल की अंत्येष्टि में शामिल होने मझौलीराज गये हैं। दो बजे तक आएंगे।

तक़रीबन ढाई बजे हम लोग यानि दीनानाथ यादव, मैं और योगेशनाथ यादव पैना गाँव पहुँचे। रास्ते में भारत के प्रधानमंत्री के बारहवें प्रिंसिपल सेक्रेटरी और फिलहाल राम मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन नृपेन्द्र मिश्र तथा देवरिया के पूर्व सांसद हरिकेश बहादुर और उनके पुत्र सांसद रवीद्र प्रसाद का गाँव पड़ा लेकिन सड़कों को देखकर यह तनिक भी नहीं लगा कि हम इतने बड़े-बड़े लोगों के गाँव से गुजर रहे हैं। राम-जानकी राजमार्ग पर स्थित पैना गाँव की गली में घुसते ही जिस पहली चीज ने ध्यान खींचा वह थी ट्रेक्टर से चलने वाली घुमन्तू आटा चक्की। योगेशनाथ यादव ने बताया कि इधर घर-घर जाकर आटा पीसने वाली चक्कियां हैं। जिसको जरूरत होती है वह अपने दरवाजे पर ही आटा पिसवा लेता है। इस गाँव में बिजली है लेकिन किसी ने कभी आटा चक्की नहीं लगवाई।

ट्रेक्टर से चलने वाली घुमन्तू आटा चक्की

हकीमों के परिवार में एक शायर

हमारे पहुँचने के थोड़ी देर बाद एसएम मुस्तफा आए और गर्मजोशी से मिले। थोड़ी ही देर में अच्छा-खासा नाश्ता आ गया। मुस्तफा साहब बी एन इंटर कॉलेज मझौली राज में उर्दू के अध्यापक थे। अब सेवानिवृत्त होकर गाँव में रह रहे हैं। उनकी पत्नी भी एक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका थीं। उनके परदादा, दादा, पिता और बड़े भाई जाने-माने हकीम थे। बहुत बड़े पैमाने पर हकीमी चलती थी। पूरे जवार के लोग यहीं से दवा लेते थे। और कोई डॉक्टर यहाँ नहीं था। मुस्तफा साहब बड़े बातूनी और यारबाश इंसान हैं। उनके पास देवरिया से जुड़े हुये ढेरों किस्से हैं। वह शायर भी हैं और उनकी एक किताब दर्द का सच छप चुकी है।

मुस्तफा साहब बताते हैं कि मोती बीए जो पूर्वांचल के बड़े कवि थे और बरहज में रहते थे। मैं उनके पास जया करता था। उनसे बहुत कुछ जानने-समझने का मौका मिला। मुझे उनसे बहुत प्रेरणा मिली। मेरे बड़े भाई साहब भी शायर थे। गोरखपुर में मुख्य सांख्यिकीय अधिकारी थे। उनसे भी प्रेरणा मिली। मेरे परिवार में एक साहित्यिक माहौल था। मेरे चचा ने उर्दू में पंद्रह-सोलह किताबें लिखीं।

शायर एस एम मुस्तफ़ा

बात की बात में बात निकली कि लोग कहते हैं कि यह गाँव दबंग ठाकुरों का है और वे अपने आगे किसी की चलने नहीं देते। मुस्तफा साहब ने इस बात का लगभग खंडन किया। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है। हम मुस्लिम हैं। हमारी दो-दो मस्जिदें हैं। एक इधर है एक उधर है। मदरसा है। हमलोग बड़ा खुलकर जीवन जिये। यही वजह है कि हमने गाँव छोड़ा भी नहीं। हमने कभी देखा नहीं कि यहाँ के लोगों का किसी पर कोई दबाव रहा हो। पहले के जमाने में तो थी। वह अलग बात है लेकिन अब नहीं है।

उनका कहना है कि सब लोग मिल-जुल कर यहाँ रहते हैं। राजपूतों की संख्या यहाँ ज्यादा है। बाकी जाति-बिरादरी के लोग भी यहाँ रहते हैं। उन्होंने बताया कि इस मकान के पीछे वाला मकान ब्राह्मण का है और उसके बगल ठाकुर लोग हैं लेकिन हम लोगों को कभी दबाया नहीं गया। हम कई पीढ़ियों से यहाँ हैं और सम्मान के साथ रह रहे हैं।

पैना गाँव में स्थापित मस्जिद 

लेकिन उन्होंने बिना हिचक यह कहा कि गाँव का माहौल बहुत ज़हरीला हो चुका है और माहौल अब पहले की तरह नहीं रहा। मंदिर-मस्जिद के झगड़े ने बहुत कुछ तहस-नहस कर दिया। जब हम गाँव में घूम रहे थे तब राजमार्ग के किनारे एक मंदिर में गए जहां एक खूबसूरत पार्क था और कई बच्चे वहाँ खेल रहे थे। पार्क में अनेक पत्थर की बेंचे थीं। उन पर स्पष्ट लिखावट में ग्राम प्रधान रवि प्रताप सिंह का नाम था लेकिन सुनहरी धूप में मानो आसपास सबकुछ अलसाया हुआ हो।

बाद में जब हम शहीद स्मारक देखने के लिए निकले तो उन्होंने रास्ते में पड़ने वाली मस्जिद दिखाई। इस मस्जिद के प्रबन्धक मुस्तफा साहब ही हैं। उन्होंने बड़े दुखी मन से बताया कि अतिक्रमण करने वालों ने मस्जिद की आधे से ज्यादा ज़मीन पर कब्जा कर लिया है। हम किससे-किससे लड़ेंगे?

गदर के दिनों में यहाँ बहुत से लोगों की शहादत हुई थी

अपने गाँव का परिचय देते हुये वह कहते हैं कि ‘यह गाँव घाघरा नदी के किनारे बसा हुआ है। इसी रास्ते से ढाका के लिए जहाज़ जाया करते थे। यहाँ से थोड़ी ही दूरी पर बरहज है जिसके बारे में कहा जाता था बिटविन कानपुर एंड पटना बरहज इज़ मिनी इंडस्ट्रियल प्लेस । एक जमाने में बरहज का रुतबा था। उस समय यहाँ से बाँस, शीरा आदि का व्यवसाय होता था।’

सन 1857 के गदर में इस गाँव के बहुत से लोग शहीद हुये थे। मुस्तफा साहब कहते हैं ‘ठाकुर सिंह इसी गाँव के राजपूत थे। उनके वंशज अभी भी हैं। उनके एक वंशज रघुनाथ सिंह थे। वे यहाँ के प्रथम गुरु थे। उन्होंने स्कूल खोला और गाँव के बच्चों को जुटाकर पढ़ाया करते थे। उनके पोते प्रेम प्रकाश सिंह मंत्री थे। मायावती के शासनकाल में उन्होंने सतिहड़ा के किनारे शहीद स्मारक बनवाया।

घाघरा नदी

‘सतिहड़ा की कहानी यह है कि जब अंग्रेजों ने यहाँ आक्रमण किया तो बहुत सी औरतों को जहाज़ में भर लिया। उनमें से बहुत सी महिलाएँ नदी में कूदकर सती हो गईं लेकिन उनके जहाज़ में उनकी गिरफ्त में नहीं आ सकीं। उनकी याद में भी स्मारक बना हुआ है। इस गाँव पर नदी की तरफ से और सड़क मार्ग दोनों तरफ से आक्रमण हुआ। सात-आठ दिनों तक लड़ाई चलती रही। गाँव जला दिया गया। हमारे भी पूर्वज थे। हमारे परदादा उमराव मियाँ। वह भी मारे गए। उनका भी स्मारक में नाम दर्ज है।

गाँव में हम ठाकुर सिंह के घर के सामने रुके। एक विशाल दो मंज़िला घर बिलकुल जनविहीन था। बुलाने पर भी कोई सामने नहीं आया। गेट में ताला नहीं लगा था। असल में यह भी शहीद स्थल था। हम अंदर गए तो वहाँ काले संगमरमर का एक पट्ट लगा था जिसमें एक वंशावली का विवरण है।

ग्राम पैना में ठाकुर सिंह की वंशावली, जिसमें ठाकुर सिंह नौवीं पीढ़ी के सदस्य थे 

शिला पट्ट से ज्ञात होता है कि कृति कुँवर शाही ने 16 वीं सदी के पहले दशक में पैना ग्राम को स्थापित किया था। ठाकुर सिंह उनके नौवें वंशज थे। ठाकुर सिंह ने अपने दो सगे भाइयों अजराइल सिंह और धज्जू सिंह तथा चचेरे भाई गुरदयाल सिंह के साथ 1857 में विद्रोहियों की ओर से संघर्ष किया था।

इस समय इस परिवार की सोलहवीं पीढ़ी के लोग इस गाँव में रहते हैं। हालांकि अब सभी लोग अपनी नौकरियों के सिलसिले में बाहर हैं। एस एम मुस्तफा बताते हैं कि जो भी गाँव से बाहर एक बार निकला उसने वहीं अपना घर बनवा लिया और फिर वापस गाँव में नहीं आया। अब केवल उनकी ज़मीनें और घर रह गए हैं।

इस गाँव से अधिकतर लोग फौज में भर्ती हुये। मुस्तफा साहब बताते हैं कि सेना में तो लेफ्टिनेंट जनरल तक यहाँ के लोग रहे। लेफ्टिनेंट जनरल कुँवर जय सिंह यहीं के थे। लेफ्टिनेंट कर्नल, कर्नल और मेजर तो कई लोग हुये। अंग्रेजों के जमाने में एक मेजर बसुदेव सिंह थे। वह एन सी सी के संस्थापकों में से थे। सैकड़ों लोग पुलिस की नौकरियों में हैं। और भी बड़े-बड़े ओहदे पर लोग गए।

एक समय एक ठाकुर साव थे

राजपूत बहुल इस गाँव में एक ठाकुर साव थे। मुस्तफा साहब बताते हैं कि वह बनिया थे। उनकी बत्तीस-पैंतीस गाँव की जमींदारी थी। किसी राजपूत ने उनसे कभी छेड़छाड़ नहीं की। उनसे बड़ा कोई पैसेवाला यहाँ कोई और नहीं था। उनकी बहुत बड़ी हवेली थी। बल्कि किला ही था। अब तो सब गिर गया। लेकिन एक ज़माना था जब उनकी बहुत बड़ी हनक थी।

ठाकुर साव के पोते  ज्वाला साव

लौटते हुये वह हमें ठाकुर साव की हवेली दिखने ले गए। लखौरी ईंटों से बना मुख्य द्वार अब ढहाया जा रहा था लेकिन लगता था जैसे इसे गिराने में भी मजदूरों को भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। अंदर एक विशाल अहाता है जिसमें दो बेल और ताड़ के पेड़ बीते जमाने की कहानी कहते हैं। ठाकुर साव की हवेली के दरवाजे और खिड़कियों की नक्काशी अब बदरंग हो रही है। लेकिन इसी जगह पर एक विशाल नया भवन बनकर तैयार हो रहा है। बक़ौल एस एम मुस्तफा ऐसा मकान पैना और बरहज में भी किसी का नहीं है।

हम जब पहुंचे तो ठाकुर साव के पोते  ज्वाला साव ह्वीलचेयर पर बैठे मिले और उनके पुराने सेवक उनके साथ खड़े थे। पता चला उन्हें 2010 में लकवा लग गया था। ठाकुर साव परपोते प्रदीप जायसवाल पूर्व ग्राम प्रधान हैं। प्रदीप जायसवाल ने बताया कि जब यहाँ की सीट ओबीसी के लिए आरक्षित हुई तब उन्होंने प्रधानी का चुनाव लड़ा था।

पैना गाँव के पूर्व प्रधान प्रदीप जायसवाल

उन्होंने कहा कि यदि ओबीसी के लिए सुरक्षित सीट न होती तो मैं चुनाव नहीं लड़ पाता। यह दीगर है कि वह इस गाँव के सबसे सम्पन्न लोगों में से एक हैं लेकिन जातीय समीकरण सामान्यतः उनके पक्ष में नहीं है। एक टर्म के बाद फिर यह सीट सामान्य हो गई। फिलहाल यहाँ से रवि प्रताप सिंह प्रधान हैं। मुस्तफा साहब ने पहले ही बताया था कि प्रदीप जायसवाल ने बहुत सा अतिक्रमण हटवाया और सार्वजनिक काम किए।

मैंने प्रदीप जायसवाल से पूछा कि इतने बड़े गाँव में लड़कियों का एक भी स्कूल नहीं है। ऐसा क्यों? उन्होंने इसका कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया। हालांकि उनका इशारा था कि यहाँ कन्या विद्यालय न होने की कई वजहें हैं। प्रभावशाली लोग नहीं चाहते कि कन्या विद्यालय खुले तो सारी जातियों की लड़कियां एक साथ पढ़ें।

इतने बड़े गाँव में लड़कियों का एक भी स्कूल नहीं

मुस्तफा साहब के यहाँ से निकले तो हम स्कूल और कॉलेज देखने गए। इससे पहले राम-जानकी राजमार्ग पर मंदिर में गए। हाई स्कूल और मंदिर आमने-सामने सड़क के दोनों पार हैं। हाई स्कूल के मैदान में कुछ महीने पहले हुए यज्ञ का पंडाल खड़ा था जो बाँस की खपच्चियों से बनाया गया था। इससे पता चलता है कि पैना गाँव कितना धार्मिक है। खासतौर से हिन्दू धर्म की आस्था इस कदर उमड़ी हुई है कि हाई स्कूल में सात दिनों तक यज्ञादि होते रहे और पढ़ाई बंद थी।

राम-जानकी राजमार्ग पर मंदिर

मंदिर का ताला उस समय बंद था लेकिन जिस एक चीज ने मेरा ध्यान खींचा वह था एक होर्डिंग। ग्राम प्रधान रवि प्रताप सिंह द्वारा लगवाई गई होर्डिंग से पाता चला कि इस इलाके में पहली बार श्रीश्री 1008 सूर्य महायज्ञ एवं श्री राम कथा एवं रासलीला का भव्य आयोजन  नवंबर 2022 में हुआ था। यह तांत्रिक योगी श्याम शरण महाराज कामाख्या शक्तिपीठ वाले की देखरेख में संपन्न हुआ। इस दौरान 1100 कन्याओं द्वारा भव्य कलश यात्रा निकाली गई। मंदिर में मौजूद एक ग्रामवासी से मैंने जानना चाहा कि इस आयोजन में किन लोगों की हिस्सेदारी थी और कलश यात्रा में किन समाजों की कन्याएँ शामिल थीं तो वह कुछ न बोलकर रहस्यमय ढंग से मुस्कराया। इसके कई अर्थ हो सकते हैं। हो सकता है केवल ठाकुर समाज की भागीदारी रही हो। हो सकता है कलश यात्रा में केवल बहुजन कन्याएँ शामिल हुई हों या संभव है सभी समाजों की कन्याएँ रही हों।

लेकिन तीस हज़ार की आबादी वाले इस गाँव में कोई कन्या पाठशाला तक नहीं है। मुस्तफा साहब कहते हैं कि आबादी को देखते हुए यहाँ इंटर ही नहीं महिला डिग्री कॉलेज तक होना चाहिए था। पैना गाँव की लड़कियां बरहज में पढ़ने जाती हैं।

प्राइमरी विद्यालय, हाई स्कूल और इंटर कॉलेज एक ही साथ हैं। प्राइमरी स्कूल में लगता है पिछले ही साल रंग रोगन हुआ है, लेकिन हाई स्कूल की कुछ इमारतें जर्जर हो रही हैं। इंटर कॉलेज का मुख्य गेट बंद था। कुछ सड़क के किनारे खेल रहे थे। मैंने उनसे जानना चाहा कि क्या वे यहाँ पढ़ते हैं? उन्होंने कहा कि वे बरहज पढ़ने जाते हैं। गाँव के एक आदमी ने कहा कि यहाँ कम ही बच्चे रह गये हैं। अच्छे अध्यापक और अच्छी पढ़ाई मुश्किल है।

किसी दुकान में यहाँ चाय नहीं मिल सकती 

लोग बताते हैं कि इस गाँव से जो एक बार बाहर निकला वह फिर मुड़कर इस गाँव में नहीं आया। उसने शहर में ही अपना घर बनवा लिया। इसलिए गाँव में कई घर ऐसे दिखे जहां कहने को भी कोई आदमी न मिला। अभी भी बाहर गए लोगों के खेत और घर गाँव में मौजूद हैं। वे पूरी तरह भले शहरवासी हो गए हों लेकिन उनकी जड़ें अभी भी गाँव में है। कई लोग अपनी ज़मीनें बेच भी रहे हैं और बहुतों ने रख छोड़ा है। यहाँ जो लोग रह गए हैं वे पुरानी हनक बनाए रखना चाहते हैं लेकिन अब समय काफी बादल चुका है। फिर भी पुराना ढर्रा काफी हद तक बना हुआ है। इसका एक पक्ष यह है कि उनके व्यवहार के चलते कोई भी व्यावसायिक गतिविधि यहाँ सफल नहीं होने पाई।

राम-जानकी राजमार्ग पर लगभग डेढ़ किलोमीटर तक फैले इस गाँव में मुश्किल से दो-तीन दुकानें होंगी। इंटर कॉलेज के सामने एक स्टेशनरी की दुकान दिखी तथा एक पंचर बनाने की दुकान थी। एकाध और भी रोज़मर्रा के सामानों की दुकान थी लेकिन चाय की कोई एक दुकान नहीं थी।

बदरे आलम

मैंने पूछा क्या यहाँ के लोग चाय नहीं पीते? एस एम मुस्तफा  के साथ मौजूद पैना गाँव निवासी हेड मुदर्रिस बदरे आलम बोले- किसी ने हिम्मत ही नहीं की। एक अन्य व्यक्ति ने बताया कि एक दो बार चाय-पकौड़े की दुकान खोली थी लेकिन कब तक चलाता! दबंग लोग आते और पकौड़े उठाकर खाते फिर चलते बनते। पैसा कोई देता ही न था। ऐसे में बताइये भला कोई कितने दिन दुकान चलाएगा?

रामजी यादव
रामजी यादव वरिष्ठ कहानीकार और गाँव के लोग के संस्थापक व सम्पादक हैं।

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