बेपेंदी का लोटा बनते जा रहे हैं दलित-बहुजन डायरी (24 जुलाई, 2021)

नवल किशोर कुमार

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हम मनुष्यों की एक सीमा होती है। मुमकिन है कि अन्य पशुओं में भी ऐसा होता होगा। अब चूंकि उनकी भाषा हमें समझ में नहीं आती है तो हम उनका आकलन नहीं कर सकते। लेकिन मनुष्यों के बारे में यह जरूर कहा जा सकता है कि हर मनुष्य अपने चारों ओर एक वृत का निर्माण करता है। इसी वृत की परिधि में उसका घर भी होता है और समाज भी। उसके अपने शब्द होते हैं और सोचने-समझने की सलाहियत भी। यहां तक कि स्वाद का परिसीमन भी आदमी स्वयं कर लेता है। मसलन, उसे क्या अच्छा लगता है और क्या नहीं। पहनावा वगैरह सब इसमें शामिल हैं। और जब कोई बदलाव होता है तो आदमी दो तरह से अपनी प्रतिक्रिया देता है। या तो वह नये बदलाव को स्वीकार कर लेता है (सहज तरीके से या फिर जोर-जबरदस्ती से) या फिर नहीं करता है। बदलाव के क्रम में होता यह है कि उसे सोच की एक प्रक्रिया से गुजरना होता है। और यह बहुत आसान नहीं होता। बाजदफा तो उम्र बीत जाती है।

दरअसल, मेरे कानों में कल अयोध्या में गूंजे जय श्रीराम और जय भीम का नारा है। कल से बसपा प्रमुख मायावती ने नया दांव आजमाया है। वह उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों से उम्मीद कर रही हैं कि वे उनका साथ देंगे। साथ देने का मतलब वोट देने से है। अनेक दलित बुद्धिजीवी मायावती के इस पहल से एकदम लहालोट हैं। उन्हें यकीन है कि मायावती द्वारा पूर्व में आजमाया गया यह नुस्खा एकबार फिर काम आएगा। दरअसल, मायावती देश की सबसे अधिक वोलाटाइल राजनेताओं में से एक हैं। एक समय वे कहती थीं – तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार। फिर उन्होंने कहा – हाथी नहीं, गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है। और अब जय श्रीराम -जय भीम।

अक्सर लोग मुझसे सवाल करते हैं कि क्या दलित-बहुजनों की अपनी मीडिया होनी चाहिए? यह सवाल पूछने वाले अधिकांश इसी मन-मिजाज के होते हैं कि जबतक दलित-बहुजनों की अपनी मीडिया नहीं होगी तबतक वे प्रभावकारी नहीं हाे सकते। न तो सामाजिक रूप से और न ही राजनीतिक और आर्थिक रूप से। लोग यह तर्क भी देते हैं कि कैसे अखबारों में उनके सवालों को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसा वे इसलिए भी कहते हैं क्योंकि अखबारों में उनकी हिस्सेदारी नगण्य है।

व्यक्तिगत तौर पर मुझे जय श्रीराम – जय भीम का नारा परेशान कर रहा है। मुझे परेशानी नहीं होनी चाहिए थी। एक पत्रकार के लिए इसमें परेशान होनेवाली कोई बात नहीं। पत्रकार को खबर के अलावा चाहिए भी क्या। मायावती जो कर रही हैं, वह एक खबर है और मुझे लगता है कि मुझे इसे महज एक खबर के रूप में ही लेना चाहिए। यह काम देश के बुद्धिजीवियों का है कि वह यह तय करें कि जय श्रीराम और जय भीम का एक साथ अलाप उनके कानों को किस तरह की अनुभूति देता है।

मैं तो खबरों का आदमी हूं। खबरें मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। अक्सर लोग मुझसे सवाल करते हैं कि क्या दलित-बहुजनों की अपनी मीडिया होनी चाहिए? यह सवाल पूछने वाले अधिकांश इसी मन-मिजाज के होते हैं कि जबतक दलित-बहुजनों की अपनी मीडिया नहीं होगी तबतक वे प्रभावकारी नहीं हाे सकते। न तो सामाजिक रूप से और न ही राजनीतिक और आर्थिक रूप से। लोग यह तर्क भी देते हैं कि कैसे अखबारों में उनके सवालों को दरकिनार कर दिया जाता है। ऐसा वे इसलिए भी कहते हैं क्योंकि अखबारों में उनकी हिस्सेदारी नगण्य है।

लेकिन यह अर्द्धसत्य है। इस सत्य का विस्तार यह है कि दलित-बहुजनों में अभी भी चेतना नहीं आई है। आई भी है तो चेतना का स्तर अभी बहुत नीचे है। इतना नीचे कि वे समझ नहीं पा रहे हैं कि इस देश का सबसे बड़ा दुश्मन ब्राह्मणवाद है और इससे लड़ने के लिए एक दूसरे तरह का दलितवाद या फिर बहुजनवाद की आवश्यकता नहीं है। जरूरत है तो ब्राह्मणवाद को खारिज करने की।

जो लोग मुझसे उपरोक्त सवाल करते हैं, मैं उनसे पूछता हूं कि क्या आपने कभी यह समझने की कोशिश की है कि आखिर किन कारणों से आज के अखबार हमारे मसलों को अहमियत नहीं देते? जवाब मिलता है कि यह उनका जातिवाद है। लेकिन यह मसला केवल जातिवाद नहीं है। हम देश के 85 फीसदी दलित-बहुजन आज भी द्विजों के बौद्धिक गुलाम हैं। सबसे अधिक दुखद यह है कि हम इस स्थिति से निकलना ही नहीं चाहते।

मैंने कल संसद को देखा। देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने एक जवाब में कहा है कि सरकार के पास उन किसानों का कोई रिकार्ड नहीं है जो किसान आंदोलन के दौरान मर गए। इसके पहले मैंने भारत सरकार के उस बयान को भी देखा जिसमें कहा गया कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान किसी की मौत ऑक्सीजन की कमी के कारण नहीं हुई। कल वरिष्ठ पत्रकार व जनसत्ता के एसोसिएट एडिटर सूर्यनाथ सिंह ने फेसबुक पर एक पोस्ट किया –  “नाहक विवाद करते हो। भारत में तो कोरोना ही नहीं आया।” ऐसा लिखकर सूर्यनाथ सिंह ने सरकार के बयान पर व्यंग्य किया है।

आखिर किन कारणों से आज के अखबार हमारे मसलों को अहमियत नहीं देते? जवाब मिलता है कि यह उनका जातिवाद है। लेकिन यह मसला केवल जातिवाद नहीं है। हम देश के 85 फीसदी दलित-बहुजन आज भी द्विजों के बौद्धिक गुलाम हैं। सबसे अधिक दुखद यह है कि हम इस स्थिति से निकलना ही नहीं चाहते।

मैं भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के वेबसाइट का होम पेज देख रहा हूं। यहां लिखा है कि कोरोना से अबतक 4 लाख 19 हजार 470 लोगों की मौतें हुई हैं। वहीं बीते 24 घंटे में इसमें 483 लोगों की मौत भी शामिल है।

मैं यह नहीं सोच रहा हूं कि वेबसाइट पर दिया गया आंकड़ा कितना सही है। वजह यह कि मौतों की संख्या छिपाने का खेल सामने आ चुका है। यह खेल वर्तमान में भी जारी हो सकता है। मेरे लिए तो यह महत्वपूर्ण है कि कोरोना के कारण जो लोग मारे गए हैं, उनमें निश्चित तौर पर सबसे अधिक संख्या दलित-बहुजनों की रही होगी। ऐसे भी आबादी में उनकी हिस्सेदारी 85 फीसदी है तो इसी के हिसाब से कोरोना के कारण हुई मौतों में भी हिस्सेदारी रही होगी। यदि ऐसा नहीं होता तो शहरों में श्मशानों के वीभत्स दृश्य और गंगा में तैरती लाशों का वह मंजर नहीं होता।

तो मैं यह सोच रहा हूं कि वे लोग या फिर वे संस्थाएं जो दलित-बहुजन मीडिया होने का दावा करते हैं, क्या उन्होंने इस विषय के उपर कोई विशेष खबर का प्रकाशन किया है? विशेष खबर तो छोड़िए सामान्य खबरें भी दलित-बहुजन मीडिया से गायब रही हैं। यह तो केवल एक मसला है। मैं तो पैगासस वाले मामले में भी दलित-बहुजन मीडिया की खामोशी को देखकर सन्न हूं। नहीं जानता कि उनके मन में चल क्या रहा है। मैं तो तृणमूल कांग्रेस के लोकसभा सांसद शांतनु सेन के बारे में सोच रहा हूं, जिन्होंने केंद्रीय आईटी मंत्री के हाथों से उनका बयान छीन लिया और उसे फाड़ दिया। हालांकि उनका यह आचरण लोकतांत्रिक नहीं माना चाहिए। लेकिन यह तो तब जब संसद में लोकतंत्र हो, संसद के बाहर लोकतंत्र हो। कागज फाड़े जाने की एक खबर बहुत पहले भी आयी थी जब सदन में महिला आरक्षण का बिल पेश किया जा रहा था। तब

महिला आरक्षण में दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान करने हेतु दबाव बनाने के लिए ऐसा किया गया था। लेकिन इसी संसद में आरक्षण की मूल परिभाषा बदल दी गयी। सभी दलित-बहुजन सांसद मुंह देखते रह गए। कुछ ने विरोध अवश्य किया लेकिन अधिसंख्य को तो जैसे लकवा मार गया था।

1920 में बाबा साहब का पहला अखबार मूकनायक और 1927 से पाक्षिक अखबार बहिष्कृत भारत का प्रकाशन शुरु हुआ

खैर, मैं वापस मीडिया और दलित-बहुजनों के सवाल पर ही बात करता हूं। दलित-बहुजनों को आंबेडकरवाद का मर्म समझना चाहिए। उन्हें यह महसूस करना चाहिए कि किन कारणों से आंबेडकर ने 1920 में ‘मूकनायक’ और 1927 में ‘बहिष्कृत भारत’ का प्रकाशन किया। उन्हें यह भी समझना चाहिए कि 1956 में ‘प्रबुद्ध भारत’ अखबार शुरू करने के पीछे उनकी योजना क्या थी। यह वह समय था जब भारत ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा था। देश तब आजाद ही हुआ था और देश भर के अखबारों में द्विजों का कब्जा वैसे ही था जैसा कि आज है। लेकिन एक अंतर था। तब गैर द्विज राजनीतिक और सामाजिक रूप से आज के जैसे सक्षम नहीं थे। आज दलित-बहुजन यह तो मानते ही हैं कि उनका राजनीतिक महत्व है और वे शासक बन सकते हैं।

मेरा तो यही मानना है कि जिस दिन 85 फीसदी आबादी यह मान लेगी कि उनकी हिस्सेदारी 85 फीसदी है और वह सवर्णों को दरकिनार कर सत्ता हासिल कर सकते हैं, तभी कोई बदलाव संभव है। याद रखिए अखबार भी सत्ता का हिस्सा है। इस पर कब्जा जरूरी है। सवर्णों को उनके ही हथियार से परास्त किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए जय श्रीराम का नारा लगाने की आवश्यकता नहीं है।

मायावती को कभी माफ नहीं किया जा सकता है।

 

एक कविता देर शाम जेहन में आयी।

सचमुच हम कुछ नहीं कहते

जब तुम कहते हो तो हम कहते हैं।

 

राम कोई प्रतापी राजा था

उसका बाप उससे भी प्रतापी था

उसका परदादा तो ब्रह्मांड का मालिक था,

हम ऐसा कुछ नहीं कहते,

जब तुम कहते हो तो हम कहते हैं।

 

तुम नहीं जन्मे वैसे

जैसा हमारा जन्म हुआ

तुम्हारी दादियों-परदादियों ने खाया खीर,

फिर ब्रह्मा के मुख से तुम्हारा अवतरण हुआ,

हम ऐसा कुछ नहीं कहते,

जब तुम कहते हो तो हम कहते हैं।

 

धन-ज्ञान-धरा पर

तुम्हारा जन्मजात अधिकार है,

पाप से भी नहीं घटता तुम्हारा सम्मान,

यह विश्व तुमसे है और तुम ही सर्वशक्तिमान,

हम ऐसा कुछ नहीं कहते

जब तुम कहते हो तो हम कहते हैं।

 

सचमुच हम कुछ नहीं कहते

जब तुम कहते हो तो हम कहते हैं।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

 

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