आखिर क्यों विषगंगा में बदलती जा रही है कोल्हापुर में पंचगंगा नदी

अलीशा सलीम देसाई

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महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर में बहने वाली पंचगंगा नदी शहर की शान है लेकिन बढ़ते प्रदूषण ने इस शान में बट्टा लगा दिया है। पंचगंगा कृष्णा नदी की एक सहायक नदी है। इस नदी पर कोल्हापुर, इचलकरंजी और आसपास के गांवों के लोग अपनी आजीविका के लिए निर्भर हैं। आज पंचगंगा नदी इतनी बुरी तरह प्रदूषित हो गई है कि इसमें नहाना और इसके पानी का अन्य उपयोग खतरनाक हो गया है। अनेक शोधकर्ताओं ने अपने अध्ययन के दौरान इसके पानी में विभिन्न प्रकार के घातक रसायनों, दूषित तत्वों और रोगाणुओं की भरमार पाया है। उन्होंने खुलासा किया कि कोल्हापुर नाले से अनुपचारित सीवेज और इचलकरंजी के औद्योगिक कचरे  के खुलेआम बहाया जाना पंचगंगा प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। पंचगंगा पर हाल ही में किए गए कार्यों और उनके सर्वेक्षणों से प्राप्त नतीजों के आधार पर इस रिपोर्ट में उन उपायों और तकनीकों की समीक्षा की गई है जिन्हें भविष्य में नदी के प्रदूषण को कम करने के लिए लागू किया जा सकता है।

पंचगंगा महाराष्ट्र में स्थित भारत की महत्वपूर्ण नदी में से एक है। यह नदी चार नदियों के संगम से बनती है: कसारी, कुंभी, तुलसी और भोगवती। कोल्हापुर में पंचगंगा नदी प्राथमिक नदी है, जो नरसोबावाड़ी के पास कृष्णा नदी से मिलने तक जिले भर में 136 किलोमीटर बहती है। वाटर क्वालिटी इंडेक्स (WQI)  के आधार पर, पंचनगंगा नदी बेसिन को तीन क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है अर्थात् उत्कृष्ट जल गुणवत्ता क्षेत्र के रूप में, अच्छी गुणवत्ता वाले क्षेत्र के रूप में और खराब गुणवत्ता वाले नदी जल क्षेत्र के रूप में। अपस्ट्रीम से डाउनस्ट्रीम तक बढ़ने की दिशा में नदी के पानी की गुणवत्ता उत्कृष्ट से खराब गुणवत्ता में बदल जाती है। कोल्हापुर में पंचगंगा के पानी की गुणवत्ता उत्तरोत्तर खराब होती जा रही है क्योंकि बिना ट्रीटमेंट के नालों द्वारा लाया जा रहा कचरा इसे खतरनाक बना रहा है।

एमपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार नदी में 21 नाले गिरते हैं, जिनमें से 12 (लक्षतीर्थ वसाहट, खानविलकर पेट्रोल पंप के पास, दुधली महादेव मंदिर के पास, जूना बुधवार पेठ, सीपीआर के पास, अस्पताल, ताराबाई पार्क के पीछे, नया पैलेस क्षेत्र, रमनमाला जावड़ेकर योजना के पास,  लाइन बाजार, गोलिबार मैदान, और बापट परिसर) कोल्हापुर नगर निगम, 2 इचलकरंजी नगर से और शेष नाले गढ़िंगलाज, बिरदेव मंदिर, तिलवानी, कबनूर, हुपरी, शिरडन से हैं। घरेलू सीवर और औद्योगिक कचरे के प्रवाह ने नदी को प्रदूषित कर दिया है।

पंचगंगा नदी की वर्तमान स्थिति विभिन्न उद्योगों द्वारा नदी में प्रवाहित कचरे के कारण खराब हुई है जिनमें जहरीले रसायन और खतरनाक पदार्थ होते हैं और वे पानी के साथ मिलकर उसे जीवन के लिए घातक बना देते हैं। इसके अलावा अनेक मानवीय गतिविधियों से भी प्रदूषण में वृद्धि होती है। नियमित रूप से कपड़े और पालतू पशुओं को धोने से भी नदी के पानी को नुकसान होता है। कपड़े धोने के दौरान डिटर्जेंट घुलने के कारण पानी का बीओडी और सीओडी स्तर बढ़ जाता है। शहर में बहनेवाले चार प्रमुख नाले जयंती, दुधली, लाइन बाजार और बापट कैंप ने जल जनित बीमारियों और मल-संदूषण को जन्म दिया है। पास के श्मशान में मृत शरीरों को जलाने के बाद राख बहाने से पानी को और अधिक दूषित बनाता है। इसके अलावा चूड़ियाँ, प्लास्टिक की माला, फेंका गया भोजन, रंगीन चूर्ण, विभिन्न अनुष्ठानों के दौरान छोड़े गए बाल भी नदी के पानी की  गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

आमतौर पर नदियों को लेकर लोगों का व्यवहार शहरों और गाँवों में भिन्न-भिन्न दिखता है लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर कई चीजें एक जैसी मिलती हैं। मसलन सांस्कृतिक मान्यताओं और व्यवहारों में नदी के साथ उनका रिश्ता एक जैसा होता है लेकिन उसको लेकर कोई सामाजिक अथवा समूहिक समझ प्रायः नहीं दिखाई पड़ती। यह जरूर है कि शहरी क्षेत्रों के मुक़ाबले देहातों में प्रदूषण कम होता है लेकिन इसके पीछे और भी कई कारण हैं।

होली के दौरान नदी के पानी में लोगों के स्नान करने से भी प्रदूषण बढ़ता है। नहाने के दौरान पानी में घुले जहरीले रंग नदी में जीवित मछलियों के लिए खतरनाक होता है। कई त्योहारों के दौरान नदी में ढेरों मूर्तियाँ  बहायी जाती हैं। बूचड़खानों, मछली बाजार, मोटरसाइकिल और कार आदि से निकलने वाले तेल और ग्रीस के साथ-साथ विभिन्न पेट्रोकेमिकल रंगों के कारण नदी के पानी की गुणवत्ता में परिवर्तन होता है।

पंचगंगा के पानी की प्रचुरता की कद्र नहीं करते किसान

नदी में जल की प्रचुर उपस्थिति के कारण पंचगंगा के किनारों पर खेती की भारी गुंजाइश और सुविधा है। लेकिन पानी कि इस प्रचुरता ने किसानों को इस जीवनदायी नदी के प्रति सरोकारहीन भी बना दिया है। उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं होती कि उनके क्रियाकलापों से नदी को किस तरह खतरा पैदा हो रहा है। किसान खेती के दौरान रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और विभिन्न अकार्बनिक उर्वरकों का उपयोग करते हैं। बरसात के मौसम या बाढ़ जैसी स्थिति के दौरान ये सभी रसायन बारिश के पानी के साथ बहते हैं और नदी के पानी में दूर तक फैल जाते हैं।

नदी के किनारों पर छोटे-छोटे गाँव बसे हैं। उचित स्वच्छता सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीणों द्वारा खुले में शौच किया जाता है जो किसी न किसी रूप में नदी में पानी के साथ मिलता रहता है जिससे नदी दूषित होती है। सभी बड़ी नदियाँ और उनकी सहायक नदियाँ अंततः समुद्र में मिलती हैं और उसे प्रदूषित करती हैं। इस तरह विभिन्न रूपों में प्रदूषण लगातार विकसित होता रहता है।

पानी के प्रदूषित होने पर मछलियाँ मरकर किनारे आ लगीं (साभार- गूगल)

औद्योगिक कचरों में भारी धातुएं, पेट्रोकेमिकल्स, घुलनशील रसायन और ज़हरीले अपशिष्ट नदी के पानी में रहने वाले जीवों, लाभकारी जीवाणुओं और जैव विविधता को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाते हैं। एक निश्चित वातावरण में भारी धातुओं की मौजूदगी मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर समस्याएं पैदा करती हैं। इस प्रदूषित पानी को पीने और घरेलू उपयोग के योग्य बनाने के लिए शोधन की आवश्यकता होती है।

कोल्हापुर में जल शोधन की स्थिति  

कोल्हापुर नगर निगम (केएमसी) ने लोगों को पीने का पानी उपलब्ध कराने के लिए पंचगंगा नदी के शोधन हेतु कोल्हापुर और उसके आसपास 4 जल उपचार संयंत्र स्थापित किए हैं। कलांबा जल उपचार संयंत्र की क्षमता 8 एमएलडी है। शहर के बी वार्ड को पानी उपलब्ध कराने के लिए 50 एमएलडी क्षमता वाले शिंगणापुर पंपिंग स्टेशन से 14 किमी दूर पानी साफ करने के लिए पुईखाड़ी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किया गया है। बावड़ा जल शोधन संयंत्र ई वार्ड और शहर के पूर्वी बाहरी इलाके के 6 गांवों को पानी प्रदान करता है।  इसकी क्षमता 36 एमएलडी है। 41 एमएलडी की क्षमता वाला बालिंगा वाटर ट्रीटमेंट प्लांट भोगवती नदी का पानी साफ करके लोगों को उपलब्ध कराता है।

पंचगंगा नदी कोल्हापुर और इचलकरंजी के साथ-साथ आसपास के गांवों के लिए पीने के पानी और सिंचाई का एक प्रमुख स्रोत है। लेकिन कोल्हापुर और इचलकरंजी शहर जैसे शहरों से नदी में अशोधित कचरा बहाने के कारण प्रदूषण स्तर लगातार बढ़ रहा है। इसलिए नदी प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित किया जाना अत्यंत जरूरी है। समीक्षा अध्ययनों के अनुसार कोल्हापुर और इचलकरंजी शहरों के चीनी और कपड़ा उद्योग बड़े पैमाने पर नदी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं। अनुपचरित औद्योगिक कचरे, घरेलू सीवेज और कृषि-अपशिष्ट सभी प्रदूषण में योगदान करते हैं। दिसंबर 2010 में केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड (सीपीसीबी) द्वारा घोषित राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना (एनआरसीपी) ने पंचगंगा को सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में चिन्हित है। फिलहाल पंचगंगा नदी की प्रदूषण स्थिति का निर्धारण करने के लिए नए तरीके से समीक्षा-अध्ययन किया जा रहा है।

शहरों में आबादी का घनत्व अधिक है। घनी आबादी के कारण घरों का सीवर बहुत बड़ी मात्रा में क्रमशः छोटी-छोटी नालियों से इकट्ठा होते हुये बड़े नालों में जमा होता है और अंततः नदी में पहुँच जाता है। यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है बल्कि यह सभी का काम है। लोग सोचते हैं कि वे टेक्स देते हैं इसलिए सीवर के निस्तारण का काम नगर निगम का है। नगर निगम के पास इसके लिए कोई समुचित परियोजना नहीं है। वह केवल नालियों को दुरुस्त रखता है ताकि वे बहकर सड़क तक न आने लगें। बाकी सारी चीजें चलती रहती हैं।

विभिन्न स्रोतों से पंचगंगा नदी को प्रदूषित करने वाले तत्वों और पानी की अशुद्धता के स्तर को जाँचने के लिए नमूने लिए गए। जाँच के परिणामों से पता चलता है कि नदी के पानी में तापमान, मैलापन, घुलित ऑक्सीजन, कुल घुलित ठोस, क्षारीयता, कठोरता, जैविक ऑक्सीजन, रासायनिक ऑक्सीजन और क्लोराइड तय मापदंडों से बहुत अधिक है।

इस रिपोर्ट में प्रमुख स्रोत विभिन्न नालों से बहने वाला अनुपचारित अपशिष्ट और इचलकरंजी से प्रवाहित अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट तथा प्रदूषण के अन्य संभावित स्रोतों पर आधारित है। उल्लिखित स्थानों पर पानी की गुणवत्ता निर्धारित करने के लिए विभिन्न मापदंडों का अनुमान लगाया जाता है। ए.आर.कुलकर्णी ने पंचगंगा नदी बेसिन के लिए जल गुणवत्ता सूचकांक निर्धारित किया और निम्नलिखित जानकारी दी।

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पंचगंगा नदी के भौतिक रासायनिक मापदंडों के अनुसार नदी का पीएच 7.1 से 7.8 की सीमा तक पहुँच चुका  है और निर्धारित सीमा के भीतर है। शहर से घरेलू कचरा बहाने वाले जयंती नाले के संगम के कारण ईसी और टीडीएस में अचानक वृद्धि हुई है। पेयजल टीडीएस स्तर चार्ट के अनुसार सर्वोत्तम टीडीएस स्तर 300 से नीचे,  300 से 600 के बीच उत्कृष्ट , 600 से 900 के बीच अच्छा,  900 और 1200 के बीच उचित, 1200 से ऊपर खराब तथा इसके ऊपर टीडीएस स्तर अस्वीकार्य है। पंचगंगा नदी के पूरे खंड का डीओ स्थान संख्या 11 को छोड़कर, जहां यह 3.4 से कम है, बाकी सभी जगहों पर 5 मिलीग्राम/एल से ऊपर है। इस तरह बीओडी मान 14.8 मिलीग्राम/ लीटर तक बढ़ जाता है। पानी की कठोरता 58 से 1004 मिलीग्राम/लीटर के बीच है। पीने लायक पानी की कठोरता की आवश्यक सीमा 300 मिलीग्राम/लीटर है। किसी भी नमूने में कॉलीफॉर्म जैविकता 10/100 एमएल से अधिक नहीं होना चाहिए लेकिन एमपीएन मान (अधिकतम संभावित मात्रा) 1 से 1800/100 एमएल की सीमा में था। कोलीफॉर्म एक बैक्टीरिया है जो प्रकृति में मौजूद रहता है और सभी मानव और पशु मल में होता है। इस बैक्टीरिया को हानिकारक नहीं माना जाता है, लेकिन पीने के पानी में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया हानिकारक, रोग पैदा करने वाले जीवों की संभावित उपस्थिति का संकेत दे सकता है।

कोल्हापुर में जयंती नाले की विडंबनाएँ

जयंती पहले एक नदी का नाम था लेकिन समय के थपेड़ों ने उसे नाले में तब्दील कर दिया। दरअसल भारत में सैकड़ों छोटी-छोटी नदियां ऐसी हैं जो या तो सूख गईं या नाला बनकर रह गईं। अब ये नाले शहर भर की गंदगी बहाकर बड़ी नदी तक ले जाने का माध्यम भर रह गए हैं। बहुत से नाले तो लोगों ने पाटकर वहाँ अपने-अपने घर बना लिए। बहुत से गरीब और दलित परिवारों की झोपड़ियाँ नालों के ऊपर या उसके आसपास होती हैं। गंदगी और बीमारियों का माध्यम बनकर रह गए नाले पर्यावरण और पानी की वास्तविक स्थितियों का बयान करते हैं। मुंबई की मीठी और दहिसर नदियाँ भी इन्हीं विडंबनाओं का शिकार होकर नाला बन गईं।

जयंती नाला.कोल्हापुर

कोल्हापुर में कई नाले हैं। जयंती नाला, दुधली नाला, लाइनबाजार नाला, बापट कैंप नाला आदि। इनमें जयंती नाला अन्य 3 नालों की तुलना में बहुत अधिक प्रदूषित और खतरनाक स्थिति में है। इसलिए जयंती नाला और उसकी सहायक नदियों पर ध्यान देना अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि वे अनुपचारित सीवेज प्रवाह को पंचगंगा में ले जाती हैं। सीपीसीबी के अनुसार पेयजल स्रोत 50/100 मि.ली. एमपीएन से अधिक नहीं होना चाहिए।  पंचगंगा एक जल स्रोत है। जयती नाले से निकलने वाले पानी को पीने योग्य नहीं बनाया जा सकता है और इसके उपयोग से पानी से संबंधित बीमारियां भी हो सकती हैं। क्लोरीनीकरण के बाद भी इसका एमपीएन सीपीसीबी के तय मानदंडों के अनुसार नहीं होगा। अगर पीने योग्य बनाने के लिए पानी में क्लोरीन की मात्रा बढ़ा दी जाए तो पेट-दर्द, उल्टी और दस्त, आंखों के लाल होने, त्वचा में रूखापन और खुजली जैसी समस्याएं पैदा होती हैं।

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नदी को सीवेज बनाने की मानसिकता से बाहर आना होगा

आमतौर पर नदियों को लेकर लोगों का व्यवहार शहरों और गाँवों में भिन्न-भिन्न दिखता है लेकिन गहराई से अध्ययन करने पर कई चीजें एक जैसी मिलती हैं। मसलन सांस्कृतिक मान्यताओं और व्यवहारों में नदी के साथ उनका रिश्ता एक जैसा होता है लेकिन उसको लेकर कोई सामाजिक अथवा समूहिक समझ प्रायः नहीं दिखाई पड़ती। यह जरूर है कि शहरी क्षेत्रों के मुक़ाबले देहातों में प्रदूषण कम होता है लेकिन इसके पीछे और भी कई कारण हैं।

ग्रामीण आबादी प्रायः दूर-दूर होती है जिसके कारण वहाँ पानी की नालियाँ बड़े नालों अथवा नदियों तक पहुँचने की स्थिति नहीं आ पाती लेकिन मरे हुये जानवरों, खेती से पैदा होने वाले कचरे का निस्तारण वे नदियों में ही करते हैं। इस तरह नदी का प्रदूषण लगातार बढ़ता जाता है। कोल्हापुर के ग्रामीण इलाकों से गुजरती हुई पंचगंगा नदी प्रदूषण से मुक्त नहीं है।

शहरों में आबादी का घनत्व अधिक है। घनी आबादी के कारण घरों का सीवर बहुत बड़ी मात्रा में क्रमशः छोटी-छोटी नालियों से इकट्ठा होते हुये बड़े नालों में जमा होता है और अंततः नदी में पहुँच जाता है। यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है बल्कि यह सभी का काम है। लोग सोचते हैं कि वे टेक्स देते हैं इसलिए सीवर के निस्तारण का काम नगर निगम का है। नगर निगम के पास इसके लिए कोई समुचित परियोजना नहीं है। वह केवल नालियों को दुरुस्त रखता है ताकि वे बहकर सड़क तक न आने लगें। बाकी सारी चीजें चलती रहती हैं। दूसरी सबसे बड़ी चीज है बहुत बड़ी मात्रा में अनुपचारित औद्योगिक कचरों को नदी में बहाने को लेकर स्पष्ट रणनीति का अभाव जिससे नदी खतरनाक स्तर तक प्रदूषित हो जाती है। इन तमाम बातों को लेकर कोई भी अभियान ईमानदारी से अपनी मंजिल तक नहीं पहुँच पाता।

साफ पानी और मनुष्य एक दूसरे के पूरक हैं। साफ पानी से ही जीवन बच सकता है और मनुष्य अपने व्यवहार से पानी को साफ रख सकता है। यह एक तरह से जीयो और जीने दो का सिद्धांत है। इकाई के रूप में हो या समूह के रूप में लेकिन मनुष्य ने जो व्यवस्था बनाई है उसमें यह सिद्धान्त सर्वोपरि रखना होगा। सीवेज की मानसिकता से बाहर आए बिना किसी नदी को साफ और प्रदूषण-मुक्त रखना असंभव है। चाहे कितना भी अध्ययन और समीक्षा कर लिया जाय लेकिन जब तक इन समस्याओं से लड़ने की इच्छाशक्ति नहीं पैदा होगी तब तक हर चीज न केवल कागज़ी रहेगी बल्कि पंचगंगा ‘विषगंगा’ ही बनती रहेगी।

 

 

 

 

अलीशा सलीम देसाई जैव-रसायन की अध्येता हैं और वर्तमान में कोल्हापुर में नदी-प्रदूषण तथा अन्य पर्यावरण क्षेत्रों में काम कर रही हैं। 

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