प्रेमचंद की तरह ओमप्रकाश वाल्मीकि भी अंत में चमार-विरोधी हो गए थे

कॅंवल भारती

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ओमप्रकाश वाल्मीकि की ‘शवयात्रा’ कहानी की आलोचना

‘शवयात्रा’ ओमप्रकाश वाल्मीकि की विवादास्पद कहानी है। अधिकांश दलित आलोचक इस कहानी को प्रेमचन्द की ‘कफन’ कहानी की तरह ही चमार-विरोधी मानते हैं। इस सम्बन्ध में रत्नकुमार सांवरिया का एक लेख मेरे सामने है, जिसमें उन्होंने ओमप्रकाश वाल्मीकि की, इस कहानी की रचना-प्रक्रिया के बारे में पूरे तथ्यों के साथ बात की है। पहले यह देख लें कि कहानी क्या है?

वाल्मीकि की ‘शवयात्रा’ का आरम्भ इन शब्दों से होता है- ‘चमारों के गांव में बल्हारों का एक परिवार था, जो जोहड़ के पार रहता था।’ ध्यान दें कि गांव चमारों का था, जिसका अर्थ है कि अन्य जातियों या धर्म के लोग उसमें शायद नहीं रहते थे। तब किसी चमार को ही गांव का प्रधान भी होना चाहिए। पर, कहानी से ऐसा प्रतीत नहीं होता। इस पर हम आगे विचार करेंगे। कहानी के मुताबिक गांव में बल्हारों अर्थात वाल्मीकियों का एक ही परिवार था, जो सुरजा का था। सुरजा का बेटा कल्लन शहर में रेलवे में नौकरी करता था और गांव कम ही आता था। वाल्मीकि लिखते हैं, ‘जब भी वह गांव आता, चमार उसे अजीब-सी नजरों से देखते थे।’ (घुसपैठिये, पृष्ठ 36) यह नजर इर्ष्या की नही, अस्पृश्यता की है, जैसा कि वह आगे लिखते हैं, ‘कल्लू से कल्लन हो जाने को वे स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। उनकी दृष्टि में वह अभी भी बल्हार ही था, समाज-व्यवस्था में सबसे नीचे, यानी अछूतों में भी अछूत।’ (वही)

कल्लन अपने पिता को शहर ले जाकर सरकारी मकान में रहने के लिए बाध्य करता है। वह कहता है, ‘बापू यहाँ न तो इज्जत है, न रोटी, चमारों की नजर में भी हम सिर्फ बल्हार है….यहाँ तुम्हारी वजह से आना पड़ता है…मेरे बच्चे यहाँ आना नहीं चाहते।’ (वही, 37) लेकिन सुरजा शहर जाने से मना कर देता है। वह गांव के ही टूटे-फूटे घर को पक्का बनवाने की जिद करता है। कल्लन अपने पिता की जिद पूरी करने के लिए शहर से रूपयों का बन्दोबस्त करके लाता है। उसके साथ उसकी पत्नी सरोज और दस साल की बेटी सलोनी भी गांव आती है। मकान बनाने के लिए ईंटें वगैरा भी आनी शुरु हो जाती हैं। राजमिस्त्री को भी तय कर लिया जाता है। पर इसी के साथ दो घटनाएँ घटती हैं और ये दोनों घटनाएँ अस्पृश्यता से जुड़ी हैं।

 पहली घटना इस प्रकार है-

सुरजा के आंगन में उतरती ईंटों को देखकर गांव में जैसे भूचाल आ जाता है। लोग जोहड़ के किनारे खड़े हो जाते हैं। उनमें एक रामजीलाल हैं। वाल्मीकि लिखते हैं, ‘रामजीलाल कीर्तन सभा का प्रधान था। रविदास जयन्ती पर रात भर कीर्तन चलता था।’ (वही, 38) उसने चिल्लाकर पूछा, ‘अबे ओ सुरजा, ये ईंटें कोण लाया है?’ सुरजा जवाब देता है, ‘अजी बस, म्हारा कल्लन पक्का घर बणवा रिया है।’ रामजीलाल फिर कहता है, ‘यो तो चोखी बात है सुरजा, पर पक्का मकान बणवाने से पहले परधान जी से भी पूछ लिया था या नहीं?’ सुरजा गुर्राकर कहता है, ‘परधान से क्या पूछना?’इसके बाद होता यह है कि रामजीलाल परधानजी के कान भरता है और परधान सन्देशा भेजकर सुरजा को बुलवा लेता है। परधानजी का नाम बलराम सिंह है। कहानी के अनुसार, वह सुरजा को देखते ही चीखता है, ‘अंटी में चार पैसे आ गए, तो अपनी औकात भूल गया। बल्हारों को यहां इसलिए नहीं बसाया था कि  हमारी छाती पर हवेली खड़ी करेंगे। वह जमीन जिस पर तुम रहते हो, हमारे बाप-दादों की है। जिस हाल में हो, रहते रहो, किसी को ऐतराज नहीं होगा। सिर उठा के खड़े होने की कोशिश करोगे, तो गांव से बाहर कर देंगे।’ (वही, 39) प्रधान की इस फटकार के बाद सुरजा पक्का मकान बनवाना भूल जाता है।

 दूसरी घटना ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही ‘शवयात्रा’ कहानी का मूल आधार है। यह घटना इस प्रकार है-

कल्लन की बेटी सलोनी को बुखार आ गया था। सलोनी का बुखार कम नहीं हो रहा था। गांव में एक ही डाक्टर था। कल्लन उसे बुलाने के लिए उसके पास गया। पर डाक्टर ने आने से मना कर दिया। कल्लन ने जब क्लीनिक पर ही मरीज को लेकर आने की बात कही, तो डाक्टर ने उसे चेतावनी देकर कहा, ‘नहीं, यहां मत लाना। कल से  मेरी दुकान ही बन्द हो जायगी। यह मत भूलो कि तुम बल्हार हो।’ अलबत्ता डाक्टर ने कुछ गोलियां पुड़िया में बांधकर दे दी थीं, लेकिन उनसे सलोनी का बुखार नहीं उतरा था। पूरी रात उनकी जागते हुए कटी। सुबह होते ही कल्लन ने सलोनी को पीठ पर लादा और वे शहर की ओर चल दिए। सरोज साथ थी। शहर आठ-दस किलोमीटर दूर था। वाल्मीकि लिखते हैं कि कल्लन ने चमारों से बैलगाड़ी मांगी थी। पर उन्होंने देने से मना कर दिया था। लेकिन इससे पहले कि वे शहर के अस्पताल पहुंच पाते, सलोनी रास्ते में ही कल्लन की पीठ पर दम तोड़ देती है। यह उनके लिए भारी दुख की घड़ी थी। दोनों सड़क के किनारे बेटी के शव पर विलाप करते हैं। कोई भी उनकी मदद के लिए नहीं आता है। एक राहगीर भी उन्हें देखकर आगे बढ़ लाता है। वाल्मीकि लिखते हैं कि ‘शायद उसने उन्हें पहिचान लिया था। उसी गांव का था। कल्लन को लगा, इन्सान की ‘जात’ ही सब कुछ है।’ (वही, पृष्ठ 41) आखिर वे उठे और बेटी का शव कंधों पर रखकर गांव की ओर लौट चले। गांव पहुंचकर उन्हें शव के दाह-संस्कार की चिन्ता हुई। ‘समस्या थी लकड़ियों की।’ वाल्मीकि लिखते हैं, ‘दाह-संस्कार के लिए लकड़ियां उनके पास नहीं थीं। सुरजा और सन्तो लकड़ियों का इन्तजाम करने के लिए निकल पड़े थे। उन्होंने चमारों के दरवाजों पर जाकर गुहार लगाई थी। लेकिन कोई भी मदद करने को तैयार नहीं था।’ (वही, पृष्ठ 42) घण्टा-भर भटकने के बाद भी उन्हें लकड़ियां नहीं मिलीं। वाल्मीकि लिखते हैं कि ‘चमारों का श्मशान गांव के ही निकट था। लेकिन उसमें बल्हारों को अपने मुर्दे फूंकने की इजाजत नहीं थी। कल्लन की मां के समय भी ऐसी ही समस्या आई थी। चमारों ने साफ मना कर दिया था। गांव से बाहर तीन-चार किलोमीटर दूर ले जाकर फूंकना पड़ा था।’ (वही) सलोनी के शव को भी वे वहीं लेकर गए। वाल्मीकि के ही शब्दों में, ‘स्त्रियों के श्मशान जाने का रिवाज बल्हारों में नहीं था। लेकिन सन्तो और सरोज के लिए इस रिवाज को तोड़ने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। सन्तो ने लकड़ियों का गट्ठर सिर पर रखकर हाथ में आग और हांडी उठा लिए थे। पीछे-पीछे सरोज उपलों से भरा टोकरा लिए चल पड़ी थी।’ (वही, पृष्ठ 43) यही शवयात्रा है और यही उसकी कहानी है।

2.

‘शवयात्रा’ पढ़ने के बाद कई प्रश्न उभरते हैं। यथा, सरजू गांव के प्रधान से डरकर मकान बनवाने का विचार क्यों छोड़ देता है? वह सामन्ती और ब्राह्मणवादी व्यवस्था से लड़ने के बजाए उसके आगे समर्पण क्यों कर देता है? एक ऐसे वातावरण में, जहां अस्पृश्यता के विरुद्ध कानून मौजूद है और देश भर में चल रहे दलित आन्दोलन दलित जातियों में संघर्ष की चेतना जगाने का काम कर रहे हैं, वहां सरजू उस आन्दोलन और उस चेतना से अनभिज्ञ क्यों है? उसने प्रधान और अन्य लोगों के विरुद्ध पुलिस में शिकायत दर्ज क्यों नहीं कराई? उसका पुत्र कल्लन, जो शहर में रेलवे में नौकरी करता है, वह भी संघर्ष की चेतना से अछूता है, यह भी समझ से परे है। कहानी के अनुसार, गांव चमारों का है, और चमार भी सामन्तवादी हैं, यह बात गले से नहीं उतरती है, क्योंकि यह सामाजिक यथार्थ के एकदम विपरीत है। किसी शहर और गांव में ऐसी घटना नहीं हुई, जहां चमारों ने मेहतर या बल्हार समुदाय को मकान बनाने से रोका हो, अथवा, जहां ऐसी घटना को मेहतर या बल्हार समुदाय ने चुपचाप बरदाश्त कर लिया हो और संघर्ष न किया हो। सरजू की मानसिकता गुलामों वाली है, उसमें बेहतर जीवन जीने की कोई लालसा नहीं है। कल्लन उसे शहर ले जाना चाहता है, और नए वातावरण में आजादी के साथ रहने के लिए उसे गांव छोड़ने को कहता है, पर वह भड़क जाता है, अपने बाप-दादों की जगह का हवाला देकर गांव छोड़कर जाने से साफ मना कर देता है। बाबासाहेब आंबेडकर ने भी सम्मान के लिए गांव छोड़कर शहरों में बसने को कहा था। बेटा जानता था कि गांव की सामन्ती व्यवस्था से टकराना उसके अकेले के वश की बात नहीं है, इसलिए उसे छोड़ देना ही बेहतर है, तब तो और भी, जब गांव में वह जमीन भी उनकी नहीं है, जिस पर बने कच्चे घर में वे रहते हैं। लेकिन सरजू को उस गांव से मोह है, जहां गुलामी और अपमान के सिवा उसके लिए कुछ भी नहीं है। अगर, वाल्मीकि जी सरजू को उसकी गुलामी और जलालत का अहसास करा देते, तो दलित चेतना की दृष्टि से यह एक सशक्त कहानी बनती, जिसके सभी पात्र विद्रोह करते। पर, वाल्मीकि जी शायद इसे चमार-विरोधी चेतना तक सीमित रखना चाहते थे। इसलिए, सरजू की कहानी आगे नहीं बढ़ पाती है और पराकाष्ठा पर पहुंचे बिना ही दम तोड़ देती है।

‘शवयात्रा’ कहानी के दूसरे भाग में कथाकार का असल मकसद यह दिखाना है कि सलोनी की शवयात्रा में गांव के चमार शामिल नहीं होते हैं। इस मकसद में उसे सफलता मिली है, पर, विसंगतियां यहां भी हैं। पहले ही दृश्य में, गांव का डाक्टर, इस तर्क से, बल्हार लड़की का इलाज करने से मना कर देता है कि गांव में उसकी दुकान बन्द हो जाएगी। वाल्मीकि जी ने यहां गांव के चमारों को बल्हार-विरोधी होने के साथ ही सम्वेदन-हीन मनुष्य के रूप में भी चित्रित किया है। यहां दो बातें गौर तलब हैं, एक, सिर्फ बल्हार ही नहीं, चमार भी अछूत जाति में आते हैं, तो, डाक्टर बल्हारों से ही छुआछूत क्यों करता है, चमारों से क्यों नहीं करता? क्या डाक्टर भी चमार है? यह भी वाल्मीकि स्पष्ट नहीं करते हैं।

दूसरा बल्हार-विरोधी पात्र गांव का प्रधान है, जो कहता है कि उसके बाप-दादाओं ने अपनी जमीन पर बल्हारों को बसाया था। इसका मतलब है कि प्रधान सामाजिक हैसियत से जमींदार है। अतः, वह चमार नहीं हो सकता। वाल्मीकि जी चमारों को जातिवादी दिखाने की हड़बड़ी में यह भी नहीं देख सके कि पंचायती राज में गांव का प्रधान वोट से बनता है, और जमींदारी-प्रथा कब की खत्म हो चुकी है। अगर वह चमारों का गांव है, तो बल्हार परिवार को प्रधान द्वारा बसाया जाना गले नहीं उतरता है, और तब तो और भी नहीं, जब उसे प्रधान के बाप-दादों के द्वारा बसाया गया था। इतने लम्बे समय के बाद, उस जमीन पर प्रधान का कानूनन दखल खत्म हो जाता है। जमीन के मालिकाना हक के लिए बल्हार परिवार ने कोई संघर्ष किया हो, इसका भी आभास कहानी में नहीं मिलता है।

सलोनी की आकस्मिक मृत्यु दुखद है। इससे भी ज्यादा दुखद यह है कि गांव में चमारों के श्मशान में बल्हारों को अपने मुर्दे फूंकने की इजाजत नहीं थी। पर, बड़ा सवाल यह है कि सलोनी की शवयात्रा में बल्हार जाति के लोग क्यों नहीं थे? माना कि गांव में वह एक ही बल्हार परिवार था, हालांकि इस पर यकीन करना मुश्किल है, पर, यह कैसे माना जा सकता कि आस-पास के गांवों में भी बल्हार परिवार नहीं थे? आस-पास के गांवों में सभी जातियों के नाते-रिश्तेदार रहते हैं, और वे खुशी और गमी के मौके पर एक-दूसरे के यहां इकट्ठे होते हैं। तब, सरजू ने इस गमी की खबर अपने दूसरे गांवों के लोगों को क्यों नहीं दी? यह एक ऐसा सवाल है, जो कहानी को आधारहीन साबित करता है।

3.

हर कहानी की एक रचना-प्रक्रिया होती है। ‘शवयात्रा’ की भी एक रचना-प्रक्रिया है। वाल्मीकि जी ने इस रचना-प्रक्रिया का जिक्र अपने लेख ‘मेरी रचना-प्रक्रिया: अस्मिता की तलाश’ में किया है, जो ‘अपेक्षा’ (सम्पादक डा. तेज सिंह) के जनवरी-मार्च 2003 के अंक में प्रकाशित हुआ था। वह घटना क्या थी? ओमप्रकाश वाल्मीकि ने उसका उल्लेख इस प्रकार किया है- ‘जयपुर से मेरे मित्र जयप्रकाश वाल्मीकि ने एक अखबार में छपी खबर की कटिंग भेजी थी। साधारण सी दिखने वाली उस खबर ने मुझे विचलित कर दिया था। अन्दर-अन्दर जैसे सब बिखर गया था। उसी दौरान शहर के व्यस्त चैराहे पर क्षणभर को जैसे कुछ थम सा गया था। भीड़ के बीच एक व्यक्ति साइकिल के कैरियर पर एक शव को श्मशान ले जा रहा था। हैंडिल से रस्सी बॅंधी एक हंडिया लटक रही थी, जिसमें आग थी। इतनी भीड़ के बीच भी वह अकेला था। ऐसी भी क्या विवशता थी कि आस-पड़ोस का कोई भी व्यक्ति उसके साथ नहीं था। शहर में अनेकों धार्मिक संगठन थे। कोई साथ चलने को तैयार नहीं था। क्षणभर में भीड़ सम्वेदनहीन हो गई थी। मेरी जेब में जयप्रकाश की भेजी हुई खबर की कटिंग कुनकुना रही थी। उसी रोज ‘शवयात्रा’ कहानी लिखी गई।’

इसकी रचना-प्रक्रिया में दो बातें गौरतलब हैं, एक, वाल्मीकि जी के मित्र जयप्रकाश वाल्मीकि की भेजी हुई खबर की कतरन, और दूसरी, उनका व्यस्त चैराहे की भीड़ में एक व्यक्ति द्वारा साइकिल के कैरियर पर एक शव को ले जाने का उनका आंखों देखा दृश्य। इन दोनों बातों की कोई छानबीन उनके द्वारा नहीं की गई। वह कौन-सा शहर था, यह भी उन्होंने नहीं लिखा है। उन्होंने यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि वह व्यक्ति साइकिल के कैरियर पर लाश को क्यों ले जा रहा था? सत्य यह है कि इस स्थिति में कोई लाश तभी ले जाई जाती है, जब वह लावारिश होती है। कोई भी लाश, जो लावारिश नहीं है, इस तरह अपमानजनक तरीके से नहीं ले जाई जा सकती, बल्कि उसे परिवार के लोग बाकायदा अर्थी पर लेकर जाते हैं, भले ही दो ही चार लोग शवयात्रा में हों। अतः, स्पष्ट है कि वाल्मीकि जी ने चैराहे की भीड़ में साइकिल के कैरियर पर जिस शव को ले जाते देखा था, वह लावारिश थी, और ऐसी लावारिश लाशों को फूंकने या दफनाने के लिए पुलिस विभाग जिन लोगों को चुनता है, वे इसी तरह रिक्शा या साइकिल पर लाशों को लादकर ले जाते हैं, क्योंकि उन लाशों के अन्तिम संस्कार के लिए उन्हें बहुत ही कम धनराशि मिलती है। अब रहा सवाल भीड़ के सम्वेदनहीन होने का, तो यह हकीकत है, और सब जानते हैं कि किसी शवयात्रा को देखकर रास्ते के लोग उसका सम्मान करते हैं, उसके साथ चलना शुरु नहीं कर देते हैं। अगर साइकिल के कैरियर पर लाश को ले जाते देखने वाली भीड़ सम्वेदनहीन थी, तो उसे देखते हुए उसी भीड़ का हिस्सा खुद वाल्मीकि जी भी थे।

वाल्मीकि जी ने अपने रचना-प्रक्रिया लेख में उन्हें भेजी गई खबर की कटिंग का जिक्र किया है, पर वह क्या खबर थी, उस बारे में उन्होंने कुछ नहीं कहा है। उस खबर को उन्होंने रहस्य ही रखा है। किन्तु, रत्नकुमार सांभरिया ने उस खबर की छानबीन की , और अपने लेख ‘शवयात्रा की झूठयात्रा’ में उसका वर्णन किया है। उन्होंने उस खबर की कतरन के स्रोत जयप्रकाश वाल्मीकि से भेंट की, जो पत्र-सूचना कार्यालय मे कर्मचारी हैं । उसने उन्हें बताया कि वह खबर उसे रमेश निदानिया नामक व्यक्ति ने दी थी, जो मूलतः दौसा का निवासी है, पर अब जयपुर मे रहता है। रमेश निदानिया ने उन्हें बताया कि घटना वह नहीं है, जो ‘शवयात्रा’ कहानी में है। रत्नकुमार सांभरिया ने लिखा है कि रमेश निदानिया ने जो सच्चाई बताई, वह इस प्रकार थी-

‘खान भाखरी मे रेलवे के सेवा-निवृत्त कर्मचारी लादूराम के यहां कोई उत्सव था। उसमें उनके रिश्तेदार की दस-बारह साल की बच्ची भी अपने मां-बाप के साथ आई थी। बच्ची रात में बीमार पड़ गई थी। सुबह उसे खान भाखरी से दौसा अस्पताल ले जाया जा रहा था, पर रास्ते में ही उस बच्ची की मृत्यु हो गई थी। उसकी डेडबाडी को घर ले जाया गया था। उस वक्त परिवार में दस-बारह लोग थे, जिनमें पांच-छह पुरुष भी थे। पुरुषों मे चार अर्थी के कन्धे हो गए। एक ने आग की हांडी सॅंभाल ली और एक ने फूंस। उनमें से दो जने लाश के पास बैठे रहे और चार लोगों ने साइकिल और रिक्शा से दाह के लिए लकडियाँ  ढोई थी। उनकी पीड़ा यह थी कि गांव में चमारों सहित दस-बारह कौमों के घर हैं, लेकिन किसी ने भी शवयात्रा में शोक-संतप्त परिवार का सहयोग नहीं किया।’

रमेश निदानिया द्वारा बताई गई इस घटना से वाल्मीकि जी को उनके मित्र जयप्रकाश वाल्मीकि द्वारा भेजी गई खबर की कतरन का रहस्य उजागर हो जाता है। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें खबर की इसी एक बात ने विचलित किया था कि ‘गांव में चमारों सहित दस-बारह कौमों के घर हैं, लेकिन किसी ने भी शवयात्रा में शोक-संतप्त परिवार का सहयोग नहीं किया।’ सिर्फ इतने भर से उन्होंने चमारों के विरोध में ‘शवयात्रा’ कहानी का तानाबाना बुना। इस तानेबाने में उन्होंने भी बिना अर्थी के शवयात्रा निकालकर, वैसा ही काम किया, जैसा पेशेवर लोग साइकिल के कैरियर पर लावारिश लाश को ढोकर करते हैं। रत्नकुमार सांभरिया ने इसकी तुलना प्रेमचन्द की ‘कफन’ कहानी से की है और लिखा है कि ‘शवयात्रा’ ज्यादा क्रूर, अमानवीय और पूर्वाग्रहों से ग्रस्त कहानी है।

( कँवल भारती जाने-माने आलोचक और संपादक हैं )

 

 

 

2 Comments
  1. नरेन्द्र वाल्मीकि says

    जब ओमप्रकाश वाल्मीकि जी जिंदा थे, तब क्यों अपनी जुबान बन्द रखते थे आप लोग। उनके रहते हुए ये लेख लिखते तो आपको जवाब मिलता। गलत सही का निर्णय भी होता। रोज लोगों को फोन करके जबरदस्ती अपनी कहानी पढ़वाने वाले लोग अब बाते बना रहे हैं।

  2. मनोहर says

    कहानी शवयात्रा समाज के सच का हिस्सा है। समीक्षा में दम नहीं है।

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