अब जहाँ देखो ये अजूबे इंसान, पानी को ही घेरकर मारने में लगे हैं!

अमन विश्वकर्मा

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पानी में घुसकर मछलियों को मारते तो कितनी दफा देखा था इंसान को।

अब जहाँ देखो ये अजूबे इंसान, पानी को ही घेरकर मारने में लगे हैं।।

नदी-अध्येता और जाने-माने लेखक-कवि राकेश कबीर की यह कविता आज के युग में नदियों और मनुष्य के बीच का जो ‘मतलबी रिश्ता’ बन गया है, उस पर सटिक बैठती है।

गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशनल ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा के क्रमिक तीसरे कार्यक्रम में ग्रामीणों से बातचीत और वरुणा नदी की स्थिति देख राकेशजी की यह कविता मेरे मन में आ गई। थोड़ा भूल गया था इसलिए दोबारा उनके संग्रह नदियाँ ही राह बताएँगी का सहारा लेना पड़ा। यात्रा तय दिन और समय पर शुरू हो गई। पिछले कार्यक्रम में सामाजिक कार्यक्रर्ता नंदलाल मास्टर के सुझाव पर अमल करते हुए रामजी भैया ने इस बार शुरुआत और समापन, दोनों का स्थान बदल दिया था। रात में देर से सोने के कारण शरीर पर आलस की छाया थी लेकिन ठीक छह बजे घर से निकल रहा था तभी अपर्णा मैम का फोन आया- ‘अमन, कहाँ पहुंचे हो?’

‘बस, मैम गाड़ी निकाल ही रहा हूँ।’

फोन कट करते ही रामजनमजी का फोन आ गया- ‘अमन भाई, कहाँ हैं?’

‘बस भैया एक मिनट में आपके पास पहुँच रहा हूँ।’

नदी का पानी आज भी कपड़ा धोने के लिए इस्तेमाल होता है

और पांडेयपुर चौराहा से उनको अपनी दुपहिया पर बैठाकर निकल पड़ा कार्यक्रम स्थल की ओर, लेकिन शिवपुर फाटक के पास ही रामजी भैया, अपर्णा मैम, सामाजिक कार्यकर्ता नंदलाल मास्टर, वल्लभाचार्यजी के साथ युवा लेखक दीपक शर्मा से मुलाकात और नमस्कारी हो गई। सभी लोग चाय की चुस्की मार चुके थे। मेरे और रामजनमजी के लिए युवा लेखक दीपकजी ने चाय की पेशकश की। चाय की सुड़ुक मारते ही शरीर तरोताजा हो गया। थोड़ी-बहुत बतकुच्चन के बाद सभी लोग भवानीपुर की ओर निकल चले। दो वर्ष पहले इस रास्ते पर आया था तो यहाँ ‘गड्ढे में सड़क’ जैसी स्थिति थी। रास्ता अब बन चुका है। मेरे एक सवाल के जवाब में रामजनमजी ने कहा- सब कॉरपोरेट का कमाल है। रामजी भैया के सुझाव पर एक चौराहे पर सभी लोगों ने अपने-अपने दुपहिए खड़े कर दिए। कुछ दूर चलने के बाद वल्लभाचार्यजी ने कहा- ‘ऐसा है, बैनर यहीं पर खोलकर हाथ में ले लिया जाए ताकि कार्यक्रम के बारे में ग्रामीणों को भी मालूम चले।’  समाज के उथल-पुथल के प्रति जागरुक रहने वाले लोग ऐसे कामों में सबसे आगे रहते हैं। हम सभी ऐसे ही लोग थे। तुरंत बैनर खोलकर हाथ में थाम लिया गया। रास्ते में जो भी दो-चार लोग मिलते एक बार रुककर पोस्टर पर लिखे शब्द को जरूर पढ़ते- नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा…।

नदी पर बना बांस का पुल

पक्के रास्ते धीरे-धीरे कच्चे और उबड़-खाबड़ होते जा रहे थे। कुछ ही समय में हम उस बाँस के पुल के पास पहुँच गए जिसे पहली यात्रा में नदी के उस पार से देखा था। पिछली बार की तरह ही लोग यहाँ नहान कर रहे थे। एक आदमी अपनी बड़ी-सी नाव पर अलकतरा लगा रहा था। वहाँ पहुँचे एक ग्रामीण ने उसकी फिरकी लेते हुए कहा- ‘घबरा मत, तू अब जेल जईबा।’ यहाँ नदी में नाव चलाने के लिए लाइसेंस बनवाना पड़ता है, शायद इसीलिए यह मजाक किया गया था। खैर, यहाँ नदी की स्थिति थोड़ी दुखदायी थी। पुल के नीचे गंदगी थी। जलकुंभी और नदी में तैर रहे कचरे के बीच दो-चार लोग नहा रहे थे। किनारे मनुष्य और जानवरों के शौच पड़े हुए थे जो स्वच्छता अभियान में दिनोंदिन बढ़ रहे बनारस जिले के ग्राफ को मुँह चिढ़ा रहे थे। पेड़ों को काटकर मनुष्यों ने कागज बना दिया, स्याही भी बना दी तो मनुष्य इस पर कुछ भी लिख सकता है। ग्राफ ऊपर कर सकता है और नीचे भी…।

मैंने एक रिपोर्ट पढ़ी थी कि दुनिया में नदियों के मामले में सबसे अधिक सम्पन्न भारत देश की तकरीबन 60 करोड़ से ज्यादा आबादी साफ पानी की समस्या से जूझ रही है। साथ ही देश के तीन चौथाई घरों में साफ पानी भी नहीं मिल पा रहा  है। वहीं, जल गुणवत्ता की बात की जाए तो हमारा देश 122 देशों में 120 वें पायदान पर है। इसका सबसे बड़ा कारण कारगर सरकारी नीति के अभाव में जल संचयन, संरक्षण और प्रबंधन में नाकामी है। मुझे लगता है कि शायद इसी का खामियाजा समूचा देश भुगत रहा है।

नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा में मिला ग्रामीणों का साथ

यहाँ सबसे पहले माऊ नामक एक ग्रामीण ने यात्रा में अपनी सहभागिता जताई। उन्होंने बताया कि तकरीबन 30 बरस पहले यह नदी इतनी स्वच्छ थी कि एक सिक्का भी अगर गिर जाए तो उसे आसानी से ढूँढा जा सकता था। उस समय अधिकतर लोग नदी में ही स्नान करते थे और इसी का पानी भी पीने के लिए घर ले जाते थे। तभी किनारे स्थित मकान से एक महिला ने कहा- ‘ई का हौत हौ भइया।’

ग्रामीण माऊ ने कहा- ‘नीचे अइबू तब न पता चली।’

गंदे पानी में ही स्नान करते ग्रामीण

कुछ बच्चे और ग्रामीण भी आ गए। फोटोबाजी और बातचीत के बाद ग्रामीणों ने ही सुझाव दिया कि आप लोग ऊपर के रास्ते जाइए, नीचे काफी गंदगी है। सभी लोग ऊपर चढ़ ही रहे थे कि लेखक संतोष कुमार का भी आगमन हो गया। उनसे पता चला कि श्यामजी भैया और गोकुल दलित दोनों जन साथ में आ रहे हैं। उनसे आगे मुलाकात हो जाएगी। ईंट बिछे रास्ते पर सभी लोग आगे बढ़ने लगे। आबादी वाले इस इलाके में ग्रामीण हम सभी को ही देख रहे थे और बुदबुदा रहे थे। कुछ लोगों ने जानने की भी इच्छा जताई कि यह क्या हो रहा है। हम सभी लोग एक-एक कर यात्रा का उद्देश्य बता रहे थे और वल्लभाचार्य ग्रामीणों को पम्फलेट बांट रहे थे जिसमें पर्यावरण सम्बंधित विशेष जानकारियां दी गई थीं।

गाँव के विशालकाय पेड़ के पास टीम

आगे चलने पर यहाँ एक मस्जिद थी और कुछ ही दूरी पर रामजानकी मंदिर। दोनों स्थान काफी शांत माहौल में थे और साफ-सुथरे भी। एक विषय पर बात होने लगी कि अच्छा है यहाँ सत्ता हावी नहीं हुई है वरना यहाँ भी मंदिर-मस्जिद और हिंदू-मुस्लिम जैसे मामले बना दिए जाते। इस विषय पर चर्चा हो ही रही थी कि नंदलाल मास्टर ने एक विशालकाय पेड़ की  ओर इशारा किया। सच में इतना बड़ा पेड़ मैंने तो आजतक नहीं देखा था। मैंने बताया कि कैंटोन्मेंट इलाके में एक ऐसा ही पेड़ है जिसे लोग कल्पवृक्ष कहते हैं। अब यह कितना सही है और कितना गलत, यह तो वे ही जानें जिन्होंने इसकी कल्पना की। हमारे साथ साइकिल पर सवार रवि नामक एक लड़का चल रहा था उसने बताया कि यह छोटे डीह बाबा का स्थान है और उस पार बड़े डीह बाबा हैं।

यहाँ से जब यात्रा आगे बढ़ी तो एक ग्रामीण ने रास्ता खराब होने की बात कही। और बोला- ‘नीचे से घूमकर जाना होगा। उधर कब्रिस्तान भी है।’

ग्रामीणों को नदी और पर्यावरण की जानकारी देते रामजी यादव

किनारे की गंदगी देख सभी लोगों का मन खींझ गया था लेकिन नदी यात्रा तो निकालनी ही थी। उस ग्रामीण की बात काटकर मैं आगे बढ़ा तो देखा एक जगह रास्ता थोड़ा ठीक था। कूदकर सभी लोग उस पार जा सकते थे और लोग इस पार आ गए। नदी और पर्यावरण के साथ पिछली यात्रा पर बातचीत करते हुए हमलोग आगे बढ़ रहे थे। यहाँ एक स्थान पर कुछ लोग मौजूद थे, पास पहुँचे तो गोकुल दलित और श्यामजी भैया मिल गए। गाँव और खेतों से होते हुए दोनों लोग यहाँ पहुँचे थे। यहाँ का इलाका काफी शांत था। एक-दो लोग खेतों में काम कर रहे थे। मैं रुककर नदी और यात्रा की फोटो उतारने लगा। यहाँ नदी का पानी काफी कम था, इतना कम कि एक कुत्ता बीच में आसानी से खड़ा था। वह उस पार से इस पार आ रहा था। रास्ते में हाथ में डंडे के सहारे खड़े एक 70 वर्षीय वृद्ध से मेरी मुलाकात हो गई। इससे पहले सभी लोगों की मुलाकात उनसे हो गई थी। नाम था- माता प्रसाद।

वे यहाँ लगभग 30 से 35 वर्षों से रह रहे थे। पूछने पर उन्होंने बताया कि ‘हमने के समय में पानी काफी साफ-सुथरा रहल। अब तक पखाना के बाद धोए जइसन भी पानी ना रह गएल। घरे सरकारी पखाना बन गयल हौ। वही में सब लोगन जा लन।’ आगे वह कहते हैं- ‘पहिल हम रोटी-अचार-दाल लेके आइ त यही किनरवे बइठ के खाईं आउर पानी ना लियावत रहली पिए बदे।’ ‘मूलत: कहाँ के रहने वाले हैं पूछने पर- ‘चौबेपुर क..’

हाथ में पम्फलेट लेकर रामजनमजी से बात करते हुए वल्लभाचार्यजी की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा-

‘ओन्हउ वहीं क हऊवन’

‘देखिए भइया, ये चाचा आपके ही गाँव के हैं।’

यह सुनकर वल्लभाचार्यजी के चेहरे पर मुस्कान बिखर गई।

मुस्कुराते हुए उन्होंने पूछा- ‘चौबेपुर में कहाँ क…’

और दोनों जन बातें करने लगे। दोनों लोगों को मिलाकर मैं आगे बढ़ गया।

थोड़ी दूर से मुझे और वृद्ध को बातचीत करते काफी देर से एक युवक देख रहा था। मैं उसके पास पहुँचा तो उसने जिज्ञासावश मुझसे पूछा- ‘भइया सड़क बनी का…’

नदी में पानी कम जलकुम्भी ज्यादा है

मुझे उसके चेहरे पर एक भय दिख रहा था। किसानों की ज़मीन जब जाती है तो उन्हें बड़ा दुख होता है। सरकारी रकम छोटी हो या बड़ी। जर और जमीन की कमी जल्दी कोई पूरी नहीं सकता।

युवक का नाम था गोविंद। मैंने उसे बताया- ‘नहीं, यह नदी यात्रा है। नदी और पर्यावरण को लेकर ग्रामीणों को जागरुक किया जा रहा है…। वरुणा नदी के बारे में आप क्या जानते हैं?’

मेरा प्रश्न सुनकर उसने भी अपनी बुद्धिजीविता दिखाते हुए बताया- ‘वरुणा-असि को मिलाकर वाराणसी नाम पड़ा है।’

‘अच्छा।’

‘नदी पहले की अपेक्षा अब कैसी है, मतलब सफाई के मामले में।’

‘नहीं सर, पहले से यह गंदी हो गई है। इस पार और उस पार दोनों ओर बड़े-बड़े नाले हैं, जहाँ से सीवर का पानी सीधा नदी में गिरता है।’

‘आसपास कारखाना या फैक्ट्री है।’

‘मुझे पता नहीं है। हाँ उस पार साड़ी और रेशमी धागे का काम होता है। वहाँ से रंग और धागे के कतरन नदी में ही फेंक दिए जाते हैं।’

‘और इस पार की क्या स्थिति है?’

‘इस पार यह फैक्ट्री बहुत कम है। उस पार के लोग अभी भी नदी किनारे ही लैट्रिन करने आते हैं।’

‘ठीक है गोविंद, मेरे लोग काफी आगे बढ़ गए है, मैं चलता हूँ।’

‘नमस्ते सर…।’

गोविंद से बातचीत के कारण मैं सभी लोगों से तकरीबन डेढ़-दो सौ मीटर पीछे हो गया था।

हाथ में झोला लिए जल्दी-जल्दी सभी लोगों के साथ पास पहुँचा। उस पार छह-सात लोग बैठे हुए थे। उनमें से एक लोग ने आवाज देकर पूछा- ‘ई क्या निकाल रहे हैं भैया?’  गोकुल दलित और नंदलाल मास्टर ने एक-एक कर यात्रा की जानकारी दी।

‘नदी यात्रा निकलत हौ। आवा तहू लोग।’

‘अरे भइया, नइया रहत त आ जाइत।’

कहीं-कहींफट गई हैं जमीन

रास्ते में कई जगह खेतों से नदी में जाने के लिए बारिश के पानी ने खुद अपना रास्ता बना लिया था। मिट्टी के बीच बड़ी-बड़ी लक़ीरें बनी हुई थीं। कुछ दिन पहले बारिश के कारण यह स्थित हो गई थी। एक-दो जगह पर औरतें कपड़े धो रहीं थीं। बीते दो बरस पहले आई बाढ़ के कारण खेतों में कटान हो गए थे। मिट्टी खिसकने के कारण पेड़ों की जड़ें तक दिखने लगी थीं। लेकिन पेड़ जस के तस खड़े थे और अपना काम यानी वातावरण को सुंदर बनाने के साथ पर्यावरण में ऑक्सीजन बढ़ा रहे थे। किनारे की कुछ जगहों पर बड़े-बड़े गड्ढे बन गए थे। बारिश के बाद जब इसमें पानी भर जाता होगा तो ये छोटे-छोटे तालाब का काम करते होंगे।

नदी का अस्तित्व मिटा रहा नाले से गिरता मलजल

यहाँ दो नाले दिखे, जिनसे काला पानी सीधे नदी में गिर रहा था। आसपास बदबू थी। जलकुम्भी ने पानी को घेर रखा था। मोटी-मोटी काई की परत जमी थी। टूटी चप्पलें, खाली बोतलें, गंदे कपड़े इधर-उधर बिखरे पड़े थे। आसपास के कुछ ग्रामीण यहाँ मिल गए। उन्हें भी नदी यात्रा की जानकारी हो गई। अधेड़ से ज्यादा उम्र के शंकर ने नदी की स्थिति पर कहा कि- ‘बाबू हम लोगन के समय में पानी इतना स्वच्छ था कि घर का खाना भी इसी से बन जात रहल। हम लोग यही किनारे खेला करते, नहाया करते। ए पार से ओ पार तैर के जाया करते रहे। अब तो पानी जानवर के पीने लायक भी नहीं है।’

मैंने बीच में उन्हें टोंकते हुए कहा- ‘सही कह रहे हैं। अभी एक कुत्ता नदी के बीच में जाकर पानी पी रहा था। उसे मालूम है साफ पानी बीच में होगा।’

‘पानी त भइया इतना साफ रहल की लोग यहाँ दारू पिए भी बैठ जात रहें।’

‘अच्छा ‘पैग’ भी लोग इसी पानी से बना लेते थे!’

इस बात पर लोग जोर से हँसने लगे। आज के समय में पियक्कड़ ‘पैग’ के लिए बीस रुपये लीटर पानी खरीदते हैं। ‘क्लास’ थोड़ा ऊपर हुआ तो 50 रुपये का सोडा।

यहीं एक अधेड़ पहलवान भी मौजूद थे। वे बोले- ‘हम त यहीं किनारे कसरत करी फिर नदिए में नहा के आराम करीं, ओकरे बाद घरे जाके खाना खात रहली।’

इन्हीं लोगों ने बताया- नदी के पानी से बनाते थे खाना

आगे बढ़ने पर एक महिला कुछ बकरियाँ चरा रही थी। महिला गौर से हमें देख रही थी लेकिन कुछ बोली नहीं। हम पिसौर पुल के पास पहुँचने वाले थे कि तभी श्यामजी भैया एक सज्जन जिनका नाम  रामलाल पटेल ‘गदहा’ था। रामजी भैया को देखते ही उन्होंने उन्हें गले लगा लिया और आँख में आँसू भरकर नदी की दुर्दशा बताने लगे -‘ई हमरे माई क का हाल हौ? देखा।’ रामजी भैया ने उनका हाल-चाल पूछकर माहौल को बदल दिया और इधर-उधर की बातें होने लगी। उन्होंने रामजी भैया से बैनर लेकर उसका एक कोना पकड़ लिया और आगे बढ़ने लगे। श्यामजी भैया एक स्थान पर इशारा कर सभी लोगों को बताने लगे ‘बस वहीं पर बइठउकी होई।’

एक पतली ढलान से चढ़कर हम एक-एक कर सड़क पर यानी पिसौर पुल के ठीक बगल में आ गए। स्थान था- शिवआश्रम।
धूप सिर पर तो नहीं थी लेकिन चुभ रही थी। उमस और गर्मी से सभी लोग बेहाल थे। आश्रम के सामने एक हैंडपंप पर कुछ लोग हाथ-पैर धोने लगे दूसरी तरफ रामजी भैया, अपर्णा मैम, नंदलाल मास्टर, वल्लभाचार्यजी, संतोषजी बैठने की व्यवस्था ढूँढने लगे। आश्रम पर दो वृद्धजनों ने सभी लोगों का स्वागत किया।

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नंदलालजी और श्यामजी भैया ने बैनर को आश्रम के एक स्थान पर टाँग दिया जिसे आते-जाते लोग देख ज़रूर रहे थे। धीरे-धीरे आसपास के ग्रामीण भी इकट्ठा होने लगे। सड़क के उस पर एक गुमटी पर मौजूद लोग इस पर स्थित आश्रम पर आ गए और पूछने लगे कि ‘इ का हौ रहा है सर।’ भोजपुरी पर अंग्रेजी जब धावा बोलती है तो ऐसे ही शब्द निकलते हैं। हम लोगों को देखकर ग्रामीण यह दिखाना चाह रहे थे कि हम भी ‘शिक्षित’ हैं। मेरा मानना है कि एक समय जरूर रहा होगा जब समझदारी शिक्षा से भी बड़ी थी जिसे गाँव में आज भी देखा जा सकता है। खैर, गोष्ठी की शुरुआत होने से पहले मैंने ‘आस्था’ वाला दृश्य देखा- एक ट्रैक्टर वाला आया। उसकी ट्रॉली ईंटों से भरी थी। ट्रॉली पर बैठे एक बच्चे ने गिनकर छह ईंटें आश्रम के बगल में फेंक दिया।

अमन विश्वकर्मा पत्रकार हैं, वाराणसी में रहते हैं।

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