बॉलीवुड में ऐतिहासिक सिनेमा हमेशा संदिग्ध विषय रहा है

राकेश कबीर

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इतिहास में बीते हुए समय में घटित घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत किया जाता है। इतिहास के अंतर्गत हम जिस विषय का अध्ययन करते हैं उसमें अब तक घटित घटनाओं या उससे संबंध रखने वाली घटनाओं का कालक्रमानुसार वर्णन होता है। आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार इतिहास में सार्वजनिक घटनाओं का विवरण होता है। इसमें व्यक्तिगत जीवन से सम्बंधित घटनाओं का उल्लेख नहीं होता। इसमें वर्णित घटनाओं में क्रमबद्धता होती है तथा इतिहासकार सच्चे वैज्ञानिक की तरह घटनाओं को जैसी घटित हुई है उनकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करते हैं। चार्ल्स फर्थ के अनुसार, ‘इतिहास मानवीय सामाजिक जीवन का वर्णन है। इसका उद्देश्य सामाजिक परिवर्तनों को प्रभावित करने वाले उन सक्रिय विचारों का अन्वेषण है, जो समाज के विकास में बाधक अथवा सहायक सिद्ध हुए हैं। इन सभी तथ्यों का उल्लेख इतिहास में होना चाहिए’। इसी क्रम में इतिहासकार ई. एच. कार के अनुसार ‘प्रत्येक इतिहास विचार का इतिहास होता है और इतिहासकार के मन में उन विचारों का पुनर्निर्माण होता है, जिनका इतिहास के अंतर्गत वह अध्ययन करता है। भारतीय इतिहास विभिन्न कालखंडों पर विभिन्न भारतीय और विदेशी विद्वानों ने काम किया है। इसी तरह बॉलीवुड के उद्भव और विकास पर कई विद्वानों ने शोध और लेखन का कार्य किया है, जिनमें आशीष राजाध्यक्ष (एन्सायक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन सिनेमा), रवि वासुदेवन, भावना सोमैया-द स्टोरी इज सो फार, कावेरी बमजई-बॉलीवुड टुडे, मिहिर बोस-बॉलीवुड: अ हिस्ट्री, इंडियन फिल्म–एरिक बर्नौव एंड एस. कृष्णास्वामी, नेशनल आइडेंटिटी इन इंडियन पोपुलर फिल्म 1947-1987, सुमिता एस. चक्रवर्ती, फियरलेस नाडिया-डोरोथी वीनर, और बॉलीवुड सिनेमा-विजय मिश्रा प्रमुख हैं।

भारत और बॉलीवुड सिनेमा का इतिहास 

जब हम सिनेमा और इतिहास के अंतर्सम्बन्ध पर बात करते हैं तो इसके तीन पहलू सामने आते हैं – पहला भारत देश का इतिहास, दूसरा भारत में फिल्म निर्माण का इतिहास और भारतीय सिनेमा में इतिहास का प्रस्तुतीकरण। 

भारत देश का इतिहास तीन हजार साल से भी अधिक पुराना है। हड़प्पा और मोहन जोदडो में प्राप्त सभ्यता के अवशेषों से इतिहासकार भारतीय इतिहास के बारे में विवेचन करना आरम्भ करते हैं। मजे की बात है कि ऐतिहासिक विवेचना और परिकल्पनाओं के आधार पर मोहनजोदारो नाम से फिल्म भी बन गयी। भारतीय इतिहास पर बनी कुछ फ़िल्में निम्न प्रकार हैं :-

फिल्म गाँधी, डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर,बोस द फॉरगेटन हीरो,और मंगल पाण्डेय (बाएं से दायें )

गौतम बुद्धा (2007), भगवान महावीर (2012), चन्द्रगुप्त (1958), सिकन्दर (1941), सिकन्दर ए आज़म (1965), अशोका (2001) पद्मावत (2018), द एम्पायर (2021), मुगल-ए-आज़म (1960), जोधा-अकबर (2008), तानसेन (1943), कबीरदास (2003), संत रविदास की अमर कहानी (1983), ताजमहल (1963), ताजमहल: एन इटरनल लव स्टोरी (2005), शाहजहाँ (1946), तख़्त (2020), द लास्ट मुगल : बहादुर शाह ज़फर (2018), सेनापति (1961), शहीद (1965), आम्रपाली (1966), सिद्धार्थ (1972), मौर्या (1975), शतरंज के खिलाड़ी (1977), गाँधी (1982), द डिसिवर्स (1988) सरदार (1993), अर्थ (1998), हे राम (2000), डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर (2000), अशोका द ग्रेट (2001), लगान: वंस अपान ए टाइम इन इंडिया (2001), गदर: एक प्रेम कथा (2001), द लीजेंड ऑफ़ भगत सिंह (2002), मंगल पांडे: द राइजिंग (2005), ताजमहल: अन इटरनल लव स्टोरी (2005), नेताजी सुभास चन्द्र बोस: द फोरगोटेन हीरो (2005), पार्टीशन (2007), जोधा अकबर (2008), बाजीराव मस्तानी (2015), मोहन जोदारो (2016), बेगम जान (2017), राग देश (2017), रंगून (2017), पदमावत (2018), मंटो (2018), पलटन (2018), 1946 कलकत्ता किलिंग्स (2018), केसरी (2019), मणिकर्णिका (2019), पानीपत (2019), तानाजी (2020), अमर कहानी रविदास जी की (2020), शिकारा (2020), द एम्पायर (2021), मुग़ल रोड़ (2021), द बैटल ऑफ़ भीमा कोरेगांव (2021)।

उपर्युक्त सूची को देखें तो हम पायेंगे कि मोहनजोदारो से लेकर भीमा कोरेगांव तक प्रत्येक कालखंड के महत्वपूर्ण घटनाओं और नायक-नायिकाओं एवं उनके कृत्यों पर भारतीय सिनेमा में फ़िल्में बनी हैं। यदि हिंदी सिनेमा में किसी मुद्दे पर फिल्म नहीं बनी है तो अन्य भाषाओं की फिल्मों तथा टेलीविजन सीरियल्स ने उन्हें अपने विषयवस्तु में शामिल किया है। अगर हम गौर करें तो पायेंगे कि अंग्रेजों के विरुद्ध हुए आन्दोलनों एवं विद्रोहों पर कई फ़िल्में बनी। तदुपरांत भारत-पकिस्तान बंटवारे और पलायन पर अब तक सबसे ज्यादा फ़िल्में बनी हैं जो अब भी जारी हैं। भारत और चीन युद्ध पर भी ‘हकीकत’ और ‘पलटन’ जैसी फ़िल्में बनी हैं।

इतिहास को लोकप्रियता के मानक तक रिड्यूस करना 

1913 में दादा साहब फाल्के निर्देशित पहली मूक फिल्म राजा हरिश्चंद्र

बॉलीवुड का इतिहास सन 1913 में दादा साहब फाल्के द्वारा निर्मित फिल्म सत्य हरिश्चंद्र के बाद मूक फिल्मों की एक लंबी परंपरा रही। सन 1937 में बोलती हुई फिल्म आलमआरा के बनने के बाद फिल्म निर्माण में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ और विभिन्न विषयों पर फिल्में बनाई जाने लगी। आजादी के बाद सिनेमा निर्माताओं पर नेहरु और गांधी के विचारों का प्रभाव रहा। उद्योगों, अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों की स्थापना और साम्प्रदायिक एकता के संदेश को लेकर आगे बढ़ रहे राजनीतिक नेतृत्व के साथ भारतीय फिल्मों की विषयवस्तु भी कदमताल कर रही थी। उस दौर के नायक राज कपूर (आवारा, श्री 420, बूट पालिश) दिलीप कुमार (मशाल, पैगाम, मजदूर) और देवानंद (बाज़ी) जैसे नायकों ने जनता को एक भरोसे भरा सन्देश देने के साथ-साथ उनके लिए आदर्श के तौर पर भी काम किया। आगे चलकर मनोज कुमार (उपकार, पूरब और पश्चिम, शहीद, क्रांति) जैसे अभिनेता ने लाल बहादुर शास्त्री के ‘जय जवान जय किसान’ के नारे के साथ फ़िल्में बनाई। देशभक्ति प्रधान कई फिल्मों का निर्माण कर वह भारत कुमार के नाम से प्रसिद्ध हो गए। सत्तर के दशक में रोमांटिक फिल्मों के नायक के तौर पर राजेश खन्ना तथा आजादी के बाद नौजवानों के टूटते सपनों और बेरोजगारी एवं राजनीतिक उथल-पुथल को आवाज देने के लिये अमिताभ बच्चन यंग्री यंग मैन के रूप में सामने आये। अस्सी के दशक में हिंसा, रेप और खूंखार विलेन के साथ डाकुओं की फ़िल्में पर्दे पर बहुतायत में दिखीं। इसी समय आतंकवाद की समस्या भी भारत और दुनिया के कई देशों में सिर उठाने लगी थी और फिल्मों के पर्दे पर उन्हें जगह भी मिलने लगी थी। बाबरी मस्जिद के विवादित ढाँचे का गिरना, मुंबई बम ब्लास्ट और कश्मीर घाटी में अलगाववादियों का उभार भी सामने आने लगा था। सांप-संपेरा, भूत-चुड़ैल के अंधविश्वास पर आधारित फ़िल्में भी अस्सी-नब्बे के दशक में आती जाती रहीं। नब्बे के दशक में भूमंडलीकरण के प्रभाव में प्रवासी भारतीयों के सिनेमा का आगाज हुआ और ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’, परदेस, आ अब लौट चलें, स्वदेस, ये है जलवा, सलाम नमस्ते जैसी फ़िल्में बनायी गयीं। शाहरुख़ खान एनआरआई युवक के तौर पर पूरी दुनिया में मशहूर हो गए। बीसवीं सदी के पहले दशक में फिल्म निर्माण और प्रदर्शन में क्रांतिकारी बदलाव घटित हुए। छोटे-छोटे शहरों में वर्षों से चलने वाले सिनेमा हाल बंद होने लगे, टेलीविजन घर-घर पहुचं गया। ढेर सारे सेटेलाइट चैनलों पर नयी-नयी फ़िल्में दिखाई जाने लगीं। साथ ही बड़े महानगरों में मल्टीप्लेक्स का उद्भव हुआ। जहाँ एक ही छत के नीचे सिनेमा, खाना, मार्किट सब उपलब्ध कराया जाने लगा। पॉपकार्न और कोल्ड्रिंक के दामों में इन्फ्लेशन लाकर अमीर वर्गों की जेब से पैसा निकलवाकर एक या दो हफ्ते में फ़िल्में सौ करोड़ के बिजनेस का आंकडा पार करने लगीं। आम दर्शकों से सिनेमा का पर्दा दूर हो गया, बीसवीं सदी के दूसरे दशक में एंड्रायड फोन और टेलीविजन का अंतर मिटने लगा। पूरी दुनिया सिमटकर मुट्ठी में आ गयी। फेसबुक, यूट्यूब, गूगल ने सारी जानकारियां एक क्लिक पर उपलब्ध कराना शुरू कर दिया। अमेजन, प्राइम वीडियो, डिज्नी-हॉटस्टार, नेटफ्लिक्स जैसे ओटीटी प्लेटफार्म पर विविध विषयों पर अब धड़ाधड़ फ़िल्में रिलीज हो रही हैं। कोरोना काल ने सामूहिकता का अंत कर सबको अकेले में रहने को विवश किया। इस मुश्किल समय का सबसे ज्यादा फायदा ओटीटी प्लेटफार्मों ने उठाया। सेंसर के अंकुश से मुक्त गाली-हिंसा से भरपूर फ़िल्में रीलिज होने लगीं। ओटीटी ने ऐसी क्रान्ति की है कि परंपरागत टेलीविजन का चेहरा बदलकर रख दिया है। नई-पुरानी सारी फ़िल्में अपनी मर्जी से लोग अपने ड्राइंग रूम में देख पाने में सक्षम हो गए हैं। यह भी सिनेमा, टेलीविजन के इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण दौर है।

ऐतिहासिक फ़िल्में कभी भी विवादों से परे नहीं रहीं 

1942 अ लव स्टोरी

इतिहास में तथ्य महत्वपूर्ण होते हैं यदि ऐतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की जाति है या तोड़ मरोड़ कर पेश किया जाता है तो बड़े पैमाने पर विवाद भी खड़े होते हैं। इतिहासकार से लेकर जातीय संगठन भी फिल्मकारों का विरोध करते हैं। कभी-कभी यह विरोध हिंसात्मक भी हो जाता है। जोधा अकबर और पद्मावत के निर्माण से लेकर रिलीज तक बहुत ही बड़े पैमाने पर विवाद और विरोध प्रदर्शन हुए। परिणामतः फिल्मकारों को फिल्मों की विषयवस्तु, संवाद, दृश्य और वेशभूषा आदि में परिवर्तन करना पड़ा। बॉलीवुड में ऐतिहासिक फिल्मों का ज़िक्र करें तो पता चलता है कि आशुतोष गोवारिकर ने ऐतिहासिक विषयों और चरित्रों पर लगान, जोधा अकबर, मोहन जोदारो और पानीपत जैसी फ़िल्में बनाईँ। संजय लीला भंसाली ने विधु विनोद चोपड़ा के साथ ब्रिटिश भारत की पृष्ठभूमि पर 1942 अ लव स्टोरी ऐतिहासिक फिल्म बनाने में सहयोग किया था। बाद के वर्षों में भंसाली ने ऐतिहासिक चरित्रों पर ‘बाजीराव मस्तानी’ और ‘पद्मावत’ फ़िल्में बनाई। लगान फिल्म में आशुतोष और आमिर की जोड़ी ने भारतीयों के पसंद की कई चीजें इकट्ठी की, जैसे कि अमिताभ बच्चन की आवाज में फिल्म का परिचय, भारतीयों और अंग्रेजों के बीच क्रिकेट मैच से राष्ट्रवाद की खुराक, हीरो आमिर खान, ए. आर. रहमान का संगीत, नाच-गाना, प्रेम त्रिकोण सब एक साथ एकत्र कर फिल्म का निर्माण किया जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया।

संगीत सिवन निर्देशित फिल्म अशोका ने चक्रवर्ती सम्राट अशोक के जीवन के कुछ हिस्सों पर बॉलीवुड मसाला से भरपूर फिल्म का निर्माण किया, जिसके कारण यह फिल्म बहुत प्रभावित नहीं करती। कौरवाकी नामक नायिका की फैंटेसी, नाच-गाना, प्यार मोहब्बत इसे ऐतिहासिक फिल्म ही नहीं रहने देता है। इतिहासकारों का कहना है कि यह फिल्म तथ्यों की अनदेखी करती है (अलेक्स वोन टनजेल्मन)। इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि अशोक के कलिंग पर आक्रमण के समय वहां किसी रानी का शासन था। इतिहासकार एम.एन.दास कहते हैं कि ऐतिहासिक महत्व के इतने बड़े शासक के जुड़े तथ्यों को पैसा कमाने के लिए तोड़-मरोड़ नहीं किया जाना चाहिए। बिना उपयुक्त शोध किये इस तरह की फिल्में बनाना ठीक नहीं है क्योंकि इन फिल्मों का उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ लोगों को शिक्षित करना भी होता है। युद्ध के रक्तपात और हिंसा से दुखी होकर अशोक ने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली थी और दुनिया भर में धम्म प्रचार भी कराया था। ऐसे महानायक के उपर ज़िम्मेदारी से फिल्म निर्माण होना चाहिए।

फिल्म पद्मावत मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य ‘पद्मावत के कथानकों पर आधारित हैं। मलिक मुहम्मद जायसी निर्गुण काव्यधारा में ‘प्रेममार्गी शाखा के भक्त कवि हैं, इस कृति में उन्होंने राजा रतनसेन, पद्मावती और नागमती  को क्रमश: आत्मा, परमात्मा और दुनियाधंधा के प्रतीकों के रूप में चित्रित किया है। पद्मावती सिंहल द्वीप की राजकुमारी है जिसे पाने के लिए राजा रतनसेन यथासंभव सारे जतन करता है। इस महाकाव्य में पद्मावती का राज्य की अन्य महिलाओं के साथ जौहर करने का भी वर्णन है, परंतु सभी कुछ प्रतीकात्मक-काल्पनिक एवं कथानक को पूर्ण करने के हिस्से मात्र है। रामचंद्र शुक्ल ने सिंहल द्वीप को श्रीलंका माना है और पद्मावती जैसी सौंदर्यवाली नारियों का भौगोलिक वातावरण के दृष्टिकोण से वहां पाया जाना संदिग्ध बताया है। पद्मावती काल्पनिक, मिथकीय या ऐतिहासिक पात्र है, इस विषय में आज भी स्पष्टता नहीं है। पद्मावती को राजस्थान के भूगोल में स्थापित करने के प्रयासों का आधार भी पद्मावती की तरह ही काल्पनिक प्रतीत होता है।

पद्मावत, मिथक, कल्पना और सिनेमा

पद्मावत

मिथक दुनिया के समस्त समाजों में विद्यमान है और समाज में उनका व्यापक प्रभाव भी होता है। मिथकों पर बहुत सारा साहित्य लिखा गया है और सिनेमा में भी उनका प्रचुर प्रस्तुतीकरण हुआ है। प्रसिद्ध मानवशास्त्री लेवी स्ट्रास ने 1964 में प्रकाशित अपनी चार खंडीय पुस्तक में दुनिया भर के मिथकों का अध्ययन करने के उपरांत यह निष्कर्ष प्रतिपादित किया कि विश्व के समाजों में जो विभिन्न तरह के मिथक और उनके वृत्तांत प्रचलित हैं, उनके मूल में एक ही तरह की प्रतीकात्मक संरचना पाई जाती है और इन प्रतीकों और कहानियों में मानव जीवन के लिए संदेश छिपे रहते हैं, जिनका उपयोग समाजीकरण की प्रक्रिया में किया जाता है। लेवी स्ट्रास ने बताया कि मिथक निर्माण की प्रक्रिया सामाजिक उपयोगिता के कारण नहीं चलती अपितु मुख्यत: यह अपने स्वयं के सहज नियमों और सिद्धांतों के द्वारा नियंत्रित होती है। मिथक बाह्य यथार्थ का नहीं, बल्कि मस्तिष्क की प्रक्रियाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मिथक, इतिहास का विरोध करते हैं क्योंकि वह बाहरी होता है। पद्मावत के बहाने यदि हम मिथकों की उत्पत्ति और विकास पर बात करें तो ज्ञात होता है कि ‘मिथक शब्द मूलत: यूनानी शब्द ‘माइथोस’ से बना है जिसका अर्थ है ऐसा आख्यान जिसमें कोई तर्क न हो। इसके लिए दंतकथा, पुरावृत्त, पुराकथा जैसे शब्द भी प्रयोग में लाए जाते हैं। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण के अनुसार सामाजिक जीवन की आशा-आकांक्षा ही प्रक्षेपित होकर प्रतीकात्मक पुराकथा का रूप ले लेती है। साहित्यकार डॉ. विद्यानिवास मिश्र लिखते हैं, ‘मिथक के बारे में भ्रांत धारणा फैली हुई है कि यह कुछ मिथ्या से संबंध रखता है अर्थात इसमें वास्तविकता का या यथार्थ का अंकन न होकर किसी काल्पनिक या अवास्तविक सत्ता या ठीक-ठीक कहें तो सत्ताभास  का मायाजाल खड़ा किया जाता है। जबकि ठीक इसके विपरीत देश और काल के चौखट से बाहर ले जाकर किसी भी वास्तविकता की सनातन और कालप्रवाही डिजाइन प्रस्तुत करना ही मिथक का मुख्य उद्देश्य होता है’। शरतचंद्र का देवदास और जायसी की पद्मावत भी अब मिथकीय पात्र बनकर सामान्य जनजीवन का हिस्सा बन चुके हैं। इनसे लोगों की भावनाएँ भी जुड़ी हैं इसीलिए नई व्याख्या या नए तरह के चित्रण पर कतिपय लोगों को ऐतराज होता है और जातीय चेतना से प्रेरित होकर विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं।  करणी सेना द्वारा किये जा रहे विरोध-प्रदर्शन उसी का उदाहरण मात्र हैं।

मिथकीय चरित्रों का चित्रण वास्तव में एक कठिन काम है और इससे तमाम लोगों की भावनाएँ क्षत-विक्षत भी हो सकती हैं क्योंकि उनके मन में चरित्रों की एक परंपरावादी छवि अंकित होती है। रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि- जो वस्तु हमसे अलग है, हमसे दूर प्रतीत होती है, उसकी मूर्ति मन में लाकर उससे सामीप्य का अनुभव करना ही उपासना है। साहित्य वाले इसे ही भावना कहते हैं और आजकल के लोग कल्पना। वे जायसी के पद्मावत की समीक्षा करते हुए लिखते हैं- अपनी कथा को काव्योपयोगी स्वरूप देने के लिए ऐतिहासिक ब्यौरे में कुछ फेरबदल करने का अधिकार कवि के बराबर रहता है। जायसी ने भी इस अधिकार का उपयोग कई स्थानों पर किया है। पद्मावती के रूप का बखान कर अलाउद्दीन को चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण के लिए उकसाने वाले पात्र पंडित राघवचेतन की कल्पना जायसी ने की। अलाउद्दीन द्वारा दर्पण में पद्मावती की छाया देखने, उसके द्वारा दूती को भेजने तथा युवा योद्धा बादल और उसकी नवविवाहिता पत्नी के बीच संवाद के दृश्य कल्पित हैं’’। इसी तरह महान कवि-नाटककार जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक अजातशत्रु की भूमिका में कल्पना तत्व के बारे में लिखा है कि ”मानव-समाज की कल्पना का भंडार अक्षय है, क्योंकि वह इच्छाशक्ति का विकास है…. विश्व में जब तक कल्पना इयत्ता को नहीं प्राप्त होती, तब तक वह रूप-परिवर्तन करती हुई, पुनरावृत्ति करती ही जाती है। अजातशत्रु नाटक में भी पद्मावती नामक पात्र का जिक्र है। उसके बारे में तमाम अध्ययन करने के बाद प्रसाद जी लिखते हैं – ”कौशांबी नरेश उदयन की दूसरी रानी पद्मावती के नाम में बड़ा मतभेद है। बौद्धों ने उसका नाम सामावती लिखा है। मेरा अनुमान है कि पद्मावती अजातशत्रु की बहन थी और मगध की राजकुमारी थी। निष्कर्ष रूप में लिखते हैं, ”मागंधी (सामावती) के उकसाने से पद्मावती पर उदयन बहुत असंतुष्ट हुए थे। सामावती ब्राह्मण कन्या थी, जिसका विवाह उसके माता-पिता की इच्छा से गौतम से होना था। इसी मागंधी को और बौद्ध साहित्य में वर्णित आम्रपाली को हमने कल्पना द्वारा एक में मिलाने का साहस किया है। बौद्धों की सामावती, वेश्या आम्रपाली, मागंधी और अजातशत्रु नाटक की श्यामा वेश्या का एकत्र संघटन कुछ विचित्र तो होगा, किंतु चरित्र का विकास और कौतुक बढ़ाना की इसका उद्देश्य है’’। प्रसाद ने चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त, अजातशत्रु जैसे मशहूर ऐतिहासिक नाटक लिखें हैं। अपने नाटकों की भूमिका में जयशंकर प्रसाद ने स्वीकार किया है कि घटनाओं को क्रमश: प्रस्तुत करने, टूटी कडिय़ों को जोडऩे व नाटक को मनोरंजक बनाने के लिए काल्पनिक पात्रों व घटनाओं का उन्हें सहारा लेना पड़ता था। रचनात्मक कृतियां तथ्यों का प्रस्तुतिकरण मात्र नहीं हैं।

पद्मावती के कथानक से पता चलता है कि राजपूत समाज में बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन रहा है। मुगलों व अन्य राजवंशों में भी यह प्रथा प्रचलित रही है। साथ ही सतीप्रथा या जौहर जैसी स्त्री विरोधी, पुरुष वर्चस्व वाली कुप्रथाओं का भी चलन था जिनका अब अंत हो चुका है। इंग्लैंड, अमेरिका और विश्व के अनेक देशों में ऐतिहासिक कथानकों पर भव्य फिल्में बनाई जाती हैं लेकिन भारतीय जातिवादियों और अतिवादियों की तरह शायद ही उनका विरोध होता है।

 

पद्मावती के कथानक से पता चलता है कि राजपूत समाज में बहुपत्नी प्रथा का प्रचलन रहा है। मुगलों व अन्य राजवंशों में भी यह प्रथा प्रचलित रही है। साथ ही सतीप्रथा या जौहर जैसी स्त्री विरोधी, पुरुष वर्चस्व वाली कुप्रथाओं का भी चलन था जिनका अब अंत हो चुका है। इंग्लैंड, अमेरिका और विश्व के अनेक देशों में ऐतिहासिक कथानकों पर भव्य फिल्में बनाई जाती हैं लेकिन भारतीय जातिवादियों और अतिवादियों की तरह शायद ही उनका विरोध होता है। कला, कल्पना के महत्त्व को न समझ पाने, मिथक, इतिहास में फर्क न कर पाने की दृष्टि का अभाव, मिथ्या स्वाभिमान, मिथ्या जातीय चेतना और सबसे बढ़कर राजनीतिक फायदे के लिए ऐसे विरोध-प्रदर्शन होते हैं जिसका लेकिन अंतत: इन विवादों का सर्वाधिक लाभ फिल्म निर्माताओं को ही होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं- ”उत्तर भारत के अवधी क्षेत्र में ‘पद्मिनी रानी और ‘हीरामन सुए की कहानी प्रचलित है और जायसी ने प्रचलित कथा के अनुसार ही वर्णन किया है। जायसी ने प्रचिलित कहानी को ही लेकर सूक्ष्म ब्यौरे की मनोहर कल्पना करके उसे सुंदर प्रबंध काव्य रचा। जायसी के अतिरिक्त कई लोगों ने इसे काव्य रूप में बांधा। हुसैन गज़नवी ने ‘किस्सए पद्मावत नाम का फारसी काव्य लिखा। सन् 1642 में रायगोविंद मुंशी ने पद्मावत की कहानी फारसी गद्य में ‘तुक फतूलकुलूब के नाम से लिखी। उन्हीं के पीछे मीर जियाउद्दीन इब्रत और गुलाम अली इशरत ने मिलकर सन् 1796 में उर्दू शेरों में इस कहानी को लिखा। जायसी ने सन् 1520 ई. में पद्मावत लिखा। अंग्रेजी दैनिक दि हिंदू में भी 17 नवंबर, 2017  को दि मेनी पद्मावतीज (कई पद्मावतियां) नाम से एक आलेख छपा है। जिसमें बताया गया है कि ऐसा कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं है कि चित्तौड़ में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय पद्मावती नामक कोई महिला थी या अलाउद्दीन ने मात्र किसी एक महिला को पाने के लिए चित्तौड़ किले पर कब्जा किया। अत: पद्मावती एक काल्पनिक साहित्यिक पात्र मात्र है और इसके कथानक में समय-समय पर परिवर्तन होते रहे हैं। रामचंद्र शुक्ल मानते हैं कि जायसी व अन्य मुस्लिम कवियों द्वारा हिंदू आख्यानों पर आधारित ग्रंथों की रचना दोनों धर्मावलंबियों के बीच सांप्रदायिक भेदभाव दूर करके पारस्परिक विश्वास एवं सद्भाव पैदा करने के लिए किया गया।

भारतीय इतिहास को देखें तो जौहर से लेकर ऑनर किलिंग तक की चर्चा की गयी है जिसे फिल्मों ने भी अपना विषय बनाया है। सिन्धु घाटी की सभ्यता मोहनजोदारो से लेकर प्राचीन इतिहास, मध्यकालीन इतिहास और आधुनिक इतिहास की प्रत्येक महत्वपूर्ण घटना पर फ़िल्में बनी हैं और बढ़ते राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभाव में इतिहास की कम चर्चित घटनाओं पर केन्द्रित बाजीराव मस्तानी, केसरी, तानाजी, भुज जैसी फ़िल्में बन रही हैं। मध्यकालीन इतिहास पर इम्पायर और पानीपत और वर्तमान इतिहास पर मंगल पांडे, गांधी, सुभाष, भगत सिंह, आंबेडकर, ठग्स ऑफ़ हिन्दुस्तान जैसी फ़िल्में बन रही हैं। फ़िल्में ऐतिहासिक चेतना के निर्माण और प्रसार का प्रमुख माध्यम हैं। इसलिए ऐतिहासिक घटनाओं और तथ्यों पर शोध और अध्ययन के उपरान्त ज़िम्मेदारी के साथ तथ्यात्मक सिनेमा का निर्माण समाज और राष्ट्र के हित में करना समय की मांग है।

कुछ संदर्भ : 

बोस, मिहिर (2006) बॉलीवुड: अ हिस्ट्री, रोली बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली।

झा, तान्या (2018) पिंजर रिव्यु: द अदर साइड ऑफ़ द इंडिया-पकिस्तान पार्टीशन, इन डब्लूडब्लूडब्लू.फेमिनिज्मइंडियाइंडिया.कॉम।

लिच्टनेर, जिओकॉमो एंड बंद्योपाध्याय, शेखर (2008) इंडियन सिनेमा एंड द पेर्सेंटिस्ट यूज ऑफ़  हिस्ट्री: कन्सेप्शन ऑफ़ नेशनहुड इन अर्थ एंड लगान, इन एशियन सर्वे, वॉल्यूम 48,नम्बर 3 मई/जून2008, पेज 431-452।

रवि, वासुदेवन (2010) इन द सेंट्रीफ्यूज ऑफ़ हिस्ट्री, सिनेमा जर्नल, वॉल्यूम50, नम्बर1(फाल 2010) पेज 135-140।

शुक्ल, रामचन्द्र (2018) हिंदी साहित्य का इतिहास, साहित्य सरोवर प्रकाशन, आगरा।

राकेश कबीर जाने-माने कवि, कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

4 Comments
  1. Ghanshyam kushwaha says

    सामाजिक दृष्टिकोण से बहुत ही सुंदर विश्लेषण। सामाजिक यथार्थ को चित्रित करता लेख। बहुत बहुत बधाई और साधुवाद सर।

  2. Dinesh Kumar Singh says

    Great achievement done by you. If you are written the short story in the film then you will have succeeded than others. Congratulations best wishes for your excellency.

  3. Gulabchand Yadav says

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    *सिनेमा, समाज और इतिहास* थीम पर केंद्रित राकेश कबीर जी का ताजा शोधपरक आलेख *बॉलीवुड में ऐतिहासिक सिनेमा हमेशा संदिग्ध विषय रहा है* पढ़ा। आलेख में भारत और विश्व के परिप्रेक्ष्य में इतिहास की महत्ता, उपादेयता, प्रासंगिकता और इस संदर्भ में समादृत इतिहासकारों/मूर्धन्य साहित्यकारों/चिंतकों की मान्यताओं/विचारों को सम्यक रूप से उद्धृत करते हुए इतिहास की प्रमुख घटनाओं, कालजयी पात्रों, लोकमानस की स्मृतियों में बसे मिथकीय चरित्रों पर बनी तमाम फिल्मों की गहराई से विवेचना की गई है। आलेख में ऐसे पहलुओं को कवर किया है जो पाठकों के सामने अनेक नई जानकारियां प्रस्तुत करते हैं।

    सिनेमा आधुनिक समय में मनोरंजन के सबसे सशक्त माध्यम के साथ साथ कला के एक प्रभावी और अपरिहार्य साधन के रूप में पूरी दुनिया में स्वीकृति पा चुका है। सिनेमा हर समाज का एक महत्वपूर्ण और प्रभावी अंग है जो काल्पनिक कथाओं/फंतासियों के साथ साथ समाज के दुःख दर्द और उसकी जय – पराजय, उम्मीदों, मिथकीय पात्रों और उनके जीवन को भी अपनी कहानियों की विषयवस्तु बनाता है। इसी क्रम में वह इतिहास की ओर भी गाहे – बगाहे झाँक लेता है और लोकमानस को लुभाने वाली ऐतिहासिक घटनाओं और उनके मुख्य नायकों/नायिकाओं पर भी फिल्में बनाता है। दर्शकों की अभिरुचि और कथानक में रोचकता और भावुकता की छौंक लगाने (वस्तुतः फिल्म की सफलता सुनिश्चित करने के लिए) के लिए वह काल्पनिक घटनाओं/रूपकों का सहारा लेता है। इतिहास में दर्ज अथवा लोक मानस में बसी छवियों/धारणाओं की लक्ष्मण रेखा को लांघकर जब फिल्म निर्माता/निर्देशक *कुछ ज्यादा छूट* ले लेता है तो वह कुछ प्रतिबद्ध/कट्टर समुदाय/यों के कोपभाजन को भी चाहे/अनचाहे आमंत्रण दे देता है। आपने भी सही संकेत किया है कि कई अवसरों पर इतिहास के साथ की गई यह छेड़छाड़ फिल्म को अतिरिक्त पब्लिसिटी दिलाने के लिए भी की जाती है। लेकिन यदि निरपेक्ष होकर देखा जाए तो निर्माता और दर्शकवृंद दोनों ही अतिरेक /अतिवाद के सर्वथा विपरीत छोरों पर खड़े नजर आते हैं। निर्माता ऐतिहासिक तथ्यों के साथ तोड़मरोड़ करने से बाज नहीं आते और दर्शक यह भूलकर कि सिनेमा मूलतः कल्पना आधारित मनोरंजन का माध्यम है, अपनी बनी बनाई मान्यताओं/आस्थाओं/ पर हमला मानकर तथाकथित “विवादित फिल्म” को प्रदर्शित न होने देने के लिए पिल पड़ता है। एक लोकतांत्रिक देश में यह अपेक्षित होता है कि सिनेमा यथेष्ठ संवेदनशील और लोकहितकारी हो और दर्शकगण भी उदारमना और खुली सोच के हों। कुछ फिल्म निर्माताओं ने अपनी फिल्मों में इस कसौटी का समुचित ध्यान रखा भी है।

    हर बार की तरह इस बार भी आपके लेख में गहरी सामाजिक दृष्टि और शोधवृत्ति स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। साथ ही, आलेख में रोचकता और प्रवाहमयता तो है ही (हमेशा की तरह)। आलेख में समाहित आपकी निम्न टिप्पणियों/सम्मतियों/निष्कर्षों ने खास तौर पर ध्यान आकर्षित किया है:

    – “रचनात्मक कृतियां तथ्यों का प्रस्तुतीकरण मात्र नहीं होती हैं।”
    – “कला, कल्पना के महत्व को न समझ पाने, मिथक, इतिहास, में फर्क न कर पाने की दृष्टि का अभाव….अंततः इन विवादों का सर्वाधिक लाभ फिल्म निर्माताओं को ही होता है।”
    – ” फिल्में ऐतिहासिक चेतना के निर्माण और प्रसार का प्रमुख माध्यम है।…तथ्यात्मक सिनेमा का निर्माण समाज और राष्ट्र के हित में करना समय की मांग है।”
    – “…मिथक दुनिया के समस्त समाजों में विद्यमान हैं और समाज में उनका व्यापक प्रभाव भी होता है।…सिनेमा में भी उनका प्रचुर प्रस्तुतीकरण हुआ है।”
    – “….बिना उपयुक्त शोध किए इस तरह की फिल्में बनाना ठीक नहीं है क्योंकि इन फिल्मों का उद्देश्य मनोरंजन के साथ – साथ लोगों को शिक्षित करना भी होता है।”

    समग्रतः कहा जा सकता है कि राकेश जी ने इस बार भी एक बेहद पठनीय और जानकारीप्रद आलेख साझा किया है जिसके लिए वे बधाई और शुभेच्छा के हकदार हैं।

    – गुलाबचंद यादव

  4. Tarkeshwar Patel says

    कुछ महापुरुष तटस्थ होकर चिंतन करते है और अन्वीक्षण ,चिंतन,मनन, संश्लेषण आदि के आधार पर कल्पना करते है ।
    और उन पर लेखन का कार्य करते है लेकिन विभिन्न लेखकों द्वारा
    एक ही घटना को अपने अपने माध्यम से लिखने में भिन्नता पाई जाती है । जिसका लाभ फिल्मकारों द्वारा बखूबी उठाया जाता है। और ये कल्पना मिथक का विषय बन जाती है जो फिल्मों के माध्यम से दर्शकों को पस्तुत किया जाता है। बिना शोध किए हुए इन पर फिल्मों का दर्शकों के सम्मक्ष प्रस्तुत करना उचित नहीं है। फिल्में दर्शकों को मनोरंजन के साथ साथ शिक्षित करनी चाहिए।
    बहुत ही सराहनीय लेख आदरणीय जो पठनीय और जनकारीप्रद है। बहुत बहुत बधाई ।।????

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