वास्तव में 1855 का संथाल हूल ही है प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

अशोक सिंह 

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हमारे समय का सच यह है कि सच को सच कहना विद्रोहियों की लिस्ट में नाम दर्ज कराना है, लेकिन उससे भी बड़ा सच यह है कि सच को सच न कहना, झूठ को जीवन देना है। तो क्या यह हमारे समय का सच नहीं है कि हम अक्सर भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते सन 1855 में हुए संथाल हूल को भूल जाते हैं? जबकि 1857 से पहले सिदो कान्हू के नेतृत्व में संताल आदिवासियों ने सर्वप्रथम स्वतंत्रता और स्वायत्तता का नगाड़ा बजाया था। क्या 1857 की तथाकथित प्रथम राज्यक्रांति की पृष्ठभूमी तैयार करने में संताल हूल की अहम भूमिका नहीं थी? क्या भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायकों ने छापामार युद्ध का हुनर और तेवर इससे नहीं सीखा था? क्या सिदो कान्हू भारत में पहली जनक्रांति के अगुवा नहीं थे? और तो और क्या यह सच नहीं है कि आदिवासी प्रतिरोध, विशेषतः सिदो कान्हू और बिरसा मुण्डा के ऐतिहासिक आन्दोलनों को इतिहास में जगह नहीं मिली?

आज भी क्षत्रिय ज्ञान सृजन अधिकांशतः मुख्यधारा के निर्माण का साधन ही है। इस परिप्रेक्ष्य में जब गवेषक स्थानीय इतिहास को सही मर्यादा देने की चेष्टा करते हैं तो तथाकथित मुख्यधारा के प्रवर्तकों के द्वारा उन पर राष्ट्र विरोध एवं क्षेत्रियता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जाता है।

एक ऐसे समय में जब 1857 पर आधारित तथाकथित भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं वर्षगाँठ मनाने की तैयारी चल रही है, मुझे लगता है कि ठीक उसके दो-तीन साल पहले हुए सन 1855 के उस संथाल हूल की चर्चा यहाँ प्रासंगिक होगी, जिसे अब तक इतिहास की इतनी पुनर्व्याख्या के बावजूद प्रथम स्वाधीनता संग्राम की संज्ञा नहीं मिली। जैसा कि सर्वविदित है कि इतिहासकारों ने 1857 के विद्रोह को आजादी का प्रथम संघर्ष कहकर प्रचारित-प्रसारित किया है। किन्तु यह बात तथ्यों पर आधारित पूरी तरह सच नहीं है। सच तो यह है कि सन 1857 के बहुत पहले से ही झारखण्ड की धरती पर अंग्रेजों और उसकी व्यवस्था से मुक्ति हेतु आदिवासियों द्वारा सतत मुक्ति संघर्ष किये जाते रहे हैं। दरअसल, 1857 की लड़ाई तो राजा-महाराजाओं ने अपना राजपाट बचाने-पाने हेतु अपने स्वार्थ के लिए लड़ी थी। अगर भारतीय राजाओं को अंग्रेज उनका राज-पाट दे देते तो शायद वे कभी विद्रोह नहीं करते। इसके विपरित झारखण्ड में आजादी के लिए सच्चे संग्राम हुए थे, जो राजनैतिक जंग के साथ-साथ आम जनता के मुद्दों के लिए किये गये जनसंघर्ष भी थे।

गौरतलब है कि वर्ष 1765 में झारखण्ड का क्षेत्र बिहार की दिवानी का अंग बन जाने कारण अंग्रेज राज के अन्तर्गत एक-कर चुकाने वाला क्षेत्र बन गया, जो आदिवासियों को स्वीकार्य नहीं था। परिणामतः 1766 में संताल परगना के कुछ हिस्सों में पहाड़िया विद्रोह शुरू हो गया, जो सन  1770-78 के बीच भी माल पहाड़ियों के नेतृत्व में सतत जारी रहा। एक तरफ 1781 में महेशपुर की रानी शव एवरी ने पहाड़ी लोगों के सहयोग से अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंका तो दूसरी तरफ 1798 में ही तिलका मांझी ने दामिन-ए-कोह में संथाल परगना की अस्मिता का उद्घोष कर दिया। यह संघर्ष 1781 से 7185 तक चला। इसमें बहुत से अंग्रेज मारे गये, साथ ही भारी संख्या में आदिवासी भी शहीद हुए।

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सन 1793 में अंग्रेजों द्वारा स्थायी बन्दोबस्ती लागू करने के बाद तो आन्दोलनों का ताँता लग गया। तामाड़ विद्रोह जो 1798 तक बुन्दू में विष्णु मानकी ने अंग्रेजों के खिलाफ बुन्दु विद्रोह की कमान संभाले रखी। 1800 से 1808 तक दुखन मानकी ने तमाड़ मे विद्रोह की चिंगारी को भड़काकर ज्वालामुखी में बदल दिया। रद कोन्टा ने 1819 से 1820 तक तमाड़ में मुंडा विद्रोह चालू रखा तो 1819 से 1820 तक रूगदेव और कोन्ता मुण्डा ने भी अपनी अगुवाई में प्रथम कोल-विद्रोह को अंजाम दिया। 1820-21 में हो-विद्रोह हुआ। 1828-32 में बिंदराय और सिंहराय के नेतृत्व में द्वितीय को-विद्रोह हुआ। जिसमें उन्होंने राजा के महल पर ही कब्जा कर लिया और कोल राज्य कायम कर स्वतंत्र सरकार का गठन किया।

आदिवासी आन्दोलनों की इसी कड़ी में सन 1853 के आसपास सिदो कान्हू और चाँद भैरो नामक चार सहोदर संताल भाईयों की अगुवाई में संताल विद्रोह का नगाड़ा बज उठा, जिसकी परिणति 30 जून, 1855 के हूल में हुई। 1855 का संताल हूल, एक बड़ा जन विद्रोह था। जिसका क्षेत्र वीरभूम, बाकुड़ा, सिहंभूम, हजारीबाग से लेकर भागलपुर मुंगेर के बीच था। इस क्षेत्र की आदिवासी जनता ने अंग्रेजों, सूदखोर, महाजनों और ज़मींदारों के शोषण व अत्याचार से तबाह होकर अपने आक्रोश व असंतोष को एक विशाल विद्रोह के रूप में प्रदर्शित किया था। इसमें लगभग 10 हजार आदिवासी मारे गये थे। अंग्रेजों के विरुद्ध हुए इस जनक्रान्ति में आदिवासी महिलाओं ने भी हिस्सा लिया जिसमें फूलो, झानो का नाम प्रसिद्ध है। इस जनक्रान्ति की एक और विशेषता यह थी इसमें उस क्षेत्र की सभी अन्य जातियों ने संथालों का साथ दिया। लुहारोें ने तीर, कुल्हाड़ी, भाला फरसा, तैयार किया तो बढ़इयों ने लाठियाँ और चमारों ने जूते व पेटियाँ मुहैया करवाईं। जुलाहों ने कपड़े बुनकर दिये तो कुम्हारों ने विद्रोहियों को पानी पीने के लिए मिट्टी के बर्तन उपलब्ध कराये। यही कारण है कि संघर्ष जन संग्राम कहलाया।

इस प्रकार देखा जाए तो 1781 के पहाड़िया विद्रोह से लेकर 1857 के तथाकथित स्वतंत्रा के बाद तक भी आदिवासी संघर्षरत रहे। सन 1895 से 1900 तक बिरसा मुंडा का महाविद्रोह यानि उलगुलान चहा। इस अवधि के दौरान आदिवासियों को लगातार जल जंगल-जमीन व उनके अन्य प्राकृतिक संसाधनों और स्रोतों से बेदखल किया गया जाता रहा। सन 1995 में बिरसा मुंडा ने अंग्रेजों द्वारा लागू नई राजस्व-व्यवस्था, ज़मीदारी तथा ठेकेदारी के विरुद्ध लड़ाई के साथ-साथ जल-जंगल-जमीन की रक्षा की लड़ाई भी छेड़ी, दरअसल संथाल विद्रोह या हूल वर्ग संघर्षमुक्तिकामी संग्राम था। यह आदिवासी अस्मिता स्वायतता व संस्कृति की रक्षा हेतु वर्ग संघर्ष व मुक्तिकामी संग्राम था। यह आदिवासियों की अंग्रेजों के विरुद्ध पहली जनक्रांति थी। इतिहासकारों ने इन संघर्षों को हमेशा विद्रोह ही कहा जबकि यह स्वाधीनता संग्राम थे। यही संज्ञा इसे मिलनी चाहिए थी, जो नहीं मिली।

ऐसे में हमें यहाँ विजयदेव नारायण साही की वह कविता याद आ रही है जिसमें एक जगह उन्होंने कहा है कि तुम इतिहास में हमारा जिक्र नहीं पाओगे/ क्योंकि हमने अपने आपको इतिहास के विरुद्ध दे दिया है/ छुटी हुई जगह दिखे जहाँ-जहाँ/ या दबी हुई चीख का एहसास हो समझना हम वहीं मौजूद थे। ये पंक्तियाँ उन्होंने किसी भी संदर्भ में लिखी हों, आदिवासी प्ररिप्रेक्ष्य में हमारी समझ से यहाँ यही निष्कर्ष निकलता है कि जिस इतिहास के विरोध में आदिवासी युगों-युगों से लड़ते रहे, उसमें भला उन्हें जगह कैसे मिल सकती है?

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आदिवासियों का वास्तविक इतिहास क्या था, उसकी खोज कैसे की जाए, उसे कैसे सामने लाया जाए, यह मूल प्रश्न अभी तक अपनी जगह पड़ी है। उसका उत्तर तलाशने से पूर्व हमें इस महत्वपूर्ण प्रश्नों से मुठभेड़ करनी होगी कि जैसा इतिहास हमें पढ़ाया-सुनाया जाता रहा है, उसमें आदिवसी किस रूप में हैं? इसे समझने के लिए हमें भारतीय मिथक परम्परा में जाना होगा, चूंकि सारी गड़बड़ी वहीं से शुरू हुई है। मिथक एवं इतिहास के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह रही है कि हारी हुई कौमों को विकृत करके चित्रित किया जाता है। वर्चस्वकारी वर्ग के पक्ष में सारी सोच होती है और प्रायः इतिहासकार स्वयं की वर्ग परंपरा के पक्ष में तथा विपक्ष के विरोध में कुछ न कुछ पूर्वाग्रहों से ग्रसित होता है। ऐतिहासिक प्रमाण तो निरपेक्ष होते हैं। जब उनके अधिकांश की व्याख्या-विश्लेषण-निष्कर्ष का मौका इतिहासकार को मिलता है तो प्रमाणिक सामग्री के अनुरूप उसका तटस्थ और निरपेक्ष हो पाना बहुत मुश्किल होता है। इतिहासकार के संस्कार सोच दृष्टि और विचारधारा प्रत्यक्ष-परोक्ष या जाने-अनजाने समाविष्ट होकर रचे जा रहे इतिहास को प्रभावित करने लगते हैं। यह किसी के साथ भी हो सकता है। इसलिए मुझे लगता है कि इस उलझन से बचने के लिए हमें- ‘वाद-विवाद-संवाद‘ की मेथोडोलोजी को अपनाना चहिए, जिसके माध्यम से विभिन्न दृष्टिकोणों से लिखे-अनलिखे इतिहास का विशेषण करके उस निष्कर्ष तक पहुँचना चाहिए जो बौद्धिक-तार्किक व तथ्यात्मक-वैज्ञानिक तुला पर खरा उतरे। पढ़-सुनकर लगे कि ‘हाँ यह प्रमाणिक है, यह सच है, इसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है।‘

इधर, हाल के कुछ वर्षों में भारतीय बुद्दिजीवियों जिसमें झारखंड के बुद्धिजीवि भी शामिल हैं, आदिवासी इतिहास की पुनर्रचना की चर्चा ने तूल पकड़ा है, जिसमें वैचारिक मतभेद के बावजूद विद्वत समाज इस बात पर सहमत है कि चूंकि आदिवासियों से संबंधित उपलब्ध ज्ञान अपूर्ण एवं पूर्वाग्रहों से ग्रसित है। इसलिए उनके इतिहास को नए सिरे से लिखा जाना चाहिए। मुख्यतः विश्वविद्यालय शिक्षक स्तरीय सेमिनारों एवं सम्मेलनों से उठती इन आवाजों से स्पष्ट होता है कि भारतीय गन्वेषक आज समझने लगे हैं कि ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया एक निरपेक्ष एवं तथ्यनिष्ठ प्रक्रिया नहीं बल्कि राजनीति से प्रेरित है। यहाँ पुनः इस बात को दुहराना उचित होगा कि क्षमता पर अपनी पकड़ को दृढ़ रखने के लिए क्षमतावानों ने हमेशा ज्ञान सृजन को प्रभावित किया है। परिणामतः समाज के पिछड़े एवं दबे कुचले लोगों को इतिहास के पृष्ठों मे विशेष जगह नहीं मिली। इसलिए यह अपेक्षा न्यायपूर्ण एवं तर्कसंगत है कि उन्हें उनकी सही जगह दी जाए। भारतीय परंपरा की यह बिडम्बना है कि किसी भी प्रयास पर जब तक विदेशी मुहर नहीं लगती, उसे सही मर्यादा नहीं दी जाती है।

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ज्ञातव्य हो कि पिछले वर्ष संथाल हूल के 150 वर्ष पूरे होते ही संसेक्स विश्वविद्यालय द्वारा आदिवासी इतिहास की पुनर्रचना के लिए एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। इससे विशेषतः राज्य गठन के तुरंत बाद झारखण्ड तथा आदिवासी इतिहास के प्रति जो उफान आया था एवं क्रमशः जो मंद पड़ने लगा था, उसे बल मिला। फलतः औपनिवेशिक दृष्टिकोण से निर्मित इस ज्ञान को स्वाधीनोत्तर काल में चुनौती देते हुए इतिहास की पुनर्व्याख्या शुरू हुई। यहाँ यह बात भी संदर्भवश कहना जरूरी लगता है कि आज से 50 वर्ष पहले भी जब 1857-58 के शताब्दी वर्ष पर इतिहास की राष्ट्रीयतावादी व्याख्या की परंपरा शुरू हुई थी तो उस ब्रिटिश विरोधी आदिवासी संग्राम पर शोध का प्रारंभिक उद्देश्य 1857-58 के महाविद्रोह के सर्वभारतीय चरित्र को स्थापित करना ही था न कि स्वतंत्रता रूप से आदिवासी आन्दोलनों का अध्ययन।

आज भी क्षत्रिय ज्ञान सृजन अधिकांशतः मुख्यधारा के निर्माण का साधन ही है। इस परिप्रेक्ष्य में जब गवेषक स्थानीय इतिहास को सही मर्यादा देने की चेष्टा करते हैं तो तथाकथित मुख्यधारा के प्रवर्तकों के द्वारा उन पर राष्ट्र विरोध एवं क्षेत्रियता को बढ़ावा देने का आरोप लगाया जाता है। वे भूल जाते हैं कि अंशों के पूर्ण समावेश से ही संपूर्ण का निर्माण होता है इसलिए प्रामाण्य सर्वभारतीय इतिहास तभी लिखा जा सकता है, जब स्थानीय इतिहास पर सघन अध्ययन है।

कैसी बिडम्बना है कि अभी भी व्यापक रूप से ब्रिटिशकालीन दलील-दस्तावेजों की स्वयं संपूर्णता एवं अभ्रांतता पर गवेषकों की आस्था अक्षुण्ण बनी हुई है। यह बात सही है कि इनसे हमें महत्वपूर्ण तथ्य मिलते हैं। पर यदि हम केवल दिल्ली, पटना, कलकत्ता एवं राँची तथा जो भाग्यवान है लंदन में, संगृहित स्रोतों के आधार पर शोध-पत्रों एवं ग्रंथों की रचना करते रहे तो आदिवासी जीवन के प्रवाह पर सम्यक धारणा नहीं बन सकती। ऐसा इसलिए कि सरकारी कागजातों के तथ्य एकपक्षीय होते हैं। उनमें न केवल प्रशासनिक प्रयोजनों के अनुरूप तथ्यों को इकट्ठा किया जाता है बल्कि प्रशासन की भूमिका के केंद्रीयता एवं व्यापकता को भी महिमामंडित किया जाता है।

आदिवासी साहित्य व संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान और चिंतक डॉ. रामदयाल मुंडा का इस संबंध में मानना है कि 1855 का संथाल हूल तथा इस तरह के तमाम अदिवासी- आन्दोलन चाहे वह मुंडा, कोल भूमिका अथवा चेरो विद्रोह हो, हमें इतिहास दृष्टि पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करते हैं। एक आदर्श रूप में इतिहासकार को तटस्थ/ वस्तुपरख होना चाहिए, किन्तु ऐसा सामान्यतया हो नही पाता है। अधिकांशतः इतिहासकार तत्कालीन राजसत्ता के पूर्वाग्रही के रूप में दिखाई देते हैं, लेकिन जैसे-जैसे समय बितता है, इस दृष्टिकोण में परिवर्तन आता है और वही ऐतिहासिक तथ्य नये आलोक में व्याख्ययित होते हैं। वे कहते हैं कि भारतीय राष्ट्रीय बहुसंख्यक समाज की दृष्टि में आदिवासी दिखाई ही नहीं देता क्योंकि बहुसंख्यक समाज का इस समाज से सीधा कोई लेना-देना नहीं है। वह एक दूरस्थ समाज है। इसलिए इस दृष्टि से कोल आन्दोलन और संथाल विद्रोह कुछ भी राष्ट्रीय नहीं है। इसलिए उनका राष्ट्रीय आन्दोलन 1857 के सिपाही विद्रोह, जिसमें देश का हिन्दू-मुस्लिम बहुसंख्यक प्रभावित दिखाई देते हैं, से आरंभ होता है। वस्तुतः आदिवासी इतिहास दृष्टि में कोल आन्दोलनों को राष्ट्रीय नहीं मानना इन समुदायों के प्रति अपमान ही कहा जायेगा।

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इस प्रकार कुल मिलाकर देखा-परखा जाए तो उपर्युक्त तथ्यों से गुजरते हुए निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि 1855 का संथाल हूल, 1857 के तथाकथित प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से दो-तीन साल पहले हुआ जन आंदोलन है, इसलिए संथाल हूल को प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम की संज्ञा मिलनी चाहिए। वैसे भी आज ज़रूरत है आदिवासी प्रतिवाद के एक सम्पूर्ण चित्र को प्रस्तुत करने की ताकि अतीत से लेकर आज तक प्रतिवाद के कारण, उसके बदलते स्वरूप एवं उसमें सम्पूर्ण समाज के योगदान के संबंध में हमें सही जानकारी मिल सके ओर यह चर्चा सही मायने में गणतांत्रिक बन सके।

अशोक सिंह वरिष्ठ कवि और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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