Friday, June 14, 2024
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क्या वास्तव में मोदी अवतारी पुरुष हैं ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू राष्ट्रवादी हैं और हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के घोषित लक्ष्य वाले आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं। सांप्रदायिक राष्ट्रवाद को नस्ल या धर्म का लबादा ओढ़े तानाशाही बहुत पसंद आती है। धार्मिक राष्ट्रवादी समूह अपने सर्वोच्च नेता की छवि एक महामानव की बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखते। ऐसे में वे अवतारी पुरुष कैसे हुए?

ये सवाल पिछले दिनों चर्चा में रहा, मोदी जी ने अपने एक भाषण में इसका संकेत दिया था। उनके भाषण को आधार बनाकर हालांकि उनका मज़ाक बनाया गया, हमेशा की तरह उनके कथन को मूर्खतापूर्ण माना गया, लेकिन मैं निजी तौर पर उनके अर्धसत्य या असत्य को हमेशा ही गंभीरता से लेता हूँ, मेरा मानना है कि अगर मोदी जी झूठ भी बोलते हैं तो वो उनके सियासी योजनाओं का हिस्सा होता है और उस झूठ से वो हमेशा ही कोई न कोई मक़सद साध रहे होते हैं। सबसे अहम् बात कि उनके झूठ की वजह से उनके विरोधी भी घंटों उन पर बात करते हैं, हालांकि उसका कोई निष्कर्ष नहीं निकलता लेकिन मोदी जी चर्चा में बने रहते हैं। मनोविज्ञान के जानकर समझा सकते हैं कि नकारात्मक प्रचार भी प्रचार का ही एक हिस्सा है।

बहारहाल, मोदी जी एक आम इन्सान हैं या ईश्वर का अवतार या कि विशेष पुरुष जिनका जन्म किसी विशेष मक़सद से हुआ है, इस अवधारणा और इसमें अन्तर्निहित सियासत को समझने की कोशिश करते हैं।

मोदी जी का ये बयान जिसमें उन्होंने इशारा किया कि वो आम इन्सान नहीं हैं, बल्कि विशेष प्रयोजन से उनका जन्म हुआ है, एक विशेष राजनीतिक धारा से जुड़ा हुआ बयान है, इसे समझने के लिए इस पूरी चर्चा में आपको साथ रहना होगा, उसके बाद आप चाहें तो अपनी टिप्पणियों से इसमें भाग भी ले सकते हैं।

मोदी जी जिस राजनीतिक धारा के प्रतिनिधि हैं, वो लोकतंत्र में भरोसा नहीं करती, यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक ताकत बढ़ने के साथ ही देश की तमाम लोकतान्त्रिक संस्थाएं लगातार कमज़ोर हुई हैं और जिन सियासी मूल्यों को समाज में स्थापित करने की कोशिश हुई है, उनके ज़रिये समाज की भी लोकतान्त्रिक चेतना लगातार कमज़ोर हुई है।

नेहरु ने भारत में कायम की  लोकतान्त्रिक चेतना

यहीं आपको ये भी याद दिला दूँ कि हिंदुत्व की राजनीति करने वालों ने हमेशा ही राजे-रजवाड़ों और उनकी राजनीतिक प्रणाली का समर्थन किया है, इस देश का सौभाग्य या संयोंग कहिये कि देश की आजादी के बाद सत्ता कांग्रेस के हाथ में रही और कांग्रेस में जवाहर लाल नेहरु जैसा लोकतान्त्रिक चेतना संपन्न व्यक्ति सत्ता शीर्ष पर रहा जिसकी वजह से देश में थोड़ा लड़खड़ाता हुआ ही सही लोकतंत्र क़ायम हो पाया, अगर हिंदुत्व के हामियों को सत्ता मिलती तो देश में राजशाही या इसके समतुल्य कोई व्यवस्था होती लोकतंत्र नहीं।

पाकिस्तान इसका जीता जागता उदहारण है। पाकिस्तान का निर्माण धर्म के आधार पर हुआ जरूर था लेकिन जिन्ना एक लोकतान्त्रिक पाकिस्तान चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान सालों तक ढंग का संविधान नहीं बना पाया और सत्ता डायरेक्ट या इनडायरेक्ट हमेशा फौज़ के हाथ में रही। भारत के कुछ राज्यों में सामंती निजाम को ख़त्म करने की कोशिश के तहत भूमि बटवारे का कार्यक्रम किसी हद तक पूरा हुआ लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं हुआ। इस आधार पर तुलना के लिए और भी एरियाज़ हैं, उन्हें मैं आपके लिए छोड़ता हूँ।

आरएसएस हो या हिन्दू महासभा वो देश में हमेशा से ही हिन्दू राष्ट्र चाहते थे/हैं, लेकिन हिन्दू राष्ट्र का स्वरूप क्या होगा, इसे डिसकस नहीं करते, हालांकि राजशाही के दौर में जो हिन्दू समाज था और जिसे आज फिर से उसी रूप में स्थापित करने की कोशिश हो रही है, उसका वर्णन मनुस्मृति में है, इसके बारे में आप जानते हैं, उस पर यहाँ ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन एक बात तो साफ़ है कि मनुस्मृति में उल्लिखित समाज अगर आज बनाना हो तो ये लोकतांत्रिक प्रणाली में संभव नहीं है। यहाँ ये कहना ज़रूरी है कि मनुस्मृति में जिस सामाजिक व्यवस्था का विधान है वो आज भी मौजूद है, बस देश की लोकतान्त्रिक प्रणाली ने उसे बहुत कमज़ोर कर दिया है।

अब यहाँ दो बातें साफ़ हैं, पहली तो ये कि जिस हिन्दू राष्ट्र की ज़ोर-शोर से बात होती है उसकी सामाजिक व्यवस्था मनुस्मृति पर ही आधारित होगी और मनुस्मृति को तभी लागू किया जा सकता है जब राजशाही या उसके समतुल्य कोई व्यवस्था हो, लोकतान्त्रिक राजनीतिक एवं सामाजिक प्रणाली में ये लागू नहीं हो सकता।

आरएसएस की सबसे बड़ी चुनौती ही यही है कि वो खुलेआम इसे स्वीकार नही कर सकती क्योंकि अभी देश में सरकारों का चुनाव जनता के वोटों से हो रहा है, ऐसे में अगर ये मालूम हो कि हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में देश का बहुसंख्यक सम्पदा और सम्मान से वंचित हो जायेगा तो आरएसएस की राजीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी का जनसमर्थन घट जायेगा, यानि कि अगर आरएसएस खुल कर अपना मंतव्य जाहिर कर दे तो देश का बहुसंख्यक आरएसएस की राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी को रिजेक्ट कर देगा।

आरएसएस ने मिथकीय कहानियों और परम्पराओं को सियासत के टूल के रूप में इस्तेमाल किया 

ऐसे में आरएसएस ने हिन्दू धर्म, हिन्दू धर्म के मिथकीय कहानियों, परम्पराओं को न सिर्फ़ सियासत के टूल के तौर पर इस्तेमाल किया बल्कि ज़रूरत के मुताबक मिथक गढ़े भी। इन तरीकों से उसने ‘हिन्दू’ टाइटल के तहत आने वाले लोगों में अपनी पैठ बनाई। मुसलमानों को हिन्दुओं के विरोध में खड़ा किया और उनका अमानवीकरण किया और हिन्दू समाज के दुश्मन के तौर पर इन्हें स्थापित किया।

ये सब करते हुए आरएसएस सत्ता शीर्ष तक पहुँच गयी है। अब चुनौती उस राजनीतिक व्यवस्था को लागू करना है जिसका आरएसएस संकेत तो देती है लेकिन खुलकर बात नहीं करती। देखा जाये तो आरएसएस ने सत्ता के सभी केन्द्रों में अपने समर्थकों को इतनी बड़ी तादाद में तो बैठा ही दिया है कि अगर आज वो संविधान बदलने की कोशिश करे तो उसे बहुत ज़्यादा दिक्क़त नहीं होगी।

मोदी जी को विशेष या अवतारी पुरुष के रूप में प्रोजेक्ट करने को इसी से जोड़ कर देखना चाहिए। यहाँ ये भी देखना होगा कि आरएसएस अलग अलग तरीकों से जनता की नब्ज़ टटोलने की कोशिश करती है और जब पूरी तरह संतुष्ट हो लेती है तभी कोई नया क़दम उठाती है। मोदी जी के बयान को इसी कोशिश का हिस्सा समझना चाहिए।

अगर देश में राजतन्त्र या राजतन्त्र के समतुल्य कोई व्यवस्था क़ायम होती है तो मोदी जी को इसका प्रधान बनाया जायेगा। आपके मन में ये सवाल उठ सकता है कि मोदी ही क्यों, इसके दो उत्तर हो सकते हैं, पहला ये कि मोदी जी की जनमानसस में पहले ही विशिष्ट पुरुष की छवि बनाई जा चुकी है, दूसरा अगर ये प्रयोग सफ़ल होता है तो मोदी जी के शासनकाल में ही उनका उत्तराधिकारी तैयार किया जा सकता है।

अब सवाल पैदा होता है कि क्या आरएसएस अपने इस मक़सद में कामयाब होगी? सीधे सीधे ‘नहीं’ तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तो तय है कि मनुष्य की सभ्यता को पीछे नहीं धकेला जा सकता, इसलिए अगर आरएसएस सफल होती भी है तो भी उसे संविधान में बदलाव करके अपना मक़सद पूरा करना होगा।

यहाँ एक और ज़रूरी पहलू पर गौर करने की ज़रूरत है, आरएसएस के पास वर्तमान आर्थिक व्यवस्था का कोई विकल्प नहीं है, दूसरे धर्म आधारित राजनीति हमेशा देश-काल में मौजूद ताक़तवर तबक़े के साथ खड़ी होती है, ऐसे में बहुत मुमकिन है कि देश के सभी संसाधन चंद अमीरों को सौंप दिया जाये, जिसके लक्षण दिखाई दे भी रहे हैं, इसके बदले ये पूंजीपति आरएसएस की सत्ता को लगातार मदद करें।

हालांकि अभी ये सब मौजूदा बयानों और कार्यों के आधार पर अनुमान ही है लेकिन ऐसा होता हुआ दिखाई भी दे रहा, दूसरी तरफ विपक्ष की एकता, छात्रों और किसानों का आन्दोलन, अंतराष्ट्रीय राजनीति में आ रहे बदलाव और पूंजीवादी निजाम के ख़िलाफ़ दुनिया भर में उभरती हुई चेनता कहती है कि आरएसएस या उसके जैसी ताकतें आगे और कामयाब नहीं होगीं।

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