एमके स्टालिन : बहुजनों के मोदी !

एच. एल. दुसाध

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हाल के दिनों में तमिलनाडु के स्टालिन सरकार से जुड़ी कोई भी खबर फेसबुक पर लोगों को खूब आकर्षित कर रही है। इसी क्रम में 22 सितम्बर को फेसबुक पर यह पोस्ट- तमिलनाडु में सभी सरकारी कॉलेजों, इंजीनियरिंग, मेडिकल और विश्वविद्यालयों में एडमिशन पाने वाले बच्चों की पढ़ाई मुफ्त होगी- लोगों द्वारा खूब लाइक किया जा रहा था। मैंने इस पोस्ट को पढने के बाद ‘एमके स्टालिन: बहुजनों के मोदी’ शीर्षक से यह पोस्ट डाला’। पिछले 8- 10 दिनों से मुझ में यह यकीन पैदा होते जा रहा है कि एमके स्टालिन बहुजनों के मोदी हैं। कारण , जिस तरह मोदी ने पीएम के रूप में अब तक जुनून की हद तक राजसत्ता का संपूर्ण इस्तेमाल संविधान को व्यर्थ एवं सवर्णों को और शक्ति- संपन्न करने में किया हैं, उसी तरह एमके स्टालिन ने सीएम के रूप में अपने छोटे से कार्यकाल का जुनून की हद तक इस्तेमाल बहुजनों को शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक,धार्मिक में वाजिब हिस्सेदारी दिलाने तथा मोदी द्वारा बेअसर कर दिये गए संविधान की मर्यादा को पुनर्प्रतिष्ठित करने में किया है। अबतक का उनका कार्यकाल देखते हुए मुक्त हृदय से मुझे यह घोषणा करने में कोई द्विधा नहीं कि स्टालिन नई सदी में सामाजिक न्याय के सबसे बड़े योद्धा के रूप में उभरे हैं। यदि उनके काम करने की निरंतरता इसी तरह बनी रही और 2024 में यदि मूलनिवासी बहुजन समाज की ओर से उन को मोदी के खिलाफ उतारा जाता है तो बहुजन भारत पूरी तरह तबाह होने से बच जायेगा। ऐसा मेरा आंकलन है और दुसाध का पॉलिटिकल आंकलन सामान्यतया सही साबित होता रहा है’।

अब जहाँ तक भारत का सवाल है इस देश में सामाजिक न्याय की स्थापना का काम आंबेडकरी आरक्षण से शुरू हुआ। आंबेडकरी आरक्षण और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत तबकों को कानून/संविधान के जोर से उनका प्राप्य दिलाने का नाम है आरक्षण। इस आरक्षण से सबसे पहले सदियों से बंद पड़े शक्ति के स्रोत मुक्त हुए एससी/ एसटी के लिए।

 

 फेसबुक पर पैदा हुआ : स्टालिन के समर्थन में सैलाब !

अपने पोस्ट में मोदी के मुकाबले स्टालिन को खड़ा करने के बाद मैं यह सोचकर परेशान हो उठा कि कहीं लोग इसका मखौल तो नहीं उड़ायेंगे। क्योंकि स्टालिन का काम सुदूर दक्षिण भारत में बोल रहा है और जो लोग मेरा पोस्ट पढ़ते हैं वे हिंदी भाषी इलाके के हैं, जो सामान्यतया इस बात से मतलब नहीं रखते कि दक्षिण में क्या हो रहा है। ऐसे में महज तीन- चार माह पूर्व सत्ता संभाले स्टालिन को नयी सदी में सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा योद्धा तथा अप्रतिरोध्य मोदी के बहुजन विकल्प के रूप में खड़ा करना हास्यास्पद लग सकता है। किन्तु मुझे विस्मित करते हुए लोगों ने मेरी राय के समर्थन का सैलाब पैदा कर दिया। 24 घंटे में 150 के करीब लोगों ने लाइक, जबकि दो दर्जन से ज्यादे ने कमेन्ट कर मेरे पोस्ट को सराहा और समर्थन किया। पैथोज कुमार ने लिखा,’ जी बिलकुल सर! एमके स्टालिन सर को कुछ ही दिन हुए हैं सत्ता में आए हुए, पर एक के बाद एक धड़ाधड़ बहुजन का जो हक और अधिकार है उसे पूर्ण रूप से तमिलनाडु में लागू कर रहे हैं’। हीरालाल पासवान ने लिखा,’ करेक्ट!’ तो पंकज ने लिखा,’ राईट सर!’  मदन पासवान ने खुलकर लिखा,’ बिल्कुल सहमत’! दिलीप हजारी ने भी मेरे पोस्ट समर्थन करते हुए लिखा,’बिल्कुल सही।‘दीपक कुमार मांझी की राय भी औरों जैसी रही। उन्होंने भी कमेन्ट किया, ‘जी बिल्कुल सही’ रविन्द्र सिंह यादव ने आह्लादित होकर लिखा,’ वाह! शानदार.!’ राज कुमार ने राय दिया,’ सही बात बहुजन नेतृत्व का गुण तो स्टालिन महोदय के अंदर झलक रहा है बस आप मुद्दों को ऐसे ही सबके सामने रखें, परिवर्तन तय है’। वरिष्ठ राजनीतिक विचारक गणपत मंडल ने भी मेरे विचार का समर्थन करते हुए लिखा, ’बिल्कुल सही सर’। बिंदा कुमारी ने समर्थन करते हुए कहा,’ जबरदस्त बात!’ युवा चिन्तक ज्योतिबा अशोक ने लिखा,’ क्या नेता है बन्दा !’ वरिष्ठ सामाजिक चिन्तक भीम शरण हंस ने कमेन्ट किया,’ आप का विचार और मोदी के सही विकल्प की अनिवार्यता, दोनों देश हित मे फलदायी होगा’। चर्चित सोशल एक्टिविस्ट रामदेव विश्वबंधु ने लिखा ‘सहमत’! पी.एल. आदर्श ने समर्थन करते हुए लिखा,’100 प्रतिशत सही’। प्रशांत कुमार परमाणु ने कुछ और आगे बढ़कर राय दिया,’ स्टालिन को बनना चाहिए अगला प्रधानमंत्री.!’ फायर ब्रांड बहुजन युवा अजय राज ने लिखा, ’ईंट का जवाब पत्थर से देने वाले बहुजननायक स्टालिन साहब को बहुजन समाज का नेतृत्व करने का अवसर जरूर मिलना चाहिए’।

विकास राज ने कहा, ‘आपके विचार से हम सहमत हैं 100 प्रतिशत सही कहा है आपने.’ प्राख्यात बहुजन चिन्तक बुद्ध शरण हंस ने भी कमेन्ट किया, ‘पूरी तरह सहमत’। देव साँची ने भी हंस साहब की ही भांति लिखा,’ सहमत!’बेहद मुखर अधिवक्ता और सामाजिक न्याय के प्रखर हिमायती कँवर सिंह बदलिया ने भी मेरी बात का समर्थन करते हुए लिखा, मेरा आँकलन भी बिल्कुल ऐसा ही है। 20 सितंबर को मैं कोर्ट में अपने चैम्बर में 4-5 वकील साथियों से चर्चा कर रहा था, तब मैंने उन्हें कहा कि स्टालिनजी थांथई पेरियार का अनुयायी और संविधान प्रेमी हैं और वह मोदी जी को अच्छी तरह से पटखनी दे सकते हैं। आज देश में स्टालिन, ममता, केजरीवाल या तेजस्वी ही ऐसे नेता हैं, जो मोदी को हरा सकते हैं। करण कुमार ने लिखा, ’बिलकुल सही कहा सर आपने! ’विपिन कुमार राजपासी ने मेरी बात का समर्थन करते हुए लिखा,’ सर आप बिलकुल ठीक फरमा रहे है बहोत सही और सटीक बात बोली है आपने। मैं खुद बहोत इम्प्रेस हूँ उनकी सोच और काम से’। तो कुल मिलाकर प्रायः दो दर्जन लोगों ने खुलकर मेरी बात का समर्थन किया: विरोध में एकभी व्यक्ति सामने नहीं आया। कमेन्ट करने वालों में एकमात्र अपवाद रहे विपिन विष्णुपूरी ,जिन्होंने बहुत ही निरीह भाव से यह कमेन्ट किया, ’यह बहुजनों के मोदी का मतलब? मैंने उन्हें प्रत्युत्तर में लिखा, ’मोदी एक ऐसे नेता के प्रतीक हैं, जिसने अपने वर्गीय(सवर्ण) हित में राजसत्ता के इस्तेमाल का बेनजीर अध्याय रचा है। जो काम मोदी ने सवर्णों के हित में किया, वही स्टालिन बहुजनों के लिए कर रहे हैं। बहरहाल बहुतों को इस लेख का उपरोक्त अंश पढ़कर अभी भी विश्वास नहीं हो रहा होगा कि जिस शख्स को सीएम की कुर्सी संभाले बमुश्किल 4 माह हुए हैं, उसने ऐसा क्या कर दिया लोगों को उसे नयी सदी में सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा योद्धा तथा मोदी जैसे बेहद शक्तिशाली व लोकप्रिय नेता का विकल्प मानने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है। कारणों की तह में जाने के लिए सामाजिक न्याय और उसका इतिहास जान लेना होगा।

बहरहाल बहुतों को इस लेख का उपरोक्त अंश पढ़कर अभी भी विश्वास नहीं हो रहा होगा कि जिस शख्स को सीएम की कुर्सी संभाले बमुश्किल 4 माह हुए हैं, उसने ऐसा क्या कर दिया लोगों को उसे नयी सदी में सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा योद्धा तथा मोदी जैसे बेहद शक्तिशाली व लोकप्रिय नेता का विकल्प मानने में कोई दिक्कत नहीं हो रही है। कारणों की तह में जाने के लिए सामाजिक न्याय और उसका इतिहास जान लेना होगा।

 

सामाजिक न्याय बनाम सामाजिक अन्याय !

वैसे तो सामाजिक न्याय की कोई निर्दिष्ट परिभाषा नहीं है, किन्तु विभिन्न समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जाति, नस्ल, लिंग, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर विभाजित समाज के विभिन्न समूहों में से कुछे एक का शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक- से जबरन बहिष्कार ही सामाजिक अन्याय कहलाता है। अगर शक्ति के स्रोतों से जबरन बहिष्कार ही सामाजिक अन्याय है तो सामाजिक अन्याय के शिकार लोगों को प्रयास पूर्वक शक्ति के स्रोतों में उनका प्राप्य दिलाना ही सामाजिक न्याय है। जहाँ तक सामाजिक अन्याय के शिकार लोगों का सवाल है दुनिया भर में स्त्री क रूप में विद्यमान आधी आबादी सर्वत्र ही सामाजिक अन्याय का शिकार रही। सामाजिक अन्याय के शिकार लोगों में दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका के ब्लैक्स तथा सारी दुनिया के मूलनिवासी रहे, जहाँ दूसरे मुल्कों से आये आक्रान्ताओं ने उन्हें पराधीन बनाकर शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत कर दिया। किन्तु जब सामाजिक अन्याय के सर्वाधिक शिकार लोगों को चिन्हित किया जायेगा तो उसमें शीर्ष पर दलित, आदिवासी और पिछड़ों से युक्त बहुजन समाज लोग ही नजर आयेंगे, जिन्हें हिन्दू धर्म के प्राणाधार वर्ण-व्यवस्था द्वारा शक्ति के स्रोतों से इस निर्ममता से बहिष्कृत किया गया कि इन्हें अच्छा नाम रखने और देवालयों में प्रवेश कर ईश्वर के समक्ष दुःख मोचन का निवेदन करने तक का कोई अवसर नहीं रहा। बहरहाल सारी दुनिया में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई और कुछ नहीं, बल्कि शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत लोगों को शक्ति के स्रोतों में उनकी वाजिब हिस्सेदारी दिलाकर सामाजिक न्याय स्थापित करने की रही है। इसी क्रम में दुनिया भर में भूरि-भूरि महामानवों का उदय और लाखों पृष्ठों का साहित्य सृजन हुआ, सामाजिक न्याय को कायम करने के क्रम में ही इतिहास में लाखों-करोड़ों लोगों ने अपना प्राण-वलिदान किया.

मोदी :  स्वाधीन भारत के सबसे बड़े सामाजिक अन्यायकारी शासक!

अब जहाँ तक भारत का सवाल है इस देश में सामाजिक न्याय की स्थापना का काम आंबेडकरी आरक्षण से शुरू हुआ। आंबेडकरी आरक्षण और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत तबकों को कानून/संविधान के जोर से उनका प्राप्य दिलाने का नाम है आरक्षण। इस आरक्षण से सबसे पहले सदियों से बंद पड़े शक्ति के स्रोत मुक्त हुए एससी/ एसटी के लिए। बाद में जब 7 अगस्त , 1990 को प्रकशित मंडल रिपोर्ट के जरिये यही आरक्षण पिछड़ों को सुलभ हुआ, भारत में रचित हो गया सामाजिक न्याय का सुनहला अध्याय है। किन्तु ऐसा होते ही ही आधुनिक भारत में नए सिरे से प्रवाहमान हुई सामाजिक अन्याय की एक नयी धारा, जिसकी सभ्यतर होती आधुनिक दुनिया में कल्पना भी नहीं की जा सकती। मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होते ही हिन्दू धर्म के सुविधाभोगी वर्ग के तमाम तबके – छात्र और उनके अभिभावक, लेखक – कलाकार, साधु-संत, धन्ना सेठ और राजनीतिक दल- सभी अपने-अपने तरीके से उस आरक्षण के खात्मे में जुट गए, जिसके जरिये हजारों साल बाद भारत में सामाजिक न्याय की धारा प्रवाहमान हुई थी। चूंकि कट्टर हिन्दुओं के लिए बहुजनों द्वारा सामाजिक न्याय का भोग अधर्म है, इसलिए इसकी जगह सामाजिक अन्याय की धारा प्रवाहमान करने के लिए हिंदुत्ववादी संघ परिवार ने छेड़ा था राम जन्मभूमि मुक्ति आन्दोलन, जिसकी जोर से आज कायम है उसकी तानाशाही सत्ता।  इस तानाशाही सत्ता के जोर से उसने 24 जुलाई,1991 को कांग्रेसी नरसिंह राव द्वारा इजाद किये गए नव उदारवादी अर्थनीति को हथियार बनाकर भारत में सामाजिक अन्याय का सैलाब पैदा कर दिया। उसके इस लक्ष्य में चैम्पियन बनकर उभरे हैं, नरेंद्र मोदी, जिन्होंने सामाजिक न्याय के खिलाफ विनिवेशीकरण को सबसे बड़ा हथियार बनाने वाले भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी तक को पूरी तरह बौना बना दिया है। वाजपेयी के बाद संघ प्रशिक्षित मोदी ने जिस तरह 2014 से सामाजिक न्याय के खिलाफ शत्रुतापूर्ण मनोभाव अपनाते हुए विनिवेशीकारण, निजीकरण और लैटरल इंट्री के जरिये बहुजनों को शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत करने का अभियान छेड़ा है, उससे हिन्दू धर्म का जन्मजात बहुसंख्य वंचित तबका नए सिरे से उस स्टेज में पहुँच गया है, जिस स्टेज में पहुँचकर दुनिया के तमाम वंचितों को शासकों के खिलाफ मुक्ति की लड़ाई में उतरना पड़ा।

वैसे तो सामाजिक न्याय की कोई निर्दिष्ट परिभाषा नहीं है, किन्तु विभिन्न समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जाति, नस्ल, लिंग, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर विभाजित समाज के विभिन्न समूहों में से कुछे एक का शासकों द्वारा शक्ति के स्रोतों- आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक- से जबरन बहिष्कार ही सामाजिक अन्याय कहलाता है। अगर शक्ति के स्रोतों से जबरन बहिष्कार ही सामाजिक अन्याय है तो सामाजिक अन्याय के शिकार लोगों को प्रयास पूर्वक शक्ति के स्रोतों में उनका प्राप्य दिलाना ही सामाजिक न्याय है।

 

सामाजिक अन्याय के सैलाब के मध्य चट्टान बनकर उभरे : एमके स्टालिन !

बहरहाल मोदी ने जिस तरह भारत में सामाजिक न्याय को अतीत का विषय बनाने के लिए रेल, हवाई अड्डों, चिकित्सालयों, शिक्षालयों इत्यादि सहित देश की सारी संपत्तियां बेचने और संविधान को व्यर्थ के लिए अपनी तानाशाही सत्ता का इस्तेमाल किया, उससे बहुजन समाज पूरी तरह उद्भ्रांत होकर निराशा के सागर में डूब गया। जिन बहुजन नायक / नायिकाओं से उसे सामाजिक अन्याय की धारा को रोकने की उम्मीद थी, वे प्रकारांतर में मोदी के सहयोगी की भूमिका में अवतरित हो गए थे। ऐसी निराशाजनक स्थिति में पेरियार के योग्यतम अनुयायी करुणानिधि के पुत्र एमके स्टालिन ने 7 मई, 2021 को तमिलनाडु के सत्ता की बागडोर संभाला और देखते ही देखते अल्पकाल के मध्य ही वह बहुजनों की आशा और आकांक्षा के प्रतीक बन गए। अब जो स्टालिन कुछेक माह के मध्य ही मोदी एंड क. द्वारा गुलामों की स्थिति में पहुंचाए गए लोगों की आशा और आकांक्षा के प्रत्तीक बन गए, उनके विषय में थोडा विस्तार से न बताना पाठकों के प्रति अन्याय होगा।

विकिपीडिया बताता है एमके स्टालिन एक भारतीय राजनीतिज्ञ और पूर्व अभिनेता हैं, जिनका पूरा नाम मुथुवेल करूणानिधि स्टालिन है। वह तमिलनाडु के मशहूर राजनेता करुणानिधि के तीसरे बेटे हैं, जिनका जन्म 1 मार्च, 1953 को उनकी दूसरी पत्नी श्रीमती दयालु अम्मल की जठर से हुआ। उनका नामकरण रूस के चर्चित नेता उस जोसेफ स्टालिन नाम पर हुआ, जिनकी मृत्यु उनके जन्म के वर्ष में ही हुई थी। एमके अलागिरी उनके बड़े भाई हैं, जबकि विवादित कनिमोझी उनकी सौतेली बहन हैं। मद्रास विश्वविद्यालय के नन्दनम आर्ट्स कॉलेज से इतिहास में अपनी स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी करने वाले स्टालिन ने 1980 के दशक के दौरान कुछ तमिल फ़िल्मों में भी काम किया है। उन्होंने 1990 के दशक के मध्य में सन टीवी के टेलीविजन धारावाहिकों में भी अभिनय किया है। 2006 के विधानसभा चुनावों के बाद तमिलनाडु सरकार में ग्रामीण विकास और स्थानीय प्रशासन मन्त्री बने और 29 मई 2009 को उन्हें राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला द्वारा तमिलनाडु के उप-मुख्यमन्त्री के रूप में नामित किया गया था।  बाद में उप-मुख्यमंत्री से आगे बढ़कर 7 मई, 2021 को वह तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बने। लेकिन  दक्षिण भारत के चर्चित राजनीतिक परिवार में जन्म ग्रहण करने के बावजूद उनका मुख्यमंत्री तक का सफ़र नाटकीय रूप में द्रुत गति से तय न होकर संघर्षों भरा रहा, जो महज 14 वर्ष की आयु में 1967 में चुनाव प्रचार से शुरू हुआ। 1973 में स्टालिन का द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) की आम समिति में निर्वाचित किया गया था.आपातकाल में वे उस समय सुर्खियों में आए, जब उन्हें आपातकाल का विरोध करने के लिए आन्तरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा) के तहत जेल में बन्द कर दिया गया। राजनीति में उत्थान के लिए वंशवाद का आरोप झेलने वाले स्टालिन को मीसा के तहत 1975 में पहली बार गिरफ्तार किये जाने के बाद विभिन्न सार्वजनिक मुद्दों पर कई बार गिरफ्तार किया गया और उन्हें पूर्व में गम्भीर शारीरिक दण्ड भी दिया जा चुका है। 1989 के बाद से तमिलनाडु विधानसभा के लिए चेन्नई के थाउजेंड लाइट्स निर्वाचन क्षेत्र से चार बार चुने गए स्टालिन 1996 में इस नगर के पहले सीधे तौर पर निर्वाचित मेयर बन। बाद में फिर 2001 में एक बार फिर से मेयर चुने गए, जिसे लेकर काफी विवाद हुआ।

तमिलनाडु में 2009 के लोकसभा चुनाव में चुनाव प्रचार और अन्ततः डीएमके-गठबन्धन (संप्रग) की जीत में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले स्टालिन 1989 और 1996 में मात्र एक विधायक ही रहे, जबकि उनके पिता करुणानिधि मुख्यमन्त्री थे। लेकिन उन्हें मन्त्रिमण्डल में शामिल नहीं किया गया था। उन्होंने अपनी लड़ाई खुद लड़ी और 1996 में चेन्नई के 44 वें मेयर बने, जिसमें उन्हें पहले सीधे तौर पर निर्वाचित मेयर के रूप में चुना गया था।

 

तमिलनाडु में 2009 के लोकसभा चुनाव में चुनाव प्रचार और अन्ततः डीएमके-गठबन्धन (संप्रग) की जीत में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले स्टालिन 1989 और 1996 में मात्र एक विधायक ही रहे, जबकि उनके पिता करुणानिधि मुख्यमन्त्री थे। लेकिन उन्हें मन्त्रिमण्डल में शामिल नहीं किया गया था। उन्होंने अपनी लड़ाई खुद लड़ी और 1996 में चेन्नई के 44 वें मेयर बने, जिसमें उन्हें पहले सीधे तौर पर निर्वाचित मेयर के रूप में चुना गया था। विधायक के रूप में यह उनका चौथा कार्यकाल था, जब उन्हें करुणानिधि मन्त्रिमण्डल में एक मंत्री बनाया गया, इस तरह उम्र के 14 वें वर्ष में शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफ़र धीमी गति के साथ मुख्यमंत्री तक की यात्रा तय किया। बहरहाल पेरियार से प्रेरित होकर राजनीति में प्रवेश करने वाले एम करूणानिधि ने सामाजिक न्याय के अध्याय में कई पन्ने जोड़ रखे थे। ऐसे में जब उनकी काबिल संतान एमके स्टालिन ने तमिलनाडु के सत्ता की बागडोर थामी, पेरियारवादियों को उम्मीद थी कि वह मोदी द्वारा बहाए गए सामाजिक अन्याय के सैलाब के खिलाफ एक चट्टान के रूप में अवतरित होंगे और हुए भी !

सीएम के रूप में स्टालिन के काम

7 अगस्त, 2021 को 33 मंत्रियों के साथ पद और गोपनीयता की शपथ लेने वाले स्टालिन का अबतक का कार्यकाल चौकाने वाले रहा है। सीएम के रूप में अपने शुरुआती फैसलों में उन्होंने तमिलनाडु के लोगों के लिए 2000 रूपये की कोविड – 19 महामारी राहत राशि; आविन दूध के दाम में कटौती तथा महिलाओं के लिए सरकारी बसों में निशुल्क यात्रा के वे फैसले लिए, जिनका वादा उन्होंने अपने चुनावी घोषणापत्र में किया था। चुनावी घोषणापत्रों पर अमल करते हुए उन्होंने जुलाई के शेष में समाचार पत्रों और टेलीविजन चैनलों के खिलाफ मानहानि के 90 मामले भी वापस ले लिए। किन्तु ये सामाजिक न्याय की दिशा में चौकाने वाले फैसले नहीं थे। इस दिशा में पहला महत्वपूर्ण और यादगार फैसला आया 14 अगस्त को जब उन्होंने सरकार के 100 दिन पूरे होने पर 6 अप्रैल को संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के घोषणापत्र में दिये गए आश्वासन के मुताबिक मंदिरों में पुजारी पद के लिए प्रशिक्षण प्राप्त सभी जातियों के 24 अभ्यर्थियों को नियुक्ति दी। स्टालिन सरकार के इस बेहद क्रांतिकारी फैसले से तमिलनाडु हिन्दू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट डिपार्ट(एचआरएंडसीई) के अधीन आने वाले 36,000 मंदिरों में गैर- ब्राह्मण स्त्री – पुरुषों की नियुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो गया।

ब्राह्मणशाही के खात्मे की दिशा में सबसे बड़ा कदम 

मंदिरों के पुजारियों के नियुक्ति में सामाजिक और लैंगिक विविधता लागू करने करने का  स्टालिन सरकार का कदम भारत के धार्मिक सेक्टर के इतिहास में एक बहुत बड़ी क्रांतिकारी घटना के रूप में दर्ज हो गया। कारण, डॉ. आंबेडकर के शब्दों में समाज की शक्ति के रूप में जिस धार्मिक सेक्टर की अहमियत आर्थिक शक्ति के समतुल्य रही, उसमें इतने बड़े पैमाने पर गैर-ब्राह्मण पुजारियों की नियुक्ति के फैसले से ब्राह्मणों का हजारों साल का एकाधिकार ध्वस्त हो गया और उसमें सभी जातियों की भागीदारी सुनिश्चित हो गयी। ऐसा करके स्टालिन ने ब्राह्मणशाही के खात्मे की दिशा में सबसे बड़ा कदम उठा दिया. स्मरण रहे बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने अपनी सर्वोत्तम रचना  जाति के विनाश में प्रायः 85 वर्ष पूर्व   ब्राह्मणशाही के खात्मे के लिए पौरोहित्य के पेशे के प्रजातान्त्रिकरण का मार्ग सुझाया था, जिस पर अमल करने का बड़े पैमाने पर साहसिक निर्णय एमके स्टालिन ही ले सके। उनके इस फैसले से देश भर में फैले लाखों मंदिरों में गैर- ब्राह्मणों की नियुक्ति का रास्ता खुल गया है।

मठों – मंदिरों के जमीन पर नजर आने लगेंगे : शैक्षणिक संस्थान और शौपिंग माल्स!

इसके पहले अगस्त के पहले सप्ताह में मंदिरों के जमीन के उपयोग को लेकर सरकार की ओर से मानव संसाधन और हिन्दू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त मंत्री पीके शेखर बाबू ने घोषणा किया किया कि राज्य के विभिन्न मंदिरों की भूमि पर कॉलेज और शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण किया जायेगा। स्टालिन सरकार के धार्मिक मामलों के मंत्री की यह घोषणा भी किसी क्रांति से कम नहीं है। देश भर के मंदिरों के पास लाखों एकड़ भूमि पड़ी है, जिसका उपयोग परजीवी पण्डे-पुरोहित और भूमाफिया कर रहे हैं। स्टालिन सरकार यदि इस दिशा में अनुकरणीय कदम उठाती है तो लाखों एकड़ में फैले धार्मिक भूखंडों पर बड़े-बड़े शैक्षणिक संस्थान और शौपिंग माल्स नजर आने लगेंगे।

क्रांतिकारी फैसला है : प्रोफेशनल कोर्सों में सरकारी स्कूल के छात्रों के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण !

तमिलनाडु की स्टालिन सरकार ने राज्य सरकार द्वारा संचालित स्कूलों के छात्रों के लिए प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रस्ताव रखा है, वह भूमंडलीकारण के दौर के भारत की अनोखी घटना कही जाएगी। इसमें इंजीनियरिंग,कृषि,पशु चिकित्सा और अन्य शामिल हैं। 26 अगस्त को इस आशय का बिल विधानसभा में पेश करते हुए मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने कहा हैयह कोटा बिलउन छात्रों पर लागू होगा,जिन्होंने राज्य के स्कूलों में छठी से 12 वीं कक्षा तक पढ़ाई की है। सरकारी स्कूल के छात्रों को प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश में वरीयता के आधार पर 7.5 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया जाएगा। उन्होंने इसके पक्ष में युक्ति खड़ा करते हुए कहा कि सरकारी स्कूल के छात्र व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश पाने में असमर्थ थे, क्योंकि वे सामाजिक-आर्थिक असमानता के कारण निजी स्कूलों के अपने समकक्षों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते थे। पिछले कुछ वर्षों में, राज्य के सरकारी स्कूलों के कम छात्रों को व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में प्रवेश मिला है। 2020-21 के दौरान, अन्ना विश्वविद्यालय में केवल 0.83 प्रतिशत सरकारी छात्रों, सरकारी संस्थानों में 6.31 प्रतिशत, सहायता प्राप्त इंजीनियरिंग कॉलेजों में 0.44 प्रतिशत, जबकि 3 प्रतिशत को पशु चिकित्सा पाठ्यक्रम में प्रवेश मिला। सीएम ने कहा केवल 3.7 प्रतिशत सरकारी स्कूल के छात्रों को मत्स्य पालन में,कृषि में 4.89 प्रतिशत और तिरुचिरापल्ली में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय में 1 प्रतिशत से भी कम प्रवेश मिला है।

इसके पहले अगस्त के पहले सप्ताह में मंदिरों के जमीन के उपयोग को लेकर सरकार की ओर से मानव संसाधन और हिन्दू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्त मंत्री पीके शेखर बाबू ने घोषणा किया किया कि राज्य के विभिन्न मंदिरों की भूमि पर कॉलेज और शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण किया जायेगा। स्टालिन सरकार के धार्मिक मामलों के मंत्री की यह घोषणा भी किसी क्रांति से कम नहीं है। देश भर के मंदिरों के पास लाखों एकड़ भूमि पड़ी है, जिसका उपयोग परजीवी पण्डे-पुरोहित और भूमाफिया कर रहे हैं।

 

इंजीनियरिंग और अन्य प्रोफेशनल कोर्स में सरकारी स्कूली छात्रों के कम प्रवेश के कारणों का आकलन और विश्लेषण करने के लिए गठित जस्टिस मुरुगेसन आयोग ने अपने निष्कर्षों में कहा था कि छात्रों को एक नुकसानदेह स्थिति में होने के कारण, अपनी स्कूली शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए और अधिक सुविधाओं की आवश्यकता होती है। सरकारी स्कूल के छात्रों के पिछले नामांकन को ध्यान में रखते हुए, आयोग ने सिफारिश की कि इंजीनियरिंग, कृषि, पशु चिकित्सा, मत्स्य पालन, कानून और अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों में कम से कम 10 प्रतिशत सीटें वरीयता प्रदान करने के लिए अलग रखी जा सकती हैं। आयोग की रिपोर्ट से यह स्पष्ट है कि सरकारी स्कूल के छात्रों और निजी स्कूल के छात्रों के बीच वास्तविक असमानता मौजूद है। सरकार ने आयोग की सिफारिशों की सावधानीपूर्वक जांच करने के बाद सकारात्मक कार्रवाई करने का फैसला किया है। ताकि सरकारी स्कूलों और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों के बीच वास्तविक समानता लाई जा सके। यही नहीं इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान मीडिया में यह भी खबर आ रही है कि स्टालिन सरकार ने एक ऐसी नीति बनायीं है, जिसके तहत सरकारी स्कूलों में पढ़े बच्चे जब इंजीनियरिंग, मेडिकल या अन्य किसी पेशेवर विषय की पढ़ाई के लिए चुने जायेंगे तो, तब उनकी फीस सरकार भरेगी।

24 जुलाई, 1991 आरक्षण के खात्मे के कुत्सित इरादे से नरसिंह राव ने जो नवउदारवादी अर्थनीति की शुरुआत की, उसका जिन क्षेत्रों में सामाजिक न्याय के लिहाज से सबसे बुरा प्रभाव पड़ा, उनमें एक क्षेत्र शिक्षा का रहा। निजीकरण के जरिये गुणवत्ती शिक्षा बहुजनों से दूर कर दी गयी, जिसके फलस्वरूप सरकारी क्षेत्र के शिक्षालय, भोजनालय में तब्दील होने के लिए अभिशप्त हुए। ऐसे स्कूलों में पढने वाले छात्रों के लिए प्रोफेशनल कोर्स सपना बनते गए। नवउदारीकरण की नीति ग्रहण करने के बाद सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कई सुझाव आये, कई कदम उठाये गए, पर, परिणाम प्रायः शून्य रहा। ऐसे में प्रोफेशन कोर्सों में स्टालिन सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों में पढ़े छात्रों के लिए 7. 5 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रयास, सरकारी स्कूलों का स्तर ऊँचा उठाने की दिशा में क्रांतिकारी कदम साबित होगा, इसके प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है।

नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन पर स्टालिन ने पकड़ी मोदी से अलग राह ! 

सामजिक न्याय का अंत करने लिए मोदी सरकार निजीकरण को जो अन्धाधुन बढ़ावा देती जा रही है, उसमें नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (National Monetization Pipeline) स्कीम अलग से लोगों का ध्यान खींच रही है, जिसके तहत वह सरकारी संपत्तियां बेंचकर 6 लाख करोड़ कमाने का मंसूबा पाल रही है। यह सरकार का सामाजिक न्याय के खिलाफ उठाये गए अबतक के सबसे खतरनाक फैसलों में से एक है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 3 सितम्बर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उनसेइस स्कीम पर पुनर्विचार करने की अपील करते हुए, इसे लागू करने से पहले सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और राज्य सरकारों की राय लेने का भी आग्रह किया। उन्होंने कहा, ‘देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए, इस तरह की बड़ी प्राइवेटाइजेशन एक्टिविटीसे अमूल्य सरकारी संपत्ति कुछ समूहों और बड़े प्राइवेट संस्थानों के हाथों में आ जाएगी’। स्टालिन ने पत्र में कहा, ‘सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की संपत्ति सार्वजनिक संपत्ति है। इनमें से कई भारत को एक औद्योगिक और आत्मनिर्भर देश के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इन्हें बनाने के लिए राज्य सरकारों और नागरिकों की जमीन दी गई है, इसलिए लोगों को इन संस्थानों पर गर्व और अधिकार है। हमें नहीं पता कि इस नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन योजना (NMP Scheme) का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा.इस स्कीम से सरकारी संपत्तियां कुछ ‘समूहों’ या बड़े निगमों के हाथों में चली जाएंगी’। सामाजिक न्याय का कोई विराट हिमायती ही इस किस्म का पत्र लिखकर सरकार के फैसले से असहमति जता सकता था।

नीट से बाहर आने का क्रांतिकारी फैसला !

बहरहाल सत्ता में आने के बाद एक से बढ़कर एक क्रांतिकारी कदम उठाकर राष्ट्र को विस्मित करते रहने वाली स्टालिन सरकार ने एक और चौकाने वाला कदम उठाते हुए 13 सितम्बर कोतमिलनाडु में नीट परीक्षा नहीं करवाने का विधेयक विधानसभा में पारित करवा दिया। कानून बनने के बाद राज्य में नीट परीक्षा आयोजित नहीं की जाएगी। सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए मेडिकल कॉलेजों में क्‍लास 12 के मार्क्‍स के आधार पर एडमिशन मिलेगा। सीएम एमके स्टालिन द्वारा पेश इस विधेयक का कांग्रेस,अन्नाद्रमुक,पीएमके और अन्य दलों ने समर्थन, जबकि  बीजेपी ने इस कदम का विरोध करते हुए बॉयकॉट किया।

24 जुलाई, 1991 आरक्षण के खात्मे के कुत्सित इरादे से नरसिंह राव ने जो नवउदारवादी अर्थनीति की शुरुआत की, उसका जिन क्षेत्रों में सामाजिक न्याय के लिहाज से सबसे बुरा प्रभाव पड़ा, उनमें एक क्षेत्र शिक्षा का रहा। निजीकरण के जरिये गुणवत्ती शिक्षा बहुजनों से दूर कर दी गयी, जिसके फलस्वरूप सरकारी क्षेत्र के शिक्षालय, भोजनालय में तब्दील होने के लिए अभिशप्त हुए।

बिल में हाई लेवल कमिटी के सुझावों का हवाला दिया गया है। सरकार ने इसमें ग्रेजुएट लेवल पर मेडिकल कोर्सों में प्रवेश के लिए नीट की बाध्यता समाप्त करने का फैसला लिया है। ऐसे कोर्सों में प्रवेश 12वीं की परीक्षा में मिले मार्क्‍स के आधार पर किया जाएगा। प्रावधानों के अनुसार, तमिलनाडु के मेडिकल कॉलेजों में स्नातक स्तर के पाठ्यक्रमों में मेडिकल,डेंटल,आयुर्वेद और होम्योपैथी में क्‍लास 12 में प्राप्त अंकों के आधार पर एडमिशन मिलेगा। तमिलनाडु सरकार ने सरकारी स्‍कूलों से पढ़े छात्रों को मेडिकल कॉलेजों की कुल सीटों में 7.5 फीसदी रिजर्वेशन देने का प्रस्‍ताव किया है।
इस बिल के साथ राज्‍य सरकार की मंशा है कि उसके राज्‍य में छात्र सेंट्रल एग्‍जाम पर निर्भर नहीं रहें। उन्‍हें इससे छूट मिले। छात्रों के लिए मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए एकमात्र जरिया नीट ही न रहे। इसका मकसद सामाजिक न्‍याय और पिछड़े और आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों के छात्रों को भेदभाव से बचाना है। राज्‍य सरकार का कहना है कि राष्‍ट्रीय स्‍तर पर सिर्फ एक दिन होने वाली परीक्षा के कारण बच्‍चों पर भारी तनाव रहता है। वहीं,इंजीनियरिंग के छात्रों के पास राज्‍य और राष्‍ट्रीय स्‍तर दोनों तरह के एग्‍जाम में बैठने का विकल्‍प मौजूद होता है। नीट राज्‍य और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मेडिकल में दाखिला पाने की इच्‍छा रखने वाले स्‍टूडेंट के लिए एकमात्र रास्‍ता है। नीट से अलग होने का यह विधेयक यूँ ही नहीं पेश किया है। सरकार ने नीट प्रवेश परीक्षा के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव के असर का अध्‍ययन करने के लिए एक समिति गठित की थी, जिसने पाया था कि नीट के आधार पर मेडिकल कॉलेजों में दाखिला पाने वाले छात्रों का प्रदर्शन क्‍लास 12 के स्‍कोर पर एडमिशन पाने वाले स्‍टूडेंट के मुकाबले कमतर रहता है। अध्ययन से यह भी पता चला था कि अमीर परिवार के बच्‍चे एग्‍जाम में बेहतर स्‍कोर कर लेते हैं। बहरहाल राज्‍य में बिल तो पास हो गया है, लेकिन इसे कानून बनना बाकी है। अब इसे गवर्नर के समक्ष पेश किया जाएगा। उनके पास चार विकल्‍प होंगे। पहला, इसे मंजूरी देने का। दूसरा, राष्‍ट्रपति के पास विचार करने के लिए भेजने का। तीसरा,इसे रोक लेने का. चौथा, दोबारा बिल को विचार के लिए विधायिका के पास भेज देने का।

अगर स्टालिन सामाजिक न्याय का सैलाब पैदा कर सकते हैं तो…

बहरहाल महज चार माह के कार्यकाल में एमके स्टालिन ने जो क्रांतिकारी निर्णय लिए हैं, क्या उसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह नयी सदी में सामाजिक न्याय के सबसे बड़े नायक के रूप में उभरे हैं। नयी सदी में भारत के शासक वर्ग द्वारा सामाजिक अन्याय का सैलाब पैदा करने का जो प्रयास हुआ, उसके खिलाफ स्टालिन जैसा साहसिक कदम किसी ने नहीं उठाया। खासतौर शक्ति के चार प्रमुख स्रोतों में दो – शैक्षिक और धार्मिक- के मोर्चे पर स्टालिन ने जो चमत्कारिक निर्णय लिया है, वह उन्हें सामाजिक न्याय के दूसरेनायकों के मुकाबले एक अलग स्थान प्रदान करता है। ऐसा लगता है वह शासक वर्गों की हर उस साजिश की काट पैदा कर सकते हैं, जिसे नवउदारवादी नीति के सहारे अंजाम दिया जा रहा है। ऐसे में उन्हें बहुजनों का मोदी बताना क्या गलत है? और अगर एमके स्टालिन बहुजनों के मोदी हैं तो 2024 में सामाजिक अन्याय के शिखर पुरुष नरेंद्र मोदी के मुकाबले स्टालिन जैसे श्रेष्ठतम सामाजिक न्याय के नायक को खड़ा करना क्या बेहतर कदम नहीं होगा? ऐसे में अगर लगता है एमके स्टालिन मोदी द्वारा बहाई गयी सामाजिक अन्याय की धारा को रोककर सामाजिक न्याय का सैलाब पैदा कर सकते हैं, कंवर सिंह बदलिया के शब्दों में वह मोदी को पटखनी दे सकते हैं तो समय गंवाए बिना बहुजन बुद्धिजीवी वर्ग को अभी से इस दिशा में अपना कर्तव्य स्थिर कर लेना चाहिए।

 

 

 

 

 

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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