मेरा हमदम मेरा यार विद्रोही

असरार खान

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जो लोग विद्रोही को केवल एक कवि के रूप में जानते हैं मैं उन्हें विद्रोही की एक दूसरी झलक दिखाना चाहता हूँ। जब वे एक क्रान्तिकारी छात्र-नेता के रूप में सक्रिय थे। आज से ठीक इक्तालीस साल पहले की बात है। 23 जनवरी को नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का जन्मदिन था। वर्ष था 1979। मैं कमला नेहरू इंस्टीट्यूट (केएनआई), सुल्तानपुर में बीए का छात्र था और विद्रोही एलएलबी के छात्र थे। उसी रोज सुबह-सुबह कॉलेज में छात्र आन्दोलन भड़क उठा। मैंने नेतृत्त्व अपने हाथ में संभाला। एलएलबी के छात्रों ने एकजुट होकर मेरा साथ दिया। कॉलेज में बलवा हो गया और छात्र वेलफेयर के इंचार्ज वरिष्ठ प्राध्यापक श्री शुक्ल की छात्रों ने पिटाई कर दी। बारह बजे कचहरी के सामने सुल्तानपुर नगर पालिका में हमारी पार्टी सीपीआईएम की तरफ से महँगाई और बेरोजगारी तथा सबको समान शिक्षा का अवसर दिए जाने को लेकर एक धरना था। मैं एसएफआई का जिला संयोजक और पार्टी की सिटी ब्रांच का सचिव था। लिहाजा मुझे भाषण देना था और उसके थोड़ी देर बाद बनारस के लिए भी रवाना होना था, विद्रोही को साथ में लेकर। उस समय तक विद्रोही पार्टी के उम्मीदवार सदस्य थे और पार्टी के सभी मोर्चों पर काम किया करते थे। विद्रोही बहुत उम्दा भाषण भी करते थे और कविताएँ तो वे बहुत जोशीले अंदाज में सुनाया करते थे। जिस समय उनकी कविता चल रही होती थी, उतने समय सड़कों पर चलने वाले लोग ठहरकर तब तक सुनते थे, जब तक विद्रोही की कविता खत्म न हो जाए।

24 जनवरी को बनारस के बेनिया बाग में किसान सभा का राष्ट्रीय सम्मलेन था। उस सम्मलेन के लिए विद्रोही और मुझे वॉलंटियर बनाया गया था। सभा वगैरह खत्म करके जल्दी-जल्दी हम दोनों रेलवे स्टेशन पहुँचे। एसएफआइ के बहुत सारे सदस्य हम दोनों को स्टेशन पर छोड़ने आए थे। विद्रोही और मैं बहुत खुश थे। पहली बार सुल्तानपुर से बाहर और राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी मिली थी। गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। तभी कुछ लड़के हमारे पास आए और धीरे से मुझसे कहा कि शायद आप को कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया है। हम लोग अभी सीधे कॉलेज से ही आ रहे हैं। वहाँ पर यह चर्चा बहुत जोरों पर है। मैंने कहा कोई बात नहीं, जो होगा देखा जाएगा। अब तो बनारस से लौटकर ही इस बारे में सोचा जाएगा।
तभी ट्रेन आयी और हम दोनों उसमें जाकर बैठ गए। मैंने अपने निकाले जाने की खबर विद्रोही को नहीं दी। इसलिए भी कि वह खबर झूठी भी हो सकती थी। बहरहाल, हम लोग बनारस में पहुँचकर क्या भूमिका निभानी है, उसको लेकर बहुत उत्सुक थे। सबसे पहले हमें दशाश्वमेध घाट, पार्टी कार्यालय पहुँचकर अपनी पार्टी के लोकसभा सदस्य कॉमरेड सत्यनारायण सिंह से मिलकर अपनी जिम्मेदारी लेनी थी। रात हो चुकी थी जब हम लोग बनारस पहुँचे। कॉमरेड सत्यनारायण ने कहा अभी तो जाकर पोस्टर लगाइए। फिर चार बजे भोर में बताऊँगा कि आप लोगों को कल से क्या करना है। मैंने निकलते-निकलते कॉमरेड से कहा कि हम दोनों को केरल के कॉमरेडों के डेलिगेट्स के साथ कर दीजिएगा। कहते हुए पोस्टर लगाने निकल पड़े।

सम्मलेन का पहला सत्र दो बजे के करीब समाप्त हुआ, तब मुझे और विद्रोही को भी बेनियावाला बाग यानी सम्मलेन स्थल पर खाने के लिए और अगले सत्र को थोड़ी देर तक देखने के लिए बुलवाया गया। जैसे ही मैं वहाँ पहुँचा कॉमरेड प्रताप कुमार टंडन ने मुझे आवाज दी। वहीं पर कॉमरेड शंकर दयाल तिवारी भी खड़े थे। मैंने लाल सलाम किया और बातें करने लगा। तभी वहाँ पर मेरे बड़े भाई कॉमरेड स्टालिन एडवोकेट मेरे पास पहुँचकर धीरे से बोले, केएनआई से तुम्हारे लिए ये टेलीग्राम आया है। मैंने टेलीग्राम को खोलकर पढ़ा तो वह मेरा एक्सपल्शन लेटर था।

 

रात भर पोस्टर लगाने के बाद जब उस सर्द रात में सुबह होने के करीब थी, तब हम पार्टी कार्यालय पहुँचे। तब कहा गया कि हमें केरल वाले कॉमरेडों की सेवा के लिए वालंटियर बनाया गया है। हम लोग उस धर्मशाले के लिए रिक्शे से रवाना हो गए। धर्मशाले तक पहुँचे ही थे कि एक साथी ने बताया, केरल वाली ट्रेन स्टेशन पहुँच चुकी है। बाहर खड़े होकर इंतजार करने लगे तब तक डेलिगेट्स आने शुरू हो गए। डेलिगेट्स की सेवा में मैं और विद्रोही समझिये एक पाँव पर खड़े रहे। रात गुजर गई। एक मिनट के लिए सोने को नहीं मिला।

सम्मलेन का पहला सत्र दो बजे के करीब समाप्त हुआ, तब मुझे और विद्रोही को भी बेनियावाला बाग यानी सम्मलेन स्थल पर खाने के लिए और अगले सत्र को थोड़ी देर तक देखने के लिए बुलवाया गया। जैसे ही मैं वहाँ पहुँचा कॉमरेड प्रताप कुमार टंडन ने मुझे आवाज दी। वहीं पर कॉमरेड शंकर दयाल तिवारी भी खड़े थे। मैंने लाल सलाम किया और बातें करने लगा। तभी वहाँ पर मेरे बड़े भाई कॉमरेड स्टालिन एडवोकेट मेरे पास पहुँचकर धीरे से बोले, केएनआई से तुम्हारे लिए ये टेलीग्राम आया है। मैंने टेलीग्राम को खोलकर पढ़ा तो वह मेरा एक्सपल्शन लेटर था। बहरहाल, मेरे ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। मैं कॉमरेड विद्रोही को ढूँढने लगा। वह खाना खा रहे थे। मैंने भी खाना खाया और एक घंटे तक सम्मेलन को देखा। मेरे गाँव के जो लोग वहाँ आए थे उन्हें भी खाना खिलाया। और फिर हम और विद्रोही वापस अपनी ड्यूटी पर धर्मशाला चले गए।
धर्मशाला तो बिलकुल खाली थी। सब सम्मलेन में थे। हम लोगों ने सोचा थोड़ा सो लेते हैं, लेकिन मुझसे रहा नहीं गया। मैंने विद्रोहीजी को वह टेलीग्राम दिखा दिया। विद्रोही ने कहा हम लोग क्राँतिकारी हैं। हमें डिग्री की परवाह नहीं। हमें तो पूरी सत्ता चाहिए। कहने लगे कॉमरेड घबराने की कोई बात नहीं है। एक क्रांतिकारी व्यक्ति के जीवन में यह बहुत छोटी घटना है। सुल्तानपुर वापस लौटकर मैनेजमेंट का दिमाग ठीक कर दिया जाएगा।

दीवारों में चिनी हुई चीखें -3

बहुत लम्बी कहानी है। जब मेरे रीएडमिशन के लिए आन्दोलन बहुत तेज हो गया तो केएनआई के संस्थापक ने, जो मेरे पिता जी के बहुत अच्छे दोस्त थे, मेरे अब्बा से कहा और फिर मुझे भी बुलाकर कहा कि अगर तुम यहाँ रहे तो कॉलेज नहीं चल सकता। मेरे अब्बा ने कहा, आप लोग आन्दोलन खत्म कर दीजिए। तब तक मार्च का महीना आ गया। अप्रैल का महीना शुरू होते ही मैंने जेएनयू जाने का निर्णय कर लिया।
जिस दिन मैं जेएनयू के लिए सुल्तानपुर से निकल रहा था, रास्ते में विद्रोही का एक छोटा-सा कमरा था। मैंने सोचा विद्रोही से मुलाकात करता चलूँ। अब पता नहीं कब वापस आऊँगा। विद्रोही जी ने कहा, असरार मैं भी आप के साथ जेएनयू चलूँगा। मैं विद्रोही जी को मना नहीं कर पाया। और मेरे पास बहुत ज्यादा पैसे भी नहीं थे। उन दिनों दिल्ली का किराया अट्ठाइस रुपए पचास पैसे (साढ़े अट्ठाइस रुपया) लगता था। मैंने कहा, विद्रोही मेरे पास जितना पैसा है, वह तो टिकट में ही खत्म हो जाएगा। फिर जेएनयूमें क्या खाएँगे? कोई रास्ता सुझाइए क्या किया जाए?

सच पूछा जाय तो यह कम्युनिस्ट आंदोलन की खामी रही। क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी भी उसी को आगे बढ़ाना चाहती थी जो दिल बहलाने के लिए या खानापूर्ति करने के लिए राजनीति भी कर ले और अपने निजी भविष्य के लिए विभिन्न क्षेत्रों के मठाधीशों के हाथ-पाँव दबाने की कला में माहिर भी हो। मेरी नजर में विद्रोही उन तमाम लोगों से बहुत ज्यादा कीमती व्यक्ति हैं जो न तो कॉमरेड लेनिन और स्टालिन बन पाए और न ही गोर्की और प्रेमचंद। टाटा-बिरला तो खैर उन्हें बनना ही नहीं था।

 

विद्रोही ने कहा, चलिए बिना टिकट चलते हैं। जो होगा देखा जाएगा। और हम लोग गंगा-यमुना एक्सप्रेस पर बिना टिकट चढ़ लिए। आखिर गाजियाबाद में मजिस्ट्रेट चेकिंग हुई। और हम दोनों पकड़े गए। मैंने टीटी को बहुत समझाया। कहा कि हम लोग मजबूरी में बिना टिकट चल दिए। हमें माफ कर दीजिए तो उसने कहा, हम तो माफ कर देते, लेकिन ये मजिस्ट्रेट चेकिंग है। अंतत: उसी टीटी ने हमें बचाया। इस तरह हम दोनों जेएनयू पहुँचे और घनश्याम मिश्रा के कमरे में काफी दिनों तक रहे। फिर मेरा दाखिला हो गया। लेकिन विद्रोहीजी का दाखिला उस साल नहीं हो पाया।
जेएनयू कैंपस में ही नहीं, इंटरनेट से लेकर देश-विदेश में भी अब विद्रोही की चर्चा बड़ी जोरों पर है। जिस तरह विद्रोही आजकल चर्चा में हैं ऐसा लगता कि इसी तरह कभी यूनान में सुकरात की चर्चा रही होगी। 1983 में जो लोग जेएनयू में थे उन्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसके बाद के लोग विद्रोही के बारे में बहुत कम जानते हैं। बहुत लोग सोचते थे कि विद्रोही हैं कौन? जो न जेएनयू के स्टूडेंट हैं और न ही डॉ. नामवर सिंह की तरह कोई मशहूर आलोचक। फिर इतनी चर्चा में ये व्यक्ति आखिर क्यों रहता है? दरअसल विद्रोही जी एक ऐसे क्रांतिकारी हैं जो किसी क्रांतिकारी पार्टी में नहीं रह गये थे। इसलिए उन्हें एक स्वतंत्र क्रांतिकारी कहा जाता तो गलत नहीं होता। लेकिन इसके साथ ही मैं ये कहना चाहता हूँ कि हमारे देश में यदि क्रांतिकारी आंदोलन सही दिशा में आगे बढ़ा होता तो विद्रोही जैसा योग्य और प्रतिभावान व्यक्ति स्वतंत्र क्रांतिकारी हरगिज नहीं होता। मेरी यह बात कुछ लोगों को कड़वी लग सकती है, लेकिन ऐसे लोगों से मैं यह नहीं कहना चाहता कि मुझे माफ कीजिएगा। आज तो परिणाम सबके सामने है। जो लोग विद्रोही को छोड़कर बहुत आगे निकल जाने की फिराक में थे वो आज कहाँ हैं? कहीं नहीं हैं। बाल-बच्चों को ही पाल-पोस रहे हैं। कैंपस से बाहर निकलते ही लाल झंडे को जेब में रख लेने वालों के पास इसका कोई जवाब नहीं है। सच पूछा जाय तो यह कम्युनिस्ट आंदोलन की खामी रही। क्योंकि कम्युनिस्ट पार्टी भी उसी को आगे बढ़ाना चाहती थी जो दिल बहलाने के लिए या खानापूर्ति करने के लिए राजनीति भी कर ले और अपने निजी भविष्य के लिए विभिन्न क्षेत्रों के मठाधीशों के हाथ-पाँव दबाने की कला में माहिर भी हो। मेरी नजर में विद्रोही उन तमाम लोगों से बहुत ज्यादा कीमती व्यक्ति हैं जो न तो कॉमरेड लेनिन और स्टालिन बन पाए और न ही गोर्की और प्रेमचंद। टाटा-बिरला तो खैर उन्हें बनना ही नहीं था।
यह बहुत दुख की बात थी कि बार-बार जेएनयू प्रशासन द्वारा विद्रोही को कैंपस से बाहर निकाला जा रहा था। विद्रोही कैंपस को क्या नुकसान पहुँचा सकते थे? सब कुछ तो उनका जेएनयू ने बहुत पहले ही छीन लिया था जब 1983 में उन्हें मैरिड हॉस्टल के रूम नंबर बीस से बाहर कर दिया गया था और 26 अप्रैल 1983 को जब वे आमरण अनशन पर बैठे तो तत्कालीन वीसी प्रो. पीएन श्रीवास्तव ने उन्हें 8 मई की रात जेल भिजवा दिया। एम्स तक उनके साथ ठीक आधी रात में पुलिस मुझे भी गिरफ़्तार करके ले गई थी। लेकिन बाद में सुबह चार बजे वसंत विहार पुलिस स्टेशन से मुझे छोड़ दिया गया। मुझे वसंत विहार के एसएचओ ने बताया था। बल्कि कागज का वह टुकड़ा भी दिखाया था जिस पर कुलपति ने हम दोनों को टेररिस्ट लिख कर दिया था। लेकिन उस समय के जेएनयू छात्र संघ ने विद्रोही के लिए कुछ नहीं किया। एसएफआई तो सबसे ज्यादा हमारे विरोध में थी। मैं हालाँकि इसके लिए किसी को दोष नहीं देना चाहता बल्कि गलती हमारी और विद्रोही की ही थी जो हम दोनों जेएनयू के मैदान को छोड़कर राजनीति के मैदान में नहीं कूदे। कवि हृदय होने के नाते विद्रोही कटते गए और एक महान जननेता बनने का अवसर खो दिया।

विद्रोही उस समय एमए हिन्दी द्वितीय वर्ष के छात्र थे। उनको यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था। और स्कॉलरशिप भी बंद कर दी गई थी। उन्होंने छात्र संघ से लेकर कुलपति तक बहुत अपील की थी कि उन्हें बहाल कर दिया जाए। परंतु कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। हमने प्रशासन से उन्हें एक मौका देने का निवेदन किया। भारतीय भाषा केंद्र की अध्यक्ष मैडम चंद्रा से विद्रोही का कुछ विवाद हो गया था। मैडम चंद्रा ने उन्हें छात्र की तरह नहीं बल्कि प्रतिद्वंद्वी समझकर ट्रीट किया। इसलिए उन्हें निष्कासित कर दिया गया। उधर प्रवेश नीति वाले मामले में सीधे इंदिरा गाँधी इन्वॉल्व थीं।

 

विद्रोही को मैं 1979 में ही सुल्तानपुर से अपने साथ ले कर आया था। तब विद्रोही कमला नेहरू इंस्टीट्यूट सुल्तानपुर से एलएलबी कर रहे थे और द्वितीय वर्ष के छात्र थे। साहित्य के तीन विषय अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत में स्नातक इस प्रतिभावान छात्र को जेएनयू में एमए पूरा नहीं करने दिया गया। कहने के लिए जेएनयू में बहुत बड़े-बड़े जनवादी, लेफ़्टिस्ट और सोशल डेमोक्रेट्स उन दिनों हुआ करते थे, लेकिन किसी ने रत्ती भर सहयोग नहीं किया। कुछ सच्चाइयाँ ऐसी हैं जिन्हें लिखना भी शायद उचित न हो लेकिन इतना समझ लिया जाए कि उनके रूम पर लगाया गया अथॉरिटीज का ताला तोड़ने का आरोप जब मेरे ऊपर लगा और शो-कॉज नोटिस जारी किया गया तो जेएनयूएसयू ने एक फर्जी मामला खड़ा करके जलीस अहमद के कमरे का ताला तोड़ दिया। अंतत: 11 मई, 1983 को सभी लोग जेल चले गए और यूनिवर्सिटी अगले अकादमिक वर्ष के लिए बंद कर दी गई। ये उस समय के जेएनयूएसयू का असली चेहरा था।
विद्रोही के वहाँ रहने पर जेएनयू की अथॉरिटीज को आपत्ति क्यों थी? जेएनयू कोई भारत सरकार का खुफिया कार्यालय तो था नहीं। पढ़ने-पढ़ाने वाले और पढ़े-लिखे लोगों की जगह थी। एक विश्वविद्यालय। वहाँ केवल छात्र ही तो नहीं रहते थे। रेजीडेंसियल यूनिट भी थी। बूढ़े-बच्चे, कर्मचारी सभी रहते थे। हम किसी कानूनी अधिकार की बात नहीं कर रहे हैं। एक व्यक्ति जिसका सब कुछ वहीं पर खो गया था और उसे कुछ हासिल करने की तमन्ना भी नहीं थी, जिससे देश की नाक कट जाए। केवल जेएनयू के माहौल में रहकर जीने की खुशी थी। तो क्या जेएनयू के प्रशासन और वहाँ के स्टूडेंट्स नैतिकता के आधार पर विद्रोही को वहाँ रहने नहीं दे सकते थे?
11 मई, 1983 का जेएनयू का आंदोलन कैसा था यह आज को लोगों का जानना जरूरी है। जिससे कभी इस घटना की चर्चा हो तो ये पता चल सके कि उस समय क्या हुआ था। 11 मई, 1983 की शाम को जब मैं अपने पेरियार हॉस्टल से निकल कर गंगा की तरफ जा रहा था तब रास्ते में मैंने देखा कि कुछ पुलिस वाले लड़कियों के साथ छेड़खानी कर रहे थे। जहाँ वे छेड़खानी कर रहे थे, ठीक उसी जगह के पीछे कुलपति का बंगला था। उनका घेराव चल रहा था जिसके अड़तालीस घंटे बीत चुके थे। लड़कियाँ पुलिस वालों की छेड़खानी का प्रतिरोध कर रही थीं। मैं जब वहाँ पहुँचा तो मैंने भी पुलिस वालों के इस व्यवहार का विरोध किया। पुलिस वाले मेरी तरफ लाठी लेकर दौड़े। इस कारण मैंने एक पत्थर उठाकर उनकी ओर फेंक दिया। इससे छात्र बनाम पुलिस का जोरदार संघर्ष शुरू हो गया। मैं घायल होकर बेहोश हो गया था। गोली नहीं चली थी। र्इंट-पत्थर से ही लड़ाई हुई थी। फिर झेलम हॉस्टल के पीछे से पुलिस ने फायरिंग की। झेलम के पीछे जंगल जैसा था। पुलिस ने चेतावनी देने के साथ गिरफ़्तारी की घोषणा की। हमारी गिरफ़्तारी हुई थी और हम तिहाड़ जेल भेजे गए थे।
यह लड़ाई आम छात्रों के हितों को लेकर नहीं हुई थी। अप्रैल, मार्च और मई 1983 के दौरान जेएनयू की पुरानी प्रवेश नीति को बदलने का फरमान आ गया था। जिसके चलते छात्र संघ के साथ जनरल बॉडी मीटिंग बुलाई गई थी। मुझे याद है उसमें कॉमरेड सीताराम येचुरी भी आए थे। हालाँकि तब वे वहाँ के छात्र नहीं थे। शायद पीएचडी कर रहे थे लेकिन जेएनयू में रहते नहीं थे। उस बैठक में ये तय हुआ कि नई प्रवेश नीति का विरोध किया जाएगा। अप्रैल आते-आते यह भी तय हुआ कि यदि नई प्रवेश नीति का विरोध नहीं हुआ तो यह लागू कर दी जाएगी। नई प्रवेश नीति से कमजोर तबकों से आने वाले अभ्यर्थियों को बड़ा नुकसान होने वाला था क्योंकि इसके अंतर्गत ऐसे अभ्यर्थियों को मिलने वाले डिप्राइवेशन प्वाइंट हटा दिए जाने थे। इससे ग्रामीण और पिछड़े समाज से आने वाले छात्रों को जेएनयू में प्रवेश मिलना बहुत मुश्किल हो जाता। प्रोफेसर बिपिन चंद्रा की अगुवाई में इंदिरा गाँधी ने एक समिति बनाई थी। उसका नाम बिपिन चंद्रा कमेटी था। उसने प्रवेश नीति पर यह राय दी थी कि डिप्राइवेशन प्वाइंट्स समाप्त कर दिए जाएँ। इसके वाजिब विरोध में ही एक बड़े आंदोलन की बुनियाद पड़ रही थी, लेकिन उस समय का जेएनयू छात्र-संघ आंदोलन को विलंबित करता गया। जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया हमारा अविश्वास भी बढ़ता गया। फिर अप्रैल में एक दिन तय किया गया कि पहली मई से मास हंगर स्ट्राइक की जाएगी।
विद्रोही उस समय एमए हिन्दी द्वितीय वर्ष के छात्र थे। उनको यूनिवर्सिटी से निकाल दिया गया था। और स्कॉलरशिप भी बंद कर दी गई थी। उन्होंने छात्र संघ से लेकर कुलपति तक बहुत अपील की थी कि उन्हें बहाल कर दिया जाए। परंतु कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। हमने प्रशासन से उन्हें एक मौका देने का निवेदन किया। भारतीय भाषा केंद्र की अध्यक्ष मैडम चंद्रा से विद्रोही का कुछ विवाद हो गया था। मैडम चंद्रा ने उन्हें छात्र की तरह नहीं बल्कि प्रतिद्वंद्वी समझकर ट्रीट किया। इसलिए उन्हें निष्कासित कर दिया गया। उधर प्रवेश नीति वाले मामले में सीधे इंदिरा गाँधी इन्वॉल्व थीं। बिपिन चंद्रा को उन्होंने अपना मोहरा बना रखा था। प्रो. चंद्रा ने इस मामले में अपनी पूरी पहचान खो दी। वे लोग अभिजात वर्ग का साथ दे रहे थे और जेएनयू की इलीट परंपरा बरकरार रखना चाहते थे। इस प्रकार प्रो. बिपिन चंद्रा इन्दिरा गाँधी की राजनीति का शिकार हो रहे थे। इन्दिरा गाँधी की क्या पीड़ा थी? जब वे दोबारा प्रधानमंत्री बनीं तो जेएनयू की चांसलर भी थीं। और जब वे यूनिवर्सिटी आर्इं तो उनका जमकर विरोध किया गया। उन्हें ‘आपातकाल की हत्यारिन’ कहकर वापस जाओ का नारा लगाया गया। वे जिस विश्वविद्यालय की चांसलर थीं उसी में उन्हें घुसने तक नहीं दिया गया। उनका मानना था कि वे बड़ी लीडर हैं और जनता पार्टी को हराकर पुन: सत्ता में आई हैं। जेएनयू के छात्रों द्वारा उन्हें कोई अहमियत न दिये जाने से वे खिसियाई हुई थीं। इसलिए जेएनयू की दशा बदलने के लिए उन्होंने बिपिन चंद्रा का इस्तेमाल किया था।

इस बीच मैंने और विद्रोही ने फैसला लिया कि 26 अप्रैल से ही वे आमरण अनशन पर बैठ जाएँ। कुलपति के कार्यालय के नीचे। और वे आमरण अनशन पर बैठ गए। कुलपति ने कुछ भाड़े के लोगों को ठीक हमारे सामने अनशन पर बिठा दिया। वे दस से पाँच बजे वाले थे और एक्स्पोज हो गए। छात्र-संघ एक बड़ी साजिश का शिकार हो रहा था। जेएनयू के अध्यक्ष उस समय नलिनरंजन मोहंती थे। जो मेरे अच्छे मित्र भी थे। अनशन से विद्रोही की हालत खराब हो रही थी। डॉक्टर ने जाँच के उपरांत जो रिपोर्ट दी थी उसमें विद्रोही की हालत चिंताजनक बताई गई थी। थाने से यह दबाव बढ़ गया था कि हमें गिरफ़्तार कर लिया जाए। हमने कहा कि हमें गिरफ़्तार कर लीजिऐ, डराइए मत। हम डरने वाले लोग नहीं हैं। 4 मई, 1983 को विद्रोही के मैरिड हॉस्टल का कमरा डबल लॉक कर दिया गया। उसी रात गोदावरी हॉस्टल में जेएनयू के सभी संगठनों की मीटिंग बुलाई गई। उसमें मैं और चमनलाल वक्ताथे। आज के प्रोफेसर चमनलाल और भगत सिंह के सबसे बड़े स्कॉलर, उस समय छात्र थे। हम दोनों आखिरी वक्ता थे। उसी रात विद्रोही के कमरे का ताला तोड़ दिया गया। ताला कैसे टूटा, यह एक अलग कहानी है। जब मैं डेढ़ बजे रात डाउन कैंपस पहुँचा तब विद्रोही वहाँ सो रहे थे। चीफ प्रोक्टर जो कि कोई सरदार जी थे, आकर मुझसे कहा – ‘यू हैव ब्रोकेन द लॉक ऑफ रूम नंबर ट्वेंटी मैरिड हॉस्टल!’ मैंने कहा, ‘आई हैव नॉट ओपेन ब्रोकेन दैट ऑल’ वे मुझसे बहस करने लगे। मैंने उकताकर कहा, ‘आप जाइए और जो भी कार्रवाई करनी हो कीजिए। किसका ताला टूट गया, मुझसे कोई मतलब नहीं।’ उनका कहना था कि ताला मैंने ही तोड़ा है। दूसरे दिन यानी 5 मई को मुझे चीफ प्रॉक्टर की ओर से नोटिस मिला कि आपने रमाशंकर यादव के कमरे का ताला तोड़ा है। जहाँ पर आमरण अनशन चल रहा था वहीं पर कार्यालय से लाकर नोटिस मुझे थमाया गया। उसी समय स्टूडेंट यूनियन ने झेलम छात्रावास के एक छात्र जलीस अहमद के कमरे का ताला तोड़कर लड़ाई को दूसरी तरफ मोड़ दिया। लड़ाई प्रवेश नीति के खिलाफ न रहकर कुछ और ही हो गई। फिर आधी रात को मुझे और विद्रोही को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस ने मुझे बहुत डराया और धमकाया। मेरे कंधे पर हथियार भी रख दिया। हमें धमकाते हुए पुलिस ने कहा कि वे हमें मारने ले जा रहे हैं। मैंने कहा, मार दो! इससे अच्छी जगह तुम्हें कहाँ मिलेगी? आई वांट टु डाय हियर!! मुझे और विद्रोही को अलग-अलग गाड़ी में ले जाया गया। एम्स ले जाने के बाद मुझे तीन बजे रात में छोड़ दिया गया। और विद्रोही को जेल भेज दिया गया।

विद्रोही न केवल एक अच्छे कवि थे बल्कि एक जननेता भी थे। वे केएनआई, सुल्तानपुर से बड़ी उम्मीदों और समाज बदलने का सपना अपनी आँखों में भरकर मेरे साथ आए थे। वहाँ के अपने हॉस्टल का दरवाजा खुला छोड़ कर…! विद्रोही मेरा प्यारा दोस्त! जिसे बहुत सताया गया, जिसके साथ अंतिम हदों तक अन्याय किया गया, उपेक्षा के अँधेरे कुएँ में डाल दिया गया। जिसके पास सफलता के नाम पर बर्बाद जीवन के सिवाय कुछ नहीं था, आज उसका जीवन कितना महान लगता है। उसकी कविता के अर्थों में उसकी परछाई चमकती हुई देखी जा सकती है। मेरे सच्चे कॉमरेड! तुम्हें क्रांतिकारी सलाम!
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असरार खान सुप्रसिद्ध पत्रकार और लेखक हैं, दिल्ली में रहते हैं।

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