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हिंसा का उत्सव जायज नहीं (डायरी 12 अक्टूबर, 2021)

किसी महिला के आठ-दस-बारह हाथ कैसे हो सकते हैं? पहली बात तो यह कि ऐसा हो ही नहीं सकता है क्योंकि हर बांह का कंधे से जुड़ाव आवश्यक है। हर बांह के लिए एक विशेष हड्डी की आवश्यकता होगी जिसका संबंध कंधे से हो। फिर हर बांह की मोटाई होती है। ऐसे में कंधे से एक से अधिक बाहों का जुड़ाव कैसे मुमकिन है?

आडंबर और पाखंड से कोई धर्म नहीं बचा हुआ है। या कहिए कि हर धर्म में केवल और केवल आडंबर और पाखंड ही है। फिर चाहे वह कोई भी धर्म हो। अभी इसी साल मैं राजस्थान के भरतपुर गया था, वहां का पक्षी विहार घूमने। मेरे साथ मेरे दो मित्र और थे। हम वापसी में फतेहपुर सीकरी गये। आगरा से पहले वह मुगलों की राजधानी थी। वहां एक दरगार है। वहां पहुंचा तो एक स्थानीय गाइड ने बताया कि यह जिस पीर की दरगाह है, उसी के आशीर्वाद से अकबर और जोधा को पुत्र सलीम की प्राप्ति हुई। दोनों ने अपने पुत्र का नाम उसी पीर के नाम पर रखा।

जब मैं वहां था और मेरे मन में इच्छा थी कि उस भव्य दरगाह की स्थापत्य कला को अंदर से देखूं। वजह यह कि बाहर से वह दरगाह अत्यंत ही भव्य लग रहा था। एक विस्तृत भव्य परिसर के बीचों-बीच है वह दरगाह। वहां मौजूद एक व्यक्ति जो मजार पर चढ़ाने के लिए चादर और कुछ अन्य सामग्री बेच रहा था, उसने मुझे पहले वजू करने को कहा। हिंदू धर्म में हमारे यहां आचमन करने का पाखंड है। मतलब यह कि आप केवल दो-चार बूँद पानी अपने ऊपर छिड़क लेने से पवित्र हो सकते हैं। वैसे ही इस्लाम में वजू करने का प्रचलन है। बस हाथ-पैर-चेहरा धोइए और फिर आप खुदा के दरबार में जाने की योग्यता पा सकते हैं। मैंने उस व्यक्ति से कहा कि मैं नास्तिक हूं और इसलिए ऐसा नहीं कर सकता। उसने मुझे स्पष्ट शब्दों में कहा कि तब आप दरगाह के अंदर नहीं जा सकते।

पहले तो विचार आया कि उस आदमी के कहे का विरोध करूं और जिस बात की इजाजत मुझे संविधान देता है, उसका उपयोग करूं। ऐसी ही एक घटना तब हुई थी जब गुरू गोविंद सिंह का विशेष प्रकाश वर्ष मनाया जा रहा था। मेरे बच्चों की इच्छा रही कि उन्हें पटनासाहिब का गुरुद्वारा दिखा दूं। वहां भी पैर धोने की परंपरा है। वहां तो खैर गुरुद्वारा परिसर में प्रवेश से पहले ही पानी का इंतजाम था तो बिना कुछ किए ही मैं ‘पवित्र’ हो गया था। लेकिन असली बाधा तो तब आयी जब एक सेवादार ने मुझे आगे बढ़ने से रोक दिया। उसने कहा कि मैं माथे पर कोई कपड़ा रखूं तभी अंदर जाने की अनुमति मिलेगी। मैंने वहां भी कहा कि मैं नास्तिक हूं और मुझे जाने की अनुमति दी जाय। मेरे इस कथन पर उस सेवादार ने इतना अवश्य किया कि अपने वरिष्ठों को तत्काल इसकी जानकारी दी। तीन जने आए जो बुजुर्ग थे। उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा कि यह हमारी परंपरा के खिलाफ होगा। हम इसकी इजाजत नहीं दे सकते।

उस दिन मैं अपने ही शहर में अपने मौलिक अधिकार से वंचित किया जा रहा था। लेकिन मेरे साथ बच्चे थे। उनके चेहरे पर उदासी छा गयी। उन्हें लगा कि अब तो अंदर जाना मुमकिन ही नहीं। फिर मैंने समझौता किया और उसी सेवादार ने मुझे एक केसरिया रंग का रूमाल दिया।

निश्चित तौर पर यदि उस दिर मेरे साथ मेरे बच्चे न होते और वे समझदार होते तो मैं उस दिन गुरुद्वारे का बहिष्कार करता। ठीक वैसे ही जैसे फतेहपुर सीकरी के उस दरगाह का किया। मैं अंदर नहीं गया। मुझे इस बात का मलाल जरूर रहा कि उसका स्थापत्य नहीं देख सका।

एक उदाहरण और है। पटना से नालंदा की दूरी बहुत अधिक नहीं है। इसी जिले में है राजगीर। वहां जैन और बौद्ध धर्म से जुड़े कई स्थल हैं। रमणीक स्थल तो है ही। वहां एक गर्म पानी का कुंड है। वहां प्रवेश स्थल पर ही लिखा है – गैर हिंदुओं के लिए प्रवेश वर्जित है।

अब इस तरह के आडंबर और पाखंड हो और उन्हें सरकारी व सामाजिक संरक्षण मिलता रहा तो वर्जनाएं टूटने से रहीं।

अब कल की ही बात है। एक वरिष्ठ मित्र मुझे दुर्गा के नौ रूपों के बारे में विस्तार से बताने लगे। चूंकि मैं बहुत अच्छा श्रोता हूं तो सुनता रहता हूं। दुर्गा रूप की चर्चा खत्म करने में उन्होंने आधा घंटे से भी अधिक समय लिया। मैंने उनसे कहा कि किसी महिला के आठ-दस-बारह हाथ कैसे हो सकते हैं? पहली बात तो यह कि ऐसा हो ही नहीं सकता है क्योंकि हर बांह का कंधे से जुड़ाव आवश्यक है। हर बांह के लिए एक विशेष हड्डी की आवश्यकता होगी जिसका संबंध कंधे से हो। फिर हर बांह की मोटाई होती है। ऐसे में कंधे से एक से अधिक बाहों का जुड़ाव कैसे मुमकिन है? मेरे सवाल का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि दरअसल दुर्गा के जितने हाथ है और हर हाथ में जो शस्त्र-अस्त्र दिखाये जाते हैं, उन सबका महत्व है। दुर्गा के पास तो केवल दो ही हाथ थे और उन दोनों हाथों से ही उन्होंने सृष्टि की रचना भी की और दुष्टों का संहार भी किया। उनके कहने का मतलब यह था कि दुर्गा बहुआयामी प्रतिभा की धनी थीं।

तर्क इन मान्यताओं का खारिज करता है। मैं भी इसमें विश्वास करता हूं कि इस तरह का पाखंड व आडंबर केवल और केवल ब्राह्मण धर्म जिसके मूल में वर्चस्ववाद को बनाए रखना है, के लिए आवश्यक है। हर साल हिंसा का उत्सव मनाना कहीं की बौद्धिकता है। महिषासुर का चित्रण जिस रूप में किया जाता है, वह निहायत ही घटिया है। एक बार मैंने झारखंड के मुख्यमंत्री रहे शिबू सोरेन का साक्षात्कार किया था। अपने उसा साक्षात्कार में उन्होंने खुद को महिषासुर का वंशज और रावण को अपना गुरू माना था। जब वे मुख्यमंत्री थे तब मोहराबादी मैदान में रावण वध कार्यक्रम में भाग लेने से मना कर दिया था। हर साल छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक और बिहार आदि राज्यों से मेरे पास सूचनाएं आती हैं जिनमें हिंसा के उत्सव दशहरा का विरोध किया जाता है। इस साल पटना के आसपास के इलाके में 9 जगहों पर दुर्गापूजा के विरोध में महिषासुर को पुरखा मानकर कार्यक्रमों के आयोजन के संबंध में जानकारी मिली है। वहीं कर्नाटक के मैसूर में होनेवाले आयोजन भी इस साल महत्वपूर्ण होगा।

अभी दो साल हुए। छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में जितेंद्र मरावी उर्फ सोनू मरावी नामक एक 19 साल के नौजवान ने खुदकुशी कर ली थी। वह महिषासुर और रावण का नकारात्मक चित्रण करने के ब्राह्मणवादी आडंबर का विरोधी था। वह एक बड़े अभियान का संचालन कर रहा था। लेकिन ब्राह्मणवादियों ने उसके पिता पर दबाव बनाया कि वह अपने घर में दुर्गापूजा कराए। उसके पिता प्रभाव में आ गए और उन्होंने अपने घर में पूजा कराया। इससे दुखी होकर 9 अक्टूबर, 2021 को साेनू ने खुदकुशी की। इस संबंध में मैंने एक रपट कारवां पत्रिका के लिए लिखी, जिसका शीर्षक था – घर में जबरन दुर्गा पूजा कराए जाने से निराश आदिवासी युवा ने दी जान।

खैर, मैं समाज में दो तरह के परिवर्तन देख रहा हूं। एक तो यह कि ब्राह्मणवादी संस्कृति जिसका सबसे बड़ा पैरोकार आरएसएस है, वह अत्यंत ही आक्रामकता के साथ पैर पसार रहा है। अन्य धर्मावलंबियों के अधिकारों को सीमित किया जा रहा है। कल की ही बात है। मध्यप्रदेश के इंदौर में कुछ लोगों को इस आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है कि वे धर्मांतरण हेतु पुस्तिकाओं का वितरण कर रहे थे। मैं सोच रहा हूं कि वे जो मुफ्त में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को हनुमान चालीसा, रामायण और गीता आदि बांटते फिरते हैं, क्या उन्हें गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए? दूसरा परिवर्तन यह कि हिंदी पट्टी में ब्राह्मणवाद का विरोध बढ़ा है। हालांकि इसका दायरा बहुत छोटा है। इसके बावजूद प्रतिगामी संस्कृति के खिलाफ यह बदलाव सुकून देनेवाला है।

कल ही पटना के वरिष्ठ साथी आशीष झा से बात हो रही थी। उनका कहना है कि सनातन धर्म में वैष्णव व शैव के अलावा भी एक पंथ है। यह पंथ है – शाक्त। यह शक्ति को महत्वपूर्ण मानता है। इसमें महिलाएं महत्वपूर्ण हैं। उनका दावा था कि पूरी दुनिया में केवल एक यही पंथ है जो महिलाओं को पुजारी बनने का अधिकार देता है। उनका यह भी कहना था कि वैष्णवों के विपरीत शाक्त काले रंग को शुभ मानते हैं। महिलाएं खुद पूजा करती/कराती हैं, इस बात पर उनका विशेष जोर था। कौड़ी कामख्या को इसका केंद्र बताते हुए आशीष झा ने यह भी कहा कि तांत्रिकों की कोई जाति नहीं होती।

बहरहाल, सोच रहा हूं कि शाक्त के विषय में थोड़ा और अध्ययन कर लूं। फिर विचार करूंगा। हालांकि मैं आशीष झा के इस दावे से असहमत हूं कि महिलाओं को केवल शाक्त ही पुजारी बनने का अधिकार देता है। मैं तो अपने घर में देखता हूं जहां आदिवासी परंपराएं हैं। मेरी मां खुद पूजा करती थी। मां के बाद मेरी पत्नी मेरे विरोध के बावजूद करती रहती है। उनका कहना है कि यह हिंदू धर्म के हिसाब से नहीं है। यह हमारी अपनी परंपरा के अनुरूप है।

मैं तो बस इतना ही मानता हूं कि यदि आप हिंसा का उत्सव मनाएंगे तो बदले में आपको हिंसा ही मिलेगी। एक ऐसा समाज मिलेगा जो धर्म के नाम पर मॉब लिंचिंग करने से परहेज नहीं करेगा। कभी वह अल्पसंख्यकों को मारेगा तो कभी किसी दलित को। वैसे भी यदि आप बबूल का पेड़ बोएंगे तो कांटे ही पाएंगे

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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