अदालतों में भ्रष्टाचार (डायरी 9 जनवरी, 2022)

नवल किशोर कुमार

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राष्ट्रवाद और राज्य अस्मिता दो ऐसे शब्द हैं, जिन्होंने क्रमश: भारत और बिहार के स्तर पर मुझे लिखने को बाध्य किया है। राष्ट्रवाद तो खैर वैसे भी आजादी के पहले का वितंडा है। मैं तो उन शोषित और वंचित समुदायों का सदस्य हूं, जिनके बहुसंख्यक लोगों के पास रहने को घर तक नहीं। किसी के पास घर है भी खेती के लिए जमीन नहीं। जबकि इसी देश में मुट्ठी भर लोग ऐसे हैं, जिनके पास अकूत जमीन है और उनके पास घर छोड़िए, हवेलियां हैं। तो ऐसे लोग जिनके पास रहने को घर नहीं है, वे किसे अपना राष्ट्र मानें। वजह यह कि राष्ट्र के होने के अहसास के लिए जमीन का एक टुकड़ा भी तो होना चाहिए ताकि आदमी खुद को देश का हिस्सेदार कह सके। जब जमीन ही नहीं तो हिस्सेदारी कैसी?

रही बात प्रांतीय अस्मिता की तो मुझे लगता है कि बिहार के संदर्भ में इसके आविष्कारक सुबोधकांत सहाय हैं। सहाय 1980 के दशक से 22 मार्च को बिहार के स्थापना दिवस के रूप में मनाते रहे थे। इसी दिन 1912 को बिहार को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग किया गया था। सहाय मूलत: रांची में रहते थे और तब झारखंड बिहार का हिस्सा था। उनके इस आविष्कार का उपयोग लालू प्रसाद नहीं कर सके। हालांकि उन्होंने एक राज्य के रूप में अस्मिता का अलख जरूर जगाया था। समान किराया अधिनियम का विरोध करते हुए संभवत: 1993 में लालू प्रसाद ने विधानसभा में कहा था कि यदि यह भेदभाव खत्म न किया गया तो बिहार से खनिज का एक ढेला भी नहीं ले जाने दिया जाएगा। ऐसा नहीं चलेगा कि बिहार के खनिज से अन्य राज्यों में उद्योग विकसित होते रहें और बिहार मुंह ताकता रहे।

सहाय 1980 के दशक से 22 मार्च को बिहार के स्थापना दिवस के रूप में मनाते रहे थे। इसी दिन 1912 को बिहार को बंगाल प्रेसीडेंसी से अलग किया गया था। सहाय मूलत: रांची में रहते थे और तब झारखंड बिहार का हिस्सा था। उनके इस आविष्कार का उपयोग लालू प्रसाद नहीं कर सके। हालांकि उन्होंने एक राज्य के रूप में अस्मिता का अलख जरूर जगाया था।

सही मायनों में इस शब्द यानी प्रांतीय अस्मिता का राजनीतिक उपयोग नीतीश कुमार ने किया। उन्होंने न केवल राजकीय स्तर पर 22 मार्च को बिहार दिवस के रूप में मनाने की परिपाटी की शुरुआत की, बल्कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग की। हालांकि जब उन्होंने इसकी पहल की तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और वे बिहार में भाजपा के साथ राज कर रहे थे। आज भी वे भाजपा के साथ मिलकर बिहार में राज कर रहे हैं, लेकिन केंद्र में सत्तासीन भाजपा से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मांगने में उनकी सांस फूलती है।

खैर, प्रांतीय अस्मिता जैसा शब्द मुझे प्रभावित तो नहीं करता है, लेकिन अपने प्रांत से मेरा जुड़ाव अवश्य है। ऐसे भी अपनी जन्मभूमि किसे प्यारी नहीं होती। चौबीस घंटे में कम से कम एक बार मेरा अपना गृह प्रदेश, गृह शहर और मेरा गांव जरूर याद आता है। इसे हम साहित्यिक अंदाज में मिट्टी और आबोहवा का असर भी कह सकते हैं, जिसमें हम पैदा होते हैं और पलते-बढ़ते हैं। तो यह लगाव तो है बिहार से मुझे।

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परंतु, अक्सर यह होता है कि मैं बिहार के बारे में सोचता हूं और मायूस हो जाता हूं। ऐसा इसलिए कि कमाल की खबरें प्राप्त होती हैं। अब आज जो मुझे खबर मिल रही है, वह तो एकदम खास है। कल सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति एएम खानविलकर और न्यायमूर्ति सीटी रविकुमार की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई की। मामला एक निचली अदालत में काम करनेवाले एक कर्मी से जुड़ा था। उसे वर्ष 2014 में निचली अदालत ने हत्या के एक आरोपी से 50 हजार रुपए की रिश्वत लेने के आरोप में बर्खास्त कर दिया था। चूंकि वह कर्मी पैसे वाला था और इतना सक्षम था कि वह इस फैसले को आगे चुनौती दे सकता था तो उसने पटना हाईकोर्ट में अपील की। वर्ष 2020 में पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया। परंतु, उक्त कर्मी ने हाईकोर्ट के फैसले को भी नहीं माना और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। कल इस मामले की सुनवाई हुई और सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशद्वय ने साफ कहा कि अदालत में काम करने के दौरान रिश्वत लेना अस्वीकार्य है। दोनों ने याचिकाकर्ता की ओर से वकील द्वारा दिए गए इस तर्क को खारिज कर दिया कि उसके याचिकाकर्ता ने 24 साल तक अदालत की बेदाग सेवा की। यह उसके खिलाफ एकमात्र मामला है और उसे जो सजा दी गयी है, बहुत सख्त है।

सही मायनों में इस शब्द यानी प्रांतीय अस्मिता का राजनीतिक उपयोग नीतीश कुमार ने किया। उन्होंने न केवल राजकीय स्तर पर 22 मार्च को बिहार दिवस के रूप में मनाने की परिपाटी की शुरुआत की, बल्कि बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने की मांग की। हालांकि जब उन्होंने इसकी पहल की तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और वे बिहार में भाजपा के साथ राज कर रहे थे।

अब जब मैं सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को देख रहा हूं तो मुझे वर्ष 2014 की ही याद आ रही है। उन दिनों एक खबर आयी थी, जिसे छपने नहीं दिया गया था। मामला पटना हाईकोर्ट के जजों से संबंधित था। दरअसल, पटना का डाकबंगला चौराहा बेहद खास है। हालांकि एक समय इसके आसपास की जमीनें खासमहल और वक्फ बोर्ड के पास हुआ करती थीं, अब यहां भूमिहार स्क्वॉयर है। भूमिहार स्क्वॉयर का मतलब यह कि डाकबंगला के आसपास की सारी जमीनें (कुछेक अपवाद भी हैं) भूमिहारों ने कब्जा रखा है और वहां अपनी इमारतें खड़ी कर ली हैं। यह सब नीतीश कुमार के राज में हुआ है। यह बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं।

तो उस समय यह खबर आयी कि भूमिहारों के एक आराध्य ने इसी डाकबंगला चौराहे पर जमीन कब्जाकर एक अपार्टमेंट का निर्माण करवाया। मामला हाईकोर्ट तक गया और फैसला भूमिहार बिल्डर (जो कि बिहार की राजनीति में उस समय नीतीश कुमार का खासमखास था) के पक्ष में। बाद में यह जानकारी भी सामने आयी कि उसी अपार्टमेंट में पटना हाईकोर्ट के कुछ जजों ने फ्लैट खरीदे। जब यह सब हुआ तो मैंने कुछ हाथ-पांव मारा और कुछ जानकारियां हासिल की। जितना लिख सकता था, लिखा। वैसे भी मेरा काम लिखना है। क्या करना है, यह काम सरकार और समाज का है।

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इससे भी बड़ी रिश्वतखोरी तो सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने की है। उसने तो बाबरी विध्वंस वाले मामले में फैसला आरएसएस के उन्मादियों के पक्ष में दिया और इसका लाभ उसे इस रूप में मिला कि वह आज राज्यसभा का सांसद है।

बहरहाल, बिहार के अदालतों में निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की बात करें तो शायद ही कोई ऐसा मुलाजिम हो, जो ‘अतिरिक्त’ धन अर्जित न करता है। कई बार तो यह जजों के सामने भी होता है। लेकिन मामला तो तब हो, जब कोई शिकायत करे, जैसा कि इस पन्ने में वर्णित सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के संदर्भ में किया गया है। तो कुछ काम तो इस देश की जनता को भी करना ही पड़ेगा। ऐसा कैसे चलेगा कि अदालतों में आपसे रिश्वत मांगी जा रही हो और आप आवाज उठाने के बजाय रिश्वत देकर अपना काम निकलवा लें।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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