लखीमपुर खीरी नरसंहार के मामले में सियासत के इस पेंच को आप समझते हैं?(डायरी 9 अक्टूबर 2021)

नवल किशोर

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राजनीति की खासियत यह है कि इसकी दिशा एकदम से सीधी नहीं होती है। ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि राजनीति का संबंध सत्ता से है और सत्ता का संबंध समाज पर हुकूमत से है। समाज में अलग-अलग तरह के लोग होते हैं। राजतंत्र में कुछ हद तक सियासत की दिशा सीधी भी होती थी। होता यह था कि एक राजा के मरने के बाद उसका वारिस उसका बेटा होता था। बेटों के बीच संघर्ष जरूर होते थे, लेकिन राजा कौन बनेगा, इसकी तस्वीर एकदम साफ रहती थी। हालांकि इतिहास के पन्नों में कुछ अपवाद जरूर मिलते हैं। नंद वंश जो कि नाई यानी शूद्र समाज के एक शासक ने शुरू किया था, उसका खात्मा मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य ने किया। बाद के दिनों में मौर्य वंश में जो मारकाट मची है, उसकी गवाही इतिहास देता है। सबसे अधिक हिंसक तो अशोक रहा। दिलचस्प यह कि मौर्य वंश की स्थापना में एक ब्राह्मण चाणक्य की बड़ी भूमिका थी और उसके खात्मे में भी एक ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग का ही हाथ था।

सत्ता के लोकतांत्रिकरण ने सियासत की दिशा ही बदल दी। लोकतंत्र का मतलब ही होता है समाज में रहनेवाले सभी तबके के लोगों की हिस्सेदारी। और जब हर तबके लोगों की हिस्सेदारी होगी और यह शर्त भी नहीं रहेगी कि केवल अमुक जाति का आदमी ही सत्ता के शीर्ष पर काबिज होगा तो ऐसे राजनीति का बहुआयामी होना आवश्यक ही है। वजह यह कि समाज के हर तबके के पास अपने मुद्दे और अपने सवाल हैं। सभी की अपनी संस्कृतियां और रीति-रिवाज हैं। ऐसे में अनेकता तो रहेगी ही और सियासत इन्हीं अनेकताओं के सहारे की जा सकती है।

इतनी लंबी भूमिका के पीछे मेरा मकसद यह स्पष्ट करना है कि कल जो सुप्रीम कोर्ट ने लखीमपुर खीरी नरसंहार के मामले में कहा और जो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कहा, उसके मायने क्या हैं। दोनों में सियासत निहित है। मसलन, कल सुप्रीम कोर्ट ने यूपी सरकार से पूछा कि जब आरोपियों, जिनमें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा का बेटा अशीष मिश्रा भी शामिल है, के खिलाफ 302 के तहत मामला दर्ज किया गया है तो उसे अबतक गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी पूछा है कि यदि यही आरोप किसी और के खिलाफ होते तो क्या तब भी राज्य (उत्तर प्रदेश सरकार) ऐसा ही सुलूक करती?

सचमुच, क्या सुप्रीम कोर्ट की कोई औकात नहीं है? आखिर आदित्यनाथ ऐसा क्यों कह रहे हैं कि वे दबाव में कोई कार्रवाई नहीं करेंगे? यदि लखीमपुर में सिक्ख नहीं मारे गए होते और मृतकों में राजपूत व ब्राह्मण होते जो कि रामजादे होते तो क्या तब भी वह यही कहते?

 

मैं यहां यह बात जोड़ रहा हूं कि यूपी सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट हरीश साल्वे पक्षकार के रूप में सामने आए। ये वही हरीश साल्वे हैं, जिनका हाल ही में पैंडोरा मामले में नाम आया है। उनके ऊपर साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए की राशि का निवेश विदेशों में अवैधानिक तरीके से करने का आरोप है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्षकार होने पर उनसे सवाल क्यों नहीं किया, यह कोई सवाल ही नहीं है। वजह यह कि जबतक कोई आरोप सिद्ध नहीं होता, तबतक कोई दोषी नहीं होता। और भारत में तो हालात यह हैं कि तमाम सबूतों और गवाहों के बावजूद आरोपी आरोपी ही बना रहता है। या तो लंबे समय के बाद उन सबूतों को अपर्याप्त मान लिया जाता है या फिर गवाहों को खरीद लिया जाता है, मार दिया जाता है। एक ऐसा ही मामला नीतीश कुमार का भी था। वर्ष 1992 में उनके ऊपर दो लोगों को मरवाने का आरोप लगा था। इसे पंडारक हत्याकांड कहते हैं। उस समय लालू प्रसाद की सरकार थी तो नीतीश कुमार को राहत मिली थी। बाद में तो खुद उनकी ही सरकार बन गयी और हुआ यह कि पटना हाई कोर्ट ने आरोपियों की सूची से नीतीश कुमार का नाम ही हटा दिया।

खैर मैं लखीमपुर खीरी मामले में सुप्रीम कोर्ट और योगी आदित्यनाथ के बयानों की बात कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट का स्वर कल यूपी सरकार के लिए बेहद तीखा था। इस मामले की सुनवाई स्वयं मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण, न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायाधीश हिमा कोहली की खंडपीठ कर रही है। अब यह खंडपीठ आगामी 20 अक्टूबर को मामले की सुनवाई करेगी।

वहीं कल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी को सिरे से नकारते हुए कहा कि सरकार कोई भी कार्रवाई किसी के दबाव में नहीं करेगी। हालांकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का नाम नहीं लिया। लेकिन उनके शब्द से यह तो स्पष्ट था कि वे निशाना किस पर साध रहे हैं। एक तरह से उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को कह दिया है कि हम आपकी औकात जानते हैं। आप चाहकर कुछ नहीं कर सकते।

सचमुच, क्या सुप्रीम कोर्ट की कोई औकात नहीं है? आखिर आदित्यनाथ ऐसा क्यों कह रहे हैं कि वे दबाव में कोई कार्रवाई नहीं करेंगे? यदि लखीमपुर में सिक्ख नहीं मारे गए होते और मृतकों में राजपूत व ब्राह्मण होते जो कि रामजादे होते तो क्या तब भी वह यही कहते?

मैं यह मानता हूं कि राज्य के लिए तबका महत्वपूर्ण होता है। मुझे स्मरण है एक घटना पटना में घटित हुई थी। राजधानी पटना के हृदयस्थली मंदिरी इलाके में नाले के पास एक स्लम बस्ती में एक युवती के साथ गैंगरेप किया गया था। आरोपियों में तीन ब्राह्मण, एक कायस्थ और एक कुर्मी था। मामला कोतवाली थाना में दर्ज हुआ था और यह मामला मेरी नजर में था। वजह यह कि तब मेरा दफ्तर घटनास्थल से करीब चार सौ मीटर की दूरी पर था।

मैं यह मानता हूं कि राज्य के लिए तबका महत्वपूर्ण होता है। मुझे स्मरण है एक घटना। घटना पटना में घटित हुई थी। वहां राजधानी पटना के हृदयस्थली मंदिरी इलाके में नाले के पास एक स्लम बस्ती में एक युवती के साथ गैंगरेप किया गया। आरोपियों में तीन ब्राह्मण, एक कायस्थ और एक कुर्मी था। मामला कोतवाली थाना में दर्ज हुआ था और यह मामला मेरी नजर में था। वजह यह कि तब मेरा दफ्तर घटनास्थल से करीब चार सौ मीटर की दूरी पर था।

 

इस मामले में पहले तो पुलिस ने रफा-दफा करने की कोशिशें कीं। लेकिन स्थानीय लोगों ने दबाव बनाया तो कार्रवाई हुई और आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। वहां मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी ने पीड़िता का बयान दर्ज किया और उसके बाद आरोपियों को जेल भेज दिया। करीब चार महीने बाद मैंने अपने क्राइम रिपोर्टर जो कि एक ऊंची जाति का था, से इस घटना का फॉलोअप लिखने को कहा। पहले तो उसने अपनी जाति के हिसाब से मामले को हल्का बताने का प्रयास करते हुए कहा कि सर, अब तो इस मामले में सभी को जेल हो चुकी है। मैंने उससे कहा कि जेल में भेजने का मतलब पीड़िता को न्याय मिलना नहीं होता है। आप यह पता करें कि पांचों आरोपी अभी कहां हैं और अदालतों में अबतक की सुनवाई क्या हुई है? आप यह भी पता करें कि पीड़िता और उसका परिवार कहां है?

कई बार बतौर संपादक के रूप में काम करने के दौरान सख्त फैसले लेने पड़ते हैं। उपरोक्त क्राइम रिपोर्टर सक्षम रिपोर्टर थे, लेकिन जातिगत पूर्वाग्रह के शिकार थे।

खैर, उन्होंने अच्छा काम किया और लंबी रिपोर्ट लिखी। जो नयी जानकारी सामने आयी, उसके मुताबिक पांचों आरोपी जेल के बाहर थे और पीड़िता व उसके परिजन पटना छोड़कर अपने गांव वापस जा चुके थे। स्थानीय गवाह जो शुरू में चिल्ला-चिल्लाकर आरोपियों पर आरोप लगा रहे थे, वे पीछे हट चुके थे। अदालत में यह पूरा मामला अब ठंडे बस्ते में है।

यह होती है पुलिसिया कार्रवाई जब पीड़ित पक्ष समाज के निचले स्तर का होता है। यही यदि पीड़िता ऊंची जाति की होती तो हालात कुछ और होते। संभव था कि स्पीडी ट्रायल के जरिए आरोपियों को कोर्ट सजा भी सुना चुकी होती।

तो मैं यह मानता हूं कि राज्य किसी घटना के आलोक में कार्रवाई इस बात को केंद्र में रखकर करता है कि उसकी कार्रवाई से उसकी सियासत को क्या लाभ होगा। अब लखीमपुर खीरी नरसंहार मामले में ही देखिए। मुख्य आरोपी ब्राह्मण है और राज्य सरकार ब्राह्मण जाति के इस आरोपी को बचाने की पूरी कोशिश कर रही है। तो क्या यह स्पष्ट संकेत नहीं है कि राज्य के वे ब्राह्मण जो इन दिनों बसपा और सपा द्वारा ब्राह्मणों के चरणवंदना से खुश हो रहे हैं, वे इस बात को समझ लें कि मायावती और अखिलेश उनका चरण धोकर जरूर पी लें, लेकिन रक्षा तो कोई राजपूत ही करेगा?

एक संकेत और। पूरी घटना में एक किरदार हैं उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य जो कि ओबीसी समुदाय के हैं। मारे गए किसान सिक्ख हैं। किसानों को गाड़ी से रौंदकर मारने वाला ब्राह्मण। और सुप्रीम कोर्ट को यह कहकर कि किसी के दबाव में कार्रवाई नहीं करूंगा, नकारने वाला राजपूत।

कुल मिलाकर बस इतना कि अब फैसला ब्राह्मणों को करना है कि, वह कौन है जो मनु के विधान में ब्राह्मणों के लिए सजा के प्रावधानों को सुरक्षित रखेगा, जिसके मुताबिक ब्राह्मणों को जघन्य से जघन्य अपराध के लिए भी न्यूनतम सजा की व्यवस्था है।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

 

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