क्या आपको पियाला के मेले की याद है?

दीपक शर्मा

0 602

क्या आपको याद है कि पियाला का मेला भी कभी एक जलवेदार मेला होता था? यह प्रश्न जब मैंने अपने एक सहकर्मी से किया तो उन्होंने झट से कहा कि यह मुसलमानों का मेला होता था। अब उनकी बुद्धि को मैं क्या कहता। कुढ़ कर रह गया। हर वह चीज जो बहुजनों से जुड़ी है उसे कूढ़मगज लोग मुसलमानों से जोड़ देते हैं। यह एक जहरीले प्रचार का परिणाम है जिसके शिकार सिर्फ भोले-भले लोग ही नहीं समझदार और पढे-लिखे लोग भी हो रहे हैं। बहरहाल, आइये मेले में चलते हैं।

बनारस मेले-ठेले और उत्सवों का नगर है। यहां पर वर्ष भर होने वाले विभिन्न आयोजनों में चौकाघाट का पियाला (प्याला) का मेला अति लोकप्रिय है‌ वैसे तो इस मेले में हर जाति, वर्ग और समुदाय के लोग शामिल होते हैं। किंतु यह मेला रजक, धोबी, कसेरा और कनौजिया तीन जातियों का विशेष त्यौहार है। इस त्यौहार में बड़े, बूढ़े, युवा, महिला और बच्चे सभी लोग शामिल होकर मेले का आनंद उठाते हैं। साथ ही धोबी समुदाय के लोग कालिका देवी को प्याले में शराब तथा फूल माला के साथ पांच दीपों में भांग-गुड़, मदिरा, रोरी, मीठा और पानी भरकर चढ़ाते हैं। इसके साथ ही अपने पूर्वजों की विशेष आराधना करते हैं और अपने परिवार के सुखमय जीवन की कामना करते हैं‌। तत्पश्चात बड़े बुजुर्ग लोग प्याले में भरे हुए शराब का सेवन करते हैं। यह त्यौहार प्रत्येक वर्ष अगहन माह में एकादशी के दूसरे मंगलवार को चौकाघाट पुल के पास मनाया जाता है। इसके दूसरे दिन शिवपुर में तांगा और इक्का की रेस होती है। इसके लिए महीनों से टांगे और इको की बुकिंग कर ली जाती है। जीतने वालों को पुरस्कृत किया जाता है।
पियाला मेले के बारे में मैंने अपने आसपास के लोगों से पता किया था तो कुछ सवर्ण समुदाय के लोगों ने वहां जाने से मना कर दिया। उनका कहना था कि यह मेला ठीक नहीं होता है। यह मुसलमानों का मेला है। वहां वे लोग विविध जानवरों का मांस खाकर अय्याशी करते हैं। यह त्यौहार हिंदू धर्म के लिए खतरे का प्रतीक है। वास्तविकता को जानने के लिए मैं 15 नवंबर मंगलवार को चौकाघाट पहुंच गया। पुल पर से ही नीचे काफी भीड़ दिखाई दी। जब नीचे उतर कर मेला स्थल पर पहुंचा तो वहां कुछ अलग ही देखने को मिला। मुसलमान लोग तो वहाँ थे ही नहीं। रहे भी होंगे तो बहुत सीमित संख्या में जैसा कि हर मेले और आयोजनों में होता है। विविध जगहों पर झूले, खिलौने, चाट, गोलगप्पे और मिठाइयों की दुकानें सजी हुई थीं। जगह-जगह लोगों के हाथ में शराब-गिलास और उनके बगल में फूल माला दीप और पूजा के सामग्रियां आदि थीं।

यह मेला रजक, धोबी, कसेरा और चौरसिया तीन जातियों का विशेष त्यौहार है। इस त्यौहार में बड़े, बूढ़े, युवा, महिला और बच्चे सभी लोग शामिल होकर मेले का आनंद उठाते हैं। साथ ही धोबी समुदाय के लोग कालिका देवी को प्याले में शराब तथा फूल माला के साथ पांच दीपों में भांग-गुड़, मदिरा, रोरी, मीठा और पानी भरकर चढ़ाते हैं। इसके साथ ही अपने पूर्वजों की विशेष आराधना करते हैं और अपने परिवार के सुखमय जीवन की कामना करते हैं‌। तत्पश्चात बड़े बुजुर्ग लोग प्याले में भरे हुए शराब का सेवन करते हैं।

मैंने मेले में घूम कर कुछ तस्वीरें उतारी, फिर वहां पर लोगों से बातचीत करना शुरू किया। लक्ष्मण कनौजिया ने बताया कि ‘इस मेला को हमारे पूर्वज सौ-दो सौ साल पहले से मनाते आ रहे हैं और हम लोग भी इसी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। आगे भी इसी तरह से चलता रहेगा। मेला एसोसिएशन के अध्यक्ष नंदू कनौजिया की देखरेख में यहां पर सारी व्यवस्थाएं ठीक-ठाक है और हम लोग इससे संतुष्ट है। पहले यह मेला वरुणा नदी के उस पार लगता था लेकिन अब इस पार लगने लगा है‌। यह मेला विशेष तौर पर धोबी समुदाय के लोग ही मनाते हैं। हम लोग प्याले में शराब, भांग, गुड़, पानी और पूजा की सामग्री मिलाकर अपने आराध्य को चढ़ाते हैं और बाल बच्चों के लिए खुशहाली की कामना करते हैं‌। पप्पू कनौजिया ने कहा कि ‘यह मेला हम लोगों के लिए उत्सव का दिन होता है, हम लोग सपरिवार यहां उपस्थित होकर अपने पूर्वजों की परंपरा का निर्वहन करते हैं और आगे भी इसी तरह से निर्वहन करते रहेंगे।’
वीडियो – गोकुल दलित 
एक और सज्जन ने बताया कि ‘इस मेले में पहले भीड़ बहुत आती थी लेकिन अब युवा पीढ़ी इसमें रुचि कम दिखा रही है, इसलिए पहले की अपेक्षा भीड़ का आना कुछ कम हुआ है, लेकिन एक परंपरा जारी रहेगी। संजय कनौजिया ने बताया कि ‘यह मेला 30 -40 वर्ष पहले शिवपुर में धूमधाम से लगता था लेकिन वहां की जमीन और मैदान सीमित हो जाने के कारण अब खासतौर से चौकाघाट में ही धोबी विशेष समुदाय के लोगों के लिए लगता है। नदी के उस पार गायक पद्मश्री हीरालाल यादव की जमीन थी। वहां गेट लग जाने के कारण मेला नहीं लग पाता है, इसलिए हम लोग इसी पार ही वर्ष में एक बार बैठकी करके मेले का उत्साह बनाते हैं‌। संजीव नामक एक व्यक्ति ने बताया कि ‘यह मेला गंगा जमुनी तहजीब का प्रतीक है। इसमें मुसलमान लोग भी डफली बजा कर  रंग बिखेरते हैं‌।’
फोटो -गोकुल दलित
कथाकार रामजी यादव इस बारे में दिलचस्प अनुभव सुनते हैं। वे कहते हैं कि ‘बाइपास पर जहां अभी सेंट जोसेफ स्कूल है वहाँ से लेकर तीन चार सौ मीटर पश्चिम तक आम का एक बड़ा बगीचा था। वहीं पर पियाले का मेला लगता था। यह वास्तव में किसान समाज का अपना मेला था। खरीदने और बेचने वाले प्रायः ज़मीन से जुड़े होते थे। मसलन नट और बंसोड़ बाँस की टोकरियाँ, दौरी, चँगेरी, पलरा आदि भारी संख्या में लाकर बेचते थे। सूप, चलनी, झरना यानि गृहस्थी के सारे समान यहाँ बिकते थे। घुड़दौड़, जुआ और शराब के शौक पूरे किए जाते थे। एक बार मैं अपनी दादी के साथ पियाले का मेला देखने गया। दादी ने कई दौरियाँ और चँगेरी खरीदी। सारा सामान मुझसे अगोरने को कहकर वे लाई-चूड़ा आदि खरीदने लगीं। मैं अपने में मगन। पता नहीं कब कौन सारा सामान लेकर चंपत हो गया। मेला खराब हो गया। जब हम घर पहुंचे तो दादा गुस्से में थे क्योंकि मेला देखने जाने की जल्दी में मैंने बैठक के जंगले में बाहर से सिटकनी लगा दी थी और दादा भीतर सो रहे थे। अब तो वह सब अतीत भर रह गया है। वह बगीचा कट गया। बगल वाला तालाब भी पट गया और कॉलोनी बन गई। वहाँ पियाले का अब कोई निशान शेष नहीं है।’
पियाला अपनी मान्यताओं के साथ मस्ती और खुशी का एक अनूठा मेला है। वह अपने आप में बहुत सी चीजों को समेटे हुये है। लेकिन बदलते हुये राजनीतिक और सांस्कृतिक हालात में वह कब तक बचेगा यह कहना कठिन है।
दीपक शर्मा युवा कहानीकार हैं। 
Leave A Reply

Your email address will not be published.