ज्ञानवापी मस्जिद प्रकरण के इस पहलू पर भी विचार करिए (डायरी 17 मई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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 मैं कोई अपवाद नहीं हूं जिसके जेहन में यह बात चल रही है कि कल बनारस के ज्ञानवापी मस्जिद प्रकरण में जो कुछ हुआ, उसकी पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। मतलब यह कि यही होना था कि निचली अदालत को ब्राह्मणों के पक्ष में फैसला सुनाना था। और यह सब गैर ब्राह्मणों ने किया। मैं नहीं जानता कि बनारस के सीनियर डिविजन जज रवि कुमार दिवाकर की जाति क्या है। लेकिन यह तो साफ है कि वह शांडिल्य, गर्ग के जैसे ब्राह्मण नहीं हैं। यदि होते तो उनके नाम में झा, मिश्र, तिवारी, पांडे, चौबे, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी या पाठक जैसा सरनेम जरूर होता। इसी आधार पर मैं यह आकलन कर रहा हूं (जो कि मुमकिन है कि गलत भी हो) कि न्यायाधीश महोदय या तो दलित हैं या फिर ओबीसी। एक उदाहरण और देखिए कि ब्राह्मण पक्ष के जिस वकील ने सबसे पहले यह उद्घोषणा की कि मस्जिद के वजूखाने में शिवलिंग मिला है, वह जाति का यादव है। उसका नाम है मदन मोहन यादव।
दरअसल, ब्राह्मण अत्यंत चालाक होते हैं। इसलिए कम संख्या में होने के बावजूद वे सत्ता के शीर्ष पर विराजमान रहते हैं और संसाधनों पर कब्जा रखते हैं। वे जानते थे कि यदि कोई ब्राह्मण जज और ब्राहमण वकील होगा तो लोग तरह-तरह के सवाल उठाएंगे। और ऐसा करने पर उनकी साजिश को बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन नहीं मिल सकेगा। ब्राह्मण कितने चालाक होते हैं, इसे आसानी से समझा जा सकता है कि जब ब्राह्मणों को बाबरी मस्जिद ढहवाना था तब वहां मंदिर निर्माण के लिए नींव डाली और जब वहां पहली ईंट लगाने की बारी आयी तो उन्होंने बिहार के एक दलित को आगे कर दिया। उस दलित का नाम है कामेश्वर चौपाल। भाजपा ने इस दलित को विधान पार्षद भी बनाया। 9 नवंबर, 1989 को इसी दलित के हाथों ब्राह्मणों ने पहली ईंट लगवायी।
मकसद को आसानी से समझा जा सकता है कि ब्राह्मण वर्ग अपनी संख्या को बहुत अच्छे से समझता है और यह भी कि उस समय जब बाबरी मस्जिद ढाहने की बारी आयी तो ब्राह्मणों ने कल्याण सिंह को सीएम बनाया। ताकि मस्जिद तुड़वाने का कलंक किसी ब्राह्मण के माथे पर ना लगे। वैसे भी बाबरी मस्जिद विध्वंस के सारे साजिशकर्ता सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्दोष साबित किये जा चुके हैं अैर कल्याण सिंह इस कलंक के साथ मर गए कि उनके रहते भारतीय संविधान की धज्जियां उड़ाते हुए एक ऐतिहासिक मस्जिद को ढाह दिया गया।

पेरियार की दृष्टि एकदम साफ थी कि कैसे ब्राह्मणों ने भारत के मूलनिवासियों के गढ़ों पर कब्जा किया और उनके उपर अपने मंदिर स्थापित कर लिये। अपने इसी भाषण में वे कहते हैं– 'पुरातत्वविद भली-भांति सिद्ध कर चुके हैं कि हिंदुओं के जितने भी प्राचीन मंदिर हैं, वे पहले कभी बौद्ध विहार थे। यहां तक बताया गया है कि श्रीरंगम, कांचीपुरम, पालनी, तिरुपति आदि मंदिर भी मूल रूप से बौद्ध विहार ही थे। ऐसे मंदिर जो कभी गौतम बुद्ध की आभा से पूरी तरह देदीप्यमान थे, जहां प्यार, अनुराग, समर्पण, सहानुभूति सब कुछ सहज प्राप्य थे, उन मंदिरों को युद्धोन्मादी देवताओं की रम्यस्थली बना दिया। उनके हाथों में जानलेवा हथियार थमा दिए गए। ऐसा कोई हिंदू देवता नहीं है, जो जानलेवा, विध्वंसक हथियारों से न खेलता हो

हमें दलितों और ओबीसी के बारे समाजशास्त्रीय आधार पर सोचना चाहिए। आखिर क्या वजह है कि ये बहुसंख्यक वर्ग ब्राह्मणों की साजिश का शिकार हो रहे हैं? पेरियार का आकलन हमारे लिए आधार हो सकता है।
दरअसल, कल एक आलेख मेरी संज्ञान में आया। हालांकि यह आलेख पेरियार द्वारा दिये गये एक भाषण का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद है। इसके अनुवादक ओमप्रकाश कश्यप हैं। यह भाषण पेरियार ने 15 मई, 1957 को चेन्नई के एगमोरे स्थित महाबोधि संगठम् परिसर में बुद्ध की 2501वीं जयंती के मौके पर आयोजित समारोह में दिया था। ब्राह्मणवाद के नस-नस को जानने और समझने वाले पेरियार ने कहा था– ‘तीन-चौथाई से अधिक पुराणों का लेखनकाल बुद्ध के बाद का बताया गया है। बुद्ध द्वारा प्रचारित तर्कवादी शिक्षा के विरोध में, उसकी ओर से लोगों का ध्यान हटाने तथा उन्हें ब्राह्मणवाद की ओर आकृष्ट करने के लिए पौराणिक ऋषियों ने अवतारों की मनगढंत कहानियां रचीं। कृष्ण को उनका मुखिया बनाया गया। हिंदू देवी-देवताओं के चमत्कारपूर्ण कारनामे हमेशा ही लोगों के विशिष्ट आकर्षण और उत्तेजन का कारण रहे हैं। कृष्ण महाकाव्य तो पूरी तरह कामुकता और फूहड़पन से भरपूर है। इतना कुछ होने के बाद, उसे दैवीय भी घोषित कर दिया गया। भगवदगीता को तो महाभारत में बहुत बाद में, आगे चलकर जोड़ा गया था।’

 पेरियार की दृष्टि एकदम साफ थी कि कैसे ब्राह्मणों ने भारत के मूलनिवासियों के गढ़ों पर कब्जा किया और उनके उपर अपने मंदिर स्थापित कर लिये। अपने इसी भाषण में वे कहते हैं– ‘पुरातत्वविद भली-भांति सिद्ध कर चुके हैं कि हिंदुओं के जितने भी प्राचीन मंदिर हैं, वे पहले कभी बौद्ध विहार थे। यहां तक बताया गया है कि श्रीरंगम, कांचीपुरम, पालनी, तिरुपति आदि मंदिर भी मूल रूप से बौद्ध विहार ही थे। ऐसे मंदिर जो कभी गौतम बुद्ध की आभा से पूरी तरह देदीप्यमान थे, जहां प्यार, अनुराग, समर्पण, सहानुभूति सब कुछ सहज प्राप्य थे, उन मंदिरों को युद्धोन्मादी देवताओं की रम्यस्थली बना दिया। उनके हाथों में जानलेवा हथियार थमा दिए गए। ऐसा कोई हिंदू देवता नहीं है, जो जानलेवा, विध्वंसक हथियारों से न खेलता हो। ये दिखाते हैं कि भगवान बनने के लिए उस सत्ता के खाते में कुछ हत्याओं का होना जरूरी है।’

अब यहां से समझा जा सकता है कि ब्राह्मण किस कदर चालाक रहे हैं। लेकिन मैं यह समझने की कोशिश कर रहा हूं कि आखिर क्या वजह है कि उत्तर भारत के दलित और पिछड़े इस सच को समझ नहीं पा रहे? मुझे लगता है कि ब्राह्मणों ने दलितों और पिछड़ों में अहंकार भर दिया है कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं। पिछड़ों में सबसे मजबूत जाति यादवों को तो यह कहा गया कि उनका कृष्ण हमारा देवता है। आज सारे यादव कृष्ण के आगे नतमस्तक हैं। क्या मजाल है कि कोई कृष्ण को कुछ कह दे। सब लाठी लेकर सड़क पर उतर जाएंगे। वैसे ही रैदास और वाल्मीकि के जरिए दलितों में अहंकार भर दिया गया है।

 दलितों में एक अहंकार और आया है। यह अहंकार है आंबेडकर का। आंबेडकर एक खूंटा बनते जा रहे हैं, जिससे बंधी डोर दलितों के गले में बंधी है। दलित उन्हीं आंबेडकर को महान मानते हैं जिन्होंने जाति का विनाश करने के लिए ब्राह्मणवाद को डायनामाइट से उड़ाने तक की बात कही थी। लेकिन दलित ब्राह्मणों के जैसे मूर्तिपूजा कर रहे हैं और आंबेडकर को भी केवल मूर्ति भर मान लिया है। वे आंबेडकर की मूर्तियों के आगे धूप-अगरबत्ती जला रहे हैं। शीश झुका रहे हैं। जबकि आंबेडकर ने चाहा था कि इस देश के तमाम वंचितों का सिर नहीं झुकने पाये।

अजीब विडंबना है कि जिन दलितों और ओबीसी को ब्राह्मणवाद का खात्मा कर अपने हजारों वर्षों की वंचना को खत्म करना चाहिए था, आज वे ही ब्राह्मणवाद के लठैत बनते जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की खंडपीठ आज सुनवाई में क्या करेगी। वजह यह कि ब्राह्मण अपने नापाक मंसूबे में कामयाब हो चुके हैं। उन्होंने मस्जिद के वजू खंड में लगे फव्वारे को शिवलिंग साबित कर दिया है। निचली अदालत ने ब्राह्मणों की अर्जी पर आननफानन में बिना दूसरे पक्ष की दलील सुने वहां नौ ताले जड़वा दिये हैं और सीआरपीएफ जवानों की एक टुकड़ी तैनात कर दी गयी है। मस्जिद में भी बीस लोगों से अधिक नमाजियों को नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी गई है।

 

कल की ही बात है। मैंने फेसबुक पर टिप्पणी लिखकर आपत्ति दर्ज की कि बुद्ध जयंती को बुद्ध पूर्णिमा लिखना गलत है। मेरी इस टिप्पणी पर दो बड़े दलित अध्येताओं – मोहनदास नैमिशराय व हेमलता महिश्वर – ने आपत्ति दर्ज की। नैमिशराय जी की टिप्पणी रही कि जयंती और पूर्णिमा में क्या अंतर है। वहीं हेमलता महिश्वर ने जो लिखा है, उसे हू-ब-हू रख रहा हूं– ‘यह कहा गया है कि सिद्धार्थ का जन्म, सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्ति और बुद्ध का महापरिनिर्वाण वैशाख पूर्णिमा को ही हुआ। यदि जयंती ही याद की जाती है तो बाक़ी दोनों घटनाएँ भूला दी जाएँगी। इसीलिए कई लोगों को आप देखेंगे कि वे त्रिविध या तिरगुन बुद्ध पूर्णिमा लिखते हैं।’
आश्चर्य होता है जब ऐसे तर्क दिये जाते हैं। बुद्ध ने चमत्कारों को खारिज किया था और बुद्धि की बात कही थी। बुद्ध ने कहा था कि जो बुद्धिमान है, वही बुद्ध है। बुद्धि भी ऐसी जो मानवता का पक्षधर हो। बुद्धि जो सृजन करता हो। ब्राह्मणों के जैसे विनाशकारी बुद्धि नहीं।
खैर, मैंने हेमलता जी से कहा है कि बुद्ध के जन्म के संबंध में जो बातें उन्होंने कही हैं, उसके बारे में विस्तार से लिखूंगा। फिलहाल तो मैं यह सोच रहा हूं कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा की खंडपीठ आज सुनवाई में क्या करेगी। वजह यह कि ब्राह्मण अपने नापाक मंसूबे में कामयाब हो चुके हैं। उन्होंने मस्जिद के वजू खंड में लगे फव्वारे को शिवलिंग साबित कर दिया है। निचली अदालत ने ब्राह्मणों की अर्जी पर आननफानन में बिना दूसरे पक्ष की दलील सुने वहां नौ ताले जड़वा दिये हैं और सीआरपीएफ जवानों की एक टुकड़ी तैनात कर दी गयी है। मस्जिद में भी बीस लोगों से अधिक नमाजियों को नमाज पढ़ने पर रोक लगा दी गई है।
लेकिन इस सबके बावजूद मैं यह सोच रहा हूं कि सुप्रीम कोर्ट के विद्वान जजद्वय इंसाफ करेंगे। मैं भी कितना नासमझ हूं ना?

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

ऐसा बहुत कुछ जिसे हम पत्रकारिता समझ कर देख-पढ़ रहे हैं दरअसल..

खबरों में शीर्षकों का खेल कितना समझते हैं आप? (डायरी 16 मई, 2022) 

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