प्रधानमंत्री हैदराबाद में एक तीर से कई निशाने लगा आये

स्वदेश कुमार सिन्हा

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अट्ठारह बरस बाद भाजपा ने अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हैदराबाद में की, जिसमें भाग लेने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहाँ पहुँचे। हैदराबाद में यह मीटिंग वास्तव में भाजपा द्वारा एक तीर से कई निशाने लगाने जैसी प्रतीत होती है। तेलंगाना राज्य में चुनाव आसन्न है, भाजपा तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव की कथित असफलताओं को भुनाकर इस राज्य में भी अपनी चुनाव वैतरणी को पार करना चाहती है। वैसे भी सत्ताधारी दल के खिलाफ़ कुछ जनाक्रोश स्वाभाविक होता ही है, जिसका फ़ायदा सभी विपक्षी दल उठाने की कोशिश करते हैं। प्रधानमंत्री की इस यात्रा के घटनाक्रम में एक महत्वपूर्ण बात यह हुई कि मुख्यमंत्री ‘केसीआर’ प्रधानमंत्री की अगुवाई और स्वागत के लिए एयरपोर्ट नहीं पहुँचे तथा उसी दिन राष्ट्रपति चुनाव के विपक्षी दलों के संयुक्त उम्मीदवार ‘यशवंत सिन्हा’ की अगुवाई के लिए मुख्यमंत्री खुद एयरपोर्ट पर पहुँचे और उनके साथ हैदराबाद में एक बड़ी रैली भी की। क्या इस घटना के कुछ दूरगामी परिणाम होंगे या किसको लाभ-हानि होगी ? यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा है।

भाजपा नेता इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन बता रहे हैं, इस पर भाजपा ने केसीआर के खिलाफ़ नाराज़गी ज़ाहिर की। भाजपा नेता और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से शनिवार को प्रेस कांफ्रेंस के दौरान इस प्रकरण से जुड़ा एक सवाल किया गया। जवाब में स्मृति ईरानी ने कहा, ‘प्रधानमंत्रीजी ने जब आठ साल पहले प्रधानसेवक के पद के दायित्व को स्वीकार किया, तब से लेकर अब तक किसी भी पार्टी के नेता क्यों न हों, प्रधानमंत्रीजी ख़ुद बड़े आदर-सम्मान के साथ उनसे मिलते हैं। आज यहाँ पर जिस दुर्भाग्यपूर्ण व्यवहार का वर्णन किया गया है, वो न सिर्फ संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन है बल्कि भारत के संस्कार का भी उल्लंघन है।” मुझे यह प्रतीत होता है कि भाजपा और केसीआर, दोनों ही इन सभी घटनाओं से चुनावी फायदा उठाना चाहते हैं, यद्यपि भाजपा ने अभी-भी दक्षिण भारत में उसका हिन्दू कार्ड पूरी तरह पिट जाने के बावजूद  उसका त्याग नहीं लिया है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को कार्यकारिणी की बैठक में भाग लेने के लिए हैदराबाद पहुँचकर सबसे पहले उस विवादास्पद लक्ष्मी मंदिर में पूजन किया, जो आज़ादी के तुरंत बाद ही चारमीनार परिसर के अंदर बना दिया गया था और इसी जगह के नाम पर भाजपा हैदराबाद का नाम बदलने की माँग करती रहती है।

उत्तर ‌भारत में लगता है फिलहाल इस कद का कोई नेता नहीं बचा है, जो इन नेताओं के क्लब का सदस्य बन सके। उत्तर प्रदेश में केवल अखिलेश यादव ही एक बड़े कद के नेताशेष बचे हैं, लेकिन लगातार दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद वे लगभग प्रभावहीन से हो गए हैं। अब विपक्षी पार्टियों के दल की अगुवाई कौन करेगा? यह अभी भी भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है।

मुझे लगता है कि विकास की तमाम लफ्फाजियों के बावजूद हिन्दू कार्ड आज भी उसका सहारा बना हुआ है। अलग तेलंगाना राज्य बन जाने के कारण भाजपा को अब यह लगने लगा है कि कर्नाटक में मिली आधी-अधूरी विजय के बाद वह इस राज्य में भी अपनी विजय का परचम लहरा सकती है, परन्तु ‌उसे यह अच्छी तरह से मालूम है कि दक्षिण भारत में उसकी राह उत्तर भारत की तरह आसान नहीं है। दक्षिण भारत ने उसके अश्वमेध के घोड़े को रोक दिया है। भाजपा सम्पूर्ण भारत में फिलहाल अपना भगवा ध्वज फहराने से वंचित हो गई, क्योंकि दक्षिण भारत अभी भी उसके गले की फांस बना हुआ है। यह सम्पूर्ण इलाका सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से उत्तर ‌भारत से बिलकुल भिन्न है। वहाँ के लोगों को हमेशा यह महसूस होता है कि उत्तर भारतीय उनकी अलग भाषा, अस्मिता और संस्कृति का सम्मान नहीं करते, इसको लेकर वहाँ कई बड़े आंदोलन भी हुए। इसी जातीय अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान के नाम पर फ़िल्मों से राजनीति में आए एनटी रामाराव ने आन्ध्र प्रदेश में अपनी अलग तेलगूदेशम पार्टी बनाकर आज़ादी के बाद आन्ध्र प्रदेश में लगातार काबिज़ कांग्रेस को हमेशा के लिए उखाड़ फेंका था। उनकी इस विजय के साथ ही सम्पूर्ण दक्षिण भारत में राष्ट्रीय पार्टियों का वर्चस्व बिलकुल समाप्त हो गया तथा इस शून्य को क्षेत्रीय पार्टियों ने भर दिया।

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केसीआर भी एनटी रामाराव की तरह कम महत्वाकांक्षी नहीं हैं। वास्तव में बंगाल तथा दक्षिण भारत में इन क्षेत्रीय पार्टियों द्वारा भाजपा का विजय रथ रोक देने के कारण इन क्षेत्रीय क्षत्रपों का महत्व एकाएक बहुत बढ़ गया। कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी के स्वरूप से एक क्षेत्रीय दल में बदल गई। इन विपक्षी दलों को यह भलीभांँति ज्ञात हो गया है कि अब भाजपा का मुकाबला केवल संयुक्त रूप से ही किया जा सकता है, लेकिन इन नेताओं में नेतृत्व को लेकर मतभेद यदा-कदा सुनाई पड़ते हैं। बंगाल में ममता बनर्जी, तमिलनाडु में के. स्टालिन और तेलंगाना में केसीआर अपने-अपने राज्यों में बड़े कद के नेता हैं तथा इन राज्यों में भी जनता में अपार क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाएँ हैं। उत्तर ‌भारत में लगता है फिलहाल इस कद का कोई नेता नहीं बचा है, जो इन नेताओं के क्लब का सदस्य बन सके। उत्तर प्रदेश में केवल अखिलेश यादव ही एक बड़े कद के नेता शेष बचे हैं, लेकिन लगातार दो विधानसभा चुनाव हारने के बाद वे लगभग प्रभावहीन से हो गए हैं। अब विपक्षी पार्टियों के दल की अगुवाई कौन करेगा? यह अभी भी भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है।

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मैं पहले ही लिख चुका हूँ कि दक्षिण भारतीय समाज अपनी भिन्न सांस्कृतिक पहचान; जिसमें खानपान, भाषा एवं रीति-रिवाज सभी हैं, उसको लेकर बहुत सचेत रहता है तथा लगातार वह यह महसूस करता है कि उत्तर भारत उन पर सांस्कृतिक वर्चस्व बनाना चाहता है, यही कारण है कि वे लोग हिन्दी भाषा को कथित रूप से थोपने को लेकर हमेशा सशंकित रहते हैं। वहाँ के राजनेता भी अपने राजनीतिक लाभ के लिए लगातार इस प्रवृत्ति को हवा देते रहते हैं। वहाँ के लोगों की शंकाओं में कुछ सच्चाई भी है। करीब-करीब एक हजार साल से दिल्ली लगातार सत्ता का मुख्य केंद्र बना हुआ है। उत्तर भारतीय अपने तमाम पिछड़ेपन के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को ही सारे ही देश की पहचान मानने की भूल करते रहते हैं। दक्षिण भारत की जीडीपी तथा प्रति व्यक्ति आय उत्तर ‌भारत से काफी अधिक है। मानव विकास दर में भी वह काफी आगे है, यही कारण है कि ये राज्य अपने नागरिकों को बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भारी मात्रा में सब्सिडी दे सकते हैं, जैसे गरीब स्त्री-पुरुषों के लिए मुफ्त भोजन व कपड़े, बेसहारा लोगों के लिए मुफ्त मकान और बिना भेदभाव के सभी छात्राओं को इण्टर पास करने के उपरांत मुफ्त स्कूटी और लैपटॉप। इन सब कल्याणकारी योजनाओं ने क्षेत्रीय पार्टियों को अपने-अपने राज्यों में लगभग अजेय बना दिया है। यही चीज़ें हम दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राजनीति में भी देखते हैं, जिन्होंने मुफ्त बिजली-पानी के साथ-साथ छात्रों को बेहतर शिक्षा प्रदान करके आम आदमी पार्टी को दिल्ली में बिलकुल अजेय बना दिया है। भाजपा के लिए इस राह में मुश्किलें इसलिए भी है कि उसके द्वारा शासित किसी एक राज्य में सब्सिडी देने पर अन्य राज्य भी इसकी माँग करने लगेंगे, जिससे उसके कार्पोरेट मित्र नाराज़ भी हो सकते हैं, परन्तु अब भाजपा यह अच्छी तरह से महसूस हो चुकी है कि धर्म की राजनीति उसे लम्बे समय तक सत्ता में स्थायित्व नहीं प्रदान कर सकती। उसे जनता के मूलभूत मुद्दों पर वापस लौटना ही पड़ेगा। उत्तर प्रदेश के चुनाव में मिली भारी सफलता के पीछे गरीब जनता को मुफ्त अनाज, घर और गैस कनेक्शन देने की रणनीति ही काम आई। धर्म का मुद्दा जिसमें राम मंदिर निर्माण की घटना महत्वपूर्ण तो थी पर यह चुनाव में कोई खास भूमिका नहीं निभा पाई।

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अब हम भाजपा कार्यकारिणी में पास किए गए आर्थिक प्रस्ताव पर जारी उस दस्तावेज पर आते हैं, जिसमें उसकी आर्थिक नीतियों में बदलाव की गूंज साफ सुनाई पड़ती है, उसमें कहा गया है कि, ‘कोविड काल और फिर यूक्रेन युद्ध के कारण अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक दबावों के बावजूद देश की आर्थिक विकास दर विश्व में सबसे ऊँची होने तथा देश के अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त भोजन देकर बड़ी आबादी को संकट से बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की भाजपा कार्यकारिणी ने आज भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि मोदी की दूरदृष्टि एवं अद्भुत नेतृत्व क्षमता से भारतीय अर्थव्यवस्था एक वैश्विक माॅडल बन चुकी है।’ भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शनिवार को पारित आर्थिक और गरीब कल्याण संकल्प प्रस्ताव में यह बात कही गई है। इसी अधिवेशन में केन्द्रीय शिक्षामंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने खबरनवीसों को बताया कि देश में गरीबों की चिंता भाजपा सरकार की प्राथमिकता रही है। हर एक कदम, हर एक फैसला देश के गरीबों को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने किया है। खबरनवीसों के सवालों के जवाब में उन्होंने कहा कि कार्यकारिणी ने केन्द्र सरकार की नौकरियों में दस लाख लोगों की भर्ती खोले जाने तथा अग्निपथ योजना की भी भूरि-भूरि प्रशंसा की।

मुझे कार्यकारिणी के प्रस्ताव में थोड़ी अतिशयोक्ति लगती है। इसमें हिन्दुत्व का मुद्दा कहीं नहीं है तथा भाजपा की हिन्दुत्व ‌के मुद्दों के साथ-साथ आर्थिक नीतियों में नए बदलाव की ओर बढ़ने के स्पष्ट संकेत मिलते हैं। क्या इसने तेलंगाना विधानसभा चुनाव में राज्य में सत्तारूढ़ टीआरएस और केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के बीच होने जा रहे मुकाबले को दिलचस्प नहीं बना दिया है? इस सवाल का जवाब तो अब भविष्य में ही मिल सकता है।

 

स्वदेश कुमार सिन्हा स्वतंत्र लेखक हैं।

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