सुप्रीम कोर्ट लिंग का मतलब समझती होगी, यह अपेक्षित है (डायरी 18 मई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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धर्म का जीवन में अहम स्थान है। इससे मैं भी इंकार नहीं करता। लेकिन मेरे लिए धर्म का कोई महत्व नहीं है। फिर चाहे वह कोई भी धर्म हो। और मेरी ख्वाहिश ऐसी भी नहीं है कि सब मेरी तरह हो जाएं। हालांकि यह ख्वाहिश जरूर है कि तमाम तरह के पाखंड खत्म हों और वैज्ञानिक विचारों से लैस हों। मैं अपने घर में भी यही करता हूं। मैं अपने परिजनों को विज्ञान के बारे में बताता हूं। उनके मन में बैठे अंधविश्वास के बारे में समझाता हूं और उसके नुकसान के बारे में भी। लेकिन अपने विचार कभी नहीं थोपता।

हाल की ही बात है। मैं हिमाचल प्रदेश के रोहतांग में था। मेरे साथ मेरी पत्नी रीतू भी थी। वहां काकसार नामक एक गांव तक हम जा सके थे। वहां ब्यास नदी हमारी हमराह थी। यह एक पहाड़ी नदी है। हिमालय के उस हिस्से से सैकड़ों जलप्रपात थे और ब्यास नदी में पानी की अविरल धार बह रही थी। निस्संदेह यह हमारे लिए पहला मौका था, जब हम नदी को ऐसे देख रहे थे। हालांकि बिहार में मेरे गांव के बगल में एक बरसाती नदी है। नाम है पुनपुन। एक बार हमदोनों ने इस नदी का 70 फीसदी हिस्सा देखा था। लेकिन ब्यास नदी की तस्वीर अलहदा थी।

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खैर, रीतू ने इच्छा व्यक्त की कि उसे ब्यास नदी में धार के बीच बैठना है। इंकार करने की कोई वजह नहीं थी। एक जगह जहां अनेक लोग पहले से मौजूद थे, हम रूके। मैंने वहां देखा कि अनेक लोग पत्थर उठा रहे हैं। मुझे लगा कि सब ब्यास नदी से अपने लिए कोई यादगार निशानी लेकर जाना चाहते हैं। लेकिन उनके पत्थर उठाने की प्रक्रिया अलग थी। वह एक खास आकार का पत्थर उठा रहे थे और उसे माथे से लगा रहे थे। खास आकार का मतलब लिंग के आकार का। इस बीच रीतू भी एक पत्थर उठाकर ले आयी। पहले तो बहुत गुस्सा आया। लेकिन मैं अपनी आदत से मजबूर और वह अपने अंधविश्वास को लेकर मजबूर। मैंने समझाया लेकिन मेरे समझाने का उसपर कोई असर नहीं हुआ। इस बीच उसने पूछा कि सब झूठ है तो इस नदी का नाम ब्यास क्यों है? और नीचे मनाली में हिडिंबा का मंदिर क्या वह भी झूठ है?

मेरी पत्नी भी इसी समाज का हिस्सा है, जिसके दिमाग में बैठा दिया गया है कि कोई एक ईश्वर है, जो कभी सूअर बन जाता है तो कभी कछुआ, कभी नरसिंह तो कभी आम इंसानों के जैसा। ऐसे मिथक क्यों जरूरी हुए होंगे, यह जानना-समझना कठिन नहीं है। यह समझना भी कठिन नहीं है कि सारे देवताओं के हाथों में प्राणघातक हथियार क्यों हैं। वजह यह कि धर्म के विस्तार के लिए लोगों को भयभीत करना बहुत जरूरी है। लोग भयभीत नहीं होंगे तो वे भक्ति नहीं कर सकते।

मैंने अपने हिसाब से उसे समझाया। उसे ब्यास नदी के बारे में बताया। फिर नदियों की मौलिक अवधारणा के संबंध में भी। लेकिन मेरे समझाने का कोई असर न हुआ।

खैर, मैं परिणाम से निराश नहीं हुआ। वजह यह कि मेरी पत्नी भी इसी समाज का हिस्सा है, जिसके दिमाग में बैठा दिया गया है कि कोई एक ईश्वर है, जो कभी सूअर बन जाता है तो कभी कछुआ, कभी नरसिंह तो कभी आम इंसानों के जैसा। ऐसे मिथक क्यों जरूरी हुए होंगे, यह जानना-समझना कठिन नहीं है। यह समझना भी कठिन नहीं है कि सारे देवताओं के हाथों में प्राणघातक हथियार क्यों हैं। वजह यह कि धर्म के विस्तार के लिए लोगों को भयभीत करना बहुत जरूरी है। लोग भयभीत नहीं होंगे तो वे भक्ति नहीं कर सकते।

एक भय जो इस देश के ब्राह्मणों ने लोगों के दिमाग में भर दिया है, वह यह कि मरने के बाद भी स्वर्ग और नर्क का फैसला होता है। हालांकि यह केवल ब्राह्मण धर्म में ही नहीं है। असल में ब्राह्मण धर्म का अपना कुछ है भी नहीं। सारी मान्यताएं दूसरों से चुरायी गयी प्रतीत होती हैं। तो मरने के बाद कर्मों का लेखा-जोखा किया जाता है, यह बात लोगों के दिमाग में बिठा दी गयी है। अब लोग हैं कि इहलोक यानी धरती की चिंता छोड़ परलोक की चिंता में सारा जीवन गुजार देते हैं। यह लोभ और भय का कमाल का कंपोजिट इफेक्ट है।

लेकिन एक मिथक जरा अलग है। वह है लिंग का। हालांकि यह सभी नरों में पाया जाता है और सभी इसकी उपयोगिता जानते हैं। यह संभोग के लिए इस्तेमाल किया जाता है और मूत्र त्याग करने के लिए भी। जितना महत्व लिंग का है उतना ही महत्व योनि का भी है। लेकिन ब्राह्मण धर्म में लिंग को अधिक महत्व दिया गया है। ऐसा इसलिए भी क्योंकि ब्राह्मण धर्म पितृसत्ता को स्थापित करता है। हालांकि ब्राह्मणों ने नारियों के लिए यह जरूर कहा है कि – या देवी सर्व भूतेषू शक्ति रूपेण संस्थिता:। लेकिन योनि की पूजा का उल्लेख बहुत कम ही मिलता है। मैंने ऐसा सुना है कि आसाम के गुवाहाटी में कौड़ी कामख्या का मंदिर है, जिसके बारे में मान्यता है कि वहां सती की योनि गिरी थी और वहां जो शक्तिपीठ है, वहां योनि की पूजा की जाती है। वैसे कौड़ी कामख्या को तंत्र विद्या के लिए भी जाना जाता है।

मैं उनसे यह उम्मीद कर रहा था कि वे निचली अदालत के उस फैसले को खारिज करेंगे जिसमें एक फव्वारे को लिंग बताया गया है। सबसे पहले जजद्वय को यह जांच करने का आदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को देना चाहिए था कि जिसे लिंग बताया जा रहा है, वह लिंग है भी या नहीं। लेकिन जजद्वय ने उसे सुरक्षित करने का आदेश दिया है। हालांकि यह मामले का आगाज है। संभव है कि कल यानी 19 मई को जजद्वय लिंग और फव्वारे का सच सामने लाने का आदेश देंगे। और यह भी मुमकिन है कि नहीं दें। अब इसका कोई कानून तो है नहीं। क्योंकि हमारे यहां कानून का मतलब बहुमत की भावना है।

तो बात लिंग की ही करते हैं। यह ब्राह्मण धर्म माननेवालों के दिमाग में इस कदर बैठ गया है कि शब्द भी कम पड़ते हैं। मैंने एक बार अपने पिता से ही पूछा था। तब मैं बारहवीं का छात्र था। मेरे पिता एक मंदिर बनवाना चाहते थे। शिव का मंदिर। हालांकि बाद में उन्होंने यह विचार ही त्याग दिया। यदि ऐसा नहीं होता तो पटना में आज जिस जमीन पर मेरा घर है, वहां पहले शिवालय होता और मेरा घर उसके पीछे। मैंने पापा से पूछा कि लोग माथे पर लेप क्यों लगाते हैं? पापा ने तो कुछ नहीं बताया। बगल में एक लंगोटिया दोस्त ने बाद में बताया कि यह बाबा का बीज है जो प्रतीक स्वरूप माथे पर लगाया जाता है।

अब इससे अधिक वाहियात बात क्या होगी भला?

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खैर, मैं सुप्रीम कोर्ट के जजद्वय डीवाई चंद्रचूड़ और पीएस नरसिम्हा के कल के फैसले के बारे में सोच रहा हूं कि उन्होंने जहर फैलाने के लिए बोये गए एक बीज को संरक्षण प्रदान कर दिया है। कहां मैं उनसे यह उम्मीद कर रहा था कि वे निचली अदालत के उस फैसले को खारिज करेंगे जिसमें एक फव्वारे को लिंग बताया गया है। सबसे पहले जजद्वय को यह जांच करने का आदेश भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को देना चाहिए था कि जिसे लिंग बताया जा रहा है, वह लिंग है भी या नहीं। लेकिन जजद्वय ने उसे सुरक्षित करने का आदेश दिया है। हालांकि यह मामले का आगाज है। संभव है कि कल यानी 19 मई को जजद्वय लिंग और फव्वारे का सच सामने लाने का आदेश देंगे। और यह भी मुमकिन है कि नहीं दें। अब इसका कोई कानून तो है नहीं। क्योंकि हमारे यहां कानून का मतलब बहुमत की भावना है। ठीक वैसे ही जैसे बाबरी मस्जिद की जमीन को बहुमत की भावना के आधार पर ब्राह्मणों को दे दिया गया था। यह काम भी सुप्रीम कोर्ट ने ही किया है।

मुझे लगता है कि मुझे कुछ अच्छा साहित्य पढ़ना चाहिए। फिलहाल जो कुछ हो रहा है, उसने मेरा स्वाद बिगाड़ दिया है।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

3 Comments
  1. दीपक शर्मा says

    वाजिब सवाल उठाया है आपने सर।

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