साहित्यिक कृतियों में कैसे-कैसे चित्रित किये गए हैं एलजीबीटीएस?

कुसुम त्रिपाठी

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नौवें और अंतिम दशक को हिन्दी साहित्य की स्त्री रचनाओं को स्वर्ण युग कहा जाता है। इन दो दशकों में हिन्दी  के बड़े उपन्यासों में सभी जेंडर समानता, जेंडर सशक्तीकरण की मांग करते दिखाई देते हैं। प्रेम-विवाह, दाम्पत्य, यौन मुक्ति से लेकर समलैंगिक सम्बंधों, गर्भधारण के यांत्रिकीकरण और स्त्री की सार्वभौमिक संवेदना-बिम्ब खड़ा करने के लिए आज का उपन्यास लेखन काफी हद तक सबल रहा है। हिन्दी साहित्य में नारी लेखन, दलित लेखन, शोषित-पीड़ित आदिवासियों जैसी विद्याओं पर भी काफी लेखन हुआ है। इसी तरह हिन्दी में समाज में दबे और हाशिये पर रखे गए जनसमूहों में अंतरलैंगिकता और समलैंगिकता क्वीयर समूह भी हैं। जिनके लेखन को अलग साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया और जिसे अंग्रेजी में क्वीयर लेखन कहते हैं। शब्दकोश में जिसका अर्थ है- भिन्न, सबकी, अनोखा, विचित्र, आम लोगों से भिन्न अंतरलैंगिक-समलैंगिक लेखक। जिसे हम यौनिक-भिन्न लेखन कह सकते हैं। पश्चिम के विश्वविद्यालयों में अलग-अलग साहित्य पढ़ाया जाता है, जिनमें नारी लेखन, आदिवासी लेखन, विकलांग लेखन, यौनिक-भिन्न लेखन की भी पढ़ाई करवाई जाती है। पर हमारे देश में विकलांग लेखन और समलैंगिक लेखन के बारे में अलग से अबतक नहीं पढ़ाया जाता है। शायद इसका बहुत बड़ा कारण है कि यौनिक-भिन्न लेखन हिन्दी साहित्य में अभी भी शैशवाकाल में है।

एलजीबीटीएस (समलिंगी, उभयलिंगी एवं विपरीत लिंगी) के आंदोलन के रूप में भारत में 20वीं दशक के आखिरी में उभरी लैंगिकता, जो अबतक निजी दायरे में थी, राजनैतिक दावों के विविध रूपों के आधार पर और केंद्र बिन्दु के रूप में उभरी। भारत में क्वीयर लोग खुलकर सामने आए और अलग यौनिक प्राणी के रूप में अपने अधिकारों का दावा कर रहे हैं। वे अपने लैंगिक रुझान, जेंडर पहचान और यौनिक व्यवहारों की वजह से स्वयं को अलग समझते हैं।

समलैंगिक शादी

उन नए राजनीतिक सरकारों से जुड़ने के लिए सक्रियतावादी राजनीति की और अधिक परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं, जो अपने आपको क्वीयर शीर्षक के अंतर्गत गे (पुरुष समलिंगी), लेस्बियन (स्त्री समलिंगी), ट्रांसजेंडर (शी मेल),  (विपरीत लिंगी), कोठी (वह स्त्री, लड़का या पुरुष जो समलिंगी रिश्ते में पुरुष की भूमिका निभाता है) और आप असंख्य पहचानों वाले मानते हैं। (नारायण, 2004)

भारतीय संदर्भों में समलैंगिकता को लेकर एक पक्ष इतिहासकारों का भी रहा है, जिन्होंने इस बात से सहमति दिखाई है कि पूर्व आपैनिवेशिक भारतीय समाज में समलैंगिकता से सम्बंधों को अपराध, पाप या अनैतिक नहीं माना जाता था। खजुराहों की मूर्तियां हो या मानवीय यौन व्यवहारों पर केंद्रित ग्रन्थ कामसूत्र। इन जगहों पर भी समलैंगिक सम्बंधों को प्राकृतिक और आनंददायक की तरह चित्रित किया गया है। भारत जैसे देश में जहां शिवलिंग और योनि की पूजा होती है। जहां अर्धनारीश्वर के रूप में शिव की सामाजिक स्वीकृति है। जहां पर माना जाता है कि एक मनुष्य के भीतर स्त्री-पुरुष दोनों भावों का संतुलन ही उसे सफलता की ओर ले जाता है। वहां लैंगिक द्वैत से भिन्न यानी पारंपरिक स्वरूप से अलग यानी अनुपात और अद्वितीय थर्ड जेंडर व्यक्तित्व पर सामाजिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया जाता है। जबकि केरल राज्य में सबरीमला में अयप्पा स्वामी का प्रसिद्ध मंदिर है। उन अयप्पा भगवान के बारे में कहा जाता है कि उनके पिता शिव और माता मोहिनी हैं। अमृतमंथन के दौरान राक्षसों से अमृत प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी (स्त्री) का रूप धारण कर लिया। मोहिनी के रूप को देखकर भगवान शिव मोहित हो गए और इन दोनों के पुत्र अयप्पा का जन्म हुआ। जिस अयप्पा मंदिर (सबरीमला) में महिलाओं को प्रवेश के लिए आंदोलन करना पड़ा और सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में महिलाओं के मंदिर प्रवेश को उचित ठहराया।

रूथ वनीता तथा सलीम किदवई द्वारा संपादित अंग्रेजी पुस्तक भारत में समलैंगिक प्रेम : एक साहित्यिक इतिहास में रूथ कहती हैं, ‘क्वीयर’ को किस तरह परिभाषित करें? मेरे विचार से इस विषय पर कोई भी लिखे, चाहे वह स्वयं को यौनिक रूप से भिन्न परिभाषित करे या न करे, वह स्वीकृत होगा। किसकी यौनिकता क्या है? यह हम कैसे जान सकते हैं? इस विषय पर हिन्दी लेखकों ने लिखा है। जैसे कि निराला, राजेंद्र यादव, उग्र तथा राजस्थानी में विजयदान देथा ने समलैंगिक विषय पर लिखा है। उर्दू में इस्मत चुगताई की कहानी लिहाफ और उपन्यास टेढ़ी लेकीर भी इसी श्रेणी में आते हैं।  इस विषय की एक अन्य दिक्कत है, जोकि सांस्कृतिक है और मूल सोच के अंतरों से जुड़ी है। पश्चिमी विचारक किसी भी विषय को  विज्ञान, दर्शन, मानव यौन पहचान, हमेंशा हर वस्तु, हर सोच को श्रेणियों में बांटते हैं, जबकि भारतीय परम्परा के विचारक हर वस्तु, हर सोच को समन्वय की दृष्टि से देखते हैं। इसी तरह यौनिक मानव व्यवहार है। जिन्हें भारतीय समाज ने  समलैंगिक, अंतरलैंगिक, द्विलैंगिक श्रेणियों में नहीं बांटा। जैसा कि महाभारत में चाहे वह शिखण्डी के लिंग बदलाव की कथा हो या अर्जुन का वर्षभर नारी बनके जंगल में घूमना।

इन कथाओं में परम्परागत भारतीय विचारकों ने यौनिक भिन्नता की परिभाषाएं नहीं खोजी। तो संशय उठता है कि हिन्दी में क्वीयर साहित्य (यौनिक भिन्नता का लेखन) की पहचान करना, भारतीय सोच व दर्शन  को पश्चिमी सोच के आईने में टेढ़ा-मेढ़ा करके बिगाड़ तो नहीं देगा?

नौवें और दसवें दशक को हिन्दी साहित्य की स्त्री रचनाओं को स्वर्ण युग कहा जाता है। इन दो दशकों में हिन्दी रचनाकारों की बड़ी उपन्यासों में सभी जेंडर समानता, जेंडर सशक्तीकरण की मांग करती दिखाई देती हैं। प्रेम-विवाह, दाम्पत्य, यौन मुक्ति से लेकर समलैंगिक सम्बंधों, गर्भधारण के यांत्रिकीकरण और स्त्री की सार्वभौमिक संवेदना-बिम्ब खड़ा करने के लिए आज का उपन्यास लेखन काफी हद तक सबल रहा है। हिन्दी साहित्य में नारी लेखन, दलित लेखन, शोषित-पीड़ित आदिवासियों जैसी विद्याओं पर भी काफी लेखन हुआ है। इसी तरह हिन्दी में समाज में दबे और हाशिये पर रखे गए जनसमूहों में अंतरलैंगिकता और समलैंगिकता क्वीयर समूह भी है। जिनके लेखन को अलग साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया जिसे अंग्रेजी में क्वीयर लेखन कहते हैं।

इसी विषय तथा पश्चिमी सोच के अन्तर के विषय पर एक अन्य उदाहरण अमिताभ घोष की अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘सी ऑफ पॉपीज’ है, जिसमें एक पात्र बाबू नवकृष्ण घोष, जो तारामयी मां के भक्त हैं, और इसी भक्ति में लीन होकर वह स्वयं को मां तारामयी का रूप समझते हैं। इस पात्र की कहानी को केवल अंतरलैंगिकता या समलैंगिकता के रूप में देखना उसकी सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक जटिलता का एक-तरफा सरकलीकरण होगा। जिसके पात्र को केरिकेचर सा बना दिया जाएगा। इसलिए भारतीय भाषाओं में क्वीयर लेखन (यौनिक भिन्नता का लेखन) की बहस में इस बात पर ध्यान रखना आवश्यक है। सूफी साहित्य में भी प्रेरणादायक काव्य में आत्मा/ परमात्मा स्त्री-पुरुष कोई भी हो सकता है। सूफी और शायरी परंपराएं उभयलैंगिकता पर आधारित थीं जो अक्सर द्विलिंगी खोज को खारिज करती थीं। उदाहरण के लिए 12वीं सदी के शैव मतावलम्बी कन्नड़ संत कवि की इन पंक्तियों को देखा जा सकता है – ‘यहां देखो, मेरे हमसफर, मैंने ये पुरुष के कपड़े धारण किए हैं, सिर्फ तुम्हारे लिए, कभी मैं पुरुष हूं, कभी स्त्री..।’

11वीं सदी के शिवभक्त कवि देवरा दासीमध्या ने लिखा था – यदि स्तन और लम्बे बालों को देखते हैं तो वह उसे स्त्री कहते हैं, अगर इन्हें दाढ़ी-मूंछ दिखाई देती है, तो वह उसे पुरुष कहते हैं। लेकिन भीतर देखो इन दोनों के बीच जो आत्मा है, वह न स्त्री है, न पुरुष है…।

जैसे कि रूथ वनिता ने कहा – कोई भी इस विषय पर अच्छा लिखे, वह अच्छी बात है और उसे सराहना चाहिए। लेकिन मेरी नजर में वह उतना ही महत्वपूर्ण है कि स्वयं को भौतिक-भिन्न स्वीकारने वाले लोग भी लिखें। वह भारतीय समझ से अक्सर इस दिशा में बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण लिखते हैं। इस सारी बहस को शर्मसार, अनैतिक, गैरकानूनी, अप्राकृतिक कहकर समाज ने उनपर हिंसात्मक हमले किए हैं। जिसके कारण क्वीयर समुदाय छुप-छुपकर जीने को मजबूर हैं। अंतर्जनपदीय स्तर के प्रसिद्ध लेखक ने अपने द्विलैंगिक होने के बारे में लिखा है कि इस तरह से अगर यौनिक भिन्न लोग अपनी भिन्नता को स्वीकारते हुए लिखेंगे तो  इन विषय को शर्म और अँधेरे में छुपे रहने से बाहर निकलने का रास्ता मिलेगा।

आज के आधुनिक समाज में यहां एक तरह से समलैंगिक लोग खुलकर प्यार, शादी, सेक्स को लेकर आमतौर पर हमारी सोच बहुत सीमित होती है। समाज में मत्स्य सिद्धान्त के अनुसार यह सिर्फ एक स्त्री और एक पुरुष के बीच की सोच है। पुरुष से पुरुष का प्यार, शादी और सेक्स या फिर स्त्री का स्त्री से प्यार, शादी या सेक्स इसे हमारे समाज ने अभी भी स्वीकारा नहीं। लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने अपनी आत्मकथा मैं हिजड़ा… मैं लक्ष्मी ने कई पूर्वाग्रहों को तोड़ा है। वे समलैंगिकता के नए पहलुओं को उजागर करती है। त्रिपाठी ने अपने और क्रिस के रिश्तों द्वारा बताया कि प्यार सेक्सुअलिटी से बहुत ऊपर की चीज है। इसी तरह फिल्म अलीगढ़ में मनोज वाजपेयी का एक बेहद उम्दा डायलॉग है लव इज़ ब्यूटीफूल वर्ड। इसमें प्रेम को यौनिकता से मुक्त परिभाषित किया गया है। हम जिस पितृसत्तात्मक समाज में रहते हैं, वहां केवल एक प्रकार की यौनिकता को मान्यता दी गई। विवाहित स्त्री-पुरुष। पितृसत्ता के अन्तर्गत जेंडर भेद को इस तरह प्रतिष्ठित कर दिया कि यही प्राकृतिक और सामान्य सम्बंध है। औरत की यौनिकता मात्र वंश चलाने का एक जरिया है। पितृसत्ता ने समलैंगिकता को स्त्री के लिए असंभव माना क्योंकि स्त्री कामना की व्याख्या भी पुरुषसत्ता ने अपने अनुसार की। पुरुष ने इसी व्यवस्था के तहत स्त्री पर शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक वर्चस्व लागू किया। इस धारा के खिलाफ यदि कोई जाता है तो पुरुषसत्ता सामाजिक व्यवस्था, हमारी परम्पराओं, धार्मिक रीति-रिवाजों पर हमला मानती हैं। कानून द्वारा श्लील-अश्लील के नियम-कानून भी इसी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का हिस्सा है। इसलिए जब इस्मत चुगताई की कहानी लिहाफ सन् 1942 में छपी तो उर्दू साहित्य में बवाल मच गया। इसके कारण उन पर समलैंगिकता के नाम पर अश्लीलता का आरोप लगा। लाहौर हाइकोर्ट में मुकदमा चला।

नए साहित्य में एक तरफ पात्र अपने समलैंगिक रिश्तों के ऐलान करने लगे वहीं दूसरी ओर हिन्दी के महिला या पुरुष साहित्यकार भी इससे अछूते नहीं रह पाए। उपन्यासकारों ने अपने उपन्यास में खुलकर तो नहीं, पर धीमे स्वर में इन सम्बंधों की बात लिखी है। देखा जाए तो हिन्दी साहित्य में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने अपने उपन्यास कुल्ली भाट (1939) में समलैंगिक विमर्श के बीज बो दिए थे। ऋषभ देवशर्मा के अनुसार ‘यदि इस उपन्यास को हिन्दी में समलैंगिकता विमर्श की पहली आहट सुनने-सुनाने वाला उपन्यास कहा जाए तो गलत नहीं होगा।’ कुल्ली एक समलैंगिक व्यक्ति था। आज भी पारम्परिक रुढ़िवादी भारतीय समाज में समलैंगिकता को कोढ़ या एड्स से कम नहीं समझा जाता। आम जनता उसे अप्राकृतिक यौनाकांक्षा वाला व्यक्ति मानकर उसके साथ अमानवीय व्यवहार करती है। ऐसे लोगों को मानसिक रोगी मानती है। एक विकृति भाव ही है। इस विकृति के कारण इसे कभी-भी समाज में सम्मानजनक स्थान तो दूर सामान्य स्थान भी प्राप्त नहीं हाता। समाज में उनका जीवन नर्क से भी बदतर हो जाता है। कुल्ली-भाट उपन्यास में निराला ने कुल्ली का समलैंगिक होना छुपाया नहीं है बल्कि उसे कथा का हृदय बताकर सम्पूर्ण ताने-बाने को बुना है। निराला को सच्चा नायक चाहिए था, जो कथा को आगे ले जाए और निरालाजी के जीवन में कुल्ली की यह भूमिका पुस्तक का विषय है। प्रस्तुत उपन्यास इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि कुल्ली के जीवन-संघर्ष के बहाने निराला के व्यक्तिगत सामाजिक जीवन को भी प्रस्तुत करता है। 1939 के मध्य में प्रकाशित यह उपन्यास तत्कालीन प्रगतिशील धारा के अग्रणी साहित्यकारों के लिए चुनौती के रूप में उपस्थित हुआ है तथा इस उपन्यास ने समाजोद्धार और देशोद्धार का राग अलापने वाले राजनीतिक परिदृश्यों का दर्पण दिखाने का कार्य किया है।

आशा सहाय का उपन्यास  एकाकिनी (1947) में लेस्बियन पर लिखा गया है। इस उपन्यास की लेस्बियन नायिका कहती है ‘प्रवंचक के छलिया अधर एक बार देवी कहकर हमारे देवीत्व की शान्ति को भी लूट लेते हैं। हम देवी हैं, इससे हमें उफ करने का भी अधिकार नहीं है। देवीत्व का अभिशाप सीमा पर हमारे प्राण तड़प उठते हैं। आह! यदि हम पुकार कर कह पाती- देवी नहीं, हम मानवी ही भली हैं।’ इस कथन में देवीत्व का अस्वीकार और मानवी की प्रतिष्ठा की हिमायत की गई है। साथ ही स्त्री के आत्मियता को सर्वोच्च दर्जा दिया गया है। आरती और कला दोनों बचपने से सहेली हैं। अशांत और नादान आरती कला के होठों पर दग्ध अनुभूति की निर्मम रेखा खींचती है और वह कांप उठती है – ‘धीरे-धीरे, जाने-अनजाने, अनुरक्त-उन्मनी वह कला को प्यार करने लगी। विरक्ति की यमुना-यामिनी में उसने अनुरक्ति की चांदनी देखी। उसे विस्मय हुआ, उसने चाहा, वह मुड़ जाए, न देखे, इस अव्यस्थित कला को, किन्तु उससे ऐसा न हो सका।’

भारत जैसे देश में जहां शिवलिंग और योनि की पूजा होती है। जहां अर्धनारीश्वर के रूप में शिव की सामाजिक स्वीकृति है। जहां पर माना जाता है कि एक मनुष्य के भीतर स्त्री-पुरुष दोनों भावों का संतुलन ही उसे सफलता की ओर ले जाता है। वहां लैंगिक द्वैत से भिन्न यानी पारम्परिक स्वरूप से अलग यानी अनुपात और अद्वितीय थर्ड जेंडर व्यक्तित्व पर सामाजिक रुप से हाशिये पर धकेल दिया जाता है।

राजकमल चौधरी की सबसे चर्चित उपन्यास मछली मरी हुई स्त्री समलैंगिकता पर लिखा गया है। राजकमल चौधरी ने अपने साहित्य में तमाम स्त्री विषयक क्रियाओं की व्यापक स्तर पर पड़ताल की है। स्त्री को उन्होंने श्लीलता-अश्लीलता के चश्मे से नहीं देखा, बल्कि राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा मनोवैज्ञानिक कारणों की खोज की। वह उपन्यास महिलाओं के समलैंगिक सम्बंधों पर लिखा एक कथानक भर नहीं, वरन् मानव व्यवहार का एक दस्तावेज भी है। 2018 में भले ही सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिक सम्बंधों को अपराध की श्रेणी से हटा दिया। पर 60 के दशक में भी सामंती हिन्दी पट्टी समाज में ऐसी बातों की चर्चा भी वर्जित थी। ऐसे समय में चौधरी जी ने न केवल उपन्यास लिखा बल्कि इसके पक्ष में तर्क भी दिए। 20 जुलाई 1965 को उन्होंने लिखा ‘लेस्बियन अर्थात समलैंगिक यौनाचारों में डूब गई स्त्रियों के बारे में खासकर हिन्दी में बहुत कम लिखा गया। भारतीय स्त्रियों के निजी और चरित्र की नमी आंखों को देखने का अवसर और संयोग हम लोगों को नहीं मिल पाता। कहीं पर्दा के कारण कहीं दूसरी जगह बे-पर्दगी के कारण।’

समाज में इंसानियत के जिस आधार पर किन्नर समुदाय को मनुष्यता के सामाजिक पैमाने पर बाहर किया। वह इंसानियत किन्नर समुदाय में अधिक प्रतिबिंबित होती है।

अमेरिकी और पश्चिमी समाज में महिलाओं की शारीरिक आजादी और उस पर लिखी किताबों का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा था कि ‘हमारे देश में जनाना क्लब नहीं है और न ही यहां की देसी औरतों को आधुनिक तौर-तरीकों में यह सब सहने की जानकारी ही है। हमारे देश में औरतें समलैंगिक आचरणों में लिप्त रहकर भी अधिकांशतः समझ नहीं पाती कि वे क्या कर रही हैं, और किस मतलब से कर रही हैं… करती हैं अवश्य।’लेकिन नींद में, नशे में, अनजाने में कर लेती हैं और अपने कुसंस्कारों और अंधेपन में जकड़ी हुई, अधिक धार्मिक और अधिक संतास बनी रहती हैं।

वाकई भारतीय संहिता में स्त्री से जुड़े दैहिक विषय, उसकी शारीरिक जरुरतें और समस्याएं, सामाजिक शालीनता की ओट में तो ढ़ंकती ही रही धर्म, सांस्कृतिक, अश्लीलता और सूचिता के नाम पर उसे दबाया जाता है। यही कारण है कि अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी… भी रुलाती तो बहुत नेगाई पर उनके अनैतिक दमन को लिखने की हिम्मत बहुत कम लोग जुटा पाए। जिन कुछ लेखकों ने इन विषयों पर, समस्याओं पर लिखा उन पर वैचारिक विकृति और सस्ते साहित्य लेखन के आरोप लगे पर राजकमल कभी-भी ऐसे आलोचना से नहीं डरे। वे ऐसे विषयों पर हिन्दी, मैथिली, बंगाली, अंग्रेजी में लिखते रहे। इसी तरह अग्निस्थान उपन्यास में राजकमल चौधरी ने नई समलैंगिकता, यौन, फिल्मी संस्कृति, महानगरों के निम्न समुदाय आदि विषयों के लेखन को मूलकेंद्र बनाया।

कृष्णा अग्निहोत्री ने उपन्यास कुमारियाँ में समान लिंग के प्रति आकर्षण को व्यक्त किया है। नायिका गुड्डी अपने परिवार में लगातार तिरस्कार और अपमान झेलती है। वह किसी लड़के से प्रेम करती है जिसके बच्चे की मां बनने वाली है। उसके पिता मानसिक दबाव बनाकर उसका गर्भपात करवा देते हैं, तथा उसे किसी भी लड़के से मिलना बंद करा देते हैं। गुड्डी को सरिता जैसी सेहेली मिलती है जिससे वह अपना मानसिक और शारीरिक वेदना बताकर हल्का महसूस करती है। देानों सहेलियां इतनी नजदीक आ जाती हैं कि काम-सम्बंधों का ऐसा  आकर्षण कि दोनों अपनी मर्यादाएं भूल जाती हैं। लड़के की जगह लड़की के साथ घुमने-फिरने में पिता को कोई परेशानी न था। गुड्डी अपने काम वृद्धि के सम्बंध में अपनी आपबीती कहती है- ‘लड़के की जगह लड़की के साथ घुमने-फिरने में पिता को आपत्ति ना थी। लेकिन सरिता के बिना, रात न बिता पाना और आंखों नीचे गुड्डे-गुड्डी और सरिता के समलैंगिक नाम सम्बंधों का भांडाफोड़ देते हैं।’ गुड्डी को शुरू से ही काम सम्बंधों के प्रति आकर्षण था। लड़के के साथ कामवासना की पूर्ति न होने पर समलैंगिक काम-सम्बंधों के प्रति अनुसार होती है।

शिवानी जी ने श्मशान-चम्पा उपन्यास में पुरुष समलैंगिकता यौनाचार को दिखाया गया है। नायक तनवीर अपनी इच्छा से अपनी पसंद की लड़की से विवाह करता है। विवाह के कुछ समय बाद पुरुष के प्रति उसका आकर्षण बढ़ जाता है। वह लड़के के साथ रात में पार्टियों में व्यस्त रहता है। उसकी पत्नी जूहीउसके बदले स्वभाव के कारण उससे सवाल पूछती है तो तनवीर कहता है- ‘मुझे माफ करना जूही, सोचा था तुमसे शादी करके अपनी जिन्दगी को भूल जाऊंगा पर अब देखता हूं कि वहां पहुंच गया हूं जहां से चाहने पर भी अब मैं नहीं लौट सकता।’ जूही अपने आप में घुटती चली जाती है। तनवीर लड़की बनते-बनते उन्हीं की तरह सजने-संवरने लगा। पत्नी डरती है कहीं परिवार व समाज को पता चल गया तो हमारा बहिष्कार कर देंगे। घर में भाभी तनवीर की हरकतों को देखकर कहती है ‘क्योंजी तुम लड़की हो या लड़का?’ तनवीर मियां के दोस्तों के मासूम जनाने चेहरे देख-देखकर हमें डर लगता है कि कहीं तुम उन्हीं में से एक तो न हो। जुही भाभी से लगातार व्यंग्यों से परेशान हो तनवीर से उत्तर जानना चाहती है। तनवीर जूही को नहीं समझा पाता। जूही मानसिक एवं शारीरिक वेदना से पीड़ित है।

हिन्दी के उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासकारों में खुलकर तो नहीं धीमे स्वर में इन सम्बंधों की बात कही है। लेखिका शिवानी ने डरे-डबे स्वर में इसका चित्रण किया है तो वहीं कुछ अंसल ने अपने उपन्यास में समलैंगिकता के प्रभाव से कोई नहीं बच पाया है। चाहे शादीशुदा हो या अकेलेपन की पीड़ा से पीड़ित अन्य पात्र। उषा प्रियवेदा ने अपने उपन्यास अंतर्वशी में समलैंगिकता का खुलकर चित्रण किया है।

आधुनिक समाज में जहां प्रेम-सम्बंधों में परिवर्तन आया, वहीं युवक-युवतियों के विचारधार में भी बदलाव आया। समलैंगिक लेस्बियन के सम्बंध में उषा प्रियवेदा ने अंतर्वशी उपन्यास में लिखा है कि स्त्री-पुरुष सम्बंध में आई नीरसता के कारण कड़वाहट उपन्न हो जाती है। नायिका वाना सम्बंधों में आए बिखराव को सहन नहीं कर पाती और अपने वेदना, अपनी मित्र क्रिस्त्रीन विदेशी महिला को बताती है। वह भी उसी की तरह सम्बंधों में मिलती अर्थहीनता के भाव से पीड़ित है। दोनों अपना सुख-दुःख बांटते-बांटते अपने तन को भी बांटने लगती हैं। दोनों अपनी मर्यादा खो देती हैं। वाना अचानक अपने भाव को संभालते हुए कहती हैं ‘वाना क्रिस्त्रीन के दिल की धड़कन सुन रही है। उसकी बांह क्रिस्त्रीन की कमर धरे हुए है। यह जो वाना निर्वस्त्र, अंकुठित, लज्जाहीन, अतृप्त और जाग्रह क्रिस्त्रीन से सटकर लेटी है, शिवेश की पत्नी नही है। यह केवल वाना है। और वह क्रिस्त्रीन की बांहों में सिमटकर उसे रातभर प्यार करने के लिए प्रशिक्षित है।’ यह सम्बंधों का नया रुप प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पुरुष प्रेम सम्बंधों में कड़वाहट अपने से स्त्री-स्त्री के सम्पर्क में नए सम्बंधों को जन्म दे रही है। वाना समलैंगिकता के धरातल पर जो अनुभूति महसूस करती है, वह उसे अपने पति शिवेश से भी नहीं मिलती। शिवेश में वाना के साथ-साथ अपनी भावनाओं को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। वाना इन बेड़ियों केा तोड़कर स्वच्दन्द हवा में सांस लेना चाहती है। वह निर्णय लेती है, दम तोड़ती सभ्यता-संस्कृति में वह अपने-आपको अब नहीं झोकेगी।

कुसुम अंसल के उपन्यास परछायों का समयसार में लेस्बियन के बारे में लिखा है। नायिका नताशा के पति शैलेन्द्र का सिंगापुर में दुर्घटना हो जाती है, जिससे उनके रीढ़ की हड्डी तो टूटती ही है। अस्पताल में किस तरह साल बदल गए पता ही नहीं चला। अस्पताल के डॉक्टर, नर्स डौरोथी और नताशा शैलेन्द्र के ठीक होने के लिए जी-जान से लगातार कोशिश कर रहे थे। नताशा के अलावा सभी जानते थे कि शैलेन्द्र फिर से पूरी तरह कभी स्वस्थ नहीं हो पाएगा। ऐसे में सिस्टर डौरोथी नताशा को समझाते हुए कहती है ‘ट्राई नताशा, सेक्स, इट्स ए नीड। जरूरत है जिस्म की, जैसे पेट को दाल-रोटी। जो नहीं मानते, वह हिपोक्रेट हैं नताशा। समाज से डरते हैं, पर हम नहीं डरते।’ नताशा नर्स डौरोथी की बातें सुनकर अचंभित हो जाती है। डौरोथी नताशा के समीप आ उसे अकेलेपन के भयावह सच से रूबरू करवाते हुए कहती है ‘नताशा तुम बहुत लोनली हो गई हो न। मैं तुम्हारी उदासी दूर करना चाहती हूं। अकेले जीना बहुत मुश्किल होता है। मैं तुम्हें आनन्द की नई परिभाषा समझाना चाहती हूं सेफ सेक्स।’ नताशा को डौरोथी की बातें समझ में आ रही थी। मन अनेक संकोचों से उथल-पुथल हो रहा था। एक बार नर्स डौरोथी के नियंत्रण पर उसने अस्पताल के कॉटेज में जाकर सिस्टर डौरोथी ऐलिजा के सम्बंधों को देखा था। नताशा पति की बीमारी से बहुत परेशान थी। इलाज में असमानता के कारण हिम्मत टूट गई थी। ऐसे समय में नर्स डौरोथी का शारीरिक सम्बंधों के प्रति नए दृष्टिकोण को समझना मुश्किल था।

चित्रा मुद्गल का उपन्यास पोस्ट बॉक्स नम्बर 20, नालासोपारा (2016) में बड़ा प्रश्न उठाया है कि लिंग पूजक समाज लिंग विहीनों का कैसे बर्दाश्त करेगा? उपन्यास इस प्रश्न पर गंभीरता से सोचने को विवश करता है कि आखिर एक मनुष्य को सिर्फ इसलिए समाज से बहिष्कृत क्यों होना पड़े कि वह लिंगदोषी है? सिर्फ इसी कारण उसकी उम्मीदों, सपनों, आकांक्षाओं, भावनाओं का गला क्यों घोट दिया जाता है? उपन्यास इस बात को प्रबलता से रेखांकित करता है कि समाज जबतक यौन केन्द्रित बना रहेगा, तबतक समस्या बनी रहेगी।

इस तरह हम कह सकते हैं कि हिन्दी के उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासकारों में खुलकर तो नहीं धीमे स्वर में इन सम्बंधों की बात कही है। लेखिका शिवानी ने डरे-डबे स्वर में इसका चित्रण किया है तो वहीं कुछ अंसल ने अपने उपन्यास में समलैंगिकता के प्रभाव से कोई नहीं बच पाया है। चाहे शादीशुदा हो या अकेलेपन की पीड़ा से पीड़ित अन्य पात्र। उषा प्रियवेदा ने अपने उपन्यास अंतर्वशी में समलैंगिकता का खुलकर चित्रण किया है। समाज और परिवार साथ देता ठीक वरना वह अपने अनुसार ही जीवनयापन करती है। आज समलैंगिक सम्बंध को धीरे-धीरे स्वीकार किया जाने लगा है। लोकतंत्र में सबको जीने की आजादी है।

दुनिया के सभी समाजों में थर्डजेंडर का एक बड़ा हिस्सा है। भारत में किन्नरों की संख्या लगभग चार लाख नब्बे हजार है। जिसे किन्नर, हिजरा, तृतीय लिंगी, उभयलिंगी, मौगा, खोजवा, छक्का, जनखा, शिखंडी, खवाजासरा, अनरावनी, यूनक आदि नामों से पुकारा जाता है। आज भूमंडलीकरण के युग में किन्नर समुदाय के लोग भीख मांगते हैं या फिर वैश्यावृत्ति करते हैं। इसके कारण उनमें एड्स जैसी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। 2016 में संसद में विधेयक के जरिये थर्ड जेंडर के अधिकारों के लिए ‘ट्रांसजेंडर पर्सनल बिल’ को मंजूरी दी गई। हिन्दी साहित्य में किन्नर विमर्श अभी अपरिपक्व अवस्था में है। हमारे देश की समाज की वैचारिकी इन्हें स्वीकारने में हिचक रही है। आज इंसान कभी यह जानने की कोशिश नहीं करता कि किन्नरों के अंदर धड़कने वाले दिल में क्या हलचल होती है। उनके मन की अतल गहराईयों में भावनाएं हिलोरे लेती हैं। फिर भी हिन्दी साहित्य में थर्ड जेंडर पर उंगली पर गिने जा सकें उतने उपन्यास लिखे गए हैं। ये हैं –

  1. यमदीप, नीरजा माधव (2009)
  2. मैं भी औरत हूँ, अनुसूया त्यागी (2011)
  3. किन्नर कथा, महेन्द्र भीष्म (2016)
  4. मैं पायल, महेन्द्र भीष्म (2016)
  5. पोस्ट बॉक्र नम्बर203, नाला सोपारा, चित्रा मद्गल (2016)
  6. जिन्दगी50-50, भगवंत अनमोल (2017)

नीरजा माधव ने यमदीप उपन्यास में थर्ड जेंडर के जीवित यथार्थ को सामने लाया है। थर्ड जेंडर को सामाजिक हेय, शारीरिक, मानसिक भेद शोषण के भयंकर दौर से गुजरना पड़ता है। इस उपन्यास के पत्र विशेष रुप से महताब शुरु, नाजबीबी, छले बिहारी, मानवी आदि घुंघरु की आवाज पर हमारे मन मस्तिष्क से सवाल करते हैं। नाजबीबी के मां-बाप से महताब गुरु का संवाद हमारे दिलों दिमाग को उद्वेलित कर देता है- ‘आप इस बस्ती में रह नहीं सकते बाबूजी और अपने बेटी को अपने साथ रख भी नहीं सकते… दुनिया में बदनाम पर हंसी-हसारत के डर से। हिजड़ी के बाप कहलाना न आप बर्दाश्त कर पाएंगे और न आपके परिवार के लोग। लूली, लंगड़ी होती या काली कोतर होती, तो भी आप इसे अपने साथ रख सकते थे। इसलिए इसे अब इसके हाल पर छोड़ दीजिए। यही इसका भाग्य था, यही बदा था….. सोच लीजिए, मन गई, सब्र कर लिया।

समाज में इंसानियत के जिस आधार पर किन्नर समुदाय को मनुष्यता के सामाजिक पैमाने पर बाहर किया। वह इंसानियत किन्नर समुदाय में अधिक प्रतिबिंबित होती है। सड़क पर पड़ी गर्भवती पगली के नवजात शिशु को मुख्यधारा समाज द्वारा उपेक्षित किए जाने पर उपन्यास की पात्रा नाजबीबी द्वारा उसका पालन-पोषण करना या फिर बलात्कार के प्रयास को असफल करना, नारी सुधार गृह में सफेदपोश चेहरे को बेनकाब करने के प्रयास में नेताओं का चरित्र भी सामने आने लगता है। और यही जनता के रक्षक- भक्षक की भूमिका में दिखाई देते हैं। इस पर नाजबीबी बहती हैं ‘सोच रही हूं मेम साहब कि भगवान ने मुझे हिजरा बनाकर ठीक ही किया। अगर हमें यह न बनाता तो जरूर औरत बनाया और तब ये सारे अत्याचार मुझे भी झेलने पड़ते।’ इस उपन्यास में लेखिका ने समाज के साथ राज्य के किन्नरों के प्रति अपने उत्तरदायित्व को नहीं स्वीकारा। महताब गुरु कहते हैं ‘मांगने के लिए उन्हीं के सामने चारा फेकेंगी, न तो रोज मुर्गियों की तरह अण्डे देकर आबादी बढ़ाएगी। हम कौन-से अण्डे देने वाले हैं अल्लामियां ने तो हमें ये नेयत दी ही नहीं है।’ किन्नर समुदाय का यही जैविक यथार्थ है। इसी आधार पर समाज में मुख्यधारा से उन्हें बाहर किया है। यहां मानव की उपयोगिता को समाज उनकी लैंगिक असमानता से क्यों सुनिश्चित करना चाहता है? उत्पादन और उपयोगिता की राजनीति का प्रश्न इस उपन्यास का केंद्रबिन्दु है। उपन्यास के अंत में नाजबीबी का संकल्प चुनाव में खड़े रहने की भूमिका तय करता है। और वह कहती हैं ‘जरुरत पड़ी तो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ हथियार भी उठाउंगी। हर गंदगी को जड़ से साफ कर दूंगी। दुनिया में शांति रहे और क्या चाहिए किसी को?’ नाजबीबी का यह कथन शबनम मौसी, कमलाजान, आशा देवी, कमला किन्नर और रायगढ़ की मेयर मधु किन्नर की याद दिलाता है। जिसका कहना था कि वह ताली बजाना चाहती वह कुछ करना चाहती है। यमदीप उपन्यास द्वारा लेखिका किन्नर समुदाय के लिए सत्ता की आवाज को सुनती है। यह सत्य है कि किन्नरों को भी अपने हवा में संवेदनशील होने की आवश्यकता है।

डॉ. अनुसूया त्यागी का उपन्यास ‘मैं भी औरत हूँ’ (2011) में उन दो लड़कियों रोशनी और मंजुला की कहानी है, जो जननांग किन्नर से युक्त हैं। संयुक्त परिवार में दोनों का जन्म एक ही परिवार में दो ऐसे बच्चों का जन्म संयोग ही है। उपन्यास में माता-पिता उच्च शिक्षित हैं। इसलिए हाय-तौबा का शोर न मचाते हुए डॉक्टर के पास जाकर इलाज करवाते हैं। इस उपन्यास में स्टीरियो-टाईप से भिन्न औरत की छवि बनता है कि स्त्री मार्ग गर्भाशय नही है।

महेन्द्र भीष्म का उपन्यास ‘किन्नर कथ’ (2011) में राजघराने में जन्मे किन्नर सोना उर्फ चन्दा के राज को, मां अपनी ममता के कारण बहुत दिनों तक स्पष्ट नहीं होने देती। लेकिन जब पता चलता है कि सोना किन्नर है तो, राजा उसे मारने का आदेश देता है। लेखक ने जगह-जह पर उस मां की ममता और पीड़ा को प्रकट किया है, जिसकी संतान को किन्नर के कारण उससे दूर कर दिया जाता है। साथ ही यथार्थ स्थिति को अपनी टिप्पणी के माध्यम से स्पष्ट किया है- ‘संतान, उसकी शारीरिक, मानसिक कमी क्यों न हो, माता-पिता को अपनी संतान हर पल में भली लगती है, प्यारी होती है। फिर भले ही वह संतान हिजड़ा क्यों न हो। फिर भी सामाजिक परिस्थ्तियां, खानदान की इज्जत, मर्यादा, जूठी शान के सामने हिजड़े बच्चे से उसके जन्मदाता हर हाल में छुटकारा पा लेना चाहते हैं। यह एक कटु सत्य है।’ महेन्द्र सिंह का उपन्यास पायल (2016) किन्नर गुरु पायल सिंह के जीवन संघर्ष पर आधारित है।

चित्रा मुद्गल का उपन्यास पोस्ट बॉक्स नम्बर 20, नालासोपारा (2016) में बड़ा प्रश्न उठाया है कि लिंग पूजक समाज लिंग विहीनों का कैसे बर्दाश्त करेगा? उपन्यास इस प्रश्न पर गंभीरता से सोचने को विवश करता है कि आखिर एक मनुष्य को सिर्फ इसलिए समाज से बहिष्कृत क्यों होना पड़े कि वह लिंगदोषी है? सिर्फ इसी कारण उसकी उम्मीदों, सपनों, आकांक्षाओं, भावनाओं का गला क्यों घोट दिया जाता है? उपन्यास इस बात को प्रबलता से रेखांकित करता है कि समाज जबतक यौन केन्द्रित बना रहेगा, तबतक समस्या बनी रहेगी। यौन केन्द्रित समाज से मुक्ति ही उपन्यास का केन्द्रिय तथ्य है। यह उपन्यास इस विषय पर सोचने के लिए बाध्य करता है कि यह कैसे हो सकता है कि एक ही मां की कोख से जन्म लेने वाले बच्चों में एक तो समाज में साधिकार शिक्षा ग्रहण करते हुए जीवन जीता है और दूसरा इसी समाज की एक अलग-थलग बस्सी में नारकिय दशा को जीने के लिए अभिशप्त है ।केवल इसलिए कि वह जननांग दोषी है। जिस भारतीय समाज में जानवरों के साथ भी बुरा व्यवहार करने की प्रथा नहीं बनी, वहां के समाज ने जीते-जागते मानवों को समाज से बाहर कर दिया, साथ ही उससे उसके सहज रुप से जीवन जीने के अधिकार को छिनकर स्वस्थ समाज की बुरी बलाएं दूर करने वले मिथकों के साथ जोड़ दिया।

उपन्यास का नायक कहता है ‘जननांग विकलांगता बहुत बड़ा दोष है, लेकिन इतना बड़ा भी नहीं कि तुम मान लो कि तुम धड़ का मात्र निचला हिस्सा, मस्तिष्क नहीं हो!, दिल नहीं हो, धड़कन नहीं हो, तुम्हारे हाथ-पांव नहीं हो। सब वैसे ही है, जैसे औरों के हैं, यौन सुख लेने-देने से वंचित हो तुम, वात्सल्य सुख से नहीं, बच्चे तुम पैदा नहीं कर सकते, मगर पिता नहीं बन सकते, यह किसी ने नहीं समझाने दिया तुम्हें? विनोद उर्फ बिन्न यह सवाल उठता है कि लिंग की दृष्टि से किन्नरों का वर्गीकरण क्यों? उन्हें अपना लिंग चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए न कि अन्य में डाल दिया जाए। अनुसूचित जाति/ अनुसूचित जनताति, पिछड़ा वर्ग, विकलांग आदि सभी समाज से वंचित वर्ग है पर वे बकायदा स्त्री-पुरुष भी हैं। ठीक उसी तरह लिंगदोषियों का वर्गीकरण में इन्हें वंचितों के साथ रखा गया जहाँ जेंडर समानता का प्रश्न उठाया गया है।

उपन्यास में राजनीतिज्ञ सियासतबाजों का भी भंडाफोड़ किया गया है। सियासतकारों का लक्ष्य किन्नरों को मानवीय गरिमा दिलाने की नहीं बल्कि आरक्षण का लालच लेकर उन्हें वोट बैंक के रुप में सिर्फ उपयोग करने की है। पहले तो विनोद में संभावना देखकर सत्ताधारी पार्टी उसे प्रश्रय देती है पर जैसे ही वह आरक्षण की भीख माँगने की जगह किन्नरों में स्वाभिमान लगाने लगता है, उसकी हत्या कर दी जाती है।

उपन्यास के अन्त में माँ के द्वारा अपनी मृत्यु के ठीक पहले अपने किन्नर बेटों को सार्वजनिक रुप में स्वीकार कर अपनी संपतित को तीनों बेटों बराबर-बराबर बाँटने की घोषणा से होती है। चित्राजी ने इस उपन्यास में पितृसत्तात्मक समाज, राजनीतिक पैतरेंबाजी, सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक रुढ़ियों सभी पर एक साथ सवाल उठाए हैं। उनके खुद के शब्दों में आप इतिहास देखिए सबल हमेशा निर्बलों को जुल्म करता रहा, इसका जुल्म का शिकार महिला और दलित पर भेदभाव के चलते महिलाओं, दलितों को कभी घर से नहीं निकाला गया, जबकि किन्नरों के माँ-बाप ही इन्हें घर से निकाल देते हैं? समाज में इनको इस दशा में क्यों रखा, ये भी सवाल है? मेरी कोशिश उसी सवाल को उठाने की थी।

प्रदीप सौरभ का उपन्यास तीसरी ताली (2011) में स्त्री समलैंगिकता, पुरुष समलैंगिकता, उभयलिंगी और थर्ड जेंडर की कथा है। लेखक स्वयं पत्रकार है इसीलिए उन्होंने खोजी पत्रकारिता का उपयोग करते हुए सभी नई जानकारियाँ देशभर से इकट्ठी की हैं। उन्होंने एलजीबीटी के चारों वर्गों के साथ किस तरह आर्थिक मंदी के दुष्परिणाम से देह व्यापार बढ़ा और इस क्षेत्र में भी गिरावट आई इसका बखूबी वर्णन किया है। इस उपन्यास में विनीत उर्फ विनिता, राजा उर्फ रानी, ज्योति, मंजू और विजय की कहानी है। यहाँ केवल खोखले संवेदना का चित्रण नहीं बल्कि शिक्षा, प्रशिक्षण और अवसर की उपलब्धता के माध्यम से थर्ड जेंडर के लोगों के आर्थिक, सामाजिक विकास का मार्ग दिखाया है।

विनीत पारिवारिक तथा सामाजिक उपेक्षा का शिकार है। उसके पिता उसे बड़े संस्थान से ब्यूटीशियन का कोर्स करवा देते हैं ताकि भविष्य में वह अपने पैरों पर खड़ा रह सकें। वह गे-पार्लर खोलता है। इसी कारण वह देश में प्रसिद्धि पाता है तथा पेज थ्री का चेहरा बनता है। ज्येाति निर्धनता के कारण ‘सामंती’ कुप्रथाओं, कुरीतियों की शिकार होती है। उसे श्यामसुंदर सिंह के यहां लौंडा रख दिया जाता है। किसी और के चुमने से श्यामसुंदर उससे अस्पृश्य की तरह व्यवहार करता है। गरीबी, घोर निर्धनता के कारण पहल वह लौंडा फिर हिजड़े के अड्डे तक पहुँचा दिया जाता है। उसे महसूस होता है कि असामान्य सेक्स व्यवहार करते-करते वह अपना सामान्य व्यवहार भूल चुका है इसलिए वह स्वेच्छा से आररेशन कर हिजड़ा बन जाता है।

लेखक ने उपन्यास में यह प्रश्न भी उठाया है कि क्या किन्नर सामान्य स्त्री-पुरुष रिश्तों को स्वीकार नहीं कर पाते। मंजू और राजा, डिम्पल किन्नर द्वारा पालित हैं। मंजू राजा के प्रेम में पड़ गर्भवती हो जाती है जिससे डिम्पल गुरु आगबबूला हो जाते हैं। वे गुस्से में मंजू की गर्भाशय की थैली आपरेशन द्वारा निकलवा देते हैं और राजा के लिंग का आपरेशन कर उसे किन्नर बना देते हैं। और दोनों की अपने बिरादरी में शामिल कर लेते हैं। सालों बाद विजय नामक फोटोग्राफर की नजर पर पड़ती है। वह उसे कैलेंडर गर्ल बना देता है। दोनेां का प्यार हो जाता है फिर पता चलता है विजय किन्नर है। पर विजय का चरित्र और नाम काम के हुनर के कारण ऊँचा है इसलिए उसे समाज स्वीकार करता है। सुविमल, अनिल, यास्मीन और जुलेखा के माध्यम से समलैंगिक रिश्तों को बताया गया है और संविधा इन्हें साथ रहने की स्वीकृति देता है, इसे भी बताया है।

इस तरह हम देखते हैं कि 80 के बाद किन्नरों की समस्या, उसकी पीड़ा, उसकी संवेदना आदि को कश्य बनाकर हिन्दी के साहित्यकारों ने कई उपन्यास लिखें। हमारे देश में थर्ड जेंडर आज भी वर्ग संवेदना से ज्यादा उपहास और तिरस्कार का विषय है। मजबूरन यह वर्ग अपने लिए स्वयं ही आवाज उठाने को बाध्य है। यह कैसी विडम्बना है कि यदि घर में कोई बच्चा शारीरिक रुप से विकलांग पैदा हो जाए तो समाज उसे घर से बाहर नहीं फेंक देता पर कोई बच्चा किन्नर हो जाएं तो मात्र ‘जेनेटिक-डिफेक्ट’ के कारण उसे बच्चे को घर से बेघर कर दिया जाता है। दर-दर भटकने के लिए, भीख माँगने के लिए, वेश्यावृत्ति करने के लिए, ताली बजाकर शादी-विवाह और बच्चा होने पर नाजने के लिए छोड़ दिया जाता है। यदि कोई बच्चा किन्नर के रुप में पैदा होता है तो इसमें उसका क्या दोष है। सपना मांगलिक की कविता हिजड़े की व्यथा में किन्नर जीवन की विडम्बना का मार्मिक अंकन है –

लिंग की त्रुटि क्या दोस माँ मेरा, काहे फिर तू रुठी,

फेंक दिया दलदल में लाकर, ममता तेरी झूठी।

मेरे हक, खुशियाँ सब सपने, माँग रहा हूँ कबसे,

छिन लिया इंसा का दर्जा, दुआ माँगते तुमसे।

जितना शापित मेरा जीवन, दुःखद अधिक मर जाना,

जूते-चप्पल मार लाश को, कहते लौट न आना।

संदर्भ

  • Rath Vanita and saleem kidwai (Edited) 2008, Same sex Love in Indian – a Literary history
  • blogspot.com सोमवार 04 मार्च, 2013
  • शर्मा महसम देव (2017) कथाकारों की दुनिया, तक्षशिला प्रकाशन नई दिल्ली।
  • प्रो. शुक्ला आशा, कुसुम त्रिपाठी (संपादित) 2014, स्त्रीः समय, सरोकार एवं प्रतिक्रिया, महिला अध्ययन विभाग, वरकतउत्पना विश्वविद्यालय प्रकाशन, भोपाल, पृष्ठ 28
  • डॉ. सिंह विजय प्रताप com 2019/03: समलैंगिकता और निराला का संस्करणात्मक उपन्यास कुल्ली भाट
  • माधव नीरजा (2002) यमदीप, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
  • भीष्म महेन्द्र (2011) किन्नर गाथा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
  • सामयिक सरस्वती, संपादक महेश भारद्वाज, जुलाई-सितंबर 2017
  • अंसल कुसुम (2018) मेरी दृष्टि तो मेही है, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
  • त्यागी अनसूर्या (2005) मैं भी औरत हूँ, परमेश्वर प्रकाशन, नई दिल्ली
  • भीष्म महेन्द्र (2011) किन्नर गाथा, सामयिक प्रकाशन, कानपुर
  • भीष्म महेन्द्र (2016) मैं पायल, अमन प्रकाशन, कानपुर
  • भुराड़िया निर्मला (2014) गुलाम मंडी, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
  • सौरभ प्रदीप (2014) तीसरी ताली, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
  • मुद्दगल चित्रा (2016) पोस्ट बाॅक्स नम्बर 203, नाला सोपारा, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
  • सिंह विजेंद्र प्रताप (2017) हिन्दी उपन्यासों के आइने में थर्ड जेंडर, अमन प्रकाशन
  • विश्नोई मिलन (2018) संपादक, किन्नर विमर्शः साहित्य और समाज, विद्या प्रकाशन, कानुपर
  • डॉ. गुप्ता पूजा, हिन्दी उपन्यास में थर्ड जेंडर, 30 अगस्त 2018
  • अपनी मार्टी वर्ष 5 अंक 28-29, संयुक्तांक जुलाई 2018, मार्च 2019
  • https ://www.jagran.com/sahitya/literaturenews3038html
  • https ://bharatdiscovery.org/india इस्मत चुगताई
  • https ://prempoet.blogspot.in/2009/07/blog-post-12.html
  • https ://hindispeakingtree.in/allslides/historyof.hohosexuality-493826/265486
  • https ://rajkamalprakashan.com/default/kallibhat
  • राजकुमार खान: साहित्य स्त्रप्टा निराजा 198, पृष्ठ 82

कुसुम त्रिपाठी जानी मानी स्त्रीवादी लेखिका और आन्दोलनकारी हैं ।

1 Comment
  1. Rajlaxmi says

    बहुत ही उत्कृष्ट लेख और नई जानकारियों से भरपूर जिससे पढ़ने के बाद अब हिंदी साहित्य को और गहराई से नई दृष्टि से पढ़ने की प्रेरणा मिल रही है ।

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