उत्तर प्रदेश के निकाय चुनाव में भाजपा ने मारी बाजी सभी सीटों पर मेयर बनाने में कामयाब

कुमार विजय

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शहरी क्षेत्रों में भाजपा का दबदबा बरकरार, ग्रामीण क्षेत्रों में भी धीमी रही सायकिल की चाल

मरणासन्न हाथी के लपेटे में कई उम्मीदवारों की उम्मीद हुई धराशायी, कुछ भी नहीं पकड़ सका पंजा पर कई सीटों पर दोनों बने  भाजपा के मददगार 

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भाजपा ने उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में अपनी विरोधी पार्टियों को जोरदार पटखनी देकर साबित कर दिया है कि अभी उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ का जादू बरकरार है। अतीक अहमद की हत्या और उसके बेटे के एनकाउंटर की वजह से भी हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण जहां भाजपा की तरफ बढ़ा, वहीं मुसलमानों  की नाराजगी सपा को भारी पड़ी। 2022 के विधान सभा में जहां 80 फीसदी मुसलमान वोटर सपा के साथ था, वहीं निकाय चुनाव में यह वोट सपा, बसपा और कांग्रेस में विभाजित नजर आया। अखिलेश यादव ने चुनाव से पहले जिस ताकत के साथ पिछड़ी और दलित जातियों को अपने पाले में करने की कोशिश की थी वह भी चुनाव के दौरान उनका ना तो एजेंडा ही बन सकी ना ही वह वोट में बदल सकी।  जिसकी वजह से अखिलेश यादव एक बार फिर उत्तर प्रदेश के चुनाव में बुरी तरह से फेल हुए।

जहां भाजपा ने निकाय चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंकी, वहीं अखिलेश यादव और सपा ने अपनी तलवार म्यान से बाहर ही नहीं निकाली।  कई सीटों पर आखरी समय में आनन-फानन में  उम्मीदवार बदलने से भी सपा को नुकसान उठाना पड़ा जबकि कुछ सीटों पर भाजपा के बागी उम्मीदवारों की वजह से सपा का फायदा भी हुआ। बसपा ने चुनावी मैदान में हाथी उतारा जरूर था पर बिना सवार के हाथी सिर्फ घूमता रहा और दूसरों की फसल को नुकसान पँहुचाता रहा। मायावती एक बार भी किसी प्रत्याशी के समर्थन में बाहर नहीं निकली जिससे उनका कोर वोटर भी भ्रमित रहा। बावजूद इसके बड़ी मात्र में मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतारकर मायावती ने मुसलमान वोटरों को सपा से दूर करने की दिशा में सकारात्मक सफलता हासिल की। कांग्रेस ने भी बेमन से चुनाव लड़ा और पूरे चुनाव कैंपेन में कांग्रेस का भी कोई बड़ा नेता नहीं दिखाई दिया।

भाजपा जहां खुद को ट्रेंड में बनाए रखने के लिए पुरजोर तरीके से शोर मचाती है, वहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के माध्यम से अपने समर्थकों से हर संभव तरीके से कनेक्ट रहती है और मनोवैज्ञानिक तरीके से बढ़त बनाने में कामयाब होती है। किसी अन्य पार्टी के पास इस तरह का कोई ढांचा नहीं है जिसकी वजह से वह सिर्फ अति उत्साही कार्यकर्त्ताओं की भीड़ के साथ खुश हो जाति हैं जबकि जमीनी स्तर पर इन अति उत्साही कार्यकर्त्ताओं के पास कोई जनाधार ही नहीं होता है।

भाजपा 2014 से जिस सक्रियता के साथ चुनाव में उतर रही है, वैसा जज़्बा फिलहाल किसी अन्य पार्टी के पास नहीं दिख रहा है। वैचारिक धरातल पर अपना कोर वोटर इकट्ठा रखने का प्रयास भी किसी अन्य पार्टी के पास नहीं दिख रहा है। जबकि भाजपा विकास के मुद्दे पर सपा और बसपा से पीछे रहने के बावजूद भी विकास का नगाड़ा जमकर बजाती रही है और उत्तर प्रदेश की सियासी कमान तक किसी पार्टी को नहीं पँहुचने दे रही है। भाजपा जहां खुद को ट्रेंड में बनाए रखने के लिए पुरजोर तरीके से शोर मचाती है, वहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के माध्यम से अपने समर्थकों से हर संभव तरीके से कनेक्ट रहती है और मनोवैज्ञानिक तरीके से बढ़त बनाने में कामयाब होती है। किसी अन्य पार्टी के पास इस तरह का कोई ढांचा नहीं है जिसकी वजह से वह सिर्फ अति उत्साही कार्यकर्त्ताओं की भीड़ के साथ खुश हो जाति हैं जबकि जमीनी स्तर पर इन अति उत्साही कार्यकर्त्ताओं के पास कोई जनाधार ही नहीं होता है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि समाजवादी पार्टी के तीन राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव, स्वामी प्रसाद मौर्य और इंद्रजीत सरोज जैसे बड़े सामाजिक जनाधार के नेता भी नेपथ्य से बाहर नहीं निकल पाते । अभी की स्थिति को यदि 2024 का ट्रायल माना जाय तो निःसंदेह भाजपा अन्य पार्टियों से बहुत आगे खड़ी दिखती है।

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इस निकाय चुनाव ने आम आदमी पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश का प्रवेश द्वार खोल दिया है। आप पार्टी के प्रदेश प्रभारी जिस तरह से सक्रिय विपक्ष की भूमिका निभाते हुए लगातार भाजपा को चुनौती देते रहे हैं हैं उससे यह कहना गलत नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश की जमीन बहुत दिनों तक आप को अपनी मिट्टी में अंकुरित नहीं होने देगी।

कुमार विजय गाँव के लोग डॉट कॉम के मुख्य संवाददाता हैं।

3 Comments
  1. khushbu kumari says

    good

  2. khushbu kumari says

    good

  3. Ebonie Mehle says

    Very interesting details you have noted, regards for putting up. “The thing always happens that you really believe in and the belief in a thing makes it happen.” by Frank Lloyd Wright.

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