आखिर कब तक बुनकर सामान्य नागरिक सुविधाओं से वंचित किए जाते रहेंगे?

मुनीज़ा रफ़ीक़ खान

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बजरडीहा बनारस का एक बड़ा मुहल्ला है, जहाँ बुनकरों की बड़ी आबादी बसती है लेकिन जितना बड़ा यह मुहल्ला है उतनी ही बड़ी इसकी विडंबनाएं भी हैं। यहाँ से महज़ चार किलोमीटर दूर रवींद्रपुरी कॉलोनी है जहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जनसम्पर्क कार्यालय है। इस कार्यालय में बनारस के तमाम लोग अपनी समस्याएँ लेकर आते हैं। लेकिन बजरडीहा के लोगों के लिए यह उतनी सहज जगह नहीं है जितनी बाकियों के लिए है। अगर इस जनसम्पर्क कार्यालय में आने वाले कामों की फेहरिस्त को उलट-पलट कर देखा जाय तो बजरडीहा और उसके जैसे दूसरे मुहल्लों के लोग किसी गिनती में नहीं मिलेंगे। यह कड़वा लेकिन सच है। बजरडीहा और उसके जैसे मोहल्ले उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ की सरकार के लिए तो मानो पाकिस्तान ही हैं। जब चाहे तब लखनऊ से कोई फरमान जारी होता है और प्रदेश भर के ‘पाकिस्तानों’ पर ऐसे चढ़ाई कर दी जाती है गोया उन्हें नक्शे से मिटाकर ही दम लिया जाएगा। दमन और उत्पीड़न के न जाने कितने दाग हैं जो इन पाकिस्तानों की पीठ पर हैं। लेकिन बेरोजगारी, भूख, वंचना और गंदगी अशिक्षा का जो चाबुक यहाँ की जनता पर लगातार चल रहा है उसका कोई अंत नहीं है। उसकी आवाज कोई सत्ता सुनने को तैयार नहीं है।

जब हम यहाँ घुसते हैं तो गंदगी के छोटे-मोटे पहाड़ सहज ही दिख जाते हैं जिसका तात्पर्य यह है कि नगर निगम यहाँ की साफ-सफाई से कोई  सरोकार नहीं रखता। हफ्तों तक कूड़ा वहीं के वहीं पड़ा रहता है। लोग इस विषय पर नाक-भौं चढ़ाते हैं और कुछ तो अपनी बनी-बनाई धारणा के तहत एक विद्वेषजनक वाक्य हवा में उछालते भी हैं कि मुसलमान गंदे रहते हैं लेकिन इसके पीछे की सच्चाई बहुत भयानक है। वाराणसी नगर निगम ने कूड़ा बटोरने का काम ठेके पर दे दिया है और ठेकेदार के आदमी वहीं से कूड़ा उठाते हैं जहाँ से उनको प्रति माह पचास रुपया मिलता है। यह संग्रहण घर-घर से होता है। लेकिन मैंने सर्वे के दौरान जब लोगों से पूछा तो यह बात सामने आई कि जहाँ बमुश्किल दो-तीन हज़ार की कमाई हो और राशन, कपड़े और दवा के लाले हों वहाँ इस तरह के खर्चे के लिए बहुत सोचना पड़ता है। लिहाजा लोग अपने घर का कूड़ा ढलाव अथवा दूसरी नियत जगहों पर रख आते हैं। अब यह नगर निगम के कर्मचारियों पर है कि वे कूड़ा उठाते हैं कि रहने देते हैं।

नक्खीघाट निवासी अपनी समस्याएं मुनीजा रफीक खान को बताते हुए ..

ढाई लाख से अधिक की आबादी वाले इस मुहल्ले में बुनकरों की बड़ी आबादी है जो कई दशकों से मंदी, बेरोजगारी, विस्थापन और गरीबी की मार झेल रही है। जो लोग पीढ़ियों से बुनकरी कर रहे थे और इस कला में जिन्हें महारत थी वे रेशम की किल्लत, भूमंडलीकरण, मशीनीकरण और हथकरघा के पतन के शिकार होकर क्रमशः जीवन के सबसे भयानक दौर में जीने को विवश हो गए। अधिकतर को बुनाई के अलावा कोई काम नहीं आता था और नए हालात में अपने को एडजस्ट करना उनके लिए बहुत मुश्किल था। हथकरघे की जगह लेने वाले पावरलूम की संख्या बहुत कम थी इसलिए पुरानी श्रमशक्ति का पूर्णतया समावेश होना असंभव था। केवल थोड़ी सी आबादी ही इस नए काम में लग पाई। बाकियों में कुछ ने मजदूरी और दूसरे कामों की ओर रुख किया। किसी न किसी रूप में परिवार चलाना था। लेकिन गरीबी का कोई अंत नहीं था। भरपेट भोजन मुहाल था। कभी-कभार गरीबी की कहानियाँ ढूँढने वाले खोजी पत्रकार ऐसे मुहल्लों में आकर लोगों से मिलते तो उन्हें लोगों के लोमहर्षक अनुभवों से दो-चार होना पड़ता। इस बात की थोड़ी-बहुत चर्चा उठती कि बुनकरों के हालात असहनीय हो गए हैं। तब कुछ समाजसेवी और एनजीओ भी बुनकरों की मिजाजपुर्सी के लिए आगे आते लेकिन जहाँ चारों तरफ आग लगी हो वहाँ इन खामोश चीख़ों को कौन सुनता?

पीने का साफ पानी जीवन जीने की सबसे बुनियादी सुविधाओं में एक है और साफ पानी लोगों को कई तरह की बीमारियों से बचाता है। लेकिन साफ पानी इस इलाके में विरले ही मिल पाता है। हमने विभिन्न मुहल्लों के दो सौ लोगों से बातचीत की। इनमें से 150 लोगों ने बताया कि उन्हें सरकार द्वारा पूर्ति किया गया पानी मिलता है। लोग पानी के लिए महीने में 50 रुपये देते हैं। आम तौर पर लोगों को सवेरे 2 घंटा और शाम को एक घंटा पानी मिलता है। लेकिन लोगों ने इस विषय में ऐसी दिक्कतों का खुलासा किया जो बरसों से बनी हुई हैं लेकिन उनका हल अभी भी नहीं निकला। उन्होंने बताया कि पानी बहुत धीरे-धीरे आता है।

बीते तीस-पैंतीस वर्षों में बजरडीहा और उसके जैसे अन्य मुहल्ले राजनीति, समाजशास्त्र और संस्कृतिकर्म के लिए अच्छे चरागाह साबित हुये। अच्छे जीवन की उम्मीद में चुनाव की फसल लहलहा उठती रही। गरीबी, भुखमरी, बदहाली और मौत के आंकड़ों से समाजशास्त्र की किताबें और अखबार के पन्ने रोचक लगने लगते। यहाँ की बात करनेवाले पत्रकार बहुत जेनुइन हो उठते। वे एक से एक खबरें और ग्राउंड रिपोर्ट खोजकर लाते और उनका कैरियर चमक उठता। लेकिन स्टेट का चरित्र वहीं का वहीं रहा। भेदभाव और घृणा से भरा हुआ। ऐसा लगता है जैसे इन मुहल्लों के लोगों का उससे कोई सरोकार ही नहीं। एक समय तो ऐसा आया कि रोजगार और शिक्षा जैसे मसलों पर बात तो दूर इनकी नागरिकता को लेकर ही सत्ता ने सवाल खड़ा कर दिया। ऐसा लगता है बजरडीहा और उसके जैसे मुहल्ले अपने अस्तित्व के साथ व्यवस्था के सामने बड़े सवाल बनकर खड़े हैं जिनका जवाब ही नहीं मिल पा रहा है।

बुनकर मुहल्लों में पानी और सेनीटेशन

हम सभी जानते हैं कि पीने का साफ पानी जीवन जीने की सबसे बुनियादी सुविधाओं में एक है और साफ पानी लोगों को कई तरह की बीमारियों से बचाता है। लेकिन साफ पानी इस  इलाके में विरले ही मिल पाता है। हमने विभिन्न मुहल्लों के दो सौ लोगों से बातचीत की। इनमें से 150 लोगों ने बताया कि उन्हें सरकार द्वारा पूर्ति किया गया पानी मिलता है। लोग पानी के लिए महीने में 50 रुपये देते हैं। आम तौर पर लोगों  को सवेरे 2 घंटा और शाम को एक घंटा पानी मिलता है। लेकिन लोगों ने इस विषय में ऐसी दिक्कतों का खुलासा किया जो बरसों से बनी हुई हैं लेकिन उनका हल अभी भी नहीं निकला। उन्होंने बताया कि पानी बहुत धीरे-धीरे आता है। दो घंटे में भी परिवार की जरूरत का पानी नहीं मिल पाता। 20 लोगों ने कहा कि ‘सबमर्सिबल से पानी मिलता है जिसे वे दूसरों के साथ साझा करते हैं।’ 8 लोगों (4 प्रतिशत) के पास अपना सबमर्सिबल है। 2 लोगों को निजी हैण्डपंप से पानी मिलता है जबकि 7 लोग निजी हैण्डपंप से पानी लेते  हैं।

लोहता का यह तालाब कचरा ही नहीं बीमारियों का भी घर बनता जा रहा है

 

17 लोग (8 प्रतिशत) कुएं या बोरवेल या पड़ोसी के पानी के टैप से पानी लेते हैं। इन लोगों को महीने में इसके लिए 50 रुपये देना पड़ता है। बजरडीहा से सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोग सरकारी सबमसिरबल से महीने में 50 रुपये देकर पानी लेते हैं। इस व्यवस्था को स्थानीय लोग चलाते हैं।  बजरडीहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रवीन्द्रपुरी संसदीय कार्यालय से लगभग 3 किलोमीटर दूर है।

रेवड़ी तालाब के अब्दुल गनी बताते हैं कि सरकारी पाइप  लाइन से गंदा पानी आता है। इसलिए स्थानीय समुदाय ने अपने खर्चे से अपनी बोरवेल व्यवस्था बनाई है। एक  बोरवेल से 15-20 परिवार महीने में 800 रुपए देकर पानी ले सकते हैं। सभी खर्चा समुदाय के लोग आपस में बाँट लेते हैं।

अस्वास्थ्यकर स्थिति में आम तौर पर फैलने वाली बीमारियों को फैलने से रोकने में साफ-सफाई रखना मददगार साबित होता है। इन बीमारियों का फैलना आम  बात है। 125 लोगों (साढ़े 62 प्रतिशत) ने बताया कि लॉकडाउन के समय सफाई कर्मचारी उनके क्षेत्र में नियमित आते थे जबकि 42 लोगों  (21 प्रतिशत) ने बताया कि लॉकडाउन के समय में उनके इलाके की सड़क को साफ करने और कूड़ा इकट्ठा करने के लिए कोई नहीं आता था।

ढाई लाख से अधिक की आबादी वाले इस मुहल्ले में बुनकरों की बड़ी आबादी है जो कई दशकों से मंदी, बेरोजगारी, विस्थापन और गरीबी की मार झेल रही है। जो लोग पीढ़ियों से बुनकरी कर रहे थे और इस कला में जिन्हें महारत थी वे रेशम की किल्लत, भूमंडलीकरण, मशीनीकरण और हथकरघा के पतन के शिकार होकर क्रमशः जीवन के सबसे भयानक दौर में जीने को विवश हो गए।

29 लोगों ने (साढ़े 14 प्रतिशत) बताया कि सफाई कर्मचारी कभी-कभी आते थे। 8 लोगों (4 प्रतिशत) ने बताया कि उन्होनें अपने इलाके में साफ-सफाई करने के लिए किसी को आते हुए नहीं के बराबर देखा है। लोहता में  स्थानीय लोगों ने बताया कि सफाई कर्मचारी सिर्फ हिंदुओं के रहने वाली जगहों पर सफाई करने के लिए आते हैं, लेकिन मुसलमानों के रहने वाले जगहों पर विरले ही आते हैं। इस इलाके के लोग खुद साफ-सफाई करते हैं। लोहता के महमूदपुर के बारे में पता चला कि मेहतर उनके सामुदायिक शौचालय को साफ करने के लिए नहीं आते। वह सरकारी स्कूल के शौचालय को साफ करते  हैं लेकिन वहाँ से आधा किलोमीटर दूर रहने वाले लोगों के क्षेत्र में नहीं आते। हमें यह भी पता चला कि त्योहारों के समय भी इस इलाके में सफाई कर्मचारी विरले ही आते  हैं। लोगों को खुद से कूड़ा फेंकना पड़ता है।

बनारस के नक्खी घाट की महिलाओं ने बताया कि उन्होनें तीन साल पहले निजी शौचालय बनाने के लिए आवेदन दिया था, लेकिन उस पर अभी तक कोई जवाब नहीं आया है और किसी ने इलाके का दौरा भी नहीं किया है। सरकार ने शौचालय बनाने के लिए बहुत सारा खर्चा किया और गंदगी को भगाना है, शौचालय जाना है का नारा दिया लेकिन खुद प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में शौचालय  नहीं है और महिलाओं को शौच के लिए खुले मैदान या रेल की पटरी पर जाना पड़ता है।

खुली नाली और सड़ांध में रहने को विवश

नक्खी घाट में लोगों ने बताया कि लॉकडाउन के समय  इलाके में नाले से निकासी से जुड़ी कई समस्याएँ थीं। स्थानीय लोगों के गुहार लगाने के बाद भी किसी ने सुध नहीं ली। उदाहरण के तौर पर हम नक्खी घाट में एक बड़ी खुली नाली का जिक्र कर सकते हैं। स्थानीय लोगों ने नगर निगम और प्रशासन से नाली को ढकने की मांग की, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं की गई। इस खुली नाली की वजह से लोगों में फैलने वाली बीमारियों का खतरा लगातार बना हुआ है।

अमर उजाला (4.1.2021) में खबर छपी थी कि सुविधा सपन्न वर्ग के आवास सोसाइटी से कूड़ा उठाया जा रहा है लेकिन बनारस के अंदर की गलियों से कूड़ा नहीं हटाया जा रहा है। घर-घर से कूड़ा उठाने का काम पिछले तीन महीनों से चल रहा है लेकिन अभी भी इसके दायरे में पूरे क्षेत्र को नहीं लिया गया है। नगर निगम के अधिकारी मानते हैं कि सभी घरों को इसके दायरे में नहीं लाया गया है। इस हकीकत को हमने अपने अध्ययन में भी देखा।

थोड़ी सी बारिश में भी उफन जाती हैं गलियाँ

कोविड- 19 के लॉकडाउन का पारंपरिक बुनाई उद्योग पर पड़ने वाले प्रभाव पर अपने एक अध्ययन में सफाई कर्मचारियों को कोविड सुरक्षा किट मिलते हुए नहीं पाया। सरकार के  दिशा-निर्देश के अनुसार लॉकडाउन के समय सफाई कर्मचारियों को सुरक्षा किट देना अनिवार्य है।

पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के हाल की रिपोर्ट के अनुसार 2.10.2014 से 13 मार्च, 2020 तक पूरे भारत में 102921674 निजी आवास और शौचालय बनाया गया। उत्तर प्रदेश में यह संख्या 21390580 है। लेकिन हमने पूर्वाञ्चल के कई जिलों में सर्वे किया तो वहाँ शौचालय नहीं बन पाये थे। उदाहरण के लिए बनारस के नक्खी घाट और आजमगढ़ के नयापुरा में अभी तक लोगों के घरों में शौचालय नहीं रहने के बारे में पता चला। सामुदायिक शौचालय का उपयोग करने के लिए पैसा देना पड़ता है, इसलिए लोग रेलवे पटरी और खुले मैदान में शौच करने जाते है। यह प्रधानमंत्री का अपना संसदीय क्षेत्र है।

बजरडीहा में कूड़े और गंदगी का आलम

यह मात्र दो सौ लोगों से हुई बातचीत का निष्कर्ष है। अगर लोगों के बीच और भी गहराई से पैठ बनाई जाय तो उनकी अनगिनत समस्याएँ सामने आएंगी। यह सब वास्तव में क्या है? यह एक व्यवस्था की सड़ांध से पैदा हुई बदहाली के अलावा क्या हो सकती है जिसके एक सिरे पर पूंजी और अंतहीन शोषण के शिकार लोग हैं जिनको रोजगार और आजीविका देने में पतनशील पूंजीवाद बिलकुल अक्षम हो चुका है तो दूसरी ओर सत्ता पाने के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण करके हिंदुओं को एकजुट करने वाले नफरत के सौदागरों की निरंकुशता और घृणा का बजबजाता साम्राज्य है। वे अपने ही देश के श्रमिकों के मौलिक और मानवीय अधिकारों से उन्हें वंचित करना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने हर स्तर पर अपना एजेंडा सेट किया है। यहाँ तक कि उन सार्वजनिक संस्थानों को भी नहीं छोड़ा है जिनका दायित्व अपने नागरिकों की सुविधाओं का खयाल रखना है। लेकिन आज वे इन्हें धार्मिक अलगाव और घृणा की नज़र से देखते हुये उनके प्रति अपने कर्तव्यों से पीछा छुड़ा रहे हैं!

डॉ. मुनीज़ा रफीक खान जानी-मानी समाजशास्त्री हैं।

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