सुप्रीम कोर्ट का सहज संज्ञान और सरकार का रवैया

रामजी यादव

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लखीमपुर खीरी की बर्बरतापूर्ण घटना के बाद इंटरनेट पर वायरल हुये वीडियो और मारे गए किसानों के साथ प्रदर्शन में शामिल किसानों के बयान के बावजूद उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार द्वारा जिस तरीके से लीपापोती की कोशिश की जा रही है वह एक षड्यंत्रकारी कृत्य है। अब इसमें शक नहीं रह गया है कि यह एक राज्य-प्रायोजित हिंसा थी जिसका उद्देश्य किसान आंदोलन को कुचलना था।

ऐसे प्रयास पिछले दस महीने से चल रहे हैं। हर बार यह कोशिश की जाती है कि आंदोलन को तहस-नहस कर दिया जाये लेकिन किसानों के दृढ़ संकल्प के सामने सरकार और उसकी गुंडा-वाहिनियों को हर बार मुंह की खानी पड़ी है।

बीते दस महीनों के घटना क्रम पर एक निगाह डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार एक सुनियोजित पद्धति से तोड़-फोड़ किया जाता रहा है। सबसे पहले किसानों को बदनाम करने की कोशिशें की गईं और फिर उनका मनोबल तोड़ने के लिए लगातार प्रयास हुये। उन्हें बार-बार बातचीत के लिए बुलाया गया लेकिन एक बार भी बातचीत का कोई हल नहीं निकला।

मोदी सरकार चाहती रही है कि किसान झुक जाएँ लेकिन किसानों ने तीनों कृषि बिल को बिना शर्त वापस करने से कम पर कोई समझौता नहीं किया। मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का सहारा लेकर हाइवे खाली कराने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली।

वास्तव में तो यह किसानों का संवैधानिक अधिकार है कि वे अपने ऊपर लादे जा रहे किसी कानून की वापसी या विरोध के लिए सड़क पर उतरें और संसद तथा विधानसभावों में अपनी आवाज पहुंचाएँ। यह लोकतन्त्र का तक़ाज़ा है कि जनविरोध को महत्व दिया जाय और जनता के हितों की रक्षा की जाय।

 

आखिर पीछे न हटने की वजहें क्या हैं?

जैसा कि अब तक लोगों को पता चल चुका है मोदी सरकार द्वारा लाये गए तीन कृषि कानून एक सिरे से किसान विरोधी हैं। अगर वे लागू हो जाते हैं तो न केवल एमएसपी यानि न्यूनतम समर्थन मूल्य समाप्त हो जाएगा बल्कि कृषि मंडियाँ भी खत्म हो जाएंगी। इस प्रकार कृषि उपज और खेती को लेकर सरकार के जो निश्चित सरोकार हैं वे भी पूरी तरह से गायब हो जाएंगे। सरकार की किसानों को लेकर कोई जवाबदेही ही नहीं रह जाएगी।

इसके साथ ही कॉर्पोरेट घरानों को कृषि उपज खरीदने का मनमाना और निरंकुश अधिकार मिल जाएगा। वे किसी भी तरह से घेरकर किसानों की उपज को अपने हिसाब से ले लेंगे। किसान मजबूर होकर या तो उनके तय दामों के आधार पर उन्हें अपनी उपज बेचेंगे या उसे घर में रखकर अत्महत्या करने के लिए विवश होंगे।

इन क़ानूनों में से एक आवश्यक वस्तु अधिनियम भी है जिसके तहत पहले से जिन वस्तुओं के अधिक भंडारण को नियंत्रित रखा गया था वे अनियंत्रित हो जाएंगी और उनका अकूत भंडार इकट्ठा किया जा सकता है। इससे कॉर्पोरेट का नियंत्रण और एकाधिकार मजबूत होगा और मुनाफाखोरी चरम पर होगी। यह कानून वस्तुतः किसानों के साथ ही जनसाधारण को भी मार डालने की परिस्थितियाँ पैदा करेगा।

इसी एकाधिकार और नियंत्रण के मद्देनजर अदानी ने पंजाब और हरियाणा सहित अनेक राज्यों में साइलों का निर्माण कराया है। इसका तात्पर्य यह है कि कृषि बिलों के आने से पहले सारी तैयारियां की जा चुकी थीं और किसानों के कल्याण की चाशनी में लपेटकर उसे लोगों के सामने पेश किया गया।

लेकिन देश किसानों और किसान संगठनों ने इस षड्यंत्र को समझ लिया और उन्होंने इनकी वापसी के लिए सड़क पर उतरकर दिल्ली घेरने का फैसला किया।

वास्तव में तो यह किसानों का संवैधानिक अधिकार है कि वे अपने ऊपर लादे जा रहे किसी कानून की वापसी या विरोध के लिए सड़क पर उतरें और संसद तथा विधानसभावों में अपनी आवाज पहुंचाएँ। यह लोकतन्त्र का तक़ाज़ा है कि जनविरोध को महत्व दिया जाय और जनता के हितों की रक्षा की जाय।

लेकिन जब सरकार ही लोकतान्त्रिक न हो बल्कि फासीवादी हो तो ऐसी उम्मीद करना बेमानी है। पिछले दस महीनों में सरकार ने यही साबित किया है।

दरअसल इसके पीछे का यथार्थ यह है कि मोदी सरकार अदानी-अंबानी और दूसरे अनेक कॉर्पोरेट के हितों की रक्षा के लिए इतनी प्रतिबद्ध है कि इन बिलों की वापसी उसके लिए अकाल मौत साबित होगी। संसद में कॉर्पोरेट के अलमबरदार इतनी जड़ें जमा चुके हैं कि वे अपने आकाओं को कोई हानि न होने देना चाहते।

जो लोग मोदी सरकार को महज़ संघ या भाजपा की सरकार मानते हैं उनको आँख खोलकर देखने की कोशिश करनी चाहिए कि नरेंद्र मोदी वास्तव में कॉर्पोरेट और हिन्दुत्व के गँठजोड़ के एक चेहरे भर हैं। अभी तक वे अपनी तथाकथित छप्पन इंच की छाती को हाँफते हुये फुला रहे हैं तो इसकी पृषभूमि में उनके पीछे काम कर रही कॉर्पोरेट की वह ताकत ही है जिसके बल पर उन्हें भरोसा है कि वे भारतीय जनता को मनमाने तरीके से बाँट और तोड़ सकते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि वे अपने आपको बचाने की कवायद कर रहे हैं।

इससे यह भी मान लेना चाहिए कि कृषि बिलों के लागू होने का मतलब किसानों की गुलामी और मौत है तो इन बिलों की वापसी मोदी सरकार के पाटन का फरमान होगा।

धीरे-धीरे देश की व्यापक जनता को यह समझ में आने लगा है कि ये तीनों कृषि बिल जनता की तबाही के कानून हैं। इसलिए लोगों का समर्थन किसानों के साथ बढ़ता रहा है। अनेक राज्यों से किसानों का जत्था दिल्ली आकर आंदोलन में शामिल होने लगा। यह घटना सरकार के उस दावे के विरुद्ध एक बड़ा नकार था कि तीनों कृषि कानून किसानों की बेहतरी के लिए है।

 

किसान आंदोलन को बदनाम करने के अनवरत षड्यंत्र

दिल्ली में विगत दस महीनों से चल रहा किसान आंदोलन विश्व इतिहास की अनोखी घटना है। जिस दिन से यह शुरू हुआ उसी दिन से केंद्र सरकार ने इसे तबाह करने की योजना बना ली है लेकिन यह न केवल अखिल भारतीय स्तर पर फैलता गया है बल्कि इसे दुनिया भर से समर्थन प्राप्त हुआ है।

धीरे-धीरे देश की व्यापक जनता को यह समझ में आने लगा है कि ये तीनों कृषि बिल जनता की तबाही के कानून हैं। इसलिए लोगों का समर्थन किसानों के साथ बढ़ता रहा है। अनेक राज्यों से किसानों का जत्था दिल्ली आकर आंदोलन में शामिल होने लगा। यह घटना सरकार के उस दावे के विरुद्ध एक बड़ा नकार था कि तीनों कृषि कानून किसानों की बेहतरी के लिए है।

जबकि सच यह है कि ये कानून कॉर्पोरेट और एकाधिकारी पूंजी के विकास के स्पष्ट एजेंडे हैं। किसानों आंदोलन को छिन्न-भिन्न करने के लिए मोदी सरकार, उसके मंत्री, भाजपा आईटी सेल और संघी गुंडों ने चौतरफा अभियान चलाया। एक तरफ मोदी ने लोकलुभावन योजनाओं की बौछार शुरू कर दिया तो दूसरी ओर कृषि मंत्री ने बार-बार किसानों को बातचीत के लिए बुलाकर अपमानित करना जारी रखा। नौ-दस चक्र की बातचीत का भी कोई नतीजा नहीं निकला।

इसके बाद आतंकवादी संगठनों के सहयोग के नाम पर किसानों को तितर-बितर करने की कोशिश की लेकिन इससे भी उनकी दाल न गली तो पुलिस और न्यायालय के सहारे आंदोलन को तोड़ने की कोशिश की। जो सरोकार सरकार के थे उन्हें सुप्रीम कोर्ट पूरा करने को तत्पर हो गया लेकिन बात अंततः नहीं बनी। गतिरोध बना रहा।

गौर करने की बात है कि उत्तर प्रदेश में लगातार हत्याएँ हो रही हैं लेकिन अपराधी पकड़ से बाहर हैं। ताज़ातरीन गोरखपुर मामले में भी अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। अपराधी पुलिसकर्मी फरार चल रहे हैं। ठीक उसी तरह लखीमपुर खीरी के अपराधियों की भी बात है। कोई पकड़ा नहीं जा रहा है। केंद्र सरकार ने इस घटना के सूत्रधार को मंत्रिमंडल से हटाने का फैसला तक नहीं किया। उस मंत्री के बेटे को गिरफ्तार करने का साहस कौन कर सकता है?

 

बर्बरता क्यों ?

अगर लखीमपुर खीरी की घटना को छोड़कर पूरे किसान आंदोलन का मूल्यांकन किया जाय तो यह स्पष्ट हो जाता है कि केंद्र की भाजपा सरकार ने किसानों के साथ शुरू से लेकर अब तक बर्बरतापूर्वक व्याहर किया है। उंसका उद्देश्य था कि किसी तरह किसान दिल्ली छोड़कर भाग जाएँ और तीनों कृषि बिल आसानी से लागू कर दिये जाएँ।

पुलिस द्वारा लाठीचार्ज, आंदोलन स्थल की बिजली काटने, अन्य रूपों में तोड़फोड़ करने, आंदोलन विरोधी स्त्रियॉं के साथ बलात्कार करने के प्रयास, आंदोलनकारियों और पत्रकारों को मारने-पीटने और जेल में डालने की अनेक कार्रवाइयों ने सरकार के मंसूबे को साफ कर दिया कि वह आंदोलन को खत्म करने के लिए किसी हद तक जा सकती है।

पिछले दिनों हरियाणा में किसानों की बर्बरतापूर्ण पिटाई ने प्रशासन की नकाब उतार दी। लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के एक वायरल वीडियो ने यह साफ कर दिया कि किसान आंदोलन को लेकर भाजपा की केंद्र और राज्य सरकारें क्या सोचती हैं? खट्टर वीडियो में  संघी गुंडों को संबोधित करते हुये देखे जा सकते हैं कि किसानों के बीच घुसकर उन्हें मारो। अगर कहीं फंसे तो हम हैं न।

अब इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि खुद को लखीमपुर खीरी का गुंडा कहनेवाले गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी किसान आंदोलन के बारे में क्या सोचते हैं। उनका धमकी भरा वीडियो वायरल भी हो चुका है। भारतीय राजनीति का चरित्र यह है कि एक कमाता है तो पीढ़ियाँ खाती हैं और जो संसद और विधानसभा में होता है उससे जुड़ा हर व्यक्ति गुंडे में बदल चुका होता है। इसलिए बाप ने सरेआम धमकी दी और बेटे ने किसानों को अपनी गाड़ी से रौंद दिया। इसमें कोई अचंभे की बात नहीं।

लेकिन क्या यह किसानों से किसी निजी दुश्मनी की वजह से था? जाहिर है इसके भी अनेक पहलू हैं। अजय मिश्र का धमकी वाला वीडियो देखा जाय तो एक बात सामने आती है कि कोई फाँस है जो अंदर धँसी है। वे कह रहे हैं कि सब जानते हैं कि मैं सांसद से पहले क्या था। मैं किसी चुनौती से भागता नहीं। …. लखीमपुर ही नहीं पलिया भी छोड़ना पड़ जाएगा।

हो सकता है पलिया के किसान मिश्र के विरोधी हों। लेकिन क्या इससे उनके ऊपर गाड़ी चढ़ा देना चाहिए? बात इससे अधिक बड़ी है। मिश्र भाजपा सांसद होने के साथ केंद्रीय गृह राज्यमंत्री भी हैं। लिहाजा वे लखीमपुर में सरकार के प्रतिनिधि हैं। ठीक उसी तरह लखीमपुर के किसान भारत भर के आंदोलनकारी किसानों की कड़ी हैं। वे आंदोलन के हिस्सेदार हैं। इसलिए उनके ऊपर किया गया हमला लखीमपुर नहीं बल्कि दिल्ली के किसान आंदोलन की पीठ पर किया गया हमला है। ऐसा लगता है कि यह घटना सरकार की शह पर अंजाम दी गई।

बर्बरता के बाद लीपापोती

लखीमपुर खीरी में किसानों की हत्या के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाके में आपात स्थिति लागू कर दिया। कॉंग्रेस, समाजवादी पार्टी, बसपा और अन्य पार्टियों के लोगों को घटनास्थल पर जाने से जबरन रोक दिया गया गया। मामले पर लीपापोती तेज हो गई।

झण्डा लेकर चल रहे किसानों पर गाड़ी चढ़ाने का वीडियो वायरल होने के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने अपराधियों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की। अजय मिश्र ने अपने पुत्र के निर्दोष होने का वीडियो जारी करना शुरू किया। लेकिन यह घटना इतनी छोटी नहीं थी। पूरे देश में इसके खिलाफ गुस्सा था।

भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत की मध्यस्थता में मारे गए किसानों के परिवार को 45 लाख रुपए मुआवजा और एक सदस्य को सरकारी नौकरी के आधार पर गतिरोध खत्म करने की सुलह हुई। सरकार ने अपनी गर्दन बचा ली और किसान शांत करा दिये गए। लेकिन सबसे भयानक पहलू यह है कि इतनी बड़ी घटना के जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार नहीं किया गया। मुआवजे ने आग पर पानी फेर दिया।

इस पूरी प्रक्रिया ने किसान आंदोलन से एक अलग हालत पैदा कर दी। यह सरकार के लिए राहत की संस थीं और अपरधियों की गिरफ्तारी को लेकर ढिलाई बरती जाने लगी। नैरेटिव बदलने की कोशिश होने लगी। उत्तर प्रदेश के एक मंत्री ने कहा कि सब खुश हैं। अजय मिश्र टेनी ने अपने बेटे के बारे में कहना जारी रखा कि वह गाड़ी में नहीं था।

लेकिन तब भी यह सवाल उठता है कि वे तीनों गाड़ियाँ किसकी थीं? और वे किसकी इजाजत से किसानों को रौंदती हुई निकलीं। ऐसा भी नहीं था कि एक गाड़ी किसानों को कुचलती हुई निकल गई तो पीछे की दोनों गाड़ियाँ रुक गई हों। वीडियो में साफ दिखा कि तीनों गाड़ियाँ एक साथ निकलीं और वे किसानों को कुचलने के उद्देश्य से ही वहाँ आई थीं।

लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि ऊपर से आदेश था कि किसानों को कुचल दिया जाय जिससे आंदोलन में शामिल लोग डरकर मैदान छोड़ दें। फिर मुआवजा देकर मामले को रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाय। इसीलिए अनेक स्पष्ट सबूतों और वहाँ मौजूद गवाहों को दरकिनार कर न गाड़ी मालिक गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र और न ही उनके बेटे को गिरफ्तार किया गया।

पूरा मामला केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के किसान विरोधी और षड्यंत्रकारी रवैये में फंस चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने भी लगातार किसान विरोधी बातें की है। वह मात्र लखीमपुर खीरी जैसी बर्बरतापूर्ण घटना के अपराधियों को बचाने की कोशिशें कर रहा है।

 

स्वतः संज्ञान के निहितार्थ

घटना के तीन दिन बाद सुप्रीम कोर्ट ने इसका स्वतः संज्ञान लिया क्योंकि उसे लगा कि किसानों के साथ अन्याय हो रहा है। इसका मतलब यह हुआ कि सुप्रीम कोर्ट को यह संज्ञान है कि सरकार निरंकुश हो चुकी है और वह अपराधियों को गिरफ्तार न करने पर तुली है। जैसा कि अभी तक देखा गया है कि लखीमपुर खीरी के सांसद और गृह राज्यमंत्री के प्रभाव में उनके बेटे को गिरफ्तार करना बहुत मुश्किल है। निष्पक्ष जाँच तो असंभव ही है।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया ताकि सरकार को निर्देश दे। अखबारी खबरों के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चार किसानों सहित आठ लोगों की हत्या दुर्भाग्यपूर्ण है। उसने प्रदेश सरकार पर आरोप लगाया कि वह आरोपियों को बचा रही है और सरकार से जवाब तलब किया कि जांच में क्या प्रगति है।

खबर है कि सात आरोपियों में से दो गिरफ्तार कर लिए गए हैं जबकि पाँच अभी पकड़ से बाहर हैं। सुप्रीम कोर्ट ने गृह राज्यमंत्री के बेटे को निर्देश दिया कि वह अपराध शाखा के दफ्तर में पेश हो।

गौर करने की बात है कि उत्तर प्रदेश में लगातार हत्याएँ हो रही हैं लेकिन अपराधी पकड़ से बाहर हैं। ताज़ातरीन गोरखपुर मामले में भी अभी तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई। अपराधी पुलिसकर्मी फरार चल रहे हैं। ठीक उसी तरह लखीमपुर खीरी के अपराधियों की भी बात है। कोई पकड़ा नहीं जा रहा है। केंद्र सरकार ने इस घटना के सूत्रधार को मंत्रिमंडल से हटाने का फैसला तक नहीं किया। उस मंत्री के बेटे को गिरफ्तार करने का साहस कौन कर सकता है?

पूरा मामला केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के किसान विरोधी और षड्यंत्रकारी रवैये में फंस चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने भी लगातार किसान विरोधी बातें की है। वह मात्र लखीमपुर खीरी जैसी बर्बरतापूर्ण घटना के अपराधियों को बचाने की कोशिशें कर रहा है।

रामजी यादव कथाकार और गाँव के लोग के संपादक हैं।

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