Friday, April 19, 2024

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वह जनवरी 2018 का कोई दिन था जब हम चार साथी यानी अंगनूराम, शशांक, कृष्ण ठाकुर और मैं, कार्यालय में लंच करने के बाद हमेशा की तरह वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर के आसपास 10 मिनट की हल्की चहलकदमी करने के बाद अपने कार्यालय भवन के पीछे एक पेड़ की छाँव तले खड़े होकर देश-दुनिया के […]

वह जनवरी 2018 का कोई दिन था जब हम चार साथी यानी अंगनूराम, शशांक, कृष्ण ठाकुर और मैं, कार्यालय में लंच करने के बाद हमेशा की तरह वर्ल्ड ट्रेड सेंटर परिसर के आसपास 10 मिनट की हल्की चहलकदमी करने के बाद अपने कार्यालय भवन के पीछे एक पेड़ की छाँव तले खड़े होकर देश-दुनिया के कुछ ताजा समाचारों पर चिंतन-अनुचिंतन कर रहे थे। कुछ देर बाद चर्चा हमारे विभाग द्वारा आयोजित किए जाने वाले आगामी राजभाषा सम्मेलन की ओर मुड़ गई जो 19 और 20 जनवरी 2018 को लोनावाला, पुणे में होने जा रहा था। अधिकांश बैंकों, सरकारी कार्यालयों/उपक्रमों में आदि में जहाँ राजभाषा कर्मी तैनात हैं, वहाँ हर वर्ष अथवा दो वर्ष में एक बार दो या तीन दिवसीय राजभाषा सम्मेलन/संगोष्ठी आयोजित करने की परंपरा है जिसमें उस संस्था के सभी राजभाषा अधिकारी/ स्टाफ भाग लेते हैं। हमारे बैंक द्वारा भी समय-समय पर इस प्रकार के राजभाषा अधिकारी सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं। इन सम्मेलनों में सभी प्रतिभागी अपने-अपने अंचल/क्षेत्र/विभागों की राजभाषा प्रगति का संक्षिप्त लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं, अपनी नई पहलों एवं नवाचारों को साझा करते हैं और सामने आने वाली कठिनाइयों पर सामूहिक रूप से चर्चा-विमर्श कर उनका समाधान निकालने की कोशिश करते हैं। संस्था के वरिष्ठ अधिकारी उनकी शंकाओं का समाधान करते हैं। एक साथ मिल-बैठकर विस्तार से हिंदी कार्यान्वयन की अपेक्षाओं के विविध पहलुओं पर चर्चा कर रणनीतियाँ बनाई जाती हैं ताकि संस्था में राजभाषा हिंदी के कार्यान्वयन के लक्ष्यों को पूरा किया जा सके। इस प्रकार के सम्मेलन में अतिथि वक्ताओं के व्याख्यान/सत्र भी रखे जाते हैं जो अपने अनुभव, ज्ञान और मार्गदर्शन से प्रतिभागियों को लाभान्वित करते हैं। इन सम्मेलनों में एक-दो सत्र प्रबंधन कौशल और व्यक्तित्व विकास संबंधी विषयों पर भी रखे जाते हैं।

[bs-quote quote=”आम तौर पर हम यह मानकर चलते हैं कि जो व्यक्ति दृष्टिबाधित दिव्यांग है उसे अपने दायित्व निर्वाह में हम सामान्य व्यक्तियों की तुलना में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और उसे विशेषरूप से बनाये गये सॉफ्टवेयरों और किसी साथी की मदद की जरूरत पड़ती ही है। मालती ने बताया कि वह दिल्ली कार्यालय की अपनी सहयोगी शशि किरण और चंडीगढ़ कार्यालय की नेहा जैन के साथ आएँगी और सम्मेलन में सहभागिता करेगी। हम सभी ने उसके जज़्बे, लगन और भावना की सराहना की।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

हमारी चर्चा इस राजभाषा अधिकारी के सम्मेलन के सत्रों, आयोजन स्थल और वहाँ उपलब्ध सुविधाओं, अनुमानित खर्चों से होते हुए प्रतिभागियों की सहभागिता और उनकी पुष्टि के बिंदु तक आ पहुँची थी। पता चला कि पुणे, नागपुर, भुवनेश्वर और चेन्नई के हमारे सहयोगी अपरिहार्य कारणों से इस सम्मेलन में भाग नहीं ले पाएँगे। दिल्ली से दो सहयोगी शामिल होने जा रहे थे। ‘दिल्ली से दो…!’ यह हमारे लिए चौंकानेवाली सूचना थी क्योंकि वरिष्ठ साथी आने वाले नहीं थे और शेष दो नये सहयोगियों में से एक आंशिक दृष्टिबाधित दिव्यांग शशि किरण और दूसरी पूर्ण दृष्टिबाधित दिव्यांग मालती कुमारी थीं। इस सम्मेलन के लिए समन्वयकर्ता की भूमिका निभा रहे हमारे वरिष्ठ सहयोगी शशांक जी ने बताया कि उन्हें भी लगा था कि दिव्यांगता के चलते मालती कुमारी शायद इस सम्मेलन में भाग नहीं ले पाएँगी। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने मालती कुमारी से कहा कि आप शायद इस सम्मेलन में नहीं आ पाएँगी क्योंकि एक तो कार्यक्रम स्थल नजदीकी मुंबई या पुणे हवाईअड्डे से दूर है, दूसरे आपको चर्चा सत्रों से सक्रिय सहभागिता करने में कठिनाई हो सकती है। इस आशंका पर मालती कुमारी का उत्तर था, ‘नहीं सर, मैं भी सम्मेलन में भाग लेने आ रही हूँ क्योंकि मैं देखना चाहती हूँ कि वहाँ क्या-क्या सत्र/ चर्चा होती है और मुझे आप सबसे सीखने-जानने का मौका मिलेगा।’ शशांक जी ने जब गंभीर भाव से मालती कुमारी की यह बात हमारे सामने रखी तो हम चारों साथी कुछ देर के लिए निशब्द और भावुक हो गए। एक लड़की जो देख नहीं सकती है वह देखने की बात करती है। यह कैसे संभव है? शायद वह अपने कानों से सुनकर, मन के भावों से गुनकर सब कुछ देख-जान लेने की बात कर रही थी, जिसके बारे में हम सोच नहीं पाए थे।

सामाजिक आक्रोश और प्रतिकार का बिगुल हैं कविताएं

आम तौर पर हम यह मानकर चलते हैं कि जो व्यक्ति दृष्टिबाधित दिव्यांग है उसे अपने दायित्व निर्वाह में हम सामान्य व्यक्तियों की तुलना में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और उसे विशेषरूप से बनाये गये सॉफ्टवेयरों और किसी साथी की मदद की जरूरत पड़ती ही है। मालती ने बताया कि वह दिल्ली कार्यालय की अपनी सहयोगी शशि किरण और चंडीगढ़ कार्यालय की नेहा जैन के साथ आएँगी और सम्मेलन में सहभागिता करेगी। हम सभी ने उसके जज़्बे, लगन और भावना की सराहना की। हमें प्रसिद्ध पर्वतारोही अरुणिमा सिन्हा की बरबस याद आ गई जिसने रेल यात्रा के दौरान लुटेरों से हुए संघर्ष के दौरान हुई दुर्घटना में अपना एक पैर पूरी तरह से और दूसरे पैर को आंशिक रूप से गँवा देने के बाद भी माउंट एवरेस्ट सहित दुनिया की अन्य कई पर्वत चोटियों पर अपनी विजयश्री की पताका लहराई है और हमारे देश की लाखों-करोड़ों युवतियों, दिव्यांगों के लिए आज दृढ़ संकल्प शक्तिऔर अदम्य हौसले की जीती-जागती मिसाल है। अरुणिमा ने साबित कर दिखाया है कि इंसान में यदि अटूट जज़्बा हो और कुछ कर दिखाने की मन में आग हो तो दिव्यांगता भी हमारा रास्ता नहीं रोक सकती है।

[bs-quote quote=”इस सूची में ‘सोलफ्री’ संस्था के जरिये दिव्यांग महिलाओं के लिए काम करने वाली प्रीति श्रीनिवासन, विख्यात डॉक्टर और समाजेवी डॉक्टर सतेंद्र सिंह, मशहूर स्काई डाइवर साई प्रसाद विश्वनाथन, प्रसिद्ध पेंटर सुश्री साधना ढांड, बेंगलुरु की प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय पैरा एथलीट सुश्री माती कृष्णमूर्ति ढोला जिन्हें अर्जुन अवार्ड और पद्मश्री सम्मान भी प्राप्त हुए हैं, आदि शामिल हैं। दो संस्थानों के प्रमुख निक वुजिकिक के जन्म से ही दोनों हाथ और दोनों पाँव नहीं है किंतु आज वे पूरी दुनिया में मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में मशहूर हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

संसार में और हमारे भारत में भी ऐसे सैकड़ों-हजारे उदाहरण मौजूद है जहाँ दिव्यांग श्रेणी के माने जानेवाले प्रतिभाशाली लोगों ने अपने ज्ञान, कौशल और प्रतिभा के परचम लहराये हैं और साबित किया है कि वे सामान्य माने जाने वाले इंसानों से किसी मायने में उन्नीस नहीं हैं। ऐसे उदाहरणों में ऊपर अरुणिमा सिन्हा का जिक्र हो चुका है। अन्यों में मशहूर गीतकार-संगीतकार रवीन्द्र जैन, बचपन में दुर्घटना में एक पैर खो चुके बैटमिंटन चैंपियन गिरीश शर्मा, टी-20 ब्लाइंड क्रिकेट के महारथी शेखर नाइक, बचपन से पोलियोग्रस्त एच.एम. कृष्णन जिन्होंने 40 वर्ष तक सफलतापूर्वक पत्रकारिता की और अब एएएस म्यूजिक टेलिविजन के सीईओ हैं। सुधा चंद्रन ने सड़क दुर्घटना में अपना एक पैर खो दिया था, किंतु उन्होंने अभिनय और भारतीय शास्त्रीय नृत्य के क्षेत्र में खूब नाम कमाया है। राजेन्द्र सिंह राहेल 8 साल की उम्र में पोलियो से ग्रस्त हो गए थे और वे चल नहीं सकते थे। किंतु यह दिव्यांगता भी उनके सपनों को पूरा करने से उन्हें रोक नहीं सकी और 2014 के कॉमनवेल्थ खेलों में इन्होंने पॉवरलिफ्टिंग में रजत पदक जीतकर इतिहास रच दिया था। सुरेश अडवाणी 8 साल की उम्र में पोलियो के शिकार हो गए थे लेकिन आपने डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी की और कैंसर के प्रसिद्ध डॉक्टर बने। आपको 2002 में पद्मश्री और 2012 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था। वर्ष 2016 में ब्राजील में संपन्न हुए पैरा-ओलंपिक खेलों में हाई जंप में स्वर्ण पदक जीतने वाले मरियप्पन थंगावेलू, कांस्य पदक जीतने वाले वरुण सिंह भाटी, शॉटपुट में रजत पदक जीतनेवाली दीपा मलिक और भाला फेंक (जैवलिन थ्रो) स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीतने वाले देवेंद्र झाझरिया जैसे दिव्यांग खिलाड़ियों को हम कैसे भुला सकते हैं?
इस सूची में ‘सोलफ्री’ संस्था के जरिये दिव्यांग महिलाओं के लिए काम करने वाली प्रीति श्रीनिवासन, विख्यात डॉक्टर और समाजेवी डॉक्टर सतेंद्र सिंह, मशहूर स्काई डाइवर साई प्रसाद विश्वनाथन, प्रसिद्ध पेंटर सुश्री साधना ढांड, बेंगलुरु की प्रसिद्ध अंतर्राष्ट्रीय पैरा एथलीट सुश्री माती कृष्णमूर्ति ढोला जिन्हें अर्जुन अवार्ड और पद्मश्री सम्मान भी प्राप्त हुए हैं, आदि शामिल हैं। दो संस्थानों के प्रमुख निक वुजिकिक के जन्म से ही दोनों हाथ और दोनों पाँव नहीं है किंतु आज वे पूरी दुनिया में मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में मशहूर हैं। निक की कहानी एक मिसाल बन गई है और लाखों लोगों को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। यह सूची बहुत लंबी है किंतु स्थानाभाव के केवल कुछ ही उदाहरण यहाँ दिए जा रहे हैं। भारत के अलावा संसार के अन्य देशों में हजारों ऐसे व्यक्ति हुए हैं जिन्होंने शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद अपने-अपने क्षेत्रों में सफलता के परचम फहराए हैं और दुनिया को दाँतों तले अंगुलियाँ दबाने को विवश किया है।

आइए, आपको ले चलता हूँ दिनाँक 20 जनवरी 2018 को लोनावाला में संपन्न हुए हमारे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन की ओर जहाँ हमारे दिल्ली के अंचल कार्यालय की उपर्युक्त दोनों दिव्यांग सहयोगी भी भाग ले रही थीं। प्रारंभिक सत्र में सभी प्रतिभागियों को अपने बारे में, अपनी जीवन यात्रा के बारे संक्षेप में कहने का अवसर दिया गया था। बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश की मूल निवासी शशि किरण ने बताया कि वर्ष 2010 में उसके सिर में गंभीर ब्रेन ट्यूमर हो गया था। किंतु उसके परिवार ने हिम्मत नहीं हारी और उसके मनोबल को कम नहीं होने दिया। उसकी जिजीविषा, सतत चिकित्सा और ईश्वर कृपा से उनकी ब्रेन ट्यूमर की बीमारी तो ठीक हो गई किंतु दोनो आँखों में रोशनी बहुत कम रह गई। इसके बावजूद शशि ने लगन से एमए और बीएड की पढ़ाई पूरी की और कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया। उसने अपनी लगन और मेहनत से प्रतियोगी परीक्षा पासकर हमारे बैंक में हिंदी अधिकारी के रूप में नियुक्ति पाई और आज हमारी संस्था के दिल्ली अंचल कार्यालय में सफलतापूर्वक काम कर रही हैं। शशि को लिखने-पढ़ने और गीत-संगीत का भी शौक है।
सुश्री मालती कुमारी बिहार के हाजीपुर जिले से हैं। जन्म से पूर्ण दृष्टि दिव्यांगता के कारण इनके परिवारवाले इनके भविष्य के बारे में सोचकर दु:खी रहते थे और ईश्वर को इस नाइंसाफी के लिए कोसते रहते थे। किंतु अपनी लगन और तीव्र स्मरण शक्ति के बलबूते पर मालती ने 10वीं की परीक्षा पास की। जब घरवालों ने आगे की पढ़ाई के लिए इंटर कॉलेज में नाम लिखाने से मना कर दिया तो वे एक दिन खुद ही अपने घर के पास के इंटर कॉलेज में अपना नाम लिखाने गईं। वहाँ भी इन्हें पूरी तरह दृष्टिबाधित पाकर हतोत्साहित किया गया और प्रवेश देने से मना कर दिया गया। तब इन्होंने पुलिस थाने में जाकर शिकायत की और पुलिस के हस्तक्षेप से इंटर कॉलेज में इन्हें दाखिला मिला। इसके बाद इन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इंटर की परीक्षा पास की। बीए, एमए और बी एड भी किया और संगीत में डिप्लोमा भी किया। मालती ने भी कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया। आपने जनवरी 2017 में बैंक की प्रतियोगी परीक्षा में हिस्सा लिया और चयनित होकर हमारे बैंक में हिंदी अधिकारी के रूप में नियुक्त हुईं। मालती कुमारी को अनेक कविताएँ, ग़ज़लें, गीत, फिल्मी नगमें आदि कंठस्थ हैं और वह खूब डूबकर गाती है। मालती मौलिक कविताएँ/ गीत/ ग़ज़ल भी लिखती हैं।

[bs-quote quote=”सामान्य व्यक्ति को एक सुई भी चुभ जाए तो वह दर्द से बिलबिलाने लगता है। किंतु दिव्यांग लोगों के जीवन के बारे में हमें सोचना चाहिए जिन्होंने गंभीर बीमारी, दुर्घटना आदि के कारण अपने शरीर के प्रमुख अंगों को खो दिया है अथवा जो जन्म से ही दिव्यांग रहे हैं। सुपरहीरो/हीरोइन वे नहीं है जिन्हें हम सिनेमा या टीवी के पर्दे पर ‘अविश्वनीय’ मारधाड़ अथवा स्टंट करते देखते हैं और जाने-अनजाने उनके लिए तालियाँ/ सीटियाँ बजाते हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

सच कहूँ तो हमारा यह सम्मेलन जिन उपलब्धियों के लिए आगे भी स्मृतियों में बना रहेगा, उनमें शशि किरण और मालती कुमारी का हौसला और सक्रिय सहभागिता सबसे ऊपर रहेगी। इनके जज़्बे को सलाम…इनकी प्रतिभा को नमन। मन की आँखों से भी देश-जहान को देखने-परखने और जानने की इनकी क्षमता को भी नमन और अभिनंदन।
जब हम ‘विकलांग’ या ‘दिव्यांग’ शब्द सुनते हैं तो हमारे जेहन में अनजाने ही एक ऐसे बेबस और लाचार इंसान की तस्वीर उभरती है जो दुनिया में दया और सहानुभूति के सहारे जीने के लिए अभिशप्त होता है। किंतु यह गलत और निर्मूल धारणा है। वास्तव में दिव्यांगता हमारे दिमाग की ऊपज है। हमारे बीच लाखों लोग ऐसे मिलेंगे जो बेकार और निठल्ले बनकर घूम रहे हैं और अपनी नाकामियों के लिए अपने अभिभावकों, शिक्षा प्रणाली, सरकार और अपने भाग्य को कोसते फिर रहे हैं। वे शरीर से पूरी तरह फिट हैं और अधिकांश पढ़े-लिखे भी हैं किंतु इतना होकर भी वे जीवन से हताश और निराश हैं। दूसरी ओर हमारे सामने सैकड़ों-हजारों ऐसे दिव्यांग हैं जो यह साबित कर रहे हैं कि जब आपके इरादे पक्के हों, मन में लक्ष्य की धुन लगी हो और अपनी सफलता पर विश्वास हो तो दुनिया की कोई ताकत आपको अपने लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।
सामान्य व्यक्ति को एक सुई भी चुभ जाए तो वह दर्द से बिलबिलाने लगता है। किंतु दिव्यांग लोगों के जीवन के बारे में हमें सोचना चाहिए जिन्होंने गंभीर बीमारी, दुर्घटना आदि के कारण अपने शरीर के प्रमुख अंगों को खो दिया है अथवा जो जन्म से ही दिव्यांग रहे हैं। सुपरहीरो/हीरोइन वे नहीं है जिन्हें हम सिनेमा या टीवी के पर्दे पर ‘अविश्वनीय’ मारधाड़ अथवा स्टंट करते देखते हैं और जाने-अनजाने उनके लिए तालियाँ/ सीटियाँ बजाते हैं। वास्तव में सच्चे सुपरहीरो/हीरोइन तो ये लोग हैं जिन्होंने अपनी विकलांगता/ दिव्यांगता के बावजूद अपनी हिम्मत, अपने हौसले और अपनी लगन में कोई कमी नहीं आने दी और तमाम प्रतिकूल बाधाओं/ अड़चनों/ समस्याओं को सफलतापूर्वक पार करते हुए न केवल अपने लिए सफल मुकाम बनाया बल्कि हजारों-लाखों अन्य लोगों को भी अपने उदाहरण से प्रेरित कर रहे हैं।
प्रसिद्ध कवि सोहनलाल द्विवेदी की पंक्तियाँ- ‘लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती, कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।’ इन संकल्पवान और धुन की पक्की दिव्यांग प्रतिभाओं पर पूरी तरह लागू होती है। वुजुकिक निक भी कहते हैं जब दूसरे लोग अपने सपनों को हासिल कर सकते हैं तो हमें भी कोशिश करनी चाहिए। हमें नाकामी से डरना नहीं चाहिए और किसी बात के लिए हिचक भी नहीं होनी चाहिए। किसी बात के लिए शर्म भी नहीं करनी चाहिए। हमारी इन दोनों सहयोगियों ने निक की इस सलाह को मान अपना ध्येय बना लिया है और अपने बुलंद हौसले से मंजिल की ओर बढ़ चली हैं क्योंकि इन्हें पता है- पंख होने से कुछ नहीं होता… हौसले से उड़ान होती है।

गुलाबचंद यादव बैंक में सेवारत हैं और फिलहाल मुंबई में रहते हैं ।

 

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