दलित लेखकों-विचारकों की वैचारिक दरिद्रता डायरी (26 अगस्त, 2021) 

नवल किशोर कुमार

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बचपन वाकई अलहदा था। अहसास ही नहीं होता था कि इंसान-इंसान के बीच कोई भेद होता है। भेद के नाम पर केवल इतना ही कि मेरी कक्षा में लड़के और लड़कियां दोनों हैं। लड़कियों का ड्रेस अलग है और हम लड़कों का अलग। जाति और धर्म का अंतर भी था, लेकिन तब महसूस नहीं होता था। इतनी समझ भी नहीं थी। लेकिन अब याद करता हूं तो महसूस करता हूं कि मेरे उस स्कूल में कितना भयंकर जातिवाद था, जिसका नाम बिहार के क्रांतिकारी जननेता रहे नक्षत्र मालाकार के नाम पर था। मेरे स्कूल में जाति का असर इतना था कि ब्राह्मणों के बच्चों को हमेशा आगे बैठने की जगह दी जाती थी। तब भी यह बात समझ में नहीं आती थी कि ऐसा क्यों होता है। मैं सोचता भी नहीं था। नहीं सोचने की एक वजह यह कि मेरा स्थान पहला होता था और यह स्थान में अपनी प्रतिभा के कारण हासिल किया था।
बाद में जब पटना के चितकोहरा स्थित दारोगा प्रसाद राय हाई स्कूल पढ़ने गया तब वहां जातिवाद की जड़ें इतनी मजबूत नहीं थीं। वजह थे हेडमास्टर मधुसूदन प्रसाद यादव। अपने ही मनमिजाज के आदमी थे। संस्कृत के शिक्षक जवाहर झा, भौतिकी के शिक्षक कामेश्वर प्रसाद और भूगोल की शिक्षिका सरोज मैम सहित कई शिक्षक सवर्ण थे, लेकिन एक जवाहर झा को छोड़कर किसी ने कोई जातिगत व्यवहार किया हो, याद नहीं आता। सबसे अच्छी थीं वीणा यादव। वह अंग्रेजी की शिक्षिका थीं। वह सिंदूर नहीं के बराबर लगाती थीं और गहने भी कम पहनती थीं। लेकिन सबसे अलग थीं। उन दिनों पाठ्यक्रम में स्टोरीज रीटोल्ड नामक पुस्तक थी, जिसमें कहानियां होती थीं। वीणा मैम की खासियत यह थी कि क्लास शुरू करने से पहले एक मैसेज ब्लैकबोर्ड पर लिख देती थीं। उन संदेशों में कभी शेक्सपीयर तो कभी आंबेडकर और कभी-कभार गांधी के संदेश होते थे।
खैर, बचपन से लेकर किशोरावस्था तक जातिवाद ने किस तरह मुझे प्रभावित किया, यह नहीं कह सकता। इसकी एक वजह यह भी रही कि मेरा बचपना और किशोरावस्था के दिनों में बिहार में ब्राह्मणों का राज नहीं था। लालू प्रसाद और उनकी पत्नी राबड़ी देवी का राज था। इसका भी एक असर था उन दिनों।

यदि केंद्र सरकार ईडब्ल्यूएस को दस फीसदी आरक्षण देना चाहती है तो उसे सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेनी होगी। इसके बारे में हाईकोर्ट का मंतव्य है कि ओबीसी के लिए 27 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी और विकलांगों के लिए क्षैतिज आरक्षण के बारे में पहले से ही सुप्रीम कोर्ट सहमत रहा है तथा इसके लिए तमाम वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं। चूंकि ईब्ल्यूएस को दस फीसदी आरक्षण देने से आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी का उल्लंघन होता है तो इसके लिए केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेनी ही चाहिए।

जातिवाद क्या होता है, यह तब महसूस हुआ जब समझदारी आयी।
बहरहाल, बचपन और अपने जीवन की इन बातों को कभी और दर्ज करूंगा। अभी तो दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता को खंगाल रहा हूं। इस अखबार ने कल मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले के बारे में खबर प्रकाशित नहीं किया है जिसमें हाईकोर्ट ने आर्थिक आधार पर पिछड़े वर्गों (ईडब्ल्यूएस) यानी गरीब सवर्णों के आरक्षण पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि नीट परीक्षा में अखिल भारतीय कोटे के तहत तमिलनाडु में राज्याधीन मेडिकल संस्थाओं में यदि केंद्र सरकार ईडब्ल्यूएस को दस फीसदी आरक्षण देना चाहती है तो उसे सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेनी होगी। इसके बारे में हाईकोर्ट का मंतव्य है कि ओबीसी के लिए 27 फीसदी, अनुसूचित जाति के लिए 15 फीसदी, अनुसूचित जनजाति के लिए 7.5 फीसदी और विकलांगों के लिए क्षैतिज आरक्षण के बारे में पहले से ही सुप्रीम कोर्ट सहमत रहा है तथा इसके लिए तमाम वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी हैं। चूंकि ईब्ल्यूएस को दस फीसदी आरक्षण देने से आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी का उल्लंघन होता है तो इसके लिए केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से अनुमति लेनी ही चाहिए।
मैं जनसत्ता के बारे में सोच रहा हूं कि उसने इतनी महत्वपूर्ण खबर को प्रकाशित क्यों नहीं किया? मेरे हिसाब से इसका जवाब यह है कि जनसत्ता के संपादकण यह नहीं चाहते हैं कि ईडब्ल्यूएस पर सवाल उठाती यह खबर लोगों तक पहुंचे। इसके कारण देशभर में इसका विरोध हो सकता है। यह संभव है कि कल कोई पटना में तो कोई इलाहाबाद या कोई मुंबई में इसके खिलाफ जनहित याचिका दायर कर दे।
जनसत्ता के बारे में और कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता। मीडिया पर द्विजों का कब्जा है। वे अपने-अपने हिसाब से कभी प्रगतिशील बनते हैं तो कभी घोर जातिवादी।
मैं तो दलित लेखकों-विचारकों के बारे में सोच रहा हूं, जिन्होंने कल डॉ. गेल ऑम्वेट के निधन को लेकर अपनी कलम को विश्राम दिया। कल तीन बजे तक मैं यह देखने का प्रयास कर रहा था कि बहुजन वैचाारिकी को नया धरातल देने वाली अमेरिकी मूल की इस भारतीय विचारक के बारे में आज के दलित क्या सोच रहे हैं। हालांकि कई दलित सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने फेसबुक पर डॉ. गेल ऑम्वेट को श्रद्धांजलि दी। उनमें अधिकांश के बारे में मेरा अनुमान है कि उन्होंने शायद ही गेल के लिखे को पढ़ा हो। वे तो ऐसे हैं कि यदि कोई चर्चित फेसबुकिया प्राणी फेसबुक पर कुछ लिख दे तो कॉपी-पेस्ट कर बात को आगे बढ़ाते हैं। ऐसे लोग भी बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता है। लेकिन सवाल शेष रह जाता है

कल मुझे दलित-बहुजनों की वैचारिक दरिद्रता भी दिखी। सबसे अधिक आश्चर्य तो प्रो. विवेक कुमार को लेकर हुआ। जहां तक मैं जानता हूं डॉ. गेल ऑम्वेट को प्रो. कुमार अपना गुरू मानते थे। उनके आराध्य कांशीराम भी डॉ. गेल आम्वेट के विचारों व अध्ययन से प्रभावित थे। फिर कल विवेक कुमार खामोश क्यों रहे? क्या उनतक यह जानकारी नहीं पहुंची

कल एक दलित लेखक संघ की अध्यक्ष अनिता भारती को छोड़कर किसी और बड़े दलित लेखक और विचारक को मैंने डॉ. गेल ऑम्वेट को श्रद्धांजलि देते हुए नहीं देखा। हालांकि ओबीसी के भी कई बड़े लोग चुप रहे। लेकिन जिन लोगों ने डॉ. गेल ऑम्वेट के बारे में कुछ लिखा, उनमें अधिकांश ओबीसी के लोग थे। नाम का जिक्र करूं तो कांचा इलैय्या, उर्मिलेश, दिलीप मंडल का नाम मुझे लेना चाहिए।
कल मुझे दलित-बहुजनों की वैचारिक दरिद्रता भी दिखी। सबसे अधिक आश्चर्य तो प्रो. विवेक कुमार को लेकर हुआ। जहां तक मैं जानता हूं डॉ. गेल ऑम्वेट को प्रो. कुमार अपना गुरू मानते थे। उनके आराध्य कांशीराम भी डॉ. गेल आम्वेट के विचारों व अध्ययन से प्रभावित थे। फिर कल विवेक कुमार खामोश क्यों रहे? क्या उनतक यह जानकारी नहीं पहुंची कि फुलेवाद और आंबेडकरवाद को नया स्वरूप देने वाली डॉ. गेल ऑम्वेट का निधन हो गया है?
हालांकि कल देर शाम प्रो. विवेक कुमार ने अपने फेसबुक पर लिखा- गेल ओमवेट की बहुजन आंदोलन के लिए प्रासंगिकता / गेल ओमवेट को मेरी आदरांजलि. अकादमिक दुनिया में तो उनका योगदान अद्भुत है ही पर उन्होंने बहुजन आंदोलन के लिए अपने शोध के माध्यम बहुमूल्य सामग्री भी उपलब्ध कराई। गेल ओमवेट  के बारे में मान्यवर ने बताया था की अमरीका की होते हुए भी उन्होंने जोतिबा फुले के आंदोलन पर शोध कर उनका हमसे साक्षात कराया जिससे हमारे आंदोलन को बल मिला।
खैर, कल मुझे एक बात से और दुख हुआ। कल बीपी मंडल की जयंती थी। उनके बारे में जो लोग कुछ लिख-पढ़ रहे थे, उनमें 95 फीसदी यादव थे।
इस देश के दलित-बहुजन ब्राह्मणवाद से ऐसे कैसे लड़ सकेंगे?
कल ही एक कविता जेहन में आयी –

 

दिल को सुकून है कि
मुर्दा बनते देश और दुनिया में
हम अब भी जिंदा हैं ।
चलो जश्न मनाते हैं
इससे पहले कि परमाणु के धमाके
हमारे चिथड़े कर दे।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं । 

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