Saturday, March 2, 2024
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‘एक देश-एक चुनाव’ का प्रस्ताव लोकतंत्र की हत्या तो नहीं?

बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुघ ने लिखा है कि ‘भारत में हर साल कोई न कोई चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है। विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समय पर विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव होते रहते हैं। इनमें लगने वाली आचार संहिता के चलते तकरीबन छह माह विकास कार्य ठप पड़ जाता है। पिछले दिनों […]

बीजेपी के राष्ट्रीय महामंत्री तरुण चुघ ने लिखा है कि ‘भारत में हर साल कोई न कोई चुनावी प्रक्रिया चलती रहती है। विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समय पर विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव होते रहते हैं। इनमें लगने वाली आचार संहिता के चलते तकरीबन छह माह विकास कार्य ठप पड़ जाता है। पिछले दिनों संविधान दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन में एक राष्ट्र-एक चुनाव की व्यवस्था और एकल मतदाता सूची लागू करने की बात कही थी।’

‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ का सिस्टम भारतीय चुनाव प्रक्रिया को नया स्वरूप दे सकता है। इसके जरिए लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने की संकल्पना है। वैसे भी आजादी के बाद वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ हो चुके हैं। वर्ष 1967 के बाद कई बार लोकसभा और विधानसभाएं अलग-अलग समय पर भंग होती रहीं, जिस कारण यह क्रम टूट गया। अब सवाल यह उठता है कि तरुण चुघ को ऐसा लगता है कि भविष्य में पहले जैसी अवस्था उतपन्न नहीं होगी। जहाँ तक  लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अलग-अलग होने से खर्च बढ़ने की बात है, तो क्या सरकारें अपने सांसदों/ विधायकों पर होने वाले खर्चों में कटौती का रुख नहीं कर सकतीं…। विगत के दृष्टिगत, यह एक दिवास्वप्न ही है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ की व्यवस्था से बार-बार चुनावों में खर्च होने वाला धन बचेगा, इसका उपयोग ऐसे कार्यों में हो पाएगा, जिससे देश के लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा।

प्रधानमंत्री का यह पहला प्रस्ताव नहीं है, 2014 में सत्ता में आने के बाद व अपनी सरकार के दो साल पूरे होते ही, मोदीजी ने अपनी जिस मुहिम को तेज़ करने का कवायद की थी, वह है लोकसभा, विधानसभा, नगर निकायों और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराना। इस संबंध में मोदीजी का यह तर्क ज़रा भी यक़ीन करने लायक नहीं है कि वे चाहते हैं कि राजनीतिज्ञों को कभी कहीं-कभी कहीं होने वाले चुनावों की उठापटक में ज़्यादा वक़्त देने के बजाय सामाजिक कार्यों पर ध्यान देने के लिए समय मिलेगा और राजनीतिक संस्थानों के चुनाव अलग-अलग कराने पर होने वाले सरकारी खर्च में हज़ारों करोड़ रुपये की बचत भी होगी। सिद्धांततः मोदी की इन दोनों दलीलों से पवित्रता की ख़ुशबू आती है। लेकिन मोदी अगर इतने ही सतयुगी होते तो फिर बात ही क्या थी? इसलिए उनके ये तर्क मानने को मन नहीं करता।

[bs-quote quote=”एक देश-एक चुनाव’ की व्यवस्था देश में अधिनायकवाद या यूँ कहें कि हिटलरशाही को ही जन्म देगी। देश में चौतरफा अराजकता का माहौल होगा, जो आज भी है। सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का आचरण लोकतांत्रिक न होकर पूरी तरह अलोकतांत्रिक हो जाएगा। यदि ’एक देश-एक चुनाव’ की व्यवस्था देश में लागू हो जाती है तो क्या लोकतंत्र की असमय हत्या नहीं हो जाएगी?” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

असल में मोदीजी को चिंता हो रही है कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में उनकी काठ की हाँडी का क्या होगा? कहावत है कि काठ की हाँडी एक बार ही चूल्हें पर चढ़ पाती है। तो मोदीजी की चिंता जायज ही है। इसलिए गुजरात से दिल्ली की छलांग लगाने की तैयारी के दौर में ही उन्होंने दिमाग़ बना लिया था कि दूसरी बार सिंहासन कब्ज़ाने के लिए उन्हें देश भर में सारे चुनाव एक साथ करवाने का दांव खेलना होगा। इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा के पिछले चुनाव के लिए ज़ारी अपने घोषणा पत्र में चुपके से यह लिख दिया था कि सरकार में आने के बाद वह ‘लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का तरीक़ा निकालेगी।’

बीजेपी की सरकार बनने के बाद मोदीजी ने ख़ामोशी से अन्दरखाने अपना यह काम ज़ारी रखा। आरएसएस ने कस्बों और गांवों तक अपनी शाखाओं का तेज़ी से न केवल विस्तार करना शुरू किया अपितु किसी न किसी बहाने समाज में अराजकता फैलाने का काम शुरु कर दिया। मोदी ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की एक बैठक में सभी चुनाव एक साथ कराने की अपनी योजना को पूरी तरह से समझाया और फिर सभी राजनीतिक दलों की एक बैठक में भी इस पर ज़ोर दिया कि बड़े-छोटे सभी चुनावों का एक साथ होना क्यों ज़रूरी है।

असल मे तमाम नुस्खे आजमाने के बाद भी बिहार और कई अन्य राज्यों के विधानसभाओं  के चुनावों में मात खाने के तुरंत बाद  दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने ‘एक देश-एक चुनाव’ के मद्दे की जोर-शोर से वकालत करते हुए यह एक ठोस क़दम उठाया। और एक संसदीय समिति गठित की और लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की संभावनाओं के बारे में अपनी रिपोर्ट देने को कहा। संसद में कार्मिक, जन-शिक़ायतें और क़ानून-न्याय मंत्रालय की स्थायी समिति ने जो रपट पेश की वह कहती है कि ‘बार-बार होने वाले चुनावों की परेशानियों से लोगों और सरकारी मशीनरी को राहत दिलाने का समाधान खोजा जाएगा।’ रपट में यह भी कहा गया कि ‘अगर भारत को एक मज़बूत लोकतांत्रिक देश के नाते विकास की दौड़ में दुनिया के अन्य देशों से मुक़ाबला करना है तो देश को आए दिन होने वाले चुनावों से निज़ात पानी ही होगी।’

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तरुण चुघ के लेख में तीन फ़ायदों पर ज़ोर दिया गया। पहला- इससे बार-बार चुनाव कराने पर अभी खर्च होने वाले सरकारी धन में काफी कमी आएगी; दूसरा- चुनावों के समय लगने वाली आचार-संहिता की वज़ह से रुक जाने वाले कामों से होने वाला नुक़सान कम हो जाएगा; तीसरा- सरकारी अमले के चुनाव के काम में लग जाने की वज़ह से सार्वजनिक सेवा के बाक़ी ज़रूरी कामों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा। समिति के मतानुसार यदि देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होंगे तो इस  परेशानियों से निजात मिल सकती है। रपट में विस्तार से यह भी बताया गया है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अंततः एक साथ कराने की स्थिति कैसे लाई जाए और इस बीच किस तरह विधानसभाओं के कार्यकाल को समायोजित किया जाए।

इस प्रस्ताव के पीछे की सत्ताशीन राजनीतिक दल की मंशा को सियासी अखाड़े का कोई भी खिलाड़ी बड़ी सहजता से भाँप सकता है। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि यदि केंद्र और राज्यों की सरकारों के लिए चुनाव एक साथ होंगे तो मतदाता एक ही राजनीतिक दल के पक्ष में मतदान करना पसंद करता है। यह एक आम अवधारणा है। इसमें कोई रहस्य की बात नहीं। ऐसा होने पर केन्द्र और राज्यों में किसी एक ही दल की सरकारें बनने की संभावना को नहीं नकारा जा सकता। जो न लोकतंत्र की परिभाषा को नकारता है अपितु लोकतंत्र की हत्या का द्योतक है। 1999 से अबतक देश लोकसभा और विधानसभाओं में एक साथ हुए चुनावों के आँकड़े इस बात का प्रमाण हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने पर 77 प्रतिशत मतदाताओं ने एक ही पार्टी को वोट देना पसंद किया। मोदी इतने भोले तो नहीं हैं कि इस सत्य से अवगत न हों। दल चाहे कोई भी हो, जिसकी हिमायत करना जनता के मन में बस, सबकी स्थिति यही होगी। यहाँ अवधारणा किसी एक दल पर लागू नहीं होते। इसलिए संविधान की तमाम व्यवस्थाओं से इतर 2019 में सभी चुनाव एक साथ कराने की उनकी ललक आसानी से समझी जा सकती है।

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संविधान की धारा 83(2) में लोकसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से पांच साल तक के लिए तय है। इसी तरह धारा 172(1) विधानसभाओं को भी पांच साल के कार्यकाल का अधिकार देती है। सामान्य स्थिति में यह कार्यकाल पूरा होना ही चाहिए। लोकसभा और विधानसभाएं समय से पहले भंग की जा सकती हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री यह भी तय कर सकते हैं कि चुनाव कब कराए जाएं? लेकिन एक साथ चुनाव कराने के मक़सद से विधानसभाओं को समय से पहले भंग करना संविधान का दुरुपयोग ही माना जाएगा। असामान्य स्थित में राष्ट्रपति को किसी विधानसभा का कार्यकाल एक साल तक बढ़ाने का अधिकार है।

अब जबकि कांग्रेस द्वारा नियत किए गए वर्तमान राष्ट्रपति ने ही मोदीजी के ‘एक देश-एक चुनाव’ पर सहमति व्यक्त कर दी है तो हमें 2017 के जुलाई-अगस्त में सत्तारूढ़ भाजपा की कृपा से मिले राष्ट्रपति से ‘एक देश-एक चुनाव’ के नकार की क्या आशा ही नहीं की जा सकती। यहाँ एक सवाल जरूर है कि क्या किसी एक राजनीतिक दल की इच्छा पूरी करने के लिए अपने इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल करना, क्या किसी भी राष्ट्रपति के लिए संवैधानिक और नैतिक नज़रिए से उचित होगा? लेकिन विगत ही नहीं वर्तमान भी इसका प्रमाण है कि राष्ट्रपति के विशेषाधिकार से कहे जाने वाली बात केवल एक तकिया कलाम है। राष्ट्रपति अक्सर वही करता है, जो केंद्र सरकार की मंशा होती है। यहाँ तक कि राष्ट्रपति के देश के नाम संदेश जैसे भाषण भी उनके अपने नहीं होते, सरकार के द्वारा अनुमोदित होते हैं।

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने भी भारत में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव को एक साथ करवाने पर जोर दिया है, हालांकि इसके लिए सभी राजनीतिक दलों का एकमत होने के साथ-साथ संवैधानिक संशोधन भी जरूरी है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसा हो जाता है तो चुनाव आयोग लोकसभा और विधानसभा के चुनावों को एक साथ करवाने के लिए तैयार है।

न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक के अनुसार, ‘लोकसभा और विधानसभाओं के एक साथ चुनाव कराने में कई और भी व्यवहारिक दिक्कतें आएंगी। एक ही दिन पूरे देश में चुनाव कराने के लिए पुलिस और अर्द्ध-सैनिक बलों की क़रीब चार हज़ार कंपनियां लगेंगी। अभी सरकार बमुश्किल एक हज़ार कंपनियों का इंतज़ाम कर पाती है। चार गुना ज़्यादा पुलिस-बल एकाएक हवा में तो पैदा हो नहीं सकते। इसके लिए पैसा कहां से आएगा? एक ही दिन में सभी जगह चुनाव कराने के लिए लगने वाली मतदान मशीनों का इंतज़ाम भी एक मुद्दा है। मतदान का काग़जी सबूत रखने वाली इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनें (EVM) लगाने पर दस हज़ार करोड़ रुपये से कम खर्च नहीं होंगे। एक साथ चुनाव कराने पर राज्यों में स्थानीय मुद्दे, राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में ग़ुम हो सकते हैं या इसके उलट स्थानीय मुद्दे इतने हावी हो सकते हैं कि केंद्रीय मसलों का कोई मतलब ही न रहे।’ इस विचार से विमुख होने का कोई कारण भी नजर नही आता। इसमे किंतु-परंतु की कोई गुंजाइश ही नहीं दिखती।

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मोटे तौर पर देखने वालों को मोदी की यह योजना देश-हित, समाज-हित और लोकतंत्र के हित में लगेगी। लेकिन मोदी इतने मासूम नहीं हैं कि स्व-हित की कसौटी पर कसे बिना किसी भी योजना को कार्यान्वित करने का मन बना लें। इसलिए यह कहना कि इस योजना को लागू किए जाने की वकालत करना राजनीतिक दलों के हित में तो हो सकता है किंतु देश और जनता के हित में कतई नहीं हो सकता। उदाहरण के रूप में 2014 के लोकसभा चुनावों को ही लिया जा सकता है। मान ले कि यदि इस वर्ष के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ विधानसभाओं के चुनाव भी होते तो जनता का मत महज एक तरफ ही जाता। केंद्र सरकार के मुद्दे और राज्य सरकारों के मुद्दे अलग-अलग न होकर घालमेल का शिकार हो जाते। इतना ही नहीं, जब केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी सरकार के दो साल पूरे होने तक समाज में, बीजेपी की पैत्रिक संस्था आरएसएस का फैला आतंक किस हद तक चला जाता! यदि राज्य सरकारें भी बीजेपी की ही होतीं, तो देश की क्या हालत होती, इसका सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक अवस्था है, किसी एक ही राजनीतिक दल पर ही लागू नहीं होती। ‘एक देश-एक चुनाव’ यदि लागू भी हो जाती है तो विपक्ष नाम की कोई संस्था शेष नहीं रह जाएगी और सत्तारूढ़ दल खुलकर बिना किसी कायदे कानून के कबड्डी खेलेगा।

वर्तमान चुनावी व्यवस्था में अब कम से कम इतना तो है कि देश की जनता केंद्र सरकार के कार्यों से संतुष्ट नहीं होती है तो राज्यों में जब-जब भी अलग-अलग समय पर होने वाले चुनावों में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को बदलने का विकल्प जनता के पास शेष है। ‘एक देश-एक चुनाव’ की व्यवस्था लागू हो जाने पर जनता से ये हक भी छिन जाएगा और देश में तमाम प्रकार के अराजक तत्व हावी हो जाएंगे। एक तरह से देश की जनता अपने ही देश में गुलाम की भूमिका में आ जाएगी। सबसे ज्यादा जो नुकसान होगा, वह देश की अनुसूचित और पिछड़े वर्ग की जनता को होगा।

तरुण चुघ ने अंत में लिखा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले लंबे समय से लोकसभा और सभी विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर जोर देते रहे हैं लेकिन इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की राय बंटी हुई रही है। पिछले साल जब एक संबंधित आयोग ने इस मसले पर राजनीतिक दलों से सलाह ली थी, तब कुछ दलों ने ‘एक देश-एक चुनाव’ की सोच का समर्थन किया था, लेकिन कुछ अन्य इसके खिलाफ थे। अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दलों को एक देश-एक चुनाव के मुद्दे पर सकारात्मक रुख लेकर चर्चा करनी चाहिए और इसे लागू कराने पर अपनी सहमति देनी चाहिए। यहाँ यह सवाल उठता है कि चुघ साहेब को आज ऐसा क्यों लगता है कि तमाम राजनीतिक दलों की इस मुद्दे पर राय बंटी हुई नहीं रहेगी?

सारांशत: कहा जा सकता है कि ‘एक देश-एक चुनाव’ की व्यवस्था देश में अधिनायकवाद या यूँ कहें कि हिटलरशाही को ही जन्म देगी। देश में चौतरफा अराजकता का माहौल होगा, जो आज भी है। सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का आचरण लोकतांत्रिक न होकर पूरी तरह अलोकतांत्रिक हो जाएगा।  यदि ‘एक देश-एक चुनाव’ की व्यवस्था देश में लागू हो जाती है तो क्या लोकतंत्र की असमय हत्या नहीं हो जाएगी?

तेजपाल सिंह ‘तेज’ विचारक और लेखक हैं।

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