असुरक्षित घर और बेटियों की चुनौती  (डायरी 7 जुलाई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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बदलाव प्रकृति का नियम है और इस लिहाज से भी सोचें तो हम बदलावों को रोक नहीं सकते। समाज में भी तमाम तरह के बदलाव हो रहे हैं। समाज के कुछ हिस्सों में बदलाव तो इतनी तेजी से हो रहे हैं कि हम केवल कल्पना कर सकते हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है, जो बहुत स्याह भी है। वैसे भी हर बदलाव सकारात्मक हो, यह आवश्यक नहीं है। इन सबके बीच एक सत्य यह भी कि महिलाएं आज भी असुरक्षित हैं।
दरअसल, कल पटना से एक खबर आयी कि दो किशोरियों के साथ उनके घर में ही गैंगरेप किया गया। खबर चौंकानेवाली थी। वैसे यह खबर अरवल जिला के नगर थाने के इलाके की है, लेकिन आरोपियों का संबंध पटना के फुलवारीशरीफ से है। एक पत्रकार मित्र ने यह खबर दी। उनके मुताबिक, करीबी रिश्तेदार फुफेरे भाई और संभवत: उसके दो मित्र परसों रात में पीड़िता के घर में रुके। किशोरियों के माता-पिता शादी समारोह में अपने एक परिवार में गये हुए थे। फुफेरे भाई और उसके दोस्तों ने दोनों किशोरियों के साथ दुष्कर्म को अंजाम दिया और वीडियो भी बनाया।
यह महज एक घटना है। इस मामले में खास बात यह कि दोनों किशोरियों ने अपनी आपबीती अपने माता-पिता को सुनायी और माता-पिता ने साहस कर मामले की प्राथमिकी दर्ज कराई। यह बेहद महत्वपूर्ण है।

दरअसल, घर केवल एक संरचना नहीं होता कि उसमें दीवारें हों, छत हो, खिड़की और दरवाजे हों। घर पनाहगार होता है जो उसमें रहनेवालाें को यह आश्वस्त करता है कि वह सुरक्षित है। लेकिन यह जिम्मेदारी परिवार की होती है कि वह इसे सुनिश्चित करे।

कई बार ऐसी घटनाएं होती हैं तो लोग प्राथमिकी दर्ज कराने से इंकार कर देते हैं। तब उन्हें लगता है कि बात फैलेगी तो घर की इज्जत चली जाएगी। और बात जब करीबी रिश्तेदारों की हो तो लोगों को इज्जत और भी अधिक प्यारी लगने लगती है। जबकि लोग पीड़िता के बारे में सोचते भी नहीं कि उसके साथ किस तरह का अमानवीय व्यवहार किया गया और उसमें उसकी कोई गलती नहीं है।
दरअसल, घर केवल एक संरचना नहीं होता कि उसमें दीवारें हों, छत हो, खिड़की और दरवाजे हों। घर पनाहगार होता है जो उसमें रहनेवालाें को यह आश्वस्त करता है कि वह सुरक्षित है। लेकिन यह जिम्मेदारी परिवार की होती है कि वह इसे सुनिश्चित करे।
कई बार लोग पीड़िता पर सवाल उठाते हैं। सबसे पहले तो थाने के अधिकारी ही यह सवाल उठाते हैं और बड़ी बेहयाई से उठाते हैं। करीब 8 साल पहले की घटना है। पटना के परसा थाने का एक मामला मेरी संज्ञान में आया था। तब जिस अखबार का मैं संपादक था, उसके क्राइम रिपोर्टर ने यह खबर दी थी कि एक किशोरी का बलात्कार हुआ और परसा थाने की पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया। किशोरी दलित परिवार की थी। चूंकि यह इलाका मेरे घर के आसपास का है और मेरे पास समय था तो मैं पीड़ित परिवार से मिलने चला गया। वह परिवार नहर पर दो कमरे की झोपड़ी में रहता था।
दरअसल, बिहार में बड़ी संख्या में भूमिहीन नहर किनारे सरकारी जमीन पर झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं। हालांकि सभी के पास पहचान के लिए आधार और वोटर कार्ड जरूर होता है। नहीं होता है तो केवल बासगीत का पर्चा। वे अवैध तरीके से ही रहते हैं। तो हुआ यह कि मैं जब उस परिवार से मिलने पहुंचा तो पहले तो पीड़िता के पिता ने कुछ भी बताने से इंकार किया। लेकिन परिचय देने पर उसने बताया कि परसा थाने के दारोगा ने बलात्कार का मामला दर्ज नहीं किया और उसकी बेटी को रंडी कहकर गाली दी। यह बताते हुए वह रोने लगा।

मुझे लगता है कि महिलाओं की राह में यह सब अवरोधक हैं, जो पुरुष प्रधान समाज ने लगा रखे हैं। पुरुष प्रधान समाज हर समय प्रयास करता रहता है कि वह महिलाओं को यह बताता रहे कि वह बेहद कमजोर हैं और पुरुष जो चाहे वह कर सकता है।

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खैर, परसा थाना के प्रभारी से मैंने बात की तब जाकर मामला दर्ज हुआ। लेकिन इस बीच हुआ यह कि पीड़िता की मेडिकल जांच में देरी हो गई। बाद में यह जानकारी मिली कि जिस दारोगा ने मामला दर्ज करने से इंकार किया था, उसने आरोपियों के सांठ-गांठ कर ली थी और उन्हें आश्वस्त कर दिया था कि इस मामले में कुछ नहीं होगा। इसी इरादे से उसने मामला दर्ज नहीं किया और दो दिनों के बाद जब मामला दर्ज हुआ और मेडिकल जांच करायी गयी तो बलात्कार की चिकित्सकीय पुष्टि नहीं हो सकी।
बहरहाल, मुझे लगता है कि महिलाओं की राह में यह सब अवरोधक हैं, जो पुरुष प्रधान समाज ने लगा रखे हैं। पुरुष प्रधान समाज हर समय प्रयास करता रहता है कि वह महिलाओं को यह बताता रहे कि वह बेहद कमजोर हैं और पुरुष जो चाहे वह कर सकता है।
लेकिन मैं आशावादी हूं और यह मानता हूं कि महिलाएं इन वर्जनाओं को स्वयं तोड़ेंगीं। हां, अगर परिजन उनका साहस बढ़ाएं तो यह प्रक्रिया तेज होगी और इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे। कल ही मेरी प्रेमिका ने एक शब्द दिया– जूते। यह एक अनोखा शब्द था।
मेरे देश की बेटियों,
जूते पहनो, जूतियां पहनो
लेकिन नंगे पांव मत चलो।
मैं चाहता हूं तुम सब
पहाड़ पर चढ़ो,
मैदानों में रेस लगाओ,
और वक्त की पीठ पर चढ़
खूब सवारी करो।
मेरे देश की बेटियों,
जूते पहनो, जूतियां पहनो
लेकिन नंगे पांव मत चलो।
अब मनु का विधान नहीं कि
औरतें जूते नहीं पहन सकतीं
और दहलीज के अंदर रहें नंगे पैर
तुम बस हौसला करो
और आसमान की बुलंदियां छू लो।
हां, मेरे देश की बेटियों,
जूते पहनो, जूतियां पहनो
लेकिन नंगे पांव मत चलो।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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